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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 722
* अध्याय ३३५ *६९५

गायत्री या अन्य किसी छन्दके समवृत्तोंमेंसे छठा भेद कैसा होगा, तब इसका उत्तर देनेकी प्रणालीपर विचार करते हैं—] नष्ट-संख्याको आधी करनेपर जब वह दो भागोंमें बराबर बँट जाय, तब एक लघु लिखना चाहिये। यदि आधा करनेपर विषम संख्या हाथ लगे तो उसमें एक जोड़कर सम बना ले और इस प्रकार पुनः आधा करे। ऐसी अवस्थामें एक गुरु अक्षरकी प्राप्ति होती है। उसे भी अन्यत्र लिख ले। जितने अक्षरवाले छन्दके भेदको जानना हो, उतने अक्षरोंकी पूर्ति होनेतक पूर्वोक्त प्रणालीसे गुरु-लघुका उल्लेख करता रहे। [जैसे गायत्री छन्दके छठे भेदका स्वरूप जानना हो तो छःका आधा करना होगा। इससे एक लघु (।)–की प्राप्ति हुई। बाकी रहा तीन; इसमें दोका भाग नहीं लग सकता, अतः एक जोड़कर आधा किया जायगा। इस दशामें एक गुरु (ऽ)–की प्राप्ति हुई। इस अवस्थामें चारका आधा करनेपर दो शेष रहा, दोका आधा करनेपर एक शेष रहा तथा एक लघु (।)–की प्राप्ति हुई। अब एक समसंख्या न होनेसे उसमें एक और जोड़ना पड़ा; इस दशामें एक गुरु (ऽ)–की प्राप्ति हुई। फिर दोका आधा करनेसे एक हुआ और उसमें एक जोड़ा गया। पुनः एक गुरु (ऽ) अक्षरकी प्राप्ति हुई। फिर यही क्रिया करनेसे एक गुरु (ऽ) और उपलब्ध हुआ। गायत्रीका एक पाद छः अक्षरोंका है, अतः छः अक्षर पूरे होनेपर यह प्रक्रिया बंद कर देनी पड़ी। उत्तर हुआ गायत्रीका छठा समवृत्त। ऽ। ऽऽऽ इस प्रकार है।] [अब ‘उद्दिष्ट’की प्रक्रिया बतलाते हैं। अर्थात् जब कोई यह पूछे कि अमुक छन्द प्रस्तारगत किस संख्याका है, तो उसके गुरु-लघु आदिका एक जगह उल्लेख कर ले। इनमें जो अन्तिम लघु हो, उसके नीचे १ लिखे। फिर विपरीतक्रमसे, अर्थात् उसके पहलेके अक्षरोंके नीचे क्रमशः दूनी संख्या लिखता जाय। जब यह संख्या अन्तिम अक्षरपर पहुँच जाय तो उस द्विगुणित संख्यामेंसे एक निकाल दे। फिर सबको जोड़नेसे जो संख्या हो, वही उत्तर होगा। अथवा यदि वह संख्या गुरु अक्षरके स्थानमें जाती हो तो पूर्वस्थानकी संख्याको दूनी करके उसमेंसे एक निकालकर रखे। फिर सबको जोड़नेसे अभीष्ट संख्या निकलेगी।] उद्दिष्टकी संख्या बतलानेका सबसे अच्छा उपाय यह है कि उस छन्दके गुरु-लघु वर्णोंको क्रमशः एक पङ्क्तिमें लिख ले और उनके ऊपर क्रमशः एकसे लेकर दूने-दूने अङ्क रखता जाय; अर्थात् प्रथमपर एक, द्वितीयपर दो, तृतीयपर चार—इस क्रमसे संख्या बैठाये। फिर केवल लघु अक्षरोंके अङ्कोंको जोड़ ले और उसमें एक और मिला दे तो वही उत्तर होगा। जैसे ‘तनुमध्या’ छन्द गायत्रीका किस संख्याका वृत्त है, यह जाननेके लिये तनुमध्याके गुरु-लघु वर्णों—तगण, यगणको ऽऽ।। ऽऽ इस प्रकार लिखना होगा। फिर क्रमशः अङ्क बिछानेपर १


समवृत्तशुद्धार्ध समवृत्तशुद्ध विषम वृत्त
एकाक्षर छन्दमें— २१२
द्वयक्षर ,, ४१२२४०
त्र्यक्षर ,, ८५६४०३२
चतुरक्षर ,, १६२४०६५२८०
पञ्चाक्षर ,, ३२९९२१०४७५५२
षडक्षर ,, ६४४०३२१६७३१२०
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