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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 878 में से

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पृष्ठ 709

६८२ * अग्निपुराण *

होता है। छन्दकी मात्राओंसे उसके अक्षरोंमें जितनी कमी हो, उतनी गुरुकी संख्या और अक्षरोंसे जितनी कमी गुरुकी संख्यामें हो, उतनी लघुकी संख्या मानी गयी है। तात्पर्य यह है$^१$ कि यदि कोई पूछे, इस आर्यामें कितने लघु और कितने गुरु हैं तो उस आर्याको लिखकर उसकी सभी मात्राओंकी गणना करके कहीं लिख ले, फिर अक्षरोंकी संख्या लिख ले। मात्राके अङ्कोंमेंसे अक्षरोंके अङ्क घटा दे; जितना बचे, वह गुरुकी संख्या हुई। इसी प्रकार अक्षरसंख्यामें गुरुकी संख्या घटा देनेपर जो बचे, वह लघु अक्षरोंकी संख्या होगी$^२$। इस प्रकार वर्ण आदिके अन्तरसे गुरु-लघु आदिका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये॥ १३-१८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दोजात्तिका निरूपण' नामक
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३१॥


तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय

विषमवृत्तका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—[छन्द या पद्य दो प्रकारके हैं—'जाति' और 'वृत्त'। यहाँतक 'जाति' छन्दोंका निरूपण किया गया, अब 'वृत्त'का वर्णन करते हैं—] वृत्तके तीन भेद हैं—सम, अर्धसम तथा विषम। इन तीनोंका प्रतिपादन करता हूँ। 'समवृत्त'की संख्यामें उतनी ही संख्यासे गुणा करे। इससे जो गुणनफल हो, उसे अर्धसमवृत्तकी संख्या समझनी चाहिये। इसी प्रकार 'अर्धसमवृत्त'की संख्यामें भी उसी संख्यासे गुणा करनेपर जो अङ्क उपलब्ध हो, वह 'विषमवृत्त'की संख्या है। विषमवृत्त और अर्धसमवृत्तकी संख्यामेंसे मूलराशि घटा देनी चाहिये। इससे शुद्ध विषम और शुद्ध अर्धसमवृत्तकी संख्याका ज्ञान होगा। [केवल गुणनसे जो संख्या ज्ञात होती है, वह मिश्रित होती है; उसमें अर्धसमके साथ सम और विषमके साथ अर्धसमकी संख्या भी सम्मिलित रहती है$^३$।] जो अनुष्टुप् छन्द प्रत्येक चरणमें गुरु और लघु अक्षरोंद्वारा समाप्त होता है, अर्थात् जिसके प्रत्येक


१. 'एकोनत्रिंशदन्ते' इत्यादिकी व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है—इकतीस मात्राएँ एवं अन्तमें गुरु होनेसे 'चूलिका' का आधा भाग सम्पन्न होता है। इस प्रकार इसके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दोनोंमें ही इकतीस-इकतीस मात्राएँ होती हैं तथा अन्तिम दो मात्राएँ गुरुके रूपमें रहती हैं। इस छन्दमें पादकी व्यवस्था नहीं है। इसका उदाहरण इस प्रकार है—
घनपरिमलमिलदलिकुलमुखरितनिखिलकमलवनमलयजवने ।
जनयति मनसि मम तु शशिमुखि मुदमतिशयितमिह मधुरयमधुना ॥
२. उदाहरणार्थ यह 'आर्या' छन्द प्रस्तुत है—
स्तनयुगलमश्रुस्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाग्नेः। चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुस्त्रीणाम् ॥
इसमें मात्रासंख्या ५७ है, इसमेंसे अक्षरसंख्या चालीस घटी, शेष बचा १७। इतने गुरुवर्ण हैं। अक्षरसंख्या ४० में १७ गुरुसंख्या घटा दी गयी। शेष २३ लघुसंख्या है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये।
३. इन सब भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये। गायत्री छन्दमें कितने समवृत्त, कितने अर्धसमवृत्त और कितने विषमवृत्त होंगे, इसकी संख्या दी जाती है। गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंका है। इसके चार भाग करनेपर एक-एक पादमें छः-छः अक्षर हो सकते हैं। इसमें वर्णप्रस्तारके नियमानुसार प्रस्तार करनेपर सर्वगुरुसे लेकर सर्वलघूतक चौंसठ भेद हो सकते हैं। ये सभी समवृत्तके भेद हैं। उपर्युक्त नियमानुसार समवृत्तकी संख्या चौंसठमें चौंसठका गुणा करनेपर ४०९६ होती है। यह सममिश्रित अर्धसमवृत्तकी संख्या हुई। पुनः इसमें इतनी ही संख्यासे गुणा करनेपर १६७७७२१६ होता है। यह सम अर्धसम-मिश्रित विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसमें मूलराशि गुण्य अङ्क ४०९६ को घटा देनेपर १६७७३१२० होता है। यह शुद्ध विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसी प्रकार ४०९६ में मूलराशि ६४ घटा देनेपर ४०३२ शेष रहा। यह 'शुद्ध अर्धसमवृत्त'की संख्या हुई।