अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 718, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३४ * ६९१
इसमें सात-सातपर विराम होता है। तगण, भगण, दो जगण और दो गुरुसे युक्त पादवाले छन्दकी ‘वसन्ततिलका’१ संज्ञा है। [इसमें पादान्तमें विराम होता है।] किसी-किसी मुनिके मतमें इसका नाम ‘सिंहोन्नता’ और ‘उद्धर्षिणी’ भी है॥ १४-१७॥
[इसके आगे ‘अतिशक्करी’का अधिकार है।] जिसके प्रत्येक पादमें चार नगण और एक सगण हों, उसका नाम ‘चन्द्रावती’२ है। [इसमें सात-आठपर विराम होता है।] इसीमें जब छः और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम ‘माला’३ होता है। आठ और सातपर विराम होनेसे यह छन्द ‘मणिगणनिकर’४ कहलाता है। दो नगण, मगण और दो यगणसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘मालिनी’५ कहते हैं। इसमें भी आठ और सात अक्षरोंपर ही विराम होता है। भगण, रगण, तीन नगण और एक गुरुसे युक्त चरणवाले छन्दको ‘ऋषभगजविलसित’६ नाम दिया गया है। इसमें सात-नौ अक्षरोंपर विराम होता है। [यह ‘अष्टि’ छन्दके अन्तर्गत है।] यगण, मगण, नगण, सगण, भगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त चरणोंवाले छन्दको ‘शिखरिणी’७ कहते हैं। इसमें छः तथा ग्यारह अक्षरोंपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा आठ-नौ अक्षरोंपर विराम हो उसका नाम ‘पृथ्वी’८ है—यह पूर्वकालमें आचार्य पिङ्गलने कहा है। मगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु तथा एक गुरुसे युक्त पदवाले छन्दको ‘वंशपत्रपतित’९ कहते हैं। इसमें दस-सातपर विराम होता है। जिसके प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु हों और छः, चार एवं सात अक्षरोंपर विराम हो, उसका नाम ‘हरिणी’१० है। [शिखरिणीसे मन्दाक्रान्तातकका छन्द ‘अत्यष्टि’के अन्तर्गत है।] मगण, भगण, नगण, दो तगण तथा दो गुरुसे युक्त पादोंवाले
१. उद्धर्षिणी जनदृशां स्तनभारगुर्वी नीलोत्पलद्युतिमलिम्लुचलोचना च। सिंहोन्नतत्रिकतटी कुटिलालकान्ता कान्ता वसन्ततिलका नृपवल्लभासौ ॥ २. पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम् । विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं विचरति पथिकमनसि शरदि सरः ॥ ३. नवविकसितकुवलयदलनयनं अमृतमधुररसमयमृदुवचनम्। मधुरिपुरुचिरजलजुगचरणं परिसर शरणमशरणशरणम्॥ ४. कथमपि निपतितमतिमहति पदे नरमनुसरति न फलमनुपचितम्। अपि वरयुवतिषु कुचतटनिहतः स्पृशति न वपुरिह मणिगणनिकरः ॥ ५. अतिविपुलललाटं पीवरोरःकपाटं सुघटितदशनोष्ठं व्याघ्रतुल्यप्रकोष्ठम्। पुरुषमशनिलेखा लक्षणं वीरलक्ष्मी रतिसुरभिशोभिमालिनीवाभ्युपैति ॥ ६. आयतबाहुदण्डमुपचितपृथुहृदयं पीनकटीप्रदेशमृषभगजविलसितम्॥ वीरमुदारसत्त्वमतिशयगुणरसिकं श्रीरतिचञ्चलापि न परिहरति पुरुषम्॥ ७. यशःशेषीभूते जगति नरनाथे गुणनिधौ प्रवृत्ते वैराग्ये विषयसनिष्क्रान्तमनसाम्। इदानीमस्माकं घनतरुलतां निर्झरवतीं तपस्तुङ्गं चेतो भवति गिरिमालां शिखरिणीम्॥ ८. हताः समिति शत्रवस्त्रिभुवने प्रकीर्णं यशः कृतञ्च गुणिनां गृहे निरवधिर्महानुत्सवः। त्वया कृतपरिग्रहे क्षितिपवीर सिंहासने नितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता ॥ ९. अद्य कुरुष्व कर्म सुवृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्। जीवितमल्पकालकलनालघुतरतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव ॥ १०. कुवलयदलेश्यामा पीनोन्नतस्तनशालिनी चकितहरिणीनेत्रच्छायामलिम्लुचलोचना । मनसिजधनुर्ज्यानिर्घोषैरिव श्रुतिपेशलैर्मनसि ललना लीलालापैः करोति ममोत्सवम् ॥