अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 707, कुल 878 में से
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चरणोंमें सोलह लघु हों तथा इनमेंसे प्रत्येक चरणके अन्तमें रगण (ऽ।ऽ), एक लघु और एक गुरु हो तो 'वैतालीय'¹ नामक छन्द होता है। [रगण, लघु और गुरु मिलाकर आठ मात्राएँ होती हैं, इनके सिवा प्रथम-तृतीय पादोंमें छः-छः मात्राएँ और द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें आठ-आठ मात्राएँ ही शेष रहती हैं। इन्हें जोड़कर ही चौदह-सोलह मात्राओंकी व्यवस्था की गयी है।] वैतालीय छन्दके अन्तमें एक गुरु और बढ़ जाय तो उसका नाम 'औपच्छन्दसक'² होता है॥ ११-१२॥
पूर्वोक्त वैतालीय छन्दके प्रत्येक चरणके अन्तमें जो रगण, लघु और गुरुकी व्यवस्था की गयी है, उसकी जगह यदि भगण और दो गुरु हो जायें तो उस छन्दका नाम 'आपातलिका'³ होता है। उपर्युक्त वैतालीय छन्दके अधिकारोंमें जो रगण आदिके द्वारा प्रत्येक चरणके अन्तमें आठ लकारों (मात्राओं)-का नियम किया गया है, उनको छोड़कर प्रत्येक चरणमें जो 'लकार' शेष रहते हैं, उनमेंसे सम लकार विषम लकारके साथ मिल नहीं सकता। अर्थात् दूसरा तीसरेके और चौथा पाँचवेंके साथ संयुक्त नहीं हो सकता; उसे पृथक् ही रखना चाहिये। इससे विषम लकारोंका सम लकारोंके साथ मेल अनुमोदित होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरणोंमें लगातार छः लकार पृथक्-पृथक् नहीं प्रयुक्त होने चाहिये। प्रथम और तृतीय चरणोंमें रुचिके अनुसार किया जा सकता है।⁴ अब 'प्राच्यवृत्ति' नामक वैतालीय छन्दका दिग्दर्शन कराया जाता है। जब दूसरे और चौथे चरणमें चतुर्थ लकार (मात्रा) पञ्चम लकारके साथ संयुक्त हो तो उसका नाम 'प्राच्यवृत्ति'⁵ होता है। [यद्यपि सम लकारका विषम लकारके साथ मिलना निषिद्ध किया गया है, तथापि वह सामान्य नियम है; प्राच्यवृत्ति आदि विशेष स्थलोंमें उस नियमका अपवाद होता है।] शेष लकार पूर्वोक्त प्रकारसे ही रहेंगे। जब प्रथम और तृतीय चरणमें दूसरा लकार तीसरेके साथ मिश्रित होता है, तब 'उदीच्यवृत्ति'⁶ नामक वैतालीय कहलाता है। शेष लकार पूर्वोक्त रूपमें ही रहते हैं। जब दोनों लक्षणोंकी एक साथ ही प्रवृत्ति
१. वैतालीय छन्दके विभिन्न उदाहरण—
(क) शुत्क्षीणशरीरसंचया व्यक्तीभूतशिरोऽस्थिपञ्जराः। केशैः परुषैस्तवारयो वैतालीयतनुं वितन्वते॥
(ख) तव तन्वि कटाक्षवीक्षितैः प्रसरद्भिः श्रवणान्तगोचरैः। विशिखैरिव तीक्ष्णकोटिभिः प्रहतः प्राणिति दुष्करं नरः॥
(ग) शवशोणितपङ्कचर्चितं पुरुषान्त्रग्रथितोर्ध्वमूर्धजम्। वपुरातपवह्निदीपितं वैतालीयमिदं विलोक्यताम्॥
२. औपच्छन्दसकका उदाहरण—
वाक्यैर्मधुरैः प्रतार्य पूर्वं यः पश्चादभि संदधाति मित्रम्। तं दुष्टमतिं विशिष्टगोष्ठ्यामौपच्छन्दसकं वदन्ति बाह्यम्॥
३. आपातलिकाका उदाहरण—
पिङ्गलकेशी कपिलाक्षी वाचाटा विकटोन्नतदन्ती। आपातलिका पुनरेषा नृपतिकुलेऽपि न भाग्यमुपैति॥
४. वैतालीय छन्दमें इसका उदाहरण—
समरशिरसि सह्यते द्विषां नवनिशितायुधवृष्टिरग्रतः। कुवलयदलदीर्घचक्षुषां प्रमदानां न कटाक्षवीक्षितम्॥
औपच्छन्दसकमें—
परयुवतिषु पुत्रभावमादौ कृत्वा प्रार्थयते पुनः पतित्वम्। इदमपरमिहोच्यते विशेषादौपच्छन्दसकं खलस्य वृत्तम्॥
आपातलिकामें—
अभिरमयति किंनरकण्ठी हंसगतिः श्रवणायतनेत्रा। विशदकमलकोमलाङ्गी युवतिरियं हृदयं तरुणानाम्॥
५. प्राच्यवृत्तिका उदाहरण—
विपुलार्थसुवाचकाक्षराः कस्य नाम न हरन्ति मानसम्। रसभावविशेषपेशलाः प्राच्यवृत्तिकविकाव्यसम्पदः॥
६. उदीच्यवृत्तिका उदाहरण—
अवाचकर्मनूर्जिताक्षरं श्रुतिदुष्टं यतिकष्टमक्रमम्। प्रसादरहितं च नेष्यते कविभिः काव्यमुदीच्यवृत्तिभिः॥