अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 706, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३१ * ६७९
आर्याके पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, उसे 'गीति'^१ नाम दिया गया है। तात्पर्य यह कि उसके उत्तरार्धमें भी छठा गण मध्यगुरु (। ऽ ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ आर्याके उत्तरार्धके समान ही पूर्वार्ध भी हो, उसे 'उपगीति'^२ कहते हैं। आर्याके पूर्वोक्त क्रमको विपरीत कर देनेपर 'उद्गीति'^३ नाम पड़ता है। सारांश यह कि उसमें पूर्वार्धको उत्तरार्धमें और उत्तरार्धको पूर्वार्धमें रखा जाता है। यदि पूर्वार्धमें आठ गण हों तो 'आर्यागीति'^४ नामक छन्द होता है। कोई विशेषता न होनेसे इसका उत्तरार्ध भी ऐसा ही समझना चाहिये। यहाँ भी छठे गणमें मध्यगुरु और सर्वलघु-इन दोनों विकल्पोंकी प्राप्ति थी, उसके स्थानमें केवल एक 'लघु'का विधान है॥९-१०$\frac{३}{४}$॥
अब 'मात्रा-छन्द' बतलाया जाता है। जहाँ विषम, अर्थात् प्रथम और तृतीय चरणमें चौदह लघु (मात्राएँ) हों और सम-द्वितीय, चतुर्थ
१. पथ्या-गीतिका उदाहरण- मधुरं वीणारणितं पञ्चमसुभगश्च कोकिलालापः। गीतिः पौरवधूनामधुना कुसुमायुधं प्रबोधयति॥ आदिविपुला-गीति- इयमपरा विपुला गीतिरुच्यते सर्वलोकहितहेतोः। यदनिष्टमात्मनस्तत्परेषु भवतापि मा क्वचित् कारि॥ पथ्या महाचपला-गीतिका उदाहरण- कामं चकास्ति गीतिर्मृगीदृशां सीधुपानचपलानाम्। मुखं च मुक्तलज्जं निरर्गलोल्लापमणितरमणीयम्॥ महाविपुला-महाचपला-गीतिका उदाहरण- पङ्केषुवल्लभः पञ्चमध्वनिस्तत्र भवति यदि विपुलः। चपलं करोति कामाकुलं मनः कामिनामसौ गीतिः॥ २. पथ्योपगीतिका उदाहरण- गान्धर्वं मकरध्वजदेवस्यास्त्रं जगद्विजायि। इति समवेक्ष्य मुमुक्षुभिरुपगीतिस्त्यज्यते देशः॥ महाविपुलोपगीतिका उदाहरण- विपुलोपगीतिझंकारमुखरिते भ्रमरमालानाम। रैवतकोपवने वस्तुमस्तु सततं मम प्रीतिः॥ पथ्या-महाचपलोपगीतिका उदाहरण- विषयाभिलाभिलाषः करोति चित्तं सदा चपलम्। वैराग्यभावनानां तथोपगीत्या भवेत् स्वस्थम्॥ महाविपुला महाचपलोपगीतिका उदाहरण- विपुलोपगीति संत्यज्यतामिदं स्थानकं भिक्षो। विषयाभिलाषदोषेण बाध्यते चञ्चलं चेतः॥ ३. पथ्योद्गीतिका उदाहरण- व्याध इवोद्गीतिरवैः प्रथमं तावन्मनो हरसि। दुर्नयकर विश्राम्यसि पश्चात् प्राणेषु विप्रियैः शल्यैः॥ महाविपुलोद्गीतिका उदाहरण- एषा तवापरोद्गीतिरत्र विपुला परिभ्रमति। तद्वल्लभामि यत्कीर्तिरखिलदिक्पालपार्श्वमुपयाति॥ पथ्यामहाचपलोद्गीतिका उदाहरण- उद्गीतिरत्र नित्यं प्रवर्त्तते कामचपलानाम्। तस्मान्मुने विमुञ्च प्रदेशमेतं समेतमेताभिः॥ महाविपुला महाचपलोद्गीतिका उदाहरण- विपुला पयोधरश्रोणिमण्डले चक्षुषोश्चपला। उद्गीतिशालिनी कामिनी च सा वर्णिनां मनो हरति॥ ४. पथ्या आर्यागीतिका उदाहरण- अजमजरममरमेकं प्रत्यक्तैन्यमीश्वरं ब्रह्म परम्। आत्मानं भावयती भवमुक्तिः स्यादितीयमार्यागीतिः॥ महाविपुला आर्यागीतिका उदाहरण- विपुलाभिलाषमृगतृष्णिका ध्रुवं हन्ति हरिणमिव हतहृदयम्। विपुलात्ममोक्षसुखकाङ्क्षिभिस्ततस्त्यज्यते विषयरससङ्गः॥ पथ्या जघनचपलार्यागीतिका उदाहरण- वाताहतोर्मिमालाचपलं सम्प्रेक्ष्य विषयसुखमल्पतरम्। मुक्त्वा समस्तसङ्गं तपोवनान्य्याश्रयन्ति तेनात्मविदः॥ महाविपुला महाचपला आर्यागीतिका उदाहरण- चपलानि चक्षुरादीनि चित्तहारी च हन्त हतविषयगणः। एकान्तशीलिनां योगिनामतो भवति परमसुखसम्प्राप्तिः॥