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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ
  • अध्याय ३३४ * ६८७

तगण और यगण हों, उसका नाम ‘तनुमध्या’$^१$ है। [यह गायत्री छन्दका वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण और एक गुरु हो, उसे ‘कुमारललिता’$^२$ कहते हैं। [यह उष्णिच् छन्दका वृत्त है। इसमें तीन, चार अक्षरोंपर विराम होता है।] दो भगण और दो गुरुसे जिसके चरण बनते हों, वह ‘चित्रपदा’$^३$ है। [यह अनुष्टुप् छन्दका वृत्त है, इसमें पादान्तमें ही यति होती है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो मगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘विद्युन्माला’$^४$ है। [इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। यह भी अनुष्टुप्का ही वृत्त है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु हो, उसको ‘माणवकाक्रीडितक’$^५$ कहते हैं। [इसमें भी चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रति चरणमें रगण, नगण और सगण हो, वह ‘हलमुखी’$^६$ नामक छन्द है। [इसमें तीन, पाँच, छः अक्षरोंपर विराम होता है, यह बृहती छन्दका वृत्त है।]॥१-२॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और एक मगण हो, वह ‘भुजङ्गशिशुभृता’$^७$ नामक छन्द है। [इसमें सात और दो अक्षरोंपर विराम है। यह भी बृहतीमें ही है।] मगण, नगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘हंसरुत’$^८$ कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण और एक गुरु हों, वह ‘शुद्धविराट्’$^९$ नामक छन्द कहा गया है। [यहाँसे इन्द्रवज्राके पहलेतकके छन्द पङ्क्ति छन्दके अन्तर्गत हैं; इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, यगण और एक गुरु हों, वह ‘पणव’$^{१०}$ नामक छन्द है। [इसमें पाँच-पाँचपर विराम होता है।] रगण, जगण, रगण और एक गुरुयुक्त चरणवाले छन्दका नाम ‘मयूरसारिणी’$^{११}$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] मगण, भगण, सगण और एक गुरुयुक्त चरणवाला छन्द ‘मत्ता’$^{१२}$ कहलाता है। [इसमें चार-छःपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें तगण, दो जगण और एक गुरु हो, उसका नाम ‘उपस्थिता’$^{१३}$ है। [इसमें दो-आठपर विराम होता है।] भगण, मगण, सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाला छन्द ‘रुक्मवती’$^{१४}$ कहलाता है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों उसका नाम ‘इन्द्रवज्रा’$^{१५}$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है। यहाँसे ‘वंशस्थ’के पहलेतकके छन्द बृहतीके अन्तर्गत हैं।] जगण, तगण, जगण


१. उदाहरण—धन्या त्रिषु नीचा कन्या तनुमध्या। श्रोणीस्तनगुर्वी रामा रमणीया॥
२. उदाहरण—यदीह पतिसेवारता भवति योषा। कुमारललितासौ सदैव नमनीया॥
३. उदाहरण—यस्य मुखे प्रियवाणी चेतसि सज्जनता च। चित्रपदापि च लक्ष्मीस्तं पुरुषं न जहाति॥
४. उदाहरण—विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानात्पन्नं निस्सामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत्॥
५. उदाहरण—माणवकाक्रीडितकं यः कुरुते वृद्धवयाः। हास्यमसौ याति जने भिक्षुरिव स्त्रीचपलः॥
६. उदाहरण—गण्डयोरतिशयकृशं यन्मुखं प्रकटदशनम्। आयतं कलहनिरतं तां स्त्रियं त्यज हलमुखीम्॥
७. उदाहरण—इयमधिकतरं रम्या विकचकुवलयश्यमा। रमयति हृदयं यूनां भुजगशिशुभृता नारी॥
८. उदाहरण—अभ्यागामिशिशुलक्ष्मीमञ्जीरक्वचिततुल्यम्। तीरे राजति नदीनां रम्यं हंसरुतमेतत्॥
९. विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा। अस्मद्वंशपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः॥
१०. मीमांसारसममृतं पीत्वा शास्त्रोक्तिः पटुरितरा भाति। एवं संसदि विदुषां मध्ये जल्पामो जयपणबन्धत्वात्॥
११. उदाहरण—या वनान्तराण्युपैति कृष्णं द्रष्टुमुत्सुका शिखण्डमौलिम्। बर्हिणं विलोक्य राधिका मे सा मयूरसारिणी प्रणम्या॥
१२. उदाहरण—स्वैरालापैः श्रुतिपुटपेयैर्गीतैः शौरेरति विशेषैः। श्यामप्रेम्णा व्रजवनितानां मध्ये मत्ता विलसति कापि॥
१३. उदाहरण—एषा जगदेकमनोहरा कन्या कनकोज्ज्वलदीधितिः। लक्ष्मीरिव दानवसूदनं पुण्यैर्नरनाथमुपस्थिता॥
१४. उदाहरण—पादतले पद्मोदरगौरै राजति यस्या ऊर्ध्वगरेखा। सा भवति स्त्री लक्षणयुक्ता रुक्मवती सौभाग्यवती च॥
१५. उदाहरण—ये दुष्टदैत्या इह भूमिलोके द्वेषं व्यधुर्गोद्विजदेवसङ्घे। तानिन्द्रवज्रादपि दारुणाङ्गानजीघतद् यः सततं नमस्ते॥

६८८ * अग्निपुराण *


और दो गुरुसे युक्त पादोंवाला छन्द ‘उपेन्द्रवज्रा’$^१$ कहलाता है। [इसमें भी पादान्तमें विराम होता है।] जब एक ही छन्दमें इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा—दोनोंके चरण लक्षित हों, तब उस छन्दका नाम ‘उपजाति’$^२$ होता है। [इन दोनोंके मेलसे जो उपजाति बनती है, उसके प्रस्तारसे चौदह भेद होते हैं। इसी प्रकार ‘वंशस्थ’ और ‘इन्द्रवज्रा’ तथा ‘शालिनी’ और ‘वातोर्मी’के मेलसे भी उपजाति छन्द होता है।] ॥ ३-५॥

तीन भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले वृत्तका नाम ‘दोधक’$^३$ है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, तगण, तगण और दो गुरु हों, उसका नाम ‘शालिनी’$^४$ है। इसमें चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक पादमें मगण, भगण, तगण एवं दो गुरु हों, उसे ‘वातोर्मी’$^५$ छन्द नाम दिया गया है। इसमें भी चार-सातपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें मगण, भगण, तगण, नगण, एक लघु और एक गुरु होनेसे ‘भ्रमरविलसिता’$^६$ (या भ्रमरविलसिता) नामक छन्द होता है। इसमें भी चार और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। जिसके प्रति पादमें रगण, नगण, रगण, एक लघु और गुरु हों, उसे ‘रथोद्धता’$^७$ कहते हैं। इसमें भी पूर्ववत् चार और सात अक्षरोंपर विराम होता है। रगण, नगण, भगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘स्वागता’$^८$ कहते हैं। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें दो नगण, सगण और दो गुरु हों, उसे ‘वृत्ता’$^९$ (या ‘वृन्ता’) कहते हैं। [इसमें चार-सातपर विराम होता है।] जिसके चरण रगण, जगण, रगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त हों, उसे ‘श्येनी’$^{१०}$ नामक छन्द कहा गया है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] जगण, रगण, जगण एवं दो गुरुसे युक्त चरणवाले


१. उदाहरण—भवन्नखाः कुन्ददलश्रियो ये नमन्ति लक्ष्मीस्तनलेखनेऽपि।
उपेन्द्रवज्राधिककर्कशत्वं कथं गतास्ते रिपुदारणायाम्॥
२. उदाहरण—तत्रोपजातिर्विविधा विदग्धैः संयोज्यते तु व्यवहारकाले।
अतः प्रयत्नः प्रथमं विधेयो नृपेण पुंरत्नपरीक्षणाय॥
३. दोधकमर्थविरोधकमग्रं स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम्।
स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं मुञ्चति यो नृपतिः स सुखी स्यात्॥
४. शस्त्रश्यामा स्निग्धमुग्धायताक्षी पीनश्रोणिर्दक्षिणावर्तनाभिः।
मध्ये क्षामा पीवरोरुस्तनी या श्लाघ्या भर्तुः शालिनी कामिनी सा॥
५. यात्युत्सेकं सपदि प्राप्य किंचित् स्याद् वा यस्याश्चपला चित्तवृत्तिः।
या दीर्घाङ्गी स्फुटशब्दाट्टहासा त्याज्या सा स्त्री द्रुतवातोर्मिमाला॥
६. किं ते वक्त्रं चलदलकचितं किं वा पद्मं भ्रमरविलसितम्।
इत्येवं मे जनयति मनसि भ्रान्तिं कान्ते परिसर सरसि॥
७. या करोति विविधैर्न रैः समं संगतिं परगृहे रता च या।
म्लानयत्युभयतोऽपि बान्धवान् मार्गधूलिरिव सा रथोद्धता॥
८. आहवं विशतो यदि राहुः पृष्ठतश्चरति वायुसमेतः।
प्राणवृत्तिरपि यस्य शरीरे स्वागता भवति तस्य जयश्रीः॥
९. द्विजगुरुपरिभवकारी यो नरपतिरतिधनलुब्धात्मा।
ध्रुवमिह निपतति पापोऽसौ फलमिव पवनहतं वृन्तात्॥
१०. क्रूरदृष्टिरयताग्रनासिका चञ्चला कठोरतीक्ष्णनादिनी।
युद्धकाङ्क्षिणी सदामिषप्रिया श्येनिकेव सा विगर्हिताङ्गना॥

  • अध्याय ३३४ * ६८९

छन्दका नाम 'रम्य'$^१$ एवं 'विलासिनी' है। [यहाँ पादान्तमें ही विराम होता है।]॥ ६-८॥

यहाँसे 'जगती' छन्दका अधिकार आरम्भ होता है [और 'प्रहर्षिणी'के पहलेतक रहता है]। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, तगण, जगण और रगण हों, उस छन्दका नाम 'वंशस्थ'$^२$ है। [यहाँ पादान्तमें विराम होता है।] दो तगण, जगण तथा रगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको 'इन्द्रवंशी'$^३$ कहते हैं। [यहाँ भी पादान्तमें ही विराम होता है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार सगण हों, उसका नाम 'तोटक'$^४$ बताया गया है। जिसके प्रत्येक पादमें नगण, भगण, भगण और रगण हों, उसका नाम 'द्रुतविलम्बित'$^५$ है। ['तोटक' और 'द्रुतविलम्बित' दोनोंमें पादान्त-विराम ही माना गया है।] जिसके सभी चरणोंमें दो-दो नगण, एक-एक मगण तथा एक-एक यगण हों, उस छन्दका नाम 'श्रीपुट'$^६$ है। इसमें आठ और चार अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, सगण, जगण, सगणसे युक्त पादोंवाले छन्दको 'जलोद्धतगति'$^७$ कहते हैं। इसमें छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है। दो नगण, एक मगण तथा एक रगणसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम 'तत'$^८$ है। नगण, यगण, नगण, यगणसे युक्त पादवाला छन्द 'कुसुमविचित्रा'$^९$ कहलाता है। [इसमें भी छः-छः अक्षरोंपर विराम होता है।] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और दो रगण हों, उसका नाम 'चञ्चलाक्षिका'$^{१०}$ है। [इसके भीतर सात-पाँचपर विराम होता है।] प्रत्येक पादमें चार यगण होनेसे 'भुजंगप्रयात'$^{११}$ और चार रगण होनेसे 'स्रग्विणी'$^{१२}$ नामक छन्द होता है। [इन दोनोंमें


१. विलासिनीविलासमोहितानां नृणां हृदि क्व सत्त्वशालि धैर्यम्।
स उर्वशीवशीकृतो नरेन्द्रस्तदर्थमुन्मना चचार भूमौ॥

२. विशुद्धवंशस्थमुदारचेष्टितं गुणप्रियं मित्रमुपात्तसज्जनम्।
विपत्तिमग्नस्य करावलम्बनं करोति यः प्राणपरिक्रयेण सः॥

३. कुर्वीत यो देवगुरुद्विजन्मनामुर्वीपतिः पालनमर्थलिप्सया।
तस्येन्द्रवंशेऽपि गृहीतजन्मनः संजायते श्रीः प्रतिकूलवर्तिनी॥

४. अमुना यमुनाजलकेलिकृता सहसा तरसा परिरभ्य धृता।
हरिणा हरिणाकुलनेत्रवती न ययौ नवयौवनभारवती॥

५. द्रुतगतिः पुरुषो धनभाजनं भवति मन्दगतिश्च सुखोचितः।
द्रुतविलम्बितखेलगतिर्नृपः सकलराज्यसुखं प्रियमश्नुते॥

६. न विचलति कथंचिन्न्यायमार्गाद् वसुनि शिथिलमुष्टिः पार्थिवो यः।
अमृतपुट इवासौ पुण्यकर्मा भवति जगति सेव्यः सर्वलोकैः॥

७. भनक्ति समरे बहून्पि रिपून हरिः प्रभूरसौ भुजोर्जितबलः।
जलोद्धतगतिर्यथैव मकरस्तरङ्गनिकरं करेण परितः॥

८. कुरु करुणमियं गाढोत्कण्ठिका यदुतनय चकोरी कामाधिका।
विरहदहनसङ्गादङ्गैः कृशा पिबतु तव मुखेन्दोर्बिम्बं दृशा॥

९. धूतनवह्वारं विगतविकारं सदयमुदारं विमलविचारम्।
विरचितवेषं विबुधविशेषं वरयति शय्या कुसुमविचित्रा॥

१०. अतिसुरभिरभाजि पुष्पश्रियायमतनुतरतयेव संतानकः।
तरुणपरभृतः स्वनं रागिणामतनुत रतये वसन्तानकः॥

११. पुरः साधुवद्वाति मिथ्या विनीतः परोक्षे करोत्यर्थनाशं हताशः।
भुजंगप्रयातोपमं यस्य चित्तं त्यजेत्तादृशं दुश्चरित्रं कुमित्रम्॥

१२. यो रणे युद्धयते निर्भरं निर्भयस्त्यागिता यस्य सर्वस्वदानाविधिः।
तं नरं वीरलक्ष्मीर्यशःस्रग्विणी नूनमभ्येति सत्कीर्तिशुक्लांशुका॥

६९० * अग्निपुराण *


पादान्तविराम माना गया है।] जिसके प्रत्येक चरणमें सगण, जगण तथा दो सगण हों, उसकी ‘प्रमिताक्षरा’$^१$ संज्ञा होती है। [इसमें भी पादान्तविराम ही अभीष्ट है।] भगण, मगण, सगण, मगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘कान्तोत्पीडा’$^२$ कहते हैं। [इसमें भी पादान्त-विराम माना गया है।] दो मगण और दो यगणयुक्त चरणवाले छन्दको ‘वैश्वदेवी’$^३$ नाम दिया गया है। इसमें पाँच-सात अक्षरोंपर विराम होता है। यदि प्रत्येक पादमें नगण, जगण, भगण और यगण हों तो उस छन्दका नाम ‘नवमालिनी’$^४$ होता है। यहाँतक ‘जगती’ छन्दका अधिकार है॥ ९—१३॥

[अब ‘अतिजगती’ छन्दके अवान्तर भेद बतलाते हैं—] जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, नगण, जगण, रगण तथा एक गुरु हों, उसकी ‘प्रहर्षिणी’$^५$ संज्ञा है। इसमें तीन और दस अक्षरोंपर विराम होता है। जगण, भगण, सगण, जगण तथा एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दका नाम ‘रुचिरा’$^६$ है। इसमें चार तथा नौ अक्षरोंपर विराम माना गया है। मगण, तगण, यगण, सगण और एक गुरुयुक्त पादवाले छन्दको ‘मत्तमयूर’$^७$ कहते हैं। इसमें चार और नौ अक्षरोंपर विराम होता है। तीन नगण, एक सगण और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी ‘गौरी’$^८$ संज्ञा है।

[अब शक्वरीके अन्तर्गत विविध छन्दोंका वर्णन किया जाता है—] जिसके प्रत्येक पादमें मगण, तगण, नगण, सगण तथा दो गुरु हों और पाँच एवं नौ अक्षरोंपर विराम होता हो, उसका नाम ‘असम्बाधा’$^९$ है। जिसके प्रतिपादमें दो नगण, रगण, सगण और एक लघु और एक गुरु हों तथा सात-सात अक्षरोंपर विराम होता हो, वह ‘अपराजिता’$^{१०}$ नामक छन्द है। दो नगण, भगण, नगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दको ‘प्रहरणकलिता’$^{११}$ कहते हैं।


१. परिशुद्धवाक्यरचनातिशयं परिषिञ्चती श्रवणयोरमृतम्।
प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती तव भारती हरति मे हृदयम्॥
२. कान्तकोरैराप्ता यदि कान्तोत्पीडां सा मनुते क्रीडां मुदित स्वान्ता स्यात्।
स्नेहवती मान्या गृहिणी सम्राज्ञी गेहगता देवी सदृशी सा नित्यम्॥
३. धन्यः पुण्यात्मा जायते कोऽपि वंशे तादृक् पुत्रोऽसौ येन गोत्रं पवित्रम्।
गोविप्रज्ञातिस्वामिकार्ये प्रवृत्तः शुद्धं श्राद्धादौ वैश्वदेवी भवेद् यः॥
४. धवलयशोऽङ्कुरेण परिवीता सकलजनानुरागधुसृणाक्ता।
दृढगुणबद्धकीर्तिकुसुमौधै स्तव नवमालिनीव नृपलक्ष्मीः॥
५. श्रीवृन्दावननवकुञ्जकेलिसद्मा पद्माक्षी मुररिपुसङ्गशालिनी च।
श्रीराधा प्रियतममुष्टिमेयमध्या मद्ध्याने भवतु मनःप्रहर्षिणी मे॥
६. मृगत्वचा रुचिरतराम्वरक्रियः कपालभृत् कपिलजटाग्रपल्लवः।
ललाटदृग्दहनतृणीकृतस्मरः पुनातु वः शिशुशशिशेखरः शिवः॥
७. व्यूढोरस्कः सिंहसमानान्तमध्यः पीनस्कन्धो मांसलहस्तायतबाहुः।
कम्बुग्रीवः स्निग्धशरीरस्तनुलोमा भुङ्क्ते राज्यं मत्तमयूराकृतिनेत्रः॥
८. सकलभुवनजनगणनतपादा निजपदभजनशमितविषादा।
विजितसरसिरुहनयनपद्मा भवतु सकलमिह जगति गौरी॥
९. भङ्क्त्वा दुर्गाणि द्रुमवनमखिलं छित्त्वा हत्वा तत्सैन्यं करितुरगबलं हित्वा।
येनासम्बाधा स्थितिरजनि विपक्षाणां सर्वोर्वीनाथः स जयति नृपतिर्मुञ्जः॥
१०. फणिपतिवलयं जटामुकुटोज्ज्वलं मनसिजमथनं त्रिशूलविभूषितम्।
स्मरसि यदि सखे शिवं शशिशेखरं भवति तव तनुः परैरपराजिता॥
११. सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणम्।
प्रणमत महिषासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम्॥

  • अध्याय ३३४ * ६९१

इसमें सात-सातपर विराम होता है। तगण, भगण, दो जगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी ‘वसन्ततिलका’१ संज्ञा है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] किसी-किसी मुनिके मतमें इसका नाम ‘सिंहोन्नता’ और ‘उद्धर्षिणी’ भी है॥ १४-१७॥

[इसके आगे ‘अतिशक्करी’का अधिकार है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार नगण और एक सगण हों, उसका नाम ‘चन्द्रावती’२ है। [इसमें सात-आठपर विराम होता है।] इसीमें जब छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’३ होता है। आठ और सातपर विराम होनेसे यह छन्द ‘मणिगणनिकर’४ कहलाता है। दो नगण, मगण और दो यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘मालिनी’५ कहते हैं। इसमें भी आठ और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। भगण, रगण, तीन नगण और एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दको ‘ऋषभगजविलसित’६ नाम दिया गया है। इसमें सात-नौ अक्षरोंपर विराम होता है। [यह ‘अष्टि’ छन्दके अन्तर्गत है।] यगण, मगण, नगण, सगण, भगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘शिखरिणी’७ कहते हैं। इसमें छः तथा ग्यारह अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ-नौ अक्षरोंपर विराम हो उसका नाम ‘पृथ्वी’८ है—यह पूर्वकालमें आचार्य पिङ्गलने कहा है। मगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त पदवाले छन्दको ‘वंशपत्रपतित’९ कहते हैं। इसमें दस-सातपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु हों और छः, चार एवं सात अक्षरोंपर विराम हो, उसका नाम ‘हरिणी’१० है। [शिखरिणीसे मन्दाक्रान्तातकका छन्द ‘अत्यष्टि’के अन्तर्गत है।] मगण, भगण, नगण, दो तगण तथा दो गुरुसे युक्त पादोंवाले


१. उद्धर्षिणी जनदृशां स्तनभारगुर्वी नीलोत्पलद्युतिमलिम्लुचलोचना च। सिंहोन्नतत्रिकतटी कुटिलालकान्ता कान्ता वसन्ततिलका नृपवल्लभासौ ॥ २. पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् । विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विचरति पथिकमनसि शरदि सरः ॥ ३. नवविकसितकुवलयदलनयनं अमृतमधुररसमयमृदुवचनम्। मधुरिपुरुचिरजलजुगचरणं परिसर शरणमशरणशरणम्॥ ४. कथमपि निपतितमतिमहति पदे नरमनुसरति न फलमनुपचितम्। अपि वरयुवतिषु कुचतटनिहतः स्पृशति न वपुरिह मणिगणनिकरः ॥ ५. अतिविपुलललाटं पीवरोरःकपाटं सुघटितदशनोष्ठं व्याघ्रतुल्यप्रकोष्ठम्। पुरुषमशनिलेखा लक्षणं वीरलक्ष्मी रतिसुरभिशोभिमालिनीवाभ्युपैति ॥ ६. आयतबाहुदण्डमुपचितपृथुहृदयं पीनकटीप्रदेशमृषभगजविलसितम्॥ वीरमुदारसत्त्वमतिशयगुणरसिकं श्रीरतिचञ्चलापि न परिहरति पुरुषम्॥ ७. यशःशेषीभूते जगति नरनाथे गुणनिधौ प्रवृत्ते वैराग्ये विषयसनिष्क्रान्तमनसाम्। इदानीमस्माकं घनतरुलतां निर्झरवतीं तपस्तुङ्गं चेतो भवति गिरिमालां शिखरिणीम्॥ ८. हताः समिति शत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतञ्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः। त्वया कृतपरिग्रहे क्षितिपवीर सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता ॥ ९. अद्य कुरुष्व कर्म सुवृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्। जीवितमल्पकालकलनालघुतरतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव ॥ १०. कुवलयदलेश्यामा पीनोन्नतस्तनशालिनी चकितहरिणीनेत्रच्छायामलिम्लुचलोचना । मनसिजधनुर्ज्यानिर्घोषैरिव श्रुतिपेशलैर्मनसि ललना लीलालापैः करोति ममोत्सवम् ॥

६९२ * अग्निपुराण *


छन्दको 'मन्दाक्रान्ता'<sup></sup> कहते हैं। इसमें चार, छः और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके पादोंमें मगण, तगण, नगण तथा तीन यगण हों, वह 'कुसुमितलतावेल्लिता'<sup></sup> छन्द है। [यह 'धृति' छन्दके अन्तर्गत है।] इसमें पाँच, छः तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण, भगण, दो तगण और एक गुरु हों, उसका नाम 'शार्दूलविक्रीडित'<sup></sup> है। इसमें बारह तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। [यह छन्द 'अतिधृति'के अन्तर्गत है] ॥१८-२३॥

'सुवदना'<sup></sup> छन्द 'कृति'के अन्तर्गत है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। इसमें सात, सात, छःपर विराम होता है। जब कृतिके प्रत्येक पादमें क्रमशः गुरु और लघु अक्षर हों तो उसे 'वृत्त'<sup></sup> छन्द कहते हैं। मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दका नाम 'स्रग्धरा'<sup></sup> है। इसमें सात-सातके तीन विराम होते हैं। [यह 'प्रकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण तथा एक गुरु हों और दस-बारह अक्षरोंपर विराम होता हो, उसे 'सुभद्रक'<sup></sup> छन्द कहते हैं। [यह 'आकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी 'अश्वललिता'<sup></sup> संज्ञा है। इसमें ग्यारह-बारहपर विराम होता है। [यह 'विकृति'के अन्तर्गत है] ॥ २४-२५$\frac{१}{२}$॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो मगण, एक तगण, चार नगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ और पंद्रहपर विराम हो, उसे 'मत्तक्रीडा'<sup></sup> [या मत्ताक्रीडा] कहते हैं। [यह भी 'विकृति'में ही है।] जिसके पृथक्-पृथक् सभी पादोंमें भगण, तगण, नगण, सगण, फिर दो भगण, नगण और यगण हों तथा पाँच, सात, बारहपर विराम होता हो, उसकी 'तन्वी'<sup>१०</sup> संज्ञा है। [यह 'संस्कृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण, चार नगण और एक


१. प्रत्यादिष्टं समरशिरसः कां दिशं प्रप्य नष्टं त्वं निःशेषं कुरु रिपुबलं मार्गमासाद्य सद्यः। किं नाश्रौषीः परिणतधियां नीतियोग्योपदेशं मन्दाक्रान्ता भवति फलिनी नारिकेल्योः क्षयाय॥ २. धन्या नामैताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजतपरभृतकलालापकोलाहलिन्यः। मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझांकाररम्य ग्रामात्तस्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयन्ति॥ ३. कम्बुग्रीवमुदग्रबाहुशिखरं रक्तान्तदीर्घेक्षणं शालप्रांशुशरीरमायतभुजं विस्तीर्णवक्षःस्थलम्। कीलस्कन्धमनुद्धतं परिजने गम्भीरसत्त्वस्वरं राज्यश्रीः समुपैति वीरपुरुषं शार्दूलविक्रीडितम्॥ ४. या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगलसद्गतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजयिनी दीर्घे च नयने। श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने संप्राप्ता साम्प्रतं मे नयनपथमसौ दैवात् सुवदना॥ ५. जन्तुमात्रादुःखकारिकर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व। विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनो हिताय॥ ६. रेखाभ्रूः शुभ्रदन्तद्युतिहसितशरच्चन्द्रिका चारूमूर्तिमद्धान्मातङ्गलीलारुचिरविपुलाभोगतुङ्गस्तनी या। रम्भास्तम्भोपमोरूरलिमलिनघनस्निग्धधम्मिल्लहस्ता राधायै रक्तकण्ठी दिशतु नवमुदं स्रग्धरा कापि गोपी॥ ७. भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभ्रावनप्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः। ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुराङ्गनापरिवृताः॥ ८. पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावशितया वशीकृतमिदम्। सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपामरयशः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतबुद्धिरश्वललितम्॥ ९. हृद्यं मद्यं पीत्वा नारी स्खलितगतिरतिशयरसिकहृदया मत्ताक्रीडालोलैरङ्गैर्मुदमखिलविटजनमनसि कुरुते। वीतक्रीडाश्लीलालापैः श्रवणसुखभगसुललितवचना नृत्यैर्गतैर्भूविक्षेपैः कलभणितविविधविहगकुलरुतैः॥ १०. चन्द्रमुखी सुन्दरघनजघना कुन्दसमानशिखरदशना या निष्कलवीणाश्रुतिसुखवचना त्रस्तकुरङ्गतारलनयनान्ता। निर्मुखपीनोन्नतकुचकलशा मत्तगजेन्द्रललितगतिभासा निर्भरलीलाचरितविततये नन्दकुमार भवतु तव तन्वी॥

  • अध्याय ३३५ * | ६९३ ---|---

गुरु हों तथा पाँच-पाँच, आठ और सातपर विराम होता हो, उस छन्दका नाम ‘क्रौञ्चपदा’$^१$ है। [यह ‘अभिकृति’ के अन्तर्गत है।] जिसके प्रतिपादमें दो मगण, तगण, तीन नगण, रगण, सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ, ग्यारह और सातपर विराम होता हो, उस छन्दको ‘भुजंगविजृम्भित’$^२$ कहते हैं। [यह ‘उत्कृति’ छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक पादमें एक मगण, छः नगण, एक सगण और दो गुरु हों तथा नौ, छः-छः एवं पाँच अक्षरोंपर विराम होता हो, उसको ‘अपहाव’$^३$ या ‘उपहाव’ नाम दिया गया है। [यह भी ‘उत्कृति’ में ही है] ॥ २६-२८॥

[अब ‘दण्डक’ जातिका वर्णन किया जाता है—] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और सात रगण हों, उसका नाम ‘दण्डक’$^४$ है; इसीको ‘चण्डवृष्टिप्रपात’ भी कहते हैं। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] उक्त छन्दमें दो नगणके सिवा रगणमें वृद्धि करनेपर ‘व्याल’, ‘जीमूत’ आदि नामवाले ‘दण्डक’ बनते हैं। ‘चण्डप्रपात’ के बाद अन्य जितने भी भेद होते हैं, वे सभी दण्डक-प्रस्तार ‘प्रचित’$^५$ कहलाते हैं। अब ‘गाथा-प्रस्तार’ का वर्णन करते हैं ॥ २९-३०॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘समवृत्तनिरूपण’ नामक तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३४॥


तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय

प्रस्तार-निरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! इस छन्दःशास्त्रमें जिन छन्दोंका नामतः निर्देश नहीं किया गया है, किंतु जो प्रयोगमें देखे जाते हैं, वे सभी ‘गाथा’ नामके छन्दके अन्तर्गत हैं। अब ‘प्रस्तार’ बतलाते हैं। जिसमें सब अक्षर गुरु हों, ऐसे पादमें जो आदिगुरु हो, उसके नीचे लघुका उल्लेख करे। [यह ‘एकाक्षर-प्रस्तार’ की बात हुई। ‘द्व्यक्षर-प्रस्तार’में] उसके बाद इसी क्रमसे वर्णोंकी स्थापना करे, अर्थात् पहले गुरु और उसके नीचे लघु$^६$ ॥ १॥


१. या कपिलाक्षी पिङ्गलकेशी कलिरुचिरनुदिनमनुनयकठिना दीर्घतराभिः स्थूलशिराभिः परिवृतवपुरतिशयकुटिलगतिः ।
आयतजङ्घा निम्नकपोला लघुतरकुचयुगपरिचितहृदया सा परिहार्या क्रौञ्चपदा स्त्री ध्रुवमिह निरवधिसुखमभिलषिता ॥
२. ये संनद्धानेकानीकैनरंतुरगकरिपरिवृतैः समं तव शत्रवो युद्धश्रद्धालुब्धात्मानस्त्वदभिमुखमपगतभियः पतन्ति धृतायुधाः ।
ये त्वां दृष्ट्वा संग्रामाग्रे नृपतिवर कृपणमनसश्चलन्ति दिगन्तरं किं वा सोढुं शक्यन्ते कैर्बहुभिरपि सविषविषमं भुजंगविजृम्भितम् ॥
३. श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणशकलललितशिरसं रुद्रं भूतैशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम्।
सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिरकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम् ॥
४. दण्डकका उदाहरणः—
इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी त्रिदशविजयिवीर्य दृप्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण संसेविते ।
जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदरस्पर्शपूताश्रये भुवननिमितपादपद्माभिनानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥
५. प्रचित दण्डकका उदाहरणः—
प्रथमकथितदण्डकश्चण्डवृष्टि प्रपाताभिधानो मुनेः पिङ्गलाचार्यनाम्नोमतः प्रचित इति ततः परं दण्डकानांमियं जातिरैकैकरेफाभिवृद्ध्या यथेष्टं भवेत्।
स्वरुचिविरचितसंज्ञया तद्विशेषैरशेषैः पुनः काव्यमन्येऽपि कुर्वन्तु वागीश्वराः ।
भवति यदि समानसंख्याक्षरैर्यत्र पादव्यवस्था ततो दण्डकः पूज्यतेऽसौ जनैः ॥
६. किस छन्दके कितने भेद हो सकते हैं, इसका ज्ञान करानेवाले प्रत्यय या प्रणालीको ‘प्रस्तार’ आदि कहते हैं। प्रस्तार आदि छः हैं— प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्व्यादिलगक्रिया, संख्या तथा अध्वयोग। एक अक्षरवाले छन्दका भेद जाननेके लिये पहले एक गुरु लिखकर

६९४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

(प्रस्तारके अनन्तर अब 'नष्ट' द्वारा वर्णन | करते हैं। अर्थात् जब यह जाननेकी इच्छा हो कि

उसके नीचे एक लघु लिखे। इस प्रकार एकाक्षर छन्दके दो ही भेद हुए। दो अक्षरके छन्दके भेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये एकाक्षर-प्रस्तारको ही दो बार लिखे; अर्थात् पहले एक गुरु और उसके नीचे एक लघु लिखकर नीचे एक तिरछी रेखा खींच दे। फिर उसके नीचे एक गुरु लिखकर उसके अधोभागमें भी एक लघु लिख दे। तत्पश्चात् पहली आवृत्तिमें द्वितीय अक्षरके स्थानपर गुरु और द्वितीय आवृत्तिमें द्वितीय अक्षरके स्थानपर लघुका उल्लेख कर रेखा हटा दे। इस प्रकार दो अक्षरवाले छन्दके चार भेद हुए। 'द्व्यक्षर-प्रस्तार'को भी पूर्ववत् दो आवृत्तियोंमें स्थापित करके प्रथम आवृत्तिमें तृतीय अक्षरोंकी जगह गुरु और द्वितीय आवृत्तिमें तृतीय अक्षरोंकी जगह लघु लिखना चाहिये। इस प्रकार 'त्र्यक्षर प्रस्तार'में आठ भेद होंगे। इसकी भी दो आवृत्तियाँ करके पूर्ववत् लघु-गुरु-स्थापन करनेसे सोलह भेद 'चतुरक्षर-प्रस्तार'के होंगे। इसी प्रक्रियासे 'पञ्चाक्षर-प्रस्तार'के ३२ और छः अक्षरवाले गायत्री आदि छन्दोंके प्रस्तारभेद ६४ होंगे। सप्ताक्षर आदिके भेद जाननेकी भी यही प्रणाली है। नीचे रेखाचित्रद्वारा इन सब भेदोंका स्पष्टीकरण किया जाता है—

एकाक्षर-प्रस्तारः—

द्व्यक्षर-प्रस्तारः—

ऽऽ
।ऽ
ऽ।
।।

त्र्यक्षर-प्रस्तारः—

ऽऽऽ
।ऽऽ
ऽ।ऽ
।।ऽ
ऽऽ।
।ऽ।
ऽ।।
।।।

चतुरक्षर-प्रस्तारः—

ऽऽऽऽ
।ऽऽऽ
ऽ।ऽऽ
।।ऽऽ
ऽऽ।ऽ
।ऽ।ऽ
ऽ।।ऽ
।।।ऽ
ऽऽऽ।
।ऽऽ।१०
ऽ।ऽ।११
।।ऽ।१२
ऽऽ।।१३
।ऽ।।१४
ऽ।।।१५
।।।।१६

उपर्युक्त रेखाचित्रद्वारा समवृत्तोंकी संख्या जानी जाती है। इस समवृत्तकी संख्यामें उसीसे गुणा करनेपर समसहित अर्धसमवृत्तकी संख्या ज्ञात होती है तथा पुनः उसीमें उसीसे गुणा करनेपर समार्धसमसहित विषमवृत्तकी संख्या जानी जाती है। इसका संकेत इस प्रकार है—

समवृत्त संख्या $\times$ (गुणे) समवृत्त संख्या=अर्धसमवृत्त संख्या। अर्धसमवृत्त संख्या $\times$ (गुणे) अर्धसमवृत्त संख्या=विषमवृत्त संख्या। इस प्रकार मिश्रित संख्याका ज्ञान होता है। शुद्ध संख्याके ज्ञानकी प्रणाली इस प्रकार है—अर्धसमवृत्त संख्या—समवृत्त संख्या = शुद्धार्धसमवृत्त संख्या। विषमवृत्त संख्या—अर्धसमवृत्त संख्या = शुद्धविषमवृत्त संख्या। नीचे इसकी तालिका दी जाती है—

समवृत्त संख्यासमगुणित अर्धसमवृत्त संख्याअर्धसमगुणित विषमवृत्त संख्या
एकाक्षर छन्दमें— २१६
द्व्यक्षर ” ४१६२५६
त्र्यक्षर ” ८६४४०९६
चतुरक्षर ” १६२५६६५५३६
पञ्चाक्षर ” ३२१०२४१०४८५७६
षडक्षर ” ६४४०९६१६७७७२१६

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* अध्याय ३३५ *६९५

गायत्री या अन्य किसी छन्दके समवृत्तोंमेंसे छठा भेद कैसा होगा, तब इसका उत्तर देनेकी प्रणालीपर विचार करते हैं—] नष्ट-संख्याको आधी करनेपर जब वह दो भागोंमें बराबर बँट जाय, तब एक लघु लिखना चाहिये। यदि आधा करनेपर विषम संख्या हाथ लगे तो उसमें एक जोड़कर सम बना ले और इस प्रकार पुनः आधा करे। ऐसी अवस्थामें एक गुरु अक्षरकी प्राप्ति होती है। उसे भी अन्यत्र लिख ले। जितने अक्षरवाले छन्दके भेदको जानना हो, उतने अक्षरोंकी पूर्ति होनेतक पूर्वोक्त प्रणालीसे गुरु-लघुका उल्लेख करता रहे। [जैसे गायत्री छन्दके छठे भेदका स्वरूप जानना हो तो छःका आधा करना होगा। इससे एक लघु (।)–की प्राप्ति हुई। बाकी रहा तीन; इसमें दोका भाग नहीं लग सकता, अतः एक जोड़कर आधा किया जायगा। इस दशामें एक गुरु (ऽ)–की प्राप्ति हुई। इस अवस्थामें चारका आधा करनेपर दो शेष रहा, दोका आधा करनेपर एक शेष रहा तथा एक लघु (।)–की प्राप्ति हुई। अब एक समसंख्या न होनेसे उसमें एक और जोड़ना पड़ा; इस दशामें एक गुरु (ऽ)–की प्राप्ति हुई। फिर दोका आधा करनेसे एक हुआ और उसमें एक जोड़ा गया। पुनः एक गुरु (ऽ) अक्षरकी प्राप्ति हुई। फिर यही क्रिया करनेसे एक गुरु (ऽ) और उपलब्ध हुआ। गायत्रीका एक पाद छः अक्षरोंका है, अतः छः अक्षर पूरे होनेपर यह प्रक्रिया बंद कर देनी पड़ी। उत्तर हुआ गायत्रीका छठा समवृत्त। ऽ। ऽऽऽ इस प्रकार है।] [अब ‘उद्दिष्ट’की प्रक्रिया बतलाते हैं। अर्थात् जब कोई यह पूछे कि अमुक छन्द प्रस्तारगत किस संख्याका है, तो उसके गुरु-लघु आदिका एक जगह उल्लेख कर ले। इनमें जो अन्तिम लघु हो, उसके नीचे १ लिखे। फिर विपरीतक्रमसे, अर्थात् उसके पहलेके अक्षरोंके नीचे क्रमशः दूनी संख्या लिखता जाय। जब यह संख्या अन्तिम अक्षरपर पहुँच जाय तो उस द्विगुणित संख्यामेंसे एक निकाल दे। फिर सबको जोड़नेसे जो संख्या हो, वही उत्तर होगा। अथवा यदि वह संख्या गुरु अक्षरके स्थानमें जाती हो तो पूर्वस्थानकी संख्याको दूनी करके उसमेंसे एक निकालकर रखे। फिर सबको जोड़नेसे अभीष्ट संख्या निकलेगी।] उद्दिष्टकी संख्या बतलानेका सबसे अच्छा उपाय यह है कि उस छन्दके गुरु-लघु वर्णोंको क्रमशः एक पङ्क्तिमें लिख ले और उनके ऊपर क्रमशः एकसे लेकर दूने-दूने अङ्क रखता जाय; अर्थात् प्रथमपर एक, द्वितीयपर दो, तृतीयपर चार—इस क्रमसे संख्या बैठाये। फिर केवल लघु अक्षरोंके अङ्कोंको जोड़ ले और उसमें एक और मिला दे तो वही उत्तर होगा। जैसे ‘तनुमध्या’ छन्द गायत्रीका किस संख्याका वृत्त है, यह जाननेके लिये तनुमध्याके गुरु-लघु वर्णों—तगण, यगणको ऽऽ।। ऽऽ इस प्रकार लिखना होगा। फिर क्रमशः अङ्क बिछानेपर १


समवृत्तशुद्धार्ध समवृत्तशुद्ध विषम वृत्त
एकाक्षर छन्दमें— २१२
द्वयक्षर ,, ४१२२४०
त्र्यक्षर ,, ८५६४०३२
चतुरक्षर ,, १६२४०६५२८०
पञ्चाक्षर ,, ३२९९२१०४७५५२
षडक्षर ,, ६४४०३२१६७३१२०

६१६ * अग्निपुराण *

२ ४ ८ १६ ३२ इस प्रकार होगा। इनमें केवल लघु अक्षरके अङ्क ४ । ८ जोड़नेपर १२ होगा। उसमें एक और मिला देनेसे १३ होगा, यही उत्तर है। तात्पर्य यह है कि 'तनुमध्या' छन्द गायत्रीका तेरहवाँ समवृत्त है। [अब बिना प्रस्तारके ही वृत्तसंख्या जाननेका उपाय बतलाते हैं। इस उपायका नाम 'संख्यान' है। जैसे कोई पूछे छः अक्षरवाले छन्दकी समवृत्त-संख्या कितनी होगी ? इसका उत्तर—] जितने अक्षरके छन्दकी संख्या जाननी हो, उसका आधा भाग निकाल दिया जायगा। इस क्रियासे दोकी उपलब्धि होगी, [जैसे छः अक्षरोंमेंसे आधा निकालनेसे ३ बचा, किंतु इस क्रियासे जो दोकी प्राप्ति हुई] उसे अलग रखेंगे। विषम संख्यामेंसे एक घटा दिया जायगा। इससे शून्यकी प्राप्ति होगी। उसे दोके नीचे रख दें। [जैसे ३ से एक निकालनेपर दो बचा, किंतु इस क्रियासे जो शून्यकी प्राप्ति हुई, उसे २ के नीचे रखा गया। तीनसे एक निकालनेपर जो दो बचा था, उसे भी दो भागोंमें विभक्त करके आधा निकाल दिया गया। इस क्रियासे पूर्ववत् दोकी प्राप्ति हुई और उसे शून्यके नीचे रख दिया गया। अब एक बचा। यह विषम संख्या है—इसमेंसे एक बाद देनेपर शून्य शेष रहा। साथ ही इस क्रियासे शून्यकी प्राप्ति हुई, इसे पूर्ववत् २ के नीचे रख दिया गया।] शून्यके स्थानमें दुगुना करे। [इस नियमके पालनके लिये निचले शून्यको एक मानकर उसका दूना किया गया।] इससे प्राप्त हुए अङ्कको ऊपरके अर्धस्थानमें रखे और उसे उतनेसे ही गुणा करे। [जैसे शून्यस्थानको एक मानकर दूना करने और उसको अर्धस्थानमें रखकर उतनेसे ही गुणा करनेपर ४ संख्या होगी। फिर शून्यस्थानमें उसे ले जाकर पूर्ववत् दूना करनेसे ८ संख्या हुई; पुनः इसे अर्धस्थानमें ले जाकर उतनी ही संख्यासे गुणा करनेपर ६४ संख्या हुई। यही पूर्वोक्त प्रश्नका उत्तर है। इसी नियमसे 'उष्णिग्'के १२८ और 'अनुष्टुप्'के २५६ समवृत्त होते हैं।] इस प्रश्नको इस प्रकार लिखकर हल करे— अर्धस्थान २, ८ × ८ ६४ शून्यस्थान ०, ४ × २ ८ अर्धस्थान २, २ × २ ४ शून्यस्थान ०, १ × २ २

गायत्री आदि छन्दोंकी संख्याको दूनी करके उसमेंसे दो घटा देनेपर जो संख्या हो, वह वहाँतकके छन्दोंकी संयुक्त संख्या होती है। जैसे गायत्रीकी वृत्त-संख्या ६४ को दूना करके २ घटानेसे १२६ हुआ। यह एकाक्षरसे लेकर षडक्षरपर्यन्त सभी अक्षरोंके छन्दोंकी संयुक्त संख्या हुई। जब छन्दके वृत्तोंकी संख्याको द्विगुणित करके उसे पूर्ण ज्यों-का-त्यों रहने दिया जाय, दो घटाया न जाय, तो वह अङ्क बादके छन्दकी वृत्तसंख्याका ज्ञापक होता है। गायत्रीकी वृत्तसंख्या ६४ को दूना करनेसे १२८ हुआ। यह 'उष्णिग्'की वृत्त-संख्याका योग हुआ। [अब एकद्व्यादि लग क्रियाकी सिद्धिके लिये 'मेरु प्रस्तार' बताते हैं—] अमुक छन्दमें कितने लघु, कितने गुरु तथा कितने वृत्त होते हैं, इसका ज्ञान 'मेरु-प्रस्तार'से होता है। सबसे ऊपर एक चौकोर कोष्ठ बनाये। उसके नीचे दो कोष्ठ, उसके नीचे तीन कोष्ठ, उसके नीचे चार कोष्ठ आदि जितने अभीष्ट हों, बनाये। पहले कोष्ठमें एक संख्या रखे, दूसरी पङ्क्तिके दोनों कोष्ठोंमें एक-एक संख्या रखे, फिर तीसरी पङ्क्तिमें किनारेके दो कोष्ठोंमें एक-एक लिखे और बीचमें ऊपरके कोष्ठोंके अङ्क जोड़कर पूरे-पूरे लिख दे। चौथी पङ्क्तिमें किनारेके कोष्ठोंमें एक-एक लिखे और बीचके दो कोष्ठोंमें ऊपरके दो-दो कोष्ठोंके अङ्क जोड़कर लिखे। नीचेके कोष्ठोंमें भी यही रीति बरतनी चाहिये। उदाहरणके लिये देखिये—

* अध्याय ३३६ * | ६१७


वर्णमेरु

एकाक्षर प्रस्तार
द्व्यक्षर प्रस्तार
त्र्यक्षर प्रस्तार
चतुरक्षर प्रस्तार१६
पञ्चाक्षर प्रस्तार१०१०३२
षडक्षर प्रस्तार१५२०१५६४
सप्ताक्षर ,,२१३५३५२११२८
अष्टाक्षर ,,२८५६७०५६२८२५६

इसमें चौथी पङ्क्तिमें १ सर्वगुरु, ३ एक लघु, तीन दो लघु और १ सर्वलघु अक्षर है। इसी प्रकार अन्य पङ्क्तियोंमें भी जानना चाहिये। इस प्रकार इसके द्वारा छन्दके लघु-गुरु अक्षरोंकी तथा एकाक्षरादि छन्दोंकी वृत्त-संख्या जानी जाती है। मेरु-प्रस्तारमें नीचेसे ऊपरकी ओर आधा-आधा अंगुल विस्तार कम होता जाता है। छन्दकी संख्याको दूनी करके एक-एक घटा दिया जाय तो उतने ही अङ्गुलका उसका अध्वा (प्रस्तारदेश) होता है। इस प्रकार यहाँ छन्दःशास्त्रका सार बताया गया॥ ४-५ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रस्तार-निरूपण' नामक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३५ ॥


तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय

शिक्षानिरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं 'शिक्षा'का वर्णन करता हूँ। वर्णोंकी संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ भी मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर$^१$, पचीस स्पर्श$^२$, आठ यादि$^३$ एवं चार यम$^४$ माने गये हैं। अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित$^५$ वर्ण—जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय ( ≍ क और ≍ प) और दुःस्पृष्ट लकार—ये तिरसठ$^६$ वर्ण हैं। इनमें प्लुत लृकारको और गिन लिया जाय तो वर्णोंकी संख्या चौंसठ हो जाती है। रङ्ग$^७$ (अनुनासिक)-का उच्चारण 'खे अराँ'की तरह बताया गया है। हकार 'ङ' आदि पञ्चमाक्षरों और य, र, ल, व—इन अन्तःस्थ वर्णोंसे संयुक्त होनेपर 'उरस्य' हो जाता है। इनसे संयुक्त न होनेपर वह 'कण्ठस्थानीय' ही रहता है। आत्मा (अन्तः-करणावच्छिन्न चैतन्य) संस्काररूपसे अपने भीतर विद्यमान घट-पटादि पदार्थोंको अपनी


$^१$. अ, इ, उ, ऋ—इन चारों अक्षरोंके ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत भेद मिलाकर बारह स्वर होते हैं। ए, ओ, ऐ, औ—इनके दीर्घ और प्लुत भेद मिलकर आठ होते हैं। ये सब मिलकर बीस हुए तथा एक दुःस्पृष्ट 'ल' मिलानेसे कुल इक्कीस स्वर हुए। दो स्वरोंके मध्यवर्ती 'ल'को 'दुःस्पृष्ट' कहते हैं।
$^२$. कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग तथा पवर्गके पचीस वर्णोंको 'स्पर्श' कहते हैं।
$^३$. य, र, ल, व, श, ष, स, ह—ये आठ अक्षर 'यादि' कहे गये हैं।
$^४$. वर्गोंमें पञ्चम वर्णके परे रहते आदिके चार वर्णों तथा पञ्चमके मध्यमें जो उन्हींके सदृश वर्ण उच्चारित होते हैं, उनको 'यम' कहते हैं। जैसा कि—भट्टोजिदीक्षित लिखते हैं—'वर्गेष्वाद्यानां चतुर्णां पञ्चमे परे मध्ये यमो नाम पूर्वसदृशो वर्णः प्रातिशाख्ये प्रसिद्धः।' यथा—पलिक्र्कनी, चख्खनतुः इत्यादि।
$^५$. क, ख तथा प, फ परे रहनेपर विसर्गके स्थानमें क्रमशः ≍ क ≍ ख तथा ≍ प ≍ फ आदेश होते हैं, अतः ये दोनों 'पराश्रित' हैं। इन्हींको क्रमशः 'जिह्वामूलीय' और 'उपध्मानीय' कहते हैं।
$^६$. 'लॄ' का 'ॠ' में ही अन्तर्भाव माननेपर उसकी पृथक् गणना न होनेसे वर्णसंख्या ६३ तक हो जाती है।
$^७$. नकारके स्थानमें 'रु' होनेपर 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा।'—इस सूत्रसे जो अनुनासिक किया जाता है, उसीका नाम 'रङ्ग' है।

६९८ * अग्निपुराण *


बुद्धिवृत्तिसे संयुक्त करके अर्थात् उन्हें एक बुद्धिका विषय बनाकर बोलने या दूसरोंपर प्रकट करनेकी इच्छासे मनको उनसे संयुक्त करता है। संयुक्त हुआ मन कायाग्नि—जठराग्निको आहत करता है। फिर वह जठरानल प्राणवायुको प्रेरित करता है। वह प्राणवायु हृदयदेशमें विचरता हुआ धीमी ध्वनिमें उस प्रसिद्ध स्वरको उत्पन्न करता है, जो प्रातःसवनकर्मके साधनभूत मन्त्रके लिये उपयोगी है तथा जो 'गायत्री' नामक छन्दके आश्रित है। तदनन्तर वह प्राणवायु कण्ठदेशमें भ्रमण करता हुआ 'त्रिष्टुप्' छन्दसे युक्त माध्यन्दिन-सवन-कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी मध्यम स्वरको उत्पन्न करता है। इसके बाद उक्त प्राणवायु शिरोदेशमें पहुँचकर उच्चध्वनिसे युक्त एवं 'जगती' छन्दके आश्रित सायं-सवन-कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी स्वरको प्रकट करता है। इस प्रकार ऊपरकी ओर प्रेरित वह प्राण, मूर्धामें टकराकर अभिघात नामक संयोगका आश्रय बनकर, मुखवर्ती कण्ठादि स्थानोंमें पहुँचकर वर्णोंको उत्पन्न करता है। उन वर्णोंके पाँच प्रकारसे विभाग माने गये हैं। स्वरसे, कालसे, स्थानसे, आभ्यन्तर प्रयत्नसे तथा बाह्य प्रयत्नसे उन वर्णोंमें भेद होता है। वर्णोंके उच्चारण-स्थान आठ हैं—हृदय, कण्ठ, मूर्धा, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठद्वय तथा तालु। विसर्गका अभाव, विवर्तन$^१$, संधिका अभाव, शकारादेश, षकारादेश, सकारादेश, रेफादेश, जिह्वामूलीयत्व और उपध्मानीयत्व—ये 'ऊष्मा' वर्णोंकी आठ प्रकारकी गतियाँ हैं$^२$। जिस उत्तरवर्ती पदमें आदि अक्षर 'उकार' हो, वहाँ गुण आदिके द्वारा यदि 'ओ' भावका प्रसंधान (परिज्ञान) हो रहा हो, तो उस 'ओकार'को स्वरान्त अर्थात् स्वर-स्थानीय जानना चाहिये। जैसे—'गङ्गोदकम्'। इस पदमें जो 'ओ' भावका प्रसंधान है, वह स्वरस्थानीय है। इससे भिन्न संधिस्थलमें जो 'ओभाव'का परिज्ञान होता है, वह 'ओ' भाव ऊष्माका ही गतिविशेष है, यह बात स्पष्टरूपसे जान लेनी चाहिये। जैसे—'शिवो वन्द्यः' इसमें जो ओकारका श्रवण होता है, वह ऊष्मस्थानीय ही है। (यह निर्णय किसी अन्य व्याकरणकी रीतिसे किया गया है, ऐसा जान पड़ता है।) जो वेदाध्ययन कुतीर्थसे प्राप्त हुआ है, अर्थात् आचारहीन गुरुसे ग्रहण किया गया है, वह दग्ध—नीरस-सा होता है। उसमें अक्षरोंको खींच-तानकर हठात् किसी अर्थतक पहुँचाया गया है। वह भक्षित-सा हो गया है, अर्थात् सम्प्रदाय-सिद्ध गुरुसे अध्ययन न करनेके कारण वह अभक्ष्य-भक्षणके समान निस्तेज है। इस तरहका उच्चारण या पठन पाप माना गया है। इसके विपरीत जो सम्प्रदायसिद्ध गुरुसे अध्ययन किया जाता है, तदनुसार पठन-पाठन शुभ होता है। जो उत्तम तीर्थ—सदाचारी गुरुसे पढ़ा गया है, सुस्पष्ट उच्चारणसे युक्त है, सम्प्रदायशुद्ध है, सुव्यवस्थित है, उदात्त आदि शुद्ध स्वरसे तथा कण्ठ-तालवादि शुद्ध स्थानसे प्रयुक्त हुआ है, वह वेदाध्ययन शोभित होता है। न तो विकराल आकृतिवाला, न लंबे ओठोंवाला, न अव्यक्त उच्चारण करनेवाला, न नाकसे बोलनेवाला एवं न गद्गद कण्ठ या जिह्वाबन्धसे युक्त मनुष्य ही वर्णोच्चारणमें समर्थ होता है। जैसे व्याघ्री


$^१$. जहाँ सकारका 'रुत्व', 'यत्व' होकर 'लोपः शाकल्यस्य।' (पा०सू० ८। ३। १९) अथवा 'हलि सर्वेषाम्।' (पा०सू० ८। ३। २२) के नियमानुसार वैकल्पिक लोप होता है और उस दशामें संधि नहीं होती, वहाँ उस संधिके अभावको 'विवृत्ति' या 'विवर्तन' कहा गया है। जैसा कि 'याज्ञवल्क्य-शिक्षा' में वर्णन है—
द्वयोस्तु स्वरयोर्मध्ये संधैर्यत्र न दृश्यते। विवृत्तिस्तत्र विज्ञेया य ईशेति निदर्शनम्॥ (श्लो० ९४)
$^२$. इन आठोंके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं—शिवो वन्द्यः, क ईशः, हरिश्र्शेते, आविष्कृतम्, कस्कः, अहर्पतिः, क ᳵ करोति, क ᳶ पचति।

* अध्याय ३३७ * ६९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

अपने बच्चोंको दाढ़ोंसे पकड़कर एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाती है, किंतु उन्हें पीड़ा नहीं देती, वर्णोंका ठीक इसी तरह प्रयोग करे, जिससे वे वर्ण न तो अव्यक्त (अस्पष्ट) हों और न पीड़ित ही हों। वर्णोंके सम्यक् प्रयोगसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। 'स्वर' तीन प्रकारके माने गये हैं—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। इनके उच्चारणकालके भी तीन नियम हैं—ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत। अकार एवं हकार कण्ठस्थानीय हैं। इकार, चवर्ग, यकार एवं शकार—ये तालुस्थानसे उच्चरित होते हैं। उकार और पवर्ग—ये दोनों ओष्ठस्थानसे उच्चरित होनेवाले हैं। ऋकार, टवर्ग, रेफ एवं षकार—ये मूर्धन्य तथा ॡकार, तवर्ग, लकार और सकार—ये दन्तस्थानीय होते हैं। कवर्गका स्थान जिह्वामूल है। वकारको विद्वज्जन दन्त और ओष्ठसे उच्चरित होनेवाला बताते हैं। एकार और ऐकार कण्ठ-तालव्य तथा ओकार एवं औकार कण्ठोष्ठज माने गये हैं। एकार, ऐकार तथा ओकार और औकारमें कण्ठस्थानीय वर्ण अकारकी आधी मात्रा या एक मात्रा होती है। 'अयोगवाह'१ आश्रयस्थानके भागी होते हैं, ऐसा जानना चाहिये। अच् (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ)—ये स्वर स्पर्शाभावरूप 'विवृत' प्रयत्नवाले हैं। यण् (य, व, र, ल)' 'ईषत्स्पृष्ट' एवं शल् (श, ष, स, ह) 'अर्धस्पृष्ट' अर्थात् 'ईषद्विवृत' प्रयत्नवाले हैं। शेष 'हल्' अर्थात् क से लेकर म तकके अक्षर 'स्पृष्ट प्रयत्नवाले' माने गये हैं। इनमें बाह्य प्रयत्नके कारण वर्णभेद जानना चाहिये 'ञम्' प्रत्याहारमें स्थित वर्ण (ञ, म, ङ, ण, न) अनुनासिक होते हैं। हकार और रेफ अनुनासिक नहीं होते। 'हकार, झकार तथा षकार' के 'संवार', 'घोष' और 'नाद' प्रयत्न हैं। 'यण्' और 'जश्'—इनके 'ईषन्नाद' अर्थात् 'अल्पप्राण' प्रयत्न हैं। ख, फ आदिका 'विवार', 'अघोष' और 'श्वास' प्रयत्न हैं। चर् (च, ट, त, क, प, श, ष, स)-का 'ईषच्छ्वास' प्रयत्न जानना चाहिये। यह व्याकरणशास्त्र वाणीका धाम कहा जाता है॥ १-२२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिक्षानिरूपण' नामक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३६ ॥


तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय

काव्य आदिके लक्षण

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं 'काव्य' और 'नाटक' आदिके स्वरूप तथा 'अलंकारों'का वर्णन करता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य—यही सम्पूर्ण वाङ्मय माना गया है२। शास्त्र, इतिहास तथा काव्य—इन तीनोंकी समाप्ति इसी वाङ्मयमें होती है। वेदादि शास्त्रोंमें शब्दकी प्रधानता है और इतिहास-पुराणोंमें अर्थकी। इन दोनोंमें 'अभिधा-शक्ति' (वाच्यार्थ)-की ही मुख्यता होती है; अतः 'काव्य' इन दोनोंसे भिन्न है। [क्योंकि उसमें व्यङ्ग्य अर्थको प्रधानता दी जाती है३।]


१. अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और यम—ये 'अयोगवाह' कहलाते हैं। वे जिस स्वरपर आश्रित होते हैं, उसीका स्थान उनका स्थान होता है। जैसे—'रामः'का विसर्ग कण्ठस्थानीय है और 'हरिः'का विसर्ग तालुस्थानीय। २. 'सरस्वती-कण्ठाभरण'के रचयिता महाराजाधिराज भोजदेवने अपने ग्रन्थके मङ्गलाचरणमें 'ध्वनिर्वर्णाः पदं वाक्यम्' (१।१) अग्निपुराणकी इस आनुपूर्वीको अविकलरूपसे उद्धृत किया है। ३. शब्दप्रधान वेदादिकी आज्ञाको भामह आदि आचार्योंने 'प्रभुसम्मित' और अर्थप्रधान इतिहास-पुराणोंकी आज्ञाको 'सुहृत्सम्मित' नाम दिया है। इसी तरह शब्द और अर्थको गौण करके जहाँ व्यङ्ग्यार्थको प्रधानता दी गयी है, उस काव्यके उपदेशको 'कान्तासम्मित' कहा है। यथा—

७०० * अग्निपुराण *

संसारमें मनुष्य-जीवन दुर्लभ है; उसमें भी विद्या तो और भी दुर्लभ है। विद्या होनेपर भी कवित्वका गुण आना कठिन है; उसमें भी काव्य-रचनाकी पूर्ण शक्तिका होना अत्यन्त कठिन है¹। शक्तिके साथ बोध एवं प्रतिभा हो, यह और भी कठिन है; इन सबके होते हुए विवेकका होना तो परम दुर्लभ है। कोई भी शास्त्र क्यों न हो, अविद्वान् पुरुषोंके द्वारा उसका अनुसंधान किया जाय तो उससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता²। 'श' आदि वर्ण, अर्थात् 'श ष स ह' तथा वर्गोंके द्वितीय एवं चतुर्थ अक्षर 'महाप्राण' कहलाते हैं³। वर्णोंके समुदायको 'पद' कहते हैं। इसके दो भेद हैं—'सुबन्त' और 'तिङन्त'। अभीष्ट अर्थसे व्यवच्छिन्न संक्षिप्त पदावलीका नाम 'वाक्य' है॥ १-६॥

जिसमें अलंकार भासित होता हो, गुण विद्यमान हो तथा दोषका अभाव हो, ऐसे वाक्यको 'काव्य'⁴ कहते हैं। लोक-व्यवहार तथा वेद (शास्त्र)-का ज्ञान—ये काव्यप्रतिभाकी योनि⁵ हैं। सिद्ध किये मन्त्रके प्रभावसे जो काव्य निर्मित होता है, वह अयोनिज है।⁶ देवता आदिके लिये संस्कृत भाषाका और मनुष्योंके लिये तीन प्रकारकी प्राकृत भाषाका प्रयोग करना चाहिये। काव्य आदि तीन प्रकारके होते हैं—


'प्रभुसम्मितशब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः, सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिहासेभ्यश्च, शब्दार्थयोर्गुणभावेन रसाङ्गभूतव्यापारप्रवणतया विलक्षणं यत् काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणकविकर्म, तत् कान्तेव सरसतापादनेनाभिमुखीकृत्य रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवेः सहृदयानां च करोतीति।' (काव्यप्रकाश-१ उल्लास)

१. साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने अपने ग्रन्थके प्रथम परिच्छेदमें 'काव्यस्योपादेयत्वमग्निपुराणेऽप्युक्तम्।'—यह लिखकर 'नरत्वं दुर्लभं लोके' इत्यादि श्लोकको पूर्णतः उद्धृत किया है। २. भामहपर भी अग्निपुराणकी इन उक्तियोंका प्रभाव पड़ा है। उनका कहना है कि 'गुरुके उपदेशसे जडबुद्धि मनुष्य भी शास्त्रका अध्ययन तो कर लेते हैं, परंतु काव्य करनेकी शक्ति किसी बिरले ही प्रतिभाशाली पुरुषमें होती है।' इस कथनमें 'शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा'की स्पष्टतः छाप है। भामहका श्लोक इस प्रकार है—

गुरुपदेशादध्येतुं शास्त्रं जडधियोऽप्यलम्।
काव्यं तु जायते जातु कस्यचित् प्रतिभावतः॥

३. यह एक श्लोकका भाव शिक्षासे सम्बद्ध है। जान पड़ता है, लेखकके प्रमादसे उसका पाठ इस अध्यायमें समाविष्ट हो गया है। ४. अग्निपुराणकी इसी उक्तिको उपजीव्य मानकर भोजदेवने 'सरस्वतीकण्ठाभरण'में इस प्रकार लिखा है—

निर्दोषं गुणवत्काव्यमलङ्कारैरलङ्कृतम्। (१।२)

५. भामहने इसी कथनको कुछ पल्लवित करके लिखा है कि 'व्याकरण', छन्द, कोष, अर्थ, इतिहासाश्रित कथाएँ, लोकव्यवहार, युक्ति (तर्क) तथा कलाओंका काव्य-रचनामें प्रवृत्त होनेवाले कविजनोंको मनन करना चाहिये। यथा—

शब्दश्छन्दोऽभिधानार्था इतिहासाश्रयाः कथाः। लोको युक्तिः कलाश्चेति मन्तव्या काव्यगैर्ह्यमी॥

अग्निपुराणके 'वेदश्च लोकश्च' इस अंशको ही भामहने विशद किया है। आचार्य वामनने काव्याङ्गकी संज्ञा देकर काव्यरचनाके तीन हेतुओंका उल्लेख किया है—लोक, विद्या और प्रकीर्ण। 'लोक'से उन्होंने 'लोकवृत्त' लिया है। 'विद्या' शब्दसे शब्दस्मृति (व्याकरण), शब्दकोष, छन्दोविचिति, कलाशास्त्र, कामशास्त्र तथा दण्डनीति आदिका ग्रहण किया है तथा 'प्रकीर्ण' शब्दसे प्रतिभा और अवधान (चित्तकी एकाग्रता)-को लिया है। यथा—(काव्यालंकारसूत्राख्ये ग्रन्थे प्रथमेऽधिकरणे तृतीयाध्याये)—'लोको विद्या प्रकीर्णं च काव्याङ्गानि'॥ १॥ 'लोकवृत्तं लोकः'॥ २॥ 'शब्दस्मृत्यभिधानकोशच्छन्दोविचितिकलाकामशास्त्रदण्डनीतिपूर्वा विद्याः'॥ ३॥ 'लक्ष्यज्ञत्वमभियोगो वृद्धसेवावेक्षणं प्रतिभानमवधानं च प्रकीर्णम्'॥ ११॥ इसी प्रकार आचार्य मम्मटने शक्ति (प्रतिभा)-को तथा लोकवृत्त, व्याकरणादिशास्त्र तथा पूर्ववर्ती कवियोंके काव्य आदिके अवलोकनसे प्राप्त हुई व्युत्पत्तिका काव्यका हेतु बताया है। 'साथ ही काव्यवेत्ताओंकी शिक्षाके अनुसार किया जानेवाला अभ्यास भी काव्यनिर्माणमें हेतु होता है,' यह उनका कथन है। अन्यान्य परवर्ती आचार्योंने भी काव्यके इन हेतुओंपर विचार किया है। इन सबके मतोंपर अग्निपुराणके 'वेदश्च लोकश्च' इस कथनका ही प्रभाव परिलक्षित होता है।

६. मन्त्रसिद्धिसे भी अद्भुत काव्य-रचनाकी शक्तिका उदय होता है, इसकी चर्चा रसगङ्गाधरकारने भी की है। 'नैषध' महाकाव्यके रचयिता श्रीहर्षने भी अपने काव्यमें चिन्तामणिबीजकी उपासनासे अकस्मात् श्लोक-रचनाकी शक्तिका आविर्भाव होना बताया है।

  • अध्याय ३३७ * ७०१

गद्य, पद्य और मिश्र१। पादविभागसे रहित पदोंका प्रवाह 'गद्य' कहलाता है। वह भी चूर्णक, उत्कलिका और वृत्तगन्धि भेदसे तीन प्रकारका होता है२। छोटी-छोटी कोमल पदावलीसे युक्त और अत्यन्त मृदु संदर्भसे पूर्ण गद्यको 'चूर्णक' कहते हैं। जिसमें बड़े-बड़े समासयुक्त पद हों, उसका नाम 'उत्कलिका' है३। जो मध्यम श्रेणीके संदर्भसे युक्त हो तथा जिसका विग्रह अत्यन्त कुत्सित (क्लिष्ट) न हो, जिसमें पद्यकी छायाका आभास मिलता हो-जिसकी पदावली किसी पद्य या छन्दके खण्ड-सी जान पड़े, उस गद्यको 'वृत्तगन्धि' कहते हैं। यह सुननेमें अधिक उत्कट नहीं होता४। गद्य-काव्यके पाँच भेद माने जाते हैं-आख्यायिका, कथा, खण्डकथा, परिकथा एवं कथानिका५। जहाँ गद्यके द्वारा विस्तारपूर्वक ग्रन्थ-निर्माता कविके वंशकी प्रशंसा की गयी हो, जिसमें कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ (वियोग) और विपत्ति (मरणादि) प्रसङ्गोंका वर्णन हो, जहाँ वैदर्भी आदि रीतियों तथा भारती आदि वृत्तियोंकी प्रवृत्तियोंपर विशेषरूपसे प्रकाश पड़ता हो, जिसमें 'उच्छ्वास'के नामसे परिच्छेद (खण्ड) किये गये हों, जो 'चूर्णक' नामक गद्यशैलीके कारण अधिक उत्कृष्ट जान पड़ती हो, अथवा जिसमें 'वक्त्र' या 'अपरवक्त्र' नामक छन्दका प्रयोग हुआ हो, उसका नाम 'आख्यायिका' है (जैसे 'कादम्बरी' आदि)। जिस काव्यमें कवि श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे अपने वंशका गुणगान करता हो, जिसमें मुख्य अर्थको उपस्थित करनेके लिये कथान्तरका संनिवेश किया गया हो, जहाँ परिच्छेद हो ही नहीं, अथवा यदि हो भी तो कहीं लम्बकोंद्वारा ही हो, उसका नाम 'कथा' है (जैसे 'कथा-सरित्सागर' आदि)। उसके मध्यभागमें चतुष्पदी (पद्य)-द्वारा बन्ध-रचना करे। जिसमें कथा खण्डमात्र हो, उसे 'खण्डकथा' कहते हैं। खण्डकथा और परिकथा-इन दोनों प्रकारकी कथाओंमें मन्त्री, सार्थवाह (वैश्य) अथवा ब्राह्मणको ही नायक मानते हैं। उन दोनोंका ही प्रधान रस 'करुण' जानना चाहिये। उसमें चार प्रकारका 'विप्रलम्भ' (विरह) वर्णित होता है। (प्रवास, शाप, मान एवं करुण-भेदसे विप्रलम्भके चार प्रकार हो जाते हैं।) उन दोनोंमें ही ग्रन्थके भीतर कथाकी समाप्ति नहीं होती। अथवा 'खण्डकथा' कथाशैलीका ही अनुसरण करती है। कथा एवं आख्यायिका दोनोंके लक्षणोंके मेलसे जो कथावस्तु प्रस्तुत होती है, उसे 'परिकथा' नाम दिया गया है। जिसमें आरम्भमें भयानक, मध्यमें करुण तथा अन्तमें अद्भुत रसको प्रकट करनेवाली रचना होती है, वह 'कथानिका' (कहानी) है। उसे उत्तम


१. भामहने काव्यके दो भेद बताये हैं-गद्य और पद्य। फिर भाषाकी दृष्टिसे इनके तीन-तीन भेद और होते हैं-संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश। वामनने 'काव्यं गद्यं पद्यं च' (३-२१) - इस सूत्रके द्वारा काव्यके गद्य और पद्य दो ही मूलभेद माने हैं। दण्डीने अपने 'काव्यादर्श' में अग्निपुराणकथित गद्य, पद्य और मिश्र - तीनों भेदोंको उद्धृत किया है। भाषाकी दृष्टिसे भी उन्होंने काव्यके चार भेद माने हैं-संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र। अग्निपुराणमें जो 'पादसंतानो गद्यम्।'- इस प्रकार गद्यका लक्षण किया है, दण्डीने अपने 'काव्यादर्श' में इसे अविकलरूपसे उद्धृत किया है। २. आचार्य वामनने भी अग्निपुराणोक्त इन्हीं तीन गद्यभेदोंका उल्लेख किया है। यथा- 'गद्यं वृत्तगन्धि चूर्णमुत्कलिकाप्रायं च।' ३. इसी भावकी छाया लेकर वामनने १।३ के २४-२५वें सूत्रोंका निर्माण किया है- 'अनाविद्धललितपदं चूर्णम्' ॥ २४॥ 'विपरीतमुत्कलिकाप्रायम्' ॥ २५॥ ४. वामनने जिसमें किसी पद्यका भाग प्रतीत होता हो, ऐसे गद्यको 'वृत्तगन्धि' कहा है। यथा- 'पद्यभागवद्वृत्तगन्धि' ॥ १।३।२३॥ साहित्यदर्पणकारने भी 'वृत्तभागयुतम्' कहकर इसी भावकी पुष्टि की है। वामन और विश्वनाथ - दोनों ही स्पष्टतः अग्निपुराणके छायाग्राही हैं। ५. विश्वनाथने 'साहित्यदर्पण' के छठे परिच्छेदमें 'कथा' और 'आख्यायिका' की चर्चा की है। उन्होंने गद्य-पद्यमय काव्योंके तीन भेद माने हैं-चम्पू, विरुद और करम्भक।

७०२ * अग्निपुराण *


श्रेणीका काव्य नहीं माना गया है॥ ७-२०॥

चतुष्पदी नाम है—पद्यका [चार पादोंसे युक्त होनेसे उसे 'चतुष्पदी' कहते हैं]। उसके दो भेद हैं, 'वृत्त' और 'जाति'¹। जो अक्षरोंकी गणनासे जाना जाय, उसे 'वृत्त' कहते हैं। यह भी दो प्रकारका है—'उक्थ' (वैदिकस्तोत्र आदि) और 'कृतिशेषज' (लौकिक)। जहाँ मात्राओंद्वारा गणना हो, वह पद्य 'जाति' कहलाता है। यह काश्यपका मत है। वर्णोंकी गणनाके अनुसार व्यवस्थित छन्दको 'वृत्त' कहते हैं। पिङ्गलमुनिने वृत्तके तीन भेद माने हैं,—सम, अर्धसम तथा विषम। जो लोग गम्भीर काव्य-समुद्रके पार जाना चाहते हैं, उनके लिये छन्दोविद्या नौकाके समान है। महाकाव्य, कलाप, पर्यायबन्ध, विशेषक, कुलक, मुक्तक तथा कोष—ये सभी पद्योंके समुदाय हैं। अनेक सर्गोंमें रचा हुआ संस्कृतभाषाद्वारा निर्मित काव्य 'महाकाव्य' कहलाता है॥ २१-२३॥

सर्गबद्ध रचनाको, जो संस्कृत भाषामें अथवा विशुद्ध एवं परिमार्जित भाषामें लिखी गयी हो, 'महाकाव्य'² कहते हैं। महाकाव्यके स्वरूपका त्याग न करते हुए उसके समान अन्य रचना भी हो तो वह दूषित नहीं मानी जाती। 'महाकाव्य' इतिहासकी कथाको लेकर निर्मित होता है अथवा उसके अतिरिक्त किसी उत्तम आधारको लेकर भी उसकी अवतारणा की जाती है। उसमें यथास्थान गुप्तमन्त्रणा, दूतप्रेषण³, अभियान और युद्ध आदिके वर्णनका समावेश होता है। वह अधिक विस्तृत नहीं होता। शक्वरी, अतिजगती, अतिशक्वरी, त्रिष्टुप् और पुष्पिताग्रा आदि तथा वक्त्र आदि मनोहर एवं समवृत्तवाले छन्दोंमें महाकाव्यकी रचना की जाती है। प्रत्येक सर्गके अन्तमें छन्द बदल देना उचित है। सर्ग अत्यन्त संक्षिप्त नहीं होना चाहिये। 'अतिशक्वरी' और 'अष्टि'—इन दो छन्दोंसे एक सर्ग संकीर्ण होना चाहिये तथा दूसरा सर्ग मात्रिक छन्दोंसे संकीर्ण होना चाहिये। अगला सर्ग पूर्वसर्गकी अपेक्षा अधिकाधिक उत्तम होना चाहिये। 'कल्प' अत्यन्त निन्दित माना गया है। उसमें सत्पुरुषोंका विशेष आदर नहीं होता। नगर, समुद्र, पर्वत, ऋतु, चन्द्रमा, सूर्य, आश्रम, वृक्ष, उद्यान, जलक्रीड़ा, मधुपान, सुरतोत्सव, दूती-वचन-विन्यास तथा कुलटाके चरित्र आदि अद्भुत वर्णनोंसे महाकाव्य पूर्ण होता है। अन्धकार, वायु तथा रतिको व्यक्त करनेवाले अन्य उद्दीपन-विभावोंसे भी वह अलंकृत होता है। उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंकी प्रवृत्ति होती है। वह सब प्रकारके भावोंसे प्रभावित होता है तथा सब प्रकारकी रीतियों तथा सभी रसोंसे उसका संस्पर्श होता है। सभी गुणों और अलंकारोंसे भी महाकाव्यको परिपुष्ट किया जाता है। इन सब विशेषताओंके कारण ही उस रचनाको 'महाकाव्य' कहते हैं तथा उसका निर्माता 'महाकवि' कहलाता है॥ २४-३२॥

महाकाव्यमें उक्ति-वैचित्र्यकी प्रधानता होते हुए भी रस ही उसका जीवन है। उसकी स्वरूप-सिद्धि अपृथग्यत्नसे (अर्थात् सहजभावसे) साध्य वाग्वक्रिमा (वचनवैचित्र्य अथवा वक्रोक्ति)-विषयक रससे होती है। महाकाव्यका फल है—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति⁴। वह नायकके नामसे ही सर्वत्र विख्यात होता है। प्रायः समान छन्दों अथवा वृत्तियोंमें महाकाव्यका निर्वाह किया जाता है। कौशिकी वृत्तिकी प्रधानता होनेसे काव्य-प्रबन्धमें कोमलता आती है। जिसमें प्रवासका


१. 'पद्यं चतुष्पदी तच्च वृत्तं जातिरिति द्विधा।'—यह पद्यांश दण्डीने अपने 'काव्यादर्श'में ज्यों-का-त्यों ले लिया है।
२. भामहने अग्निपुराणके 'सर्गबन्धो महाकाव्यम्'—इस उक्तिको अविकलरूपसे उद्धृत करके ही महाकाव्यके लक्षणका विस्तार किया है।
३. भामहने भी 'मन्त्रदूतप्रयाणादि'—इस आनुपूर्वीका अपने महाकाव्य-लक्षणमें उपयोग किया है।
४. 'चतुर्वर्गफलप्राप्तिः'—इस अंशको परवर्ती साहित्यालोचकोंने अग्निपुराणके इस कथनसे ही लिया है।

  • अध्याय ३३८ * ७०३

वर्णन हो, उस रचनाको 'कलाप' कहते हैं। उसमें 'पूर्वानुराग' नामक शृङ्गाररसकी प्रधानता होती है। संस्कृत अथवा प्राकृतके द्वारा प्राप्ति आदिका वर्णन 'विशेषक' कहलाता है। जहाँ अनेक श्लोकोंका एक साथ अन्वय हो, उसे 'कुलक' कहते हैं। उसीका नाम 'संदानितक' भी है। एक-एक श्लोककी स्वतन्त्र रचनाको 'मुक्तक' कहते हैं। उसे सहृदयोंके हृदयमें चमत्कार उत्पन्न करनेमें समर्थ होना चाहिये। श्रेष्ठ कवियोंकी सुन्दर उक्तियोंसे सम्पन्न ग्रन्थको 'कोष' कहा गया है। वह ब्रह्मकी भाँति अपरिच्छिन्न रससे युक्त होता है तथा सहृदय पुरुषोंको रुचिकर प्रतीत होता है। सर्गमें जो भिन्न-भिन्न छन्दोंकी रचना होती है, वह आभासोपम शक्ति है। उसके दो भेद हैं—'मिश्र' तथा 'प्रकीर्ण'। जिसमें 'श्रव्य' और 'अभिनेय'—दोनोंके लक्षण हों, वह 'मिश्र' और सकल उक्तियोंसे युक्त काव्य 'प्रकीर्ण' कहलाता है॥ ३३-३९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्य आदिके लक्षण' नामक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३७॥


तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय

नाटक-निरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! 'रूपक'के सत्ताईस भेद माने गये हैं¹—नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्णा, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीगदित, नाट्यरासक, रासक, उल्लाप्य तथा प्रेङ्खण। लक्षण दो प्रकारके होते हैं—सामान्य और विशेष। सामान्य लक्षण रूपकके सभी भेदोंमें व्याप्त होते हैं और विशेष लक्षण किसी-किसीमें दृष्टिगोचर होते हैं। रूपकके सभी भेदोंमें पूर्वरङ्गके² निवृत्त हो जानेपर देश-काल, रस, भाव, विभाव, अनुभाव, अभिनय, अङ्क और स्थिति—ये उनके सामान्य लक्षण हैं; क्योंकि इनका सर्वत्र उपसर्पण देखा जाता है। विशेष लक्षण यथावसर बताया जायगा। यहाँ पहले सामान्य लक्षण कहा जाता है; 'नाटक'को धर्म, अर्थ और कामका साधन माना गया है; क्योंकि वह करण है। उसकी इतिकर्तव्यता (कार्यारम्भकी विधि) यह है कि 'पूर्वरङ्ग'का विधिवत् सम्पादन किया जाय। 'पूर्वरङ्ग'के नान्दी आदि बाईस अङ्ग होते हैं³॥ १-८॥

देवताओंको नमस्कार, गुरुजनकी प्रशस्ति तथा गौ, ब्राह्मण और राजा आदिके आशीर्वाद 'नान्दी' कहलाते हैं। रूपकोंमें 'नान्दीपाठ'के पश्चात् यह


१. भरतमुनिके नाट्यशास्त्र (१८। २)-में 'रूपक' के दस भेद बताये गये हैं—नाटक, प्रकरण, अङ्क, व्यायोग, भाण, समवकार, वीथी, प्रहसन, डिम और ईहामृग। अग्निपुराणमें ये दस भेद तो मिलते ही हैं, सत्रह भेद और उपलब्ध होते हैं। इन्हींमें 'विलासिका' नामक एक भेद और जोड़कर विश्वनाथने सब भेदोंकी सम्मिलित संख्या अट्ठाईस कर दी है। उन्होंने प्रथम दस भेदोंको 'रूपक' और शेष अठारह भेदोंको 'उपरूपक' बताया है। अग्निपुराणोक्त 'कर्णा' नामक भेद 'साहित्यदर्पण'में 'प्रकरणी'के नामसे और 'भाणी' नामक भेद 'संलापक' नामसे लिखा गया है।
२. 'रङ्ग' कहते हैं— 'रङ्गशाला' या 'नृत्यस्थान'को। वहाँ जो सम्भावित विघ्न या उपद्रव हों, उनकी शान्तिके लिये सूत्रधार और नट आदि जो 'नान्दीपाठ' और 'स्तुति' आदि करते हैं, उसका नाम 'पूर्वरङ्ग' है।
३. नाट्यशास्त्रके पाँचवें अध्याय (९-१७ तकके श्लोकों)-में प्रत्याहार, अवतरण, आरम्भ, आश्रावणा, वक्त्रपाणि, परिघट्टना, संघोटना, मार्गासारित, ज्येष्ठासारित, मध्यासारित, कनिष्ठासारित—ये ग्यारह 'बहिर्गीत' कहे गये हैं, जो परदेके भीतर ही रहकर अभिनेता या प्रयोगकर्ता प्रयोगमें लाते हैं। तदनन्तर परदा उठाकर सब लोग एक साथ गीतकी योजना करते हैं। उसके गीतक, वर्द्धमान, ताण्डव, उत्थापन, परिवर्तन, नान्दी, शुष्कावकृष्टा, रङ्गद्वार, चारी, महाचारी और प्ररोचना—ये ग्यारह अङ्ग हैं। इन बाईस अङ्गोंका पूर्वरङ्गमें प्रयोग होता है।

७०४ * अग्निपुराण *

लिखा जाता है कि ‘नान्द्यन्ते१ सूत्रधारः' (नान्दीपाठके अनन्तर सूत्रधारका प्रवेश)। इसमें कविकी पूर्व गुरुपरम्पराका, वंशप्रशंसा, पौरुष तथा काव्यके सम्बन्ध और प्रयोजन—इन पाँच विषयोंका निर्देश करे। नटी, विदूषक और पारिपार्श्वक—ये सूत्रधारके साथ जहाँ अपने कार्यसे सम्बद्ध, प्रस्तुत विषयको उपस्थित करनेवाले विचित्र वाक्योंद्वारा परस्पर संलाप करते हैं, पण्डितजन उसको ‘आमुख' जानें। उसको ‘प्रस्तावना' भी कहा जाता है॥ ९-१२॥

‘आमुख'के तीन भेद२ होते हैं—प्रवृत्तक, कथोद्घात और प्रयोगातिशय। जब सूत्रधार उपस्थित काल (ऋतु आदि)-का वर्णन करता है, तब उसका आश्रयभूत पात्र-प्रवेश ‘प्रवृत्तक' कहलाता है। इसका बीजांशोंमें ही प्रादुर्भाव होता है। जब पात्र सूत्रधारके वाक्य अथवा वाक्यार्थको ग्रहण करके प्रवेश करता है, तब उसको ‘कथोद्घात' कहा जाता है। जिस समय सूत्रधार एक प्रयोगमें दूसरे प्रयोगका वर्णन करे, उस समय यदि पात्र वहाँ प्रवेश करे, तो वह ‘प्रयोगातिशय' होता है। ‘इतिवृत्त' (इतिहास)-को नाटक आदिका शरीर कहा जाता है। उसके दो भेद माने गये हैं—‘सिद्ध' और ‘उत्प्रेक्षित'। शास्त्रोंमें वर्णित इतिवृत्त ‘सिद्ध' और कविकी कल्पनासे निर्मित ‘उत्प्रेक्षित' कहा जाता है। बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य—ये पाँच अर्थप्रकृतियाँ (प्रयोजनसिद्धिकी हेतुभूता) हैं३। चेष्टा (कार्यावस्थाएँ) भी पाँच ही मानी गयी हैं। इनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—प्रारम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति-सद्भाव, नियतफलप्राप्ति और पाँचवाँ फलयोग। रूपकमें मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण—ये क्रमशः पाँच संधियाँ हैं४। जो अल्पमात्र वर्णित होनेपर भी बहुधा विसर्पण—अनेक अवान्तर कार्योंको उत्पन्न करता है, फलकी हेतुभूत उस अर्थप्रकृतिको ‘बीज' कहा जाता है। जिसमें विविध वृत्तान्तों और रससे बीजकी उत्पत्ति होती है, काव्यके शरीरमें अनुगत उस संधिको ‘मुख' कहते हैं। अभीष्ट अर्थकी रचना, कथावस्तुकी अखण्डता, प्रयोगमें अनुराग, गोपनीय विषयोंका गोपन, अद्भुत वर्णन, प्रकाश्य विषयोंका प्रकाशन—ये काव्याङ्गोंके छः फल हैं। जैसे अङ्गहीन मनुष्य किसी कार्यमें समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार अङ्गहीन काव्य भी प्रयोगके योग्य नहीं माना जाता। देश-कालके बिना किसी भी इतिवृत्तकी प्रवृत्ति नहीं होती, अतः नियमपूर्वक उन दोनोंका उपादान ‘पद' कहलाता है। देशोंमें भारतवर्ष और कालमें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरयुगको ग्रहण करना चाहिये। देश-कालके बिना कहीं भी प्राणियोंके सुख-दुःखका उदय नहीं होता। सृष्टिके आदिकालकी वार्ता अथवा सृष्टिपालन आदिकी वार्ता प्राप्त हो तो वह वर्णनीय है। ऐसा करनेमें कोई दोष नहीं है५॥ १३-२७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नाटकका निरूपण' नामक तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३८ ॥


१. नाटकोंमें सबसे प्रथम 'नान्दीपाठ'का विधान भरतमुनिने किया है। जैसा कि नाट्यशास्त्रके प्रथम अध्यायमें उल्लेख है— नान्दी कृता मया पूर्वमाशीर्वचनसंयुता। अष्टाङ्गपदसंयुक्ता विचित्रा देवसम्मता॥ २. विश्वनाथने अग्निपुराणके 'संहिताः सूत्रधारेण' इत्यादिसे लेकर 'प्रस्तावनापि सा' तककी पङ्क्तियोंको अपने ग्रन्थमें अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अग्निपुराणमें प्रस्तावनाके 'प्रवृत्तक', 'कथोद्घात' और 'प्रयोगातिशय'—ये तीन भेद माने गये हैं। परंतु विश्वनाथने 'उद्घात्यक' और 'अवलगित'—ये दो भेद और जोड़कर पाँच भेद स्वीकार किये हैं। ३. इन पाँचों अर्थप्रकृतियोंको विश्वनाथने अपने ग्रन्थमें ज्यों-का-त्यों ग्रहण किया है। ४. विश्वनाथने 'निर्वहण' के स्थानमें 'उपसंहृति'का उल्लेख किया है। ५. इस प्रसङ्गके अनुशीलनसे यह स्पष्ट जान पड़ता है कि व्यासदेवपर भरतमुनिका प्रभाव पड़ा है और परवर्ती आलोचकोंके ग्रन्थ भरतमुनि एवं व्यासदेवसे भी प्रभावित हैं।

* अध्याय ३३९ * ७०५

तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय

शृङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदिका निरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! वेदान्तशास्त्रमें जिस अक्षर (अविनाशी), सनातन, अजन्मा और व्यापक परब्रह्म परमेश्वरको अद्वितीय, चैतन्यस्वरूप और ज्योतिर्मय कहते हैं, उसका सहज (स्वरूपभूत) आनन्द कभी-कभी व्यञ्जित होता है, उस आनन्दकी अभिव्यक्तिका ही 'चैतन्य', 'चमत्कार' और 'रस'के नामसे वर्णन किया जाता है¹। आनन्दका जो प्रथम विकार है, उसे 'अहंकार' कहा गया है। अहंकारसे 'अभिमान'का प्रादुर्भाव हुआ। इस अभिमानमें ही तीनों लोकोंकी समाप्ति हुई है॥ १–३॥

अभिमानसे रतिकी उत्पत्ति हुई और वह व्यभिचारी आदि भाव-सामान्यके सहकारसे पुष्ट होकर 'शृङ्गार'के नामसे गायी जाती है। शृङ्गारके इच्छानुसार हास्य आदि अनेक दूसरे भेद प्रकट हुए हैं²। उनके अपने-अपने विशेष स्थायी भाव होते हैं, जिनका परिपोष (अभिव्यक्ति) ही उन-उन रसोंका लक्षण है॥ ४–५॥

वे रस परमात्माके सत्त्वादि गुणोंके विस्तारसे प्रकट होते हैं। अनुरागसे शृङ्गार, तीक्ष्णतासे रौद्र, उत्साहसे वीर और संकोचसे बीभत्स रसका उदय होता है। शृङ्गार रससे हास्य, रौद्र रससे करुण रस, वीर रससे अद्भुत रस तथा बीभत्स रससे भयानक रसकी निष्पत्ति होती है। शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त—ये नौ रस माने गये हैं। वैसे सहज रस तो चार (शृङ्गार, रौद्र, वीर एवं बीभत्स) ही हैं। जैसे बिना त्यागके धनकी शोभा नहीं होती, वैसे ही रसहीन वाणीकी भी शोभा नहीं होती। अपार काव्यसंसारमें कवि ही प्रजापति है। उसको संसारका जैसा स्वरूप रुचिकर जान पड़ता है, उसके काव्यमें यह जगत् वैसे ही रूपमें परिवर्तित होता है। यदि कवि शृङ्गाररसका प्रेमी है, तो उसके काव्यमें रसमय जगत्का प्राकट्य होता है। यदि कवि शृङ्गारी न हो तो निश्चय ही काव्य नीरस होगा। 'रस' भावहीन नहीं है और 'भाव' भी रससे रहित नहीं है; क्योंकि इन भावोंसे रसकी भावना (अभिव्यक्ति) होती है। 'भाव्यन्ते रसा एभिः।' (भावित होते हैं रस इनके द्वारा)—इस व्युत्पत्तिके अनुसार वे 'भाव' कहे गये हैं³॥ ६—१२॥


१. भरतमुनिने रसनिष्पत्तिपर विचार किया, भावोंका भी विशद विवेचन किया, किंतु रसको ब्रह्मचैतन्यसे अभिन्न नहीं कहा; इस विषयमें वेदव्यासकी वाणी 'अग्निपुराण'में अधिक स्पष्ट हुई है। इन्होंने ब्रह्मके सहज आनन्दकी अभिव्यक्तिको ही 'चैतन्य', 'चमत्कार' तथा 'रस' नाम दिया है। वेदान्त-सूत्रकार वेदव्यासके समक्ष अवश्य ही 'रसो वै सः।'-यह औपनिषद वाणी भी रही है। भरतसूत्रके व्याख्याकार आचार्य अभिनवगुप्तपादने, जिनके मतका विशद विवेचन आचार्य मम्मटने अपनी पीयूषवर्षिणी वाणीद्वारा 'काव्यप्रकाश' में किया है, यह वेदान्तदृष्टि ही अपनायी है, तथा 'रसो वै सः'का प्रमाणरूपमें उल्लेख करके 'चिदावरणभङ्ग' या 'भग्नावरणा चित्'को ही 'रस' माना है। भामहने महाकाव्यके लक्षणमें 'युक्तं लोकस्वभावेन रसैश्च सकलैः पृथक्।'-यों लिखकर रसका योग तो स्वीकार किया है, किंतु रसके भव्य स्वरूपका कोई विवेचन नहीं किया है। अभिनवगुप्त, मम्मट तथा विश्वनाथने भी व्यासद्वारा निर्दिष्ट स्वरूपको ही स्वीकार किया है। ध्वनिवादी या व्यञ्जनावादी सहृदयोंने रसके उक्त महामहिम स्वरूपको ही आदर दिया तथा 'ब्रह्मास्वादसहोदर' कहकर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ायी है।

२. इस कथनके उपजीव्य हैं—भरतमुनि। उन्होंने शृंगार, रौद्र, वीर और बीभत्स रसोंसे क्रमशः हास्य, करुण, अद्भुत तथा भयानक रसकी उत्पत्ति मानी है। यथा— शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः। वीराच्चैवाद्भुतोत्पत्तिर्बीभत्साच्च भयानकः ॥ (नाट्यशास्त्र ६। ३९)

३. भरतमुनिने नाट्यशास्त्रमें यह प्रश्न उठाया है कि 'किं रसेभ्यो भावानामाभिनिर्वृत्तिरुताहो भावेभ्यो रसानाम्।' (क्या रसोंसे भावोंकी अभिव्यक्ति होती है अथवा भावोंसे रसोंकी।) इसके उत्तरमें वे कहते हैं कि 'भावोंसे ही रसोंकी अभिव्यक्ति देखी जाती है, रसोंसे भावोंकी नहीं।' रसके उद्भावक होनेके कारण ही वे 'भाव' कहे जाते हैं। यह उत्तर ही अग्निपुराणकी उक्तियोंमें मुखरित हुआ है। **'न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः।'-**यह उक्ति भी नाट्यशास्त्रकी कारिकाका ही अंश है। (देखिये ६। ३६)।

७०६

  • अग्निपुराण *

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'रति' आदि आठ स्थायी भाव होते हैं तथा 'स्तम्भ' आदि आठ सात्त्विक भाव माने जाते हैं। सुखके मनोऽनुकूल अनुभव (आनन्दकी मनोरम अनुभूति)-को 'रति' कहा जाता है। हर्ष आदिके द्वारा चित्तके विकासको 'हास' कहा जाता है। अभीष्ट वस्तुके नाश आदिसे उत्पन्न मनकी विकलताको 'शोक' कहते हैं। अपने प्रतिकूल आचरण करनेवालेपर कठोरताके उदयको 'क्रोध' कहते हैं। पुरुषार्थके अनुकूल मनोभावका नाम 'उत्साह' है॥ १३-१५॥

चित्र आदिके दर्शनसे जनित मानसिक विकलताको 'भय' कहते हैं। दुर्भाग्यवाही पदार्थोंकी निन्दा 'जुगुप्सा' कहलाती है। किसी वस्तुके दर्शनसे चित्तका अतिशय आश्चर्यसे पूरित हो जाना 'विस्मय' कहलाता है। 'स्तम्भ' आदि आठ सात्त्विक भाव हैं, जो रजोगुण और तमोगुणसे परे हैं। भय या रागादि उपाधियोंसे चेष्टाका अवरोध हो जाना 'स्तम्भ'* कहलाता है। श्रम एवं राग आदिसे युक्त अन्तःकरणके क्षोभसे शरीरमें उत्पन्न जलको 'स्वेद' कहते हैं। हर्षादिसे शरीरका उच्छ्वसित होना और उसमें रोंगटे खड़े हो जाना 'रोमाञ्च' कहा गया है। हर्ष आदि तथा भय आदिके कारण वाणीका स्पष्ट उच्चारण न होना (गद्गद हो जाना) 'स्वरभेद' कहा गया है। चित्तके क्षोभसे उत्पन्न कम्पनको 'वेपथु' कहा गया है। विषाद आदिसे शरीरकी कान्तिका परिवर्तन 'वैवर्ण्य' कहा गया है। दुःख अथवा आनन्द आदिसे उद्भूत नेत्रजलको 'अश्रु' कहते हैं। उपवास आदिसे इन्द्रियोंकी संज्ञाहीनताको 'प्रलय' कहा जाता है॥ १६-२१॥

वैराग्य आदिसे उत्पन्न मानसिक खेदको 'निर्वेद' कहा जाता है। मानसिक पीड़ा आदिसे जनित शैथिल्यको 'ग्लानि' कहते हैं; वह शरीरमें ही व्याप्त होती है। अनिष्टप्राप्तिकी सम्भावनाको 'शङ्का' और मत्सर (दूसरेका उत्कर्ष सहन न करने)-को 'असूया' कहा जाता है। मदिरा आदिके उपयोगसे उत्पन्न मानसिक मोह 'मद' कहलाता है। अधिक कार्य करनेसे शरीरके भीतर उत्पन्न क्लान्ति को 'श्रम' कहते हैं। शृङ्गार आदि धारण करनेमें चित्तकी उदासीनताको 'आलस्य' कहते हैं। धैर्यसे भ्रष्ट हो जाना 'दैन्य' तथा अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति न होनेसे जो बार-बार उसकी ओर ध्यान जाता है, उसे 'चिन्ता' कहते हैं। किसी कार्य (भयसे छूटने या इष्टवस्तुको पाने आदि)-के लिये उपाय न सूझना 'मोह' कहलाता है॥ २२-२५॥

अनुभूत वस्तुका चित्तमें प्रतिबिम्बित होना 'स्मृति' कहलाता है। तत्त्वज्ञानके द्वारा अर्थोंके निश्चयको 'मति' कहते हैं। अनुराग आदिसे होनेवाला जो कोई अकथनीय मानसिक संकोच होता है, उसका नाम 'व्रीडा' या 'लज्जा' है। चित्तकी अस्थिरताको 'चपलता' और प्रसन्नताको 'हर्ष' कहते हैं। प्रतीकारकी आशासे उद्भूत अन्तःकरणकी विकलताको 'आवेश' कहा जाता है। कर्तव्यके विषयमें कुछ प्रतिभान न होना 'जडता' कही जाती है। अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिसे बढ़े हुए आनन्द या सन्तोषके अभ्युदयको 'धृति' कहते हैं। दूसरोंमें निकृष्टता और अपनेमें उत्कृष्टराकी भावनाको 'गर्व' कहा जाता है। इच्छित वस्तुके लाभमें दैव आदिसे जनित विघ्नके कारण जो दुःख होता है, उसे 'विषाद' कहते हैं। अभीष्ट पदार्थकी इच्छासे जो मनकी चञ्चल स्थिति होती है, उसका नाम 'उत्कण्ठा' या 'उत्सुकता' है। अस्थिर हो उठना चित्त और इन्द्रियोंका 'अपस्मार'


* 'स्तम्भ' का यही लक्षण विश्वनाथने भी लिया है।