अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 704, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३१ * ६७७
अस्सी अक्षरोंकी ‘कृति’$^१$, छिहत्तर अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^२$, बहत्तर अक्षरोंकी ‘धृति’$^३$, अड़सठ अक्षरोंकी ‘अत्यष्टि’$^४$, चौसठ अक्षरोंकी ‘अष्टि’$^५$, साठ अक्षरोंकी ‘अतिशक्वरी’$^६$, छप्पन अक्षरोंकी ‘शक्वरी’$^७$, बावन अक्षरोंकी ‘अतिजगती’$^८$ तथा अड़तालीस अक्षरोंकी ‘जगती’$^९$ होती है। यहाँतक केवल वैदिक छन्द हैं। यहाँसे आगे लौकिक छन्दका अधिकार है। ‘गायत्री’से लेकर ‘त्रिष्टुप्’ तक जो आर्षछन्द वैदिक छन्दोंमें गिनाये गये हैं, वे लौकिक छन्द भी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—त्रिष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती, अनुष्टुप्, उष्णिक् और गायत्री। गायत्री छन्दमें क्रमशः एक-एक अक्षरकी कमी होनेपर ‘सुप्रतिष्ठा’, ‘प्रतिष्ठा’, ‘मध्या’, ‘अत्युक्तात्युक्त’ तथा ‘आदि’ नामक छन्द होते हैं॥१-४॥
छन्दके चौथाई भागको ‘पाद’ या ‘चरण’ कहते हैं। [छन्द तीन प्रकारके हैं—गणच्छन्द, मात्रा-छन्द और अक्षरच्छन्द]। पहले ‘गणच्छन्द’ दिखलाया जाता है। चार लघु अक्षरोंकी ‘गण’ संज्ञा होती है। [‘आर्या’के लक्षणोंकी सिद्धि ही इस संज्ञाका प्रयोजन है।] ये गण पाँच हैं। कहीं आदि गुरु (ऽ।।), कहीं मध्य गुरु (।ऽ।), कहीं अन्त्य गुरु (।।ऽ), कहीं सर्वगुरु (ऽऽ) और कहीं चारों अक्षर लघु (।।।।) होते हैं। [एक ‘गुरु’ दो ‘लघु’ अक्षरोंके बराबर होता है; अतः जहाँ सब लघु हैं, वहाँ चार अक्षर तथा जहाँ सब गुरु हैं, वहाँ दो अक्षर दिखाये गये हैं।] अब ‘आर्या’का लक्षण बताया जाता है। साढ़े सात गणोंकी, अर्थात् तीस मात्राओं या तीस लघु अक्षरोंकी आधी ‘आर्या’ होती है। [आर्यामें गुरुवर्णको दो मात्रा या दो लघु मानकर गिनना चाहिये।] ‘आर्या’ छन्दके विषम गणोंमें जगण (।ऽ।)-का प्रयोग नहीं होता$^{१०}$। किंतु छठा गण अवश्य जगण (।ऽ।) होना चाहिये।$^{११}$ अथवा वह नगण और लघु यानी सब-का-सब लघु भी हो सकता है। जब छठा गण सब-का-सब लघु हो तो उस गणके द्वितीय अक्षरसे सुबन्त या तिङन्तलक्षण पदसंज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१२}$ यदि छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) हो और सातवाँ गण भी सर्वलघु ही हो, तो सातवें गणके प्रथम अक्षरसे ‘पद’ संज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१३}$ इसी प्रकार जब आर्याके उत्तरार्ध-भागमें पाँचवाँ गण सर्वलघु हो तो उसके प्रथम अक्षरसे ही पदका आरम्भ होता है।$^{१४}$ आर्याके उत्तरार्ध भागमें छठा गण एकमात्र लघु अक्षरका (।) होता है।$^{१५}$ जिस आर्याके पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें
१. यजुर्वेदे—‘सुपर्णोऽसि गरुत्मॉस्त्रिः सत्रिवृत्ते शिरो गायत्रम्’ इत्यादि (१७।७२)। २. ऋग्वेदे—‘स हि शर्धो न मारुतं तु विष्णोणि’ इत्यादि (१।१२७।६)। ३. ऋग्वेदे—‘अवमह इन्द्र दादृहि श्रुधि नः शुशोच हि द्यौः०’ इत्यादि (१।१३३।६)। ४. ऋग्वेदे—‘अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिः०’ इत्यादि (१।१३६।२)। ५. ऋग्वेदे—‘त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तु विषुष्म’ इत्यादि (२।२२।१)। ६. ऋग्वेदे—‘सार्कं जातः क्रतुना साकभोजसा ववक्षिथ’ इत्यादि (२।२२।३)। ७. ऋग्वेदे—‘प्रीस्वस्मै पुरोरथं, इन्द्राय शषमर्चत्०’ इत्यादि। ८. मन्त्रब्राह्मणे—‘मा ते गृहेषु निशि घोष उत्था०’ इत्यादि। ९. सामवेदे—‘इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया। भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसदि, अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥’ (६६)
१०. उदाहरण— द्वीपादप्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ ११. सा जयति जगत्यार्या देवी दिवमुत्पतिष्णुरतिरुपिरा। यादृश्यत गगनतले कंसवधोत्पातविद्युदिव॥ १२. रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः। पादस्पर्शसुखादिव मीलितनयनोऽभवद् यस्याः॥ यहाँ ‘मि सपदि’ यही छठा गण है, इसमें द्वितीय अक्षरसे पदका आरम्भ है। १३. ब्रह्मक्षत्रकुलीनः प्रलीनसामन्तचक्रनुतचरणः। सकलसुकृतैकपुञ्जः श्रीमान् मुञ्जश्चिरं जयति॥ जयति भुवनैकवीरः सीरायुधतुलितविपुलबलविभवः। अनवरतवित्तवितरणनिर्जितचम्पाधिपो मुञ्जः॥ १४-१५. स जयति वाक्पतिराजः सकलार्थमनोरथैककल्पतरुः। प्रत्यर्थिभूतपार्थिवलक्ष्मीहठहरणदुर्ललितः॥