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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 878 में से

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पृष्ठ 720
  • अध्याय ३३५ * | ६९३ ---|---

गुरु हों तथा पाँच-पाँच, आठ और सातपर विराम होता हो, उस छन्दका नाम ‘क्रौञ्चपदा’$^१$ है। [यह ‘अभिकृति’ के अन्तर्गत है।] जिसके प्रतिपादमें दो मगण, तगण, तीन नगण, रगण, सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ, ग्यारह और सातपर विराम होता हो, उस छन्दको ‘भुजंगविजृम्भित’$^२$ कहते हैं। [यह ‘उत्कृति’ छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक पादमें एक मगण, छः नगण, एक सगण और दो गुरु हों तथा नौ, छः-छः एवं पाँच अक्षरोंपर विराम होता हो, उसको ‘अपहाव’$^३$ या ‘उपहाव’ नाम दिया गया है। [यह भी ‘उत्कृति’ में ही है] ॥ २६-२८॥

[अब ‘दण्डक’ जातिका वर्णन किया जाता है—] जिसके प्रत्येक चरणमें दो नगण और सात रगण हों, उसका नाम ‘दण्डक’$^४$ है; इसीको ‘चण्डवृष्टिप्रपात’ भी कहते हैं। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] उक्त छन्दमें दो नगणके सिवा रगणमें वृद्धि करनेपर ‘व्याल’, ‘जीमूत’ आदि नामवाले ‘दण्डक’ बनते हैं। ‘चण्डप्रपात’ के बाद अन्य जितने भी भेद होते हैं, वे सभी दण्डक-प्रस्तार ‘प्रचित’$^५$ कहलाते हैं। अब ‘गाथा-प्रस्तार’ का वर्णन करते हैं ॥ २९-३०॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘समवृत्तनिरूपण’ नामक तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३४॥


तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय

प्रस्तार-निरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! इस छन्दःशास्त्रमें जिन छन्दोंका नामतः निर्देश नहीं किया गया है, किंतु जो प्रयोगमें देखे जाते हैं, वे सभी ‘गाथा’ नामके छन्दके अन्तर्गत हैं। अब ‘प्रस्तार’ बतलाते हैं। जिसमें सब अक्षर गुरु हों, ऐसे पादमें जो आदिगुरु हो, उसके नीचे लघुका उल्लेख करे। [यह ‘एकाक्षर-प्रस्तार’ की बात हुई। ‘द्व्यक्षर-प्रस्तार’में] उसके बाद इसी क्रमसे वर्णोंकी स्थापना करे, अर्थात् पहले गुरु और उसके नीचे लघु$^६$ ॥ १॥


१. या कपिलाक्षी पिङ्गलकेशी कलिरुचिरनुदिनमनुनयकठिना दीर्घतराभिः स्थूलशिराभिः परिवृतवपुरतिशयकुटिलगतिः ।
आयतजङ्घा निम्नकपोला लघुतरकुचयुगपरिचितहृदया सा परिहार्या क्रौञ्चपदा स्त्री ध्रुवमिह निरवधिसुखमभिलषिता ॥
२. ये संनद्धानेकानीकैनरंतुरगकरिपरिवृतैः समं तव शत्रवो युद्धश्रद्धालुब्धात्मानस्त्वदभिमुखमपगतभियः पतन्ति धृतायुधाः ।
ये त्वां दृष्ट्वा संग्रामाग्रे नृपतिवर कृपणमनसश्चलन्ति दिगन्तरं किं वा सोढुं शक्यन्ते कैर्बहुभिरपि सविषविषमं भुजंगविजृम्भितम् ॥
३. श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणशकलललितशिरसं रुद्रं भूतैशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरणयुगमीशानम्।
सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिरकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम् ॥
४. दण्डकका उदाहरणः—
इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी त्रिदशविजयिवीर्य दृप्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण संसेविते ।
जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदरस्पर्शपूताश्रये भुवननिमितपादपद्माभिनानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥
५. प्रचित दण्डकका उदाहरणः—
प्रथमकथितदण्डकश्चण्डवृष्टि प्रपाताभिधानो मुनेः पिङ्गलाचार्यनाम्नोमतः प्रचित इति ततः परं दण्डकानांमियं जातिरैकैकरेफाभिवृद्ध्या यथेष्टं भवेत्।
स्वरुचिविरचितसंज्ञया तद्विशेषैरशेषैः पुनः काव्यमन्येऽपि कुर्वन्तु वागीश्वराः ।
भवति यदि समानसंख्याक्षरैर्यत्र पादव्यवस्था ततो दण्डकः पूज्यतेऽसौ जनैः ॥
६. किस छन्दके कितने भेद हो सकते हैं, इसका ज्ञान करानेवाले प्रत्यय या प्रणालीको ‘प्रस्तार’ आदि कहते हैं। प्रस्तार आदि छः हैं— प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्व्यादिलगक्रिया, संख्या तथा अध्वयोग। एक अक्षरवाले छन्दका भेद जाननेके लिये पहले एक गुरु लिखकर