अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 721, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६९४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
(प्रस्तारके अनन्तर अब 'नष्ट' द्वारा वर्णन | करते हैं। अर्थात् जब यह जाननेकी इच्छा हो कि
उसके नीचे एक लघु लिखे। इस प्रकार एकाक्षर छन्दके दो ही भेद हुए। दो अक्षरके छन्दके भेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये एकाक्षर-प्रस्तारको ही दो बार लिखे; अर्थात् पहले एक गुरु और उसके नीचे एक लघु लिखकर नीचे एक तिरछी रेखा खींच दे। फिर उसके नीचे एक गुरु लिखकर उसके अधोभागमें भी एक लघु लिख दे। तत्पश्चात् पहली आवृत्तिमें द्वितीय अक्षरके स्थानपर गुरु और द्वितीय आवृत्तिमें द्वितीय अक्षरके स्थानपर लघुका उल्लेख कर रेखा हटा दे। इस प्रकार दो अक्षरवाले छन्दके चार भेद हुए। 'द्व्यक्षर-प्रस्तार'को भी पूर्ववत् दो आवृत्तियोंमें स्थापित करके प्रथम आवृत्तिमें तृतीय अक्षरोंकी जगह गुरु और द्वितीय आवृत्तिमें तृतीय अक्षरोंकी जगह लघु लिखना चाहिये। इस प्रकार 'त्र्यक्षर प्रस्तार'में आठ भेद होंगे। इसकी भी दो आवृत्तियाँ करके पूर्ववत् लघु-गुरु-स्थापन करनेसे सोलह भेद 'चतुरक्षर-प्रस्तार'के होंगे। इसी प्रक्रियासे 'पञ्चाक्षर-प्रस्तार'के ३२ और छः अक्षरवाले गायत्री आदि छन्दोंके प्रस्तारभेद ६४ होंगे। सप्ताक्षर आदिके भेद जाननेकी भी यही प्रणाली है। नीचे रेखाचित्रद्वारा इन सब भेदोंका स्पष्टीकरण किया जाता है—
एकाक्षर-प्रस्तारः—
| ऽ | १ |
|---|---|
| । | २ |
द्व्यक्षर-प्रस्तारः—
| ऽऽ | १ |
|---|---|
| ।ऽ | २ |
| ऽ। | ३ |
| ।। | ४ |
त्र्यक्षर-प्रस्तारः—
| ऽऽऽ | १ |
|---|---|
| ।ऽऽ | २ |
| ऽ।ऽ | ३ |
| ।।ऽ | ४ |
| ऽऽ। | ५ |
| ।ऽ। | ६ |
| ऽ।। | ७ |
| ।।। | ८ |
चतुरक्षर-प्रस्तारः—
| ऽऽऽऽ | १ |
|---|---|
| ।ऽऽऽ | २ |
| ऽ।ऽऽ | ३ |
| ।।ऽऽ | ४ |
| ऽऽ।ऽ | ५ |
| ।ऽ।ऽ | ६ |
| ऽ।।ऽ | ७ |
| ।।।ऽ | ८ |
| ऽऽऽ। | ९ |
| ।ऽऽ। | १० |
| ऽ।ऽ। | ११ |
| ।।ऽ। | १२ |
| ऽऽ।। | १३ |
| ।ऽ।। | १४ |
| ऽ।।। | १५ |
| ।।।। | १६ |
उपर्युक्त रेखाचित्रद्वारा समवृत्तोंकी संख्या जानी जाती है। इस समवृत्तकी संख्यामें उसीसे गुणा करनेपर समसहित अर्धसमवृत्तकी संख्या ज्ञात होती है तथा पुनः उसीमें उसीसे गुणा करनेपर समार्धसमसहित विषमवृत्तकी संख्या जानी जाती है। इसका संकेत इस प्रकार है—
समवृत्त संख्या $\times$ (गुणे) समवृत्त संख्या=अर्धसमवृत्त संख्या। अर्धसमवृत्त संख्या $\times$ (गुणे) अर्धसमवृत्त संख्या=विषमवृत्त संख्या। इस प्रकार मिश्रित संख्याका ज्ञान होता है। शुद्ध संख्याके ज्ञानकी प्रणाली इस प्रकार है—अर्धसमवृत्त संख्या—समवृत्त संख्या = शुद्धार्धसमवृत्त संख्या। विषमवृत्त संख्या—अर्धसमवृत्त संख्या = शुद्धविषमवृत्त संख्या। नीचे इसकी तालिका दी जाती है—
| समवृत्त संख्या | समगुणित अर्धसमवृत्त संख्या | अर्धसमगुणित विषमवृत्त संख्या |
|---|---|---|
| एकाक्षर छन्दमें— २ | ४ | १६ |
| द्व्यक्षर ” ४ | १६ | २५६ |
| त्र्यक्षर ” ८ | ६४ | ४०९६ |
| चतुरक्षर ” १६ | २५६ | ६५५३६ |
| पञ्चाक्षर ” ३२ | १०२४ | १०४८५७६ |
| षडक्षर ” ६४ | ४०९६ | १६७७७२१६ |
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