अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 716, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३४ * ६८९
छन्दका नाम 'रम्य'$^१$ एवं 'विलासिनी' है। [यहाँ पादान्तमें ही विराम होता है।]॥ ६-८॥
यहाँसे 'जगती' छन्दका अधिकार आरम्भ होता है [और 'प्रहर्षिणी'के पहलेतक रहता है]। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, तगण, जगण और रगण हों, उस छन्दका नाम 'वंशस्थ'$^२$ है। [यहाँ पादान्तमें विराम होता है।] दो तगण, जगण तथा रगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'इन्द्रवंशी'$^३$ कहते हैं। [यहाँ भी पादान्तमें ही विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार सगण हों, उसका नाम 'तोटक'$^४$ बताया गया है। जिसके प्रत्येक पादमें नगण, भगण, भगण और रगण हों, उसका नाम 'द्रुतविलम्बित'$^५$ है। ['तोटक' और 'द्रुतविलम्बित' दोनोंमें पादान्त-विराम ही माना गया है।] जिसके सभी चरणोंमें दो-दो नगण, एक-एक मगण तथा एक-एक यगण हों, उस छन्दका नाम 'श्रीपुट'$^६$ है। इसमें आठ और चार अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, सगण, जगण, सगणसे युक्त पादोंवाले छन्दको 'जलोद्धतगति'$^७$ कहते हैं। इसमें छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है। दो नगण, एक मगण तथा एक रगणसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम 'तत'$^८$ है। नगण, यगण, नगण, यगणसे युक्त पादवाला छन्द 'कुसुमविचित्रा'$^९$ कहलाता है। [इसमें भी छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और दो रगण हों, उसका नाम 'चञ्चलाक्षिका'$^{१०}$ है। [इसके भीतर सात-पाँचपर विराम होता है।] प्रत्येक पादमें चार यगण होनेसे 'भुजंगप्रयात'$^{११}$ और चार रगण होनेसे 'स्रग्विणी'$^{१२}$ नामक छन्द होता है। [इन दोनोंमें
१. विलासिनीविलासमोहितानां नृणां हृदि क्व सत्त्वशालि धैर्यम्।
स उर्वशीवशीकृतो नरेन्द्रस्तदर्थमुन्मना चचार भूमौ॥
२. विशुद्धवंशस्थमुदारचेष्टितं गुणप्रियं मित्रमुपात्तसज्जनम्।
विपत्तिमग्नस्य करावलम्बनं करोति यः प्राणपरिक्रयेण सः॥
३. कुर्वीत यो देवगुरुद्विजन्मनामुर्वीपतिः पालनमर्थलिप्सया।
तस्येन्द्रवंशेऽपि गृहीतजन्मनः संजायते श्रीः प्रतिकूलवर्तिनी॥
४. अमुना यमुनाजलकेलिकृता सहसा तरसा परिरभ्य धृता।
हरिणा हरिणाकुलनेत्रवती न ययौ नवयौवनभारवती॥
५. द्रुतगतिः पुरुषो धनभाजनं भवति मन्दगतिश्च सुखोचितः।
द्रुतविलम्बितखेलगतिर्नृपः सकलराज्यसुखं प्रियमश्नुते॥
६. न विचलति कथंचिन्न्यायमार्गाद् वसुनि शिथिलमुष्टिः पार्थिवो यः।
अमृतपुट इवासौ पुण्यकर्मा भवति जगति सेव्यः सर्वलोकैः॥
७. भनक्ति समरे बहून्पि रिपून हरिः प्रभूरसौ भुजोर्जितबलः।
जलोद्धतगतिर्यथैव मकरस्तरङ्गनिकरं करेण परितः॥
८. कुरु करुणमियं गाढोत्कण्ठिका यदुतनय चकोरी कामाधिका।
विरहदहनसङ्गादङ्गैः कृशा पिबतु तव मुखेन्दोर्बिम्बं दृशा॥
९. धूतनवह्वारं विगतविकारं सदयमुदारं विमलविचारम्।
विरचितवेषं विबुधविशेषं वरयति शय्या कुसुमविचित्रा॥
१०. अतिसुरभिरभाजि पुष्पश्रियायमतनुतरतयेव संतानकः।
तरुणपरभृतः स्वनं रागिणामतनुत रतये वसन्तानकः॥
११. पुरः साधुवद्वाति मिथ्या विनीतः परोक्षे करोत्यर्थनाशं हताशः।
भुजंगप्रयातोपमं यस्य चित्तं त्यजेत्तादृशं दुश्चरित्रं कुमित्रम्॥
१२. यो रणे युद्धयते निर्भरं निर्भयस्त्यागिता यस्य सर्वस्वदानाविधिः।
तं नरं वीरलक्ष्मीर्यशःस्रग्विणी नूनमभ्येति सत्कीर्तिशुक्लांशुका॥