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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 719, कुल 878 में से

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पृष्ठ 719

६९२ * अग्निपुराण *


छन्दको 'मन्दाक्रान्ता'<sup></sup> कहते हैं। इसमें चार, छः और सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके पादोंमें मगण, तगण, नगण तथा तीन यगण हों, वह 'कुसुमितलतावेल्लिता'<sup></sup> छन्द है। [यह 'धृति' छन्दके अन्तर्गत है।] इसमें पाँच, छः तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें मगण, सगण, जगण, भगण, दो तगण और एक गुरु हों, उसका नाम 'शार्दूलविक्रीडित'<sup></sup> है। इसमें बारह तथा सात अक्षरोंपर विराम होता है। [यह छन्द 'अतिधृति'के अन्तर्गत है] ॥१८-२३॥

'सुवदना'<sup></sup> छन्द 'कृति'के अन्तर्गत है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। इसमें सात, सात, छःपर विराम होता है। जब कृतिके प्रत्येक पादमें क्रमशः गुरु और लघु अक्षर हों तो उसे 'वृत्त'<sup></sup> छन्द कहते हैं। मगण, रगण, भगण, नगण और तीन यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दका नाम 'स्रग्धरा'<sup></sup> है। इसमें सात-सातके तीन विराम होते हैं। [यह 'प्रकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, रगण, नगण, रगण, नगण, रगण, नगण तथा एक गुरु हों और दस-बारह अक्षरोंपर विराम होता हो, उसे 'सुभद्रक'<sup></sup> छन्द कहते हैं। [यह 'आकृति' छन्दके अन्तर्गत है।] नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, एक लघु और एक गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी 'अश्वललिता'<sup></sup> संज्ञा है। इसमें ग्यारह-बारहपर विराम होता है। [यह 'विकृति'के अन्तर्गत है] ॥ २४-२५$\frac{१}{२}$॥

जिसके प्रत्येक चरणमें दो मगण, एक तगण, चार नगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ और पंद्रहपर विराम हो, उसे 'मत्तक्रीडा'<sup></sup> [या मत्ताक्रीडा] कहते हैं। [यह भी 'विकृति'में ही है।] जिसके पृथक्-पृथक् सभी पादोंमें भगण, तगण, नगण, सगण, फिर दो भगण, नगण और यगण हों तथा पाँच, सात, बारहपर विराम होता हो, उसकी 'तन्वी'<sup>१०</sup> संज्ञा है। [यह 'संस्कृति' छन्दके अन्तर्गत है।] जिसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण, चार नगण और एक


१. प्रत्यादिष्टं समरशिरसः कां दिशं प्रप्य नष्टं त्वं निःशेषं कुरु रिपुबलं मार्गमासाद्य सद्यः। किं नाश्रौषीः परिणतधियां नीतियोग्योपदेशं मन्दाक्रान्ता भवति फलिनी नारिकेल्योः क्षयाय॥ २. धन्या नामैताः कुसुमितलतावेल्लितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजतपरभृतकलालापकोलाहलिन्यः। मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोद्गीतझांकाररम्य ग्रामात्तस्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयन्ति॥ ३. कम्बुग्रीवमुदग्रबाहुशिखरं रक्तान्तदीर्घेक्षणं शालप्रांशुशरीरमायतभुजं विस्तीर्णवक्षःस्थलम्। कीलस्कन्धमनुद्धतं परिजने गम्भीरसत्त्वस्वरं राज्यश्रीः समुपैति वीरपुरुषं शार्दूलविक्रीडितम्॥ ४. या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगलसद्गतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजयिनी दीर्घे च नयने। श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने संप्राप्ता साम्प्रतं मे नयनपथमसौ दैवात् सुवदना॥ ५. जन्तुमात्रादुःखकारिकर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व। विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनो हिताय॥ ६. रेखाभ्रूः शुभ्रदन्तद्युतिहसितशरच्चन्द्रिका चारूमूर्तिमद्धान्मातङ्गलीलारुचिरविपुलाभोगतुङ्गस्तनी या। रम्भास्तम्भोपमोरूरलिमलिनघनस्निग्धधम्मिल्लहस्ता राधायै रक्तकण्ठी दिशतु नवमुदं स्रग्धरा कापि गोपी॥ ७. भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभ्रावनप्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः। ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुराङ्गनापरिवृताः॥ ८. पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावशितया वशीकृतमिदम्। सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपामरयशः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतबुद्धिरश्वललितम्॥ ९. हृद्यं मद्यं पीत्वा नारी स्खलितगतिरतिशयरसिकहृदया मत्ताक्रीडालोलैरङ्गैर्मुदमखिलविटजनमनसि कुरुते। वीतक्रीडाश्लीलालापैः श्रवणसुखभगसुललितवचना नृत्यैर्गतैर्भूविक्षेपैः कलभणितविविधविहगकुलरुतैः॥ १०. चन्द्रमुखी सुन्दरघनजघना कुन्दसमानशिखरदशना या निष्कलवीणाश्रुतिसुखवचना त्रस्तकुरङ्गतारलनयनान्ता। निर्मुखपीनोन्नतकुचकलशा मत्तगजेन्द्रललितगतिभासा निर्भरलीलाचरितविततये नन्दकुमार भवतु तव तन्वी॥