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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 714, कुल 878 में से

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पृष्ठ 714
  • अध्याय ३३४ * ६८७

तगण और यगण हों, उसका नाम ‘तनुमध्या’$^१$ है। [यह गायत्री छन्दका वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण और एक गुरु हो, उसे ‘कुमारललिता’$^२$ कहते हैं। [यह उष्णिच् छन्दका वृत्त है। इसमें तीन, चार अक्षरोंपर विराम होता है।] दो भगण और दो गुरुसे जिसके चरण बनते हों, वह ‘चित्रपदा’$^३$ है। [यह अनुष्टुप् छन्दका वृत्त है, इसमें पादान्तमें ही यति होती है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो मगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘विद्युन्माला’$^४$ है। [इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। यह भी अनुष्टुप्का ही वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु हो, उसको ‘माणवकाक्रीडितक’$^५$ कहते हैं। [इसमें भी चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रति चरणमें रगण, नगण और सगण हो, वह ‘हलमुखी’$^६$ नामक छन्द है। [इसमें तीन, पाँच, छः अक्षरोंपर विराम होता है, यह बृहती छन्दका वृत्त है।]॥१-२॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और एक मगण हो, वह ‘भुजङ्गशिशुभृता’$^७$ नामक छन्द है। [इसमें सात और दो अक्षरोंपर विराम है। यह भी बृहतीमें ही है।] मगण, नगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘हंसरुत’$^८$ कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण और एक गुरु हों, वह ‘शुद्धविराट्’$^९$ नामक छन्द कहा गया है। [यहाँसे इन्द्रवज्राके पहलेतकके छन्द पङ्क्ति छन्दके अन्तर्गत हैं; इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, यगण और एक गुरु हों, वह ‘पणव’$^{१०}$ नामक छन्द है। [इसमें पाँच-पाँचपर विराम होता है।] रगण, जगण, रगण और एक गुरुयुक्त चरणवाले छन्दका नाम ‘मयूरसारिणी’$^{११}$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] मगण, भगण, सगण और एक गुरुयुक्त चरणवाला छन्द ‘मत्ता’$^{१२}$ कहलाता है। [इसमें चार-छःपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें तगण, दो जगण और एक गुरु हो, उसका नाम ‘उपस्थिता’$^{१३}$ है। [इसमें दो-आठपर विराम होता है।] भगण, मगण, सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाला छन्द ‘रुक्मवती’$^{१४}$ कहलाता है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों उसका नाम ‘इन्द्रवज्रा’$^{१५}$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है। यहाँसे ‘वंशस्थ’के पहलेतकके छन्द बृहतीके अन्तर्गत हैं।] जगण, तगण, जगण


१. उदाहरण—धन्या त्रिषु नीचा कन्या तनुमध्या। श्रोणीस्तनगुर्वी रामा रमणीया॥
२. उदाहरण—यदीह पतिसेवारता भवति योषा। कुमारललितासौ सदैव नमनीया॥
३. उदाहरण—यस्य मुखे प्रियवाणी चेतसि सज्जनता च। चित्रपदापि च लक्ष्मीस्तं पुरुषं न जहाति॥
४. उदाहरण—विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानात्पन्नं निस्सामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत्॥
५. उदाहरण—माणवकाक्रीडितकं यः कुरुते वृद्धवयाः। हास्यमसौ याति जने भिक्षुरिव स्त्रीचपलः॥
६. उदाहरण—गण्डयोरतिशयकृशं यन्मुखं प्रकटदशनम्। आयतं कलहनिरतं तां स्त्रियं त्यज हलमुखीम्॥
७. उदाहरण—इयमधिकतरं रम्या विकचकुवलयश्यमा। रमयति हृदयं यूनां भुजगशिशुभृता नारी॥
८. उदाहरण—अभ्यागामिशिशुलक्ष्मीमञ्जीरक्वचिततुल्यम्। तीरे राजति नदीनां रम्यं हंसरुतमेतत्॥
९. विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा। अस्मद्वंशपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः॥
१०. मीमांसारसममृतं पीत्वा शास्त्रोक्तिः पटुरितरा भाति। एवं संसदि विदुषां मध्ये जल्पामो जयपणबन्धत्वात्॥
११. उदाहरण—या वनान्तराण्युपैति कृष्णं द्रष्टुमुत्सुका शिखण्डमौलिम्। बर्हिणं विलोक्य राधिका मे सा मयूरसारिणी प्रणम्या॥
१२. उदाहरण—स्वैरालापैः श्रुतिपुटपेयैर्गीतैः शौरेरति विशेषैः। श्यामप्रेम्णा व्रजवनितानां मध्ये मत्ता विलसति कापि॥
१३. उदाहरण—एषा जगदेकमनोहरा कन्या कनकोज्ज्वलदीधितिः। लक्ष्मीरिव दानवसूदनं पुण्यैर्नरनाथमुपस्थिता॥
१४. उदाहरण—पादतले पद्मोदरगौरै राजति यस्या ऊर्ध्वगरेखा। सा भवति स्त्री लक्षणयुक्ता रुक्मवती सौभाग्यवती च॥
१५. उदाहरण—ये दुष्टदैत्या इह भूमिलोके द्वेषं व्यधुर्गोद्विजदेवसङ्घे। तानिन्द्रवज्रादपि दारुणाङ्गानजीघतद् यः सततं नमस्ते॥