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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 878 में से

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पृष्ठ 711

६८४ * अग्निपुराण *


जब प्रत्येक चरणमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जायें तो 'पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्द होता है। [तात्पर्य यह कि इसके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह, तृतीय पादमें सोलह और चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं।] उक्त छन्दके चारों चरणोंमें अन्तिम दो अक्षर गुरु हों तो उसकी 'आपीड²' संज्ञा होती है। [यहाँ अन्तिम अक्षरोंको गुरु बतलानेका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि शेष लघु ही होते हैं।] जब आदिके दो अक्षर गुरु और शेष सभी लघु हों तो उसका नाम 'प्रत्यापीड³' होता है। 'पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्दके प्रथम पादका द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर क्रमशः 'मञ्जरी⁴' 'लवली⁵' तथा 'अमृतधारा⁶' नामक छन्द होते हैं। (अर्थात् जब प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हों तो 'मञ्जरी' छन्द होता है। जब प्रथम पादके स्थानमें तृतीय पाद और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो 'लवली' छन्द होता है और जब प्रथम पादके स्थानमें चतुर्थ पाद और चतुर्थ पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो 'अमृतधारा' नामक छन्द होता है।) अब 'उद्गता' छन्दका प्रतिपादन किया जाता है। जहाँ प्रथम चरणमें सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (॥ऽ) और एक लघु—ये दस अक्षर हों, द्वितीय पादमें भी नगण (।।।), सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु—ये दस ही अक्षर हों, तृतीय पादमें भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु तथा एक गुरु—ये ग्यारह अक्षर हों तथा चतुर्थ चरणमें सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु—ये तेरह अक्षर हों, वह 'उद्गता⁷' नामवाला छन्द है। उद्गताके तृतीय चरणमें जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), भगण (ऽ।।) और एक गुरु—ये दस अक्षर हों तथा शेष तीन पाद पूर्ववत् ही रहें तो उसका नाम 'सौरभ⁸' होता है। उद्गताके तृतीय पादमें जब दो नगण और दो सगण हों और शेष चरण ज्यों-के-त्यों रहें तो उसकी 'ललित⁹' संज्ञा होती है। जिसके प्रथम चरणमें यगण, सगण, जगण, भगण और दो गुरु (अठारह अक्षर) हों, द्वितीय चरणमें सगण, नगण, जगण,


१. तस्याः कटाक्षविक्षेपैः कम्पिततनुकुटिलैरतिदीर्घः।
तक्षकदष्ट इवेन्द्रियशून्यः क्षतचैतन्यः, पदचतुरूर्ध्वं न चलति पुरुषः पतति सहसैव॥
—इसमें गुरु-लघुका विभाग नहीं होता।
२. कुसुमितसहकारे हतहिममहिमशुचिशशाङ्के।
विकसितकमलसरसि मधुसमयेऽस्मिन्, प्रवससि पथिकहतक यदि भवति तव विपत्तिः॥
३. चित्तं मम रमयति, कान्तं वनमिदमुपगिरिनदि।
कूजन्मधुकरकलवरकृतजनधृति, पुंस्कोकिलमुखरितसुरभिकुसुमोपचिततरुवति॥
४. जनयति महतीं प्रीतिं हृदये, कामिनां चूतमञ्जरी।
मिलदलिचक्रचञ्चुपरिचुम्बितकेसरा, कोमलमलवयातपरिनर्तिततरुशिखरस्थिता॥
५. विरहविधुरहूणकाङ्क्षनाकपोलोपमं, परिणतिधरं पीतपाण्डुच्छवि।
लवलीफलं निदाघे, भवति जगति हिमकरशीतलमतिस्वादूष्णहरम्॥
६. परिवाञ्छसि कर्णरसायनं सततममृतधाराभिर्यदि हृदि वा परमानन्दरसम्।
चेतः शृणु धरणीधरवाणीममृतमयी तत्काव्यगुणभूषणम्॥
७. मृगलोचना शशिमुखी च, रुचिरदशना नितम्बिनी।
हंसललितगमना ललना, परिणीयते यदि भवेत् कुलोद्गता॥
८. विनिवारितोऽपि नयनेन, तदपि किमिहागतो भवान्।
एतदेव तव सौरभकं यदुदीरितार्थमपि नावबुद्ध्यसे॥
९. सततं प्रियंवदमनूनममलहृदयं गुणोत्तरम्।
सुललितमतिकमनीयतनुं पुरुषं त्यजन्ति न तु जातु योषितः॥