अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 878 में से
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और दो गुरुसे युक्त पादोंवाला छन्द ‘उपेन्द्रवज्रा’$^१$ कहलाता है। [इसमें भी पादान्तमें विराम होता है।] जब एक ही छन्दमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा—दोनोंके चरण लक्षित हों, तब उस छन्दका नाम ‘उपजाति’$^२$ होता है। [इन दोनोंके मेलसे जो उपजाति बनती है, उसके प्रस्तारसे चौदह भेद होते हैं। इसी प्रकार ‘वंशस्थ’ और ‘इन्द्रवज्रा’ तथा ‘शालिनी’ और ‘वातोर्मी’के मेलसे भी उपजाति छन्द होता है।] ॥ ३-५॥
तीन भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले वृत्तका नाम ‘दोधक’$^३$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, तगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘शालिनी’$^४$ है। इसमें चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक पादमें मगण, भगण, तगण एवं दो गुरु हों, उसे ‘वातोर्मी’$^५$ छन्द नाम दिया गया है। इसमें भी चार-सातपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें मगण, भगण, तगण, नगण, एक लघु और एक गुरु होनेसे ‘भ्रमरविलसिता’$^६$ (या भ्रमरविलसिता) नामक छन्द होता है। इसमें भी चार और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। जिसके प्रति पादमें रगण, नगण, रगण, एक लघु और गुरु हों, उसे ‘रथोद्धता’$^७$ कहते हैं। इसमें भी पूर्ववत् चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। रगण, नगण, भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘स्वागता’$^८$ कहते हैं। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो नगण, सगण और दो गुरु हों, उसे ‘वृत्ता’$^९$ (या ‘वृन्ता’) कहते हैं। [इसमें चार-सातपर विराम होता है।] जिसके चरण रगण, जगण, रगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त हों, उसे ‘श्येनी’$^{१०}$ नामक छन्द कहा गया है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जगण, रगण, जगण एवं दो गुरुसे युक्त चरणवाले
१. उदाहरण—भवन्नखाः कुन्ददलश्रियो ये नमन्ति लक्ष्मीस्तनलेखनेऽपि।
उपेन्द्रवज्राधिककर्कशत्वं कथं गतास्ते रिपुदारणायाम्॥
२. उदाहरण—तत्रोपजातिर्विविधा विदग्धैः संयोज्यते तु व्यवहारकाले।
अतः प्रयत्नः प्रथमं विधेयो नृपेण पुंरत्नपरीक्षणाय॥
३. दोधकमर्थविरोधकमग्रं स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम्।
स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं मुञ्चति यो नृपतिः स सुखी स्यात्॥
४. शस्त्रश्यामा स्निग्धमुग्धायताक्षी पीनश्रोणिर्दक्षिणावर्तनाभिः।
मध्ये क्षामा पीवरोरुस्तनी या श्लाघ्या भर्तुः शालिनी कामिनी सा॥
५. यात्युत्सेकं सपदि प्राप्य किंचित् स्याद् वा यस्याश्चपला चित्तवृत्तिः।
या दीर्घाङ्गी स्फुटशब्दाट्टहासा त्याज्या सा स्त्री द्रुतवातोर्मिमाला॥
६. किं ते वक्त्रं चलदलकचितं किं वा पद्मं भ्रमरविलसितम्।
इत्येवं मे जनयति मनसि भ्रान्तिं कान्ते परिसर सरसि॥
७. या करोति विविधैर्न रैः समं संगतिं परगृहे रता च या।
म्लानयत्युभयतोऽपि बान्धवान् मार्गधूलिरिव सा रथोद्धता॥
८. आहवं विशतो यदि राहुः पृष्ठतश्चरति वायुसमेतः।
प्राणवृत्तिरपि यस्य शरीरे स्वागता भवति तस्य जयश्रीः॥
९. द्विजगुरुपरिभवकारी यो नरपतिरतिधनलुब्धात्मा।
ध्रुवमिह निपतति पापोऽसौ फलमिव पवनहतं वृन्तात्॥
१०. क्रूरदृष्टिरयताग्रनासिका चञ्चला कठोरतीक्ष्णनादिनी।
युद्धकाङ्क्षिणी सदामिषप्रिया श्येनिकेव सा विगर्हिताङ्गना॥