अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 710, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ३३२ * | ६८३ |
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पादमें अन्तिम दो वर्ण क्रमशः गुरु-लघु होते हैं, उसे 'समानी'$^१$ नाम दिया गया है। जिसके चारों चरणोंके अन्तिम वर्ण क्रमशः लघु और गुरु हों, उसकी 'प्रमाणी'$^२$ संज्ञा है। इन दोनोंसे भिन्न स्थितिवाला छन्द 'वितान'$^३$ कहलाता है। [इसके अन्तिम दो वर्ण केवल लघु अथवा केवल गुरु भी हो सकते हैं।] यहाँसे तीन अध्यायोंतक 'पादस्य' इस पदका अधिकार है तथा 'पदचतुरूर्ध्व' छन्दके पहलेतक 'अनुष्टुब्वक्त्रम्'का अधिकार है। तात्पर्य यह कि आगे बताये जानेवाले कुछ अनुष्टुप् छन्द 'वक्त्र' संज्ञा धारण करते हैं। 'वक्त्र' जातिके छन्दमें पादके प्रथम अक्षरके पश्चात् सगण (॥ऽ) और नगण (॥।) नहीं प्रयुक्त होने चाहिये।$^४$ इन दोनोंके अतिरिक्त मगण आदि छः गणोंमेंसे किसी एक गणका प्रयोग हो सकता है। पादके चौथे अक्षरके बाद भगण (ऽ॥)-का प्रयोग करना उचित है।$^५$ जिस 'वक्त्र' जातिके छन्दमें द्वितीय और चतुर्थ पादके चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग हो, उसे 'पथ्या वक्त्र'$^६$ कहते हैं। किसी-किसीके मतमें इसके विपरीत न्यास करनेसे, अर्थात् प्रथम एवं तृतीय पादके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग करनेसे 'पथ्या'$^७$ संज्ञा होती है। जब विषम पादोंके चतुर्थ अक्षरके बाद नगण (॥।) हों तथा सम पादोंमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगण (।ऽऽ)-की ही स्थिति हो तो उस 'अनुष्टुब्वक्त्र'का नाम 'चपला'$^८$ होता है। जब सम पादोंमें सातवाँ अक्षर लघु हो, अर्थात् चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसका नाम 'विपुला'$^९$ होता है। [यहाँ सम पादोंमें तो सप्तम लघु होगा ही, विषम पादोंमें भी यगणको बाधितकर अन्य गण हो सकते हैं—यही 'विपुला' और 'पथ्या'का भेद है।] सैतव आचार्यके मतमें विपुलाके सम और विषम सभी पादोंमें सातवाँ अक्षर लघु होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादोंमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगणको बाध कर विकल्पसे भगण (ऽ॥), रगण (ऽ।ऽ), नगण (॥।) और तगण (ऽऽ।) आदि हों तो 'विपुला'$^{१०}$ छन्द होता है।
इस प्रकार 'विपुला' अनेक प्रकारकी होती है। यहाँतक 'वक्त्र' जातिके छन्दोंका वर्णन किया गया। अनुष्टुप् छन्दके प्रथम पादके पश्चात्
१. समानीका उदाहरण—
वासवोऽपि विक्रमेण यत्समानतां न याति। तस्य वल्लभेश्वरस्य केन तुल्यता क्रियेत॥
ॐ नमो जनार्दनाय पापसंघमोचनाय। दुष्टदैत्यमर्दनाय पुण्डरीकलोचनाय॥
२. प्रमाणीका उदाहरण—
सरोजयोनिरम्बरे रसातले तथाच्युतः। तव प्रयाणमीक्षितुं क्षमौ न तौ बभूवतुः॥
३. वितानका उदाहरण—
तृष्णां त्यज धर्मं भज पापे हृदयं मा कुरु। इष्टा यदि लक्ष्मीस्तव शिष्टामनिशं संश्रय॥
हृदयं यस्य विशालं गणनायोगसमानम्। लभतेऽसौ मणिवित्रं नृपतिमूर्धिन वितानम्॥
४. नवधाराम्बुसंसिक्तं वसुधागन्धिनिःश्वासम्। किंचिदुन्नतघोणाग्रं मही कामयते वक्त्रम्॥
५. दुर्भाषितेऽपि सौभाग्यं प्रायः प्रकुरुते प्रीतिः। मातुर्मनो हरन्त्येव दौर्लालित्योक्तिभिर्बालाः॥
६. उदाहरण—नित्यं नीतिनिषण्णस्य राज्ञो राष्ट्रं न सीदति। न हि पथ्याशिनः काये जायन्ते व्याधिवेदनाः॥
७. उदाहरण—भर्तुराज्ञानुवर्तिनी या स्त्री स्यात् सा स्थिरा लक्ष्मीः। स्वप्रभुत्वाभिमानिनी विपरीता परित्याज्या॥
८. उदाहरण—क्षीयमाणाग्रदशना वक्त्रनिर्मांसनासाग्रा। कन्यका वाक्यचपला लभते धूर्तसौभाग्यम्॥
९. उदाहरण—सैतवेन यथार्णवं तीर्णो दशरथात्मजः। रक्षःक्षयकरौं पुनः प्रतिज्ञां स्वेन बाहुना॥
१०. यगणके द्वारा उदाहरण—
इयं सखे चन्द्रमुखी स्मितज्योत्स्ना च मानिनी। इन्दीवराक्षी हृदयं दंदहीति तथापि मे॥
इसी प्रकार अन्य भी बहुत-से उदाहरण हो सकते हैं। 'विपुला' छन्दके पादोंका चौथा अक्षर प्रायः गुरु ही होता है।