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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 708, कुल 878 में से

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पृष्ठ 708
  • अध्याय ३३१ * ६८१

हो, अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें पञ्चम लकारके साथ चौथा मिल जाय और प्रथम एवं तृतीय चरणोंमें तृतीयके साथ द्वितीय लकार संयुक्त हो जाय तो ‘प्रवृत्तिक’१ नामक छन्द होता है। जिस वैतालीय छन्दके चारों चरण विषम पादोंके ही अनुसार हों, अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारोंसे युक्त हो तथा द्वितीय लकार तृतीयसे मिला हो, उसे ‘चारुहासिनी’२ कहते हैं। जब चारों चरण सम पादोंके लक्षणसे युक्त हों अर्थात् सबमें सोलह लकार (मात्राएँ) हों और चतुर्थ लकार पञ्चमसे मिला हो तो उसका नाम ‘अपरान्तिका’३ है। जिसके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों, किंतु पादके अन्तिम अक्षर गुरु ही हों, उसे ‘मात्रासमक’४ नामक छन्द कहा गया है। साथ ही इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस ‘मात्रासमक’के चरणमें बारहवाँ लकार अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम ‘वानवासिका’५ है। जिसके चारों चरणोंमें पाँचवाँ और आठवाँ लकार लघुरूपमें ही स्थित रहता है, उसका नाम ‘विश्लोक’६ है। जहाँ नवाँ भी लघु हो, वह ‘चित्रा’७ नामक छन्द कहलाता है। जहाँ नवाँ लकार दसवेंके साथ मिलकर गुरु हो गया हो, वहाँ ‘उपचित्रा’८ नामक छन्द होता है। मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा और उपचित्रा—इन पाँचोंमें जिस-किसी भी छन्दके एक-एक पादको लेकर जब चार चरणोंका छन्द बनाया जाय, तब उसे ‘पादाकुलक’९ कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें सोलह लघु स्वरूपसे ही स्थित हों, किसीसे मिलकर गुरु न हो गये हों, उस छन्दका नाम ‘गीत्यार्या’१० है। इसी गीत्यार्यामें जब आधे भागकी सभी मात्राएँ गुरुरूपमें हों और आधे भागकी मात्राएँ लघुरूपमें तो उसका नाम ‘शिखा’ होता है। इसीके दो भेद हैं—पूर्वाधर्भागमें लघु-ही-लघु और उत्तरार्धमें गुरु-ही-गुरु हों तो उसका नाम ‘ज्योति’११ बताया गया है। इसके विपरीत पूर्वार्धभागमें सब गुरु और उत्तरार्धमें सब लघु हों तो ‘सौम्या’१२ नामक छन्द होता है। जब पूर्वार्धभागमें उन्तीस लकार और उत्तरार्धमें इकतीस लकार हों एवं अन्तिम दो लकारोंके स्थानमें एक-एक गुरु हो तो उसका नाम ‘चूलिका’१३

१. इदं भरतवंशभूभृतां श्रूयतां श्रुतिमनोरसायनम्। पवित्रमधिकं शुभोदयं व्यासवक्त्रकथितं प्रवृत्तकम्॥
२. मनाक्प्रसृतदन्तदीधितिः स्मरोल्लसितगण्डमण्डला। कटाक्षललिता तु कामिनी मनो हरति चारुहासिनी॥
३. स्थिरविलासनतमौक्तिकावली कमलकोमलाङ्गी मृगेक्षणा। हरति कस्य हृदयं न कामिनः सुरतकेलिकुशलापरान्तिका॥
४. अश्मश्रुमुखो विरलैर्दन्तैर्गम्भीराक्षो मितानासाग्रः। निर्मांसहनुः स्फुटितैः केशैर्मात्रासमकं लभते दुःखम्॥
५. मन्मथचापध्वनिरमणीयः सुरतमहोत्सवपटहनिनादः। वनवासस्त्रीस्वनितविशेषः कस्य न चित्तं रमयति पुंसः॥
६. भ्रातृगुणरहितं विश्लोकं दुर्नयचरणकदर्थितलोकम्। जातं महितकुलेऽप्यविनीतं मित्रं परिहर साधुविगीतम्॥
७. यदि वाञ्छसि परपदमारोढुं मैत्रीं परिहर सह वनिताभिः। मुह्यति मुनिरपि विषयात्सङ्गाच्चित्रा भवति हि मनसो वृत्तिः॥
८. यच्चित्तं गुरुसक्तमुदारं विद्याभ्यासमहाव्यसनं च। पृथ्वी तस्य गुणैरुपचित्रा चन्द्रमरीचिनिभैर्भवतीथम्॥
९. अलिवाचालितविकसितचूते काले मदनसमागमदूते। स्मृत्वा कान्तां विरहितसार्थः पादाकुलकं धावति पान्थः॥
(इसमें मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका और उपचित्राके चरण हैं।)
१०. मदकलखगकुलकलरवमुखरिणि विकसितसरसिजपरिमलसुरभिणि।
गिरिवरपरिसरसरसि महति खलु रतिरतिशयमिह मम हृदि विलसति॥
११. यदि सुखमनुपममपरमभिलषसि परिहर युवतिषु रतिमतिशयमिह।
आत्मज्योतिर्योगाभ्यासाद् दृष्ट्वा दुः खच्छेदं कुर्याः॥
१२. सौम्यां दृष्टिं देहि स्नेहाद् देहेऽस्माकं मानं मुक्त्वा।
शशधरमुखि सुखमुपनय मम हृदि मनसिजरुजमपहर लघुतरमिह॥
१३. रतिकरमलयमरुति शुभशशभृति समभिहतहिममहसि मधुसमये।
प्रवससि पथिक विरहितं कथमिह तु परिहृतयुवतिरतिचपलतया॥

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth