अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३३ * ६८५
रगण और एक गुरु (तेरह अक्षर) हों, तृतीय चरणमें दो नगण और एक सगण (नौ अक्षर) हों तथा चतुर्थ चरणमें तीन नगण, एक जगण और एक भगण (पंद्रह अक्षर) हों, वह उपस्थित 'प्रचुपित'¹ नामक छन्द होता है। उक्त छन्दके तृतीय चरणमें जब क्रमशः दो नगण, एक सगण, फिर दो नगण और एक सगण (अठारह अक्षर) हों तो वह 'वर्धमान'² छन्द नाम धारण करता है। उसी छन्दमें तृतीय चरणके स्थानमें जब तगण, जगण और रगण (ये नौ अक्षर) हों तो वह 'शुद्ध विराषभ'³ छन्द कहलाता है। अब अर्धसमवृत्तका वर्णन करूँगा॥ १-१०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विषमवृत्तका वर्णन' नामक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३२॥
तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय
अर्धसमवृत्तोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, वह 'उपचित्रक'⁴ नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें तीन भगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय पादमें एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) एवं एक जगण हो, वह 'द्रुतमध्या'५ नामक छन्द होता है। [यहाँ भी प्रथम पादके समान तृतीय पाद और द्वितीय पादके समान चतुर्थ पाद जानना चाहिये। यही बात आगेके छन्दोंमें भी स्मरण रखनेयोग्य है।] जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण और एक गुरु तथा द्वितीय चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों, उस छन्दका नाम 'वेगवती'⁶ है। जिसके पहले पादमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु तथा दूसरे चरणमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु हों, वह 'भद्रविराट्'⁷ नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें सगण, जगण, सगण और एक गुरु तथा द्वितीय पादमें भगण, रगण, नगण और दो गुरु हों, उसका नाम 'केतुमती'⁸ है। जिसके पहले चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों तथा दूसरे चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो
१. रामा कामकरेणुका मृगायतनेत्रा, हृदयं हरति पयोधरावनम्रा।
इयमतिशयसुभगा, बहुविधनिधुवनकुशला ललिताङ्गी॥
२. बिम्बोष्ठि कठिनोन्नतस्तनाव्नताङ्गी, हरिणी शिशुनयना नितम्बगुर्वी।
जनयति मम मनसि मुदं मदिराक्षी, मदकलकरिगमना परिणतशशिवदना॥
३. कन्येयं कनकोज्ज्वला मनोहरदीप्तिः शशिनिर्मलवदना विशालनेत्रा।
पीनोरुनितम्बशालिनी सुखयति हृदयमतिशयं तरुणानाम्॥
४. उपचित्रकमत्र विराजते चूतवनं कुसुमैर्विकसद्भिः।
परपुष्टविघृष्टमनोहरं मन्मथकेलिनिकेतनमेतत्॥
५. यद्यपि शीघ्रगतिमद्रुगामी बहुधनवानपि दुःखमुपैति। नातिशयत्वरिता न च मृद्वी नृपतिगतिः कथिता द्रुतमध्या॥
६. तव मुञ्ज नराधिपसेनां वेगवतीं सहते समरेषु। प्रलयोर्मिमिवाभिमुखीं तां कः सकलक्षितिभृन्निवहेषु॥
७. यत्पादतले चकास्ति चक्रं हस्ते वा कुलिशं सरोरुहं वा।
राजा जगदेकचक्रवर्ती स्याच्छं भद्रविराट् समश्रुतेऽसौ॥
८. हतभूरिभूमिपतिचिह्नां युद्धसहस्रलब्धजयलक्ष्मीम्।
सहते न कोऽपि वसुधायां केतुमतीं नरेन्द्र तव सेनाम्॥