अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 731, कुल 878 में से
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लिखा जाता है कि ‘नान्द्यन्ते१ सूत्रधारः' (नान्दीपाठके अनन्तर सूत्रधारका प्रवेश)। इसमें कविकी पूर्व गुरुपरम्पराका, वंशप्रशंसा, पौरुष तथा काव्यके सम्बन्ध और प्रयोजन—इन पाँच विषयोंका निर्देश करे। नटी, विदूषक और पारिपार्श्वक—ये सूत्रधारके साथ जहाँ अपने कार्यसे सम्बद्ध, प्रस्तुत विषयको उपस्थित करनेवाले विचित्र वाक्योंद्वारा परस्पर संलाप करते हैं, पण्डितजन उसको ‘आमुख' जानें। उसको ‘प्रस्तावना' भी कहा जाता है॥ ९-१२॥
‘आमुख'के तीन भेद२ होते हैं—प्रवृत्तक, कथोद्घात और प्रयोगातिशय। जब सूत्रधार उपस्थित काल (ऋतु आदि)-का वर्णन करता है, तब उसका आश्रयभूत पात्र-प्रवेश ‘प्रवृत्तक' कहलाता है। इसका बीजांशोंमें ही प्रादुर्भाव होता है। जब पात्र सूत्रधारके वाक्य अथवा वाक्यार्थको ग्रहण करके प्रवेश करता है, तब उसको ‘कथोद्घात' कहा जाता है। जिस समय सूत्रधार एक प्रयोगमें दूसरे प्रयोगका वर्णन करे, उस समय यदि पात्र वहाँ प्रवेश करे, तो वह ‘प्रयोगातिशय' होता है। ‘इतिवृत्त' (इतिहास)-को नाटक आदिका शरीर कहा जाता है। उसके दो भेद माने गये हैं—‘सिद्ध' और ‘उत्प्रेक्षित'। शास्त्रोंमें वर्णित इतिवृत्त ‘सिद्ध' और कविकी कल्पनासे निर्मित ‘उत्प्रेक्षित' कहा जाता है। बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य—ये पाँच अर्थप्रकृतियाँ (प्रयोजनसिद्धिकी हेतुभूता) हैं३। चेष्टा (कार्यावस्थाएँ) भी पाँच ही मानी गयी हैं। इनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—प्रारम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति-सद्भाव, नियतफलप्राप्ति और पाँचवाँ फलयोग। रूपकमें मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण—ये क्रमशः पाँच संधियाँ हैं४। जो अल्पमात्र वर्णित होनेपर भी बहुधा विसर्पण—अनेक अवान्तर कार्योंको उत्पन्न करता है, फलकी हेतुभूत उस अर्थप्रकृतिको ‘बीज' कहा जाता है। जिसमें विविध वृत्तान्तों और रससे बीजकी उत्पत्ति होती है, काव्यके शरीरमें अनुगत उस संधिको ‘मुख' कहते हैं। अभीष्ट अर्थकी रचना, कथावस्तुकी अखण्डता, प्रयोगमें अनुराग, गोपनीय विषयोंका गोपन, अद्भुत वर्णन, प्रकाश्य विषयोंका प्रकाशन—ये काव्याङ्गोंके छः फल हैं। जैसे अङ्गहीन मनुष्य किसी कार्यमें समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार अङ्गहीन काव्य भी प्रयोगके योग्य नहीं माना जाता। देश-कालके बिना किसी भी इतिवृत्तकी प्रवृत्ति नहीं होती, अतः नियमपूर्वक उन दोनोंका उपादान ‘पद' कहलाता है। देशोंमें भारतवर्ष और कालमें सत्ययुग, त्रेता और द्वापरयुगको ग्रहण करना चाहिये। देश-कालके बिना कहीं भी प्राणियोंके सुख-दुःखका उदय नहीं होता। सृष्टिके आदिकालकी वार्ता अथवा सृष्टिपालन आदिकी वार्ता प्राप्त हो तो वह वर्णनीय है। ऐसा करनेमें कोई दोष नहीं है५॥ १३-२७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘नाटकका निरूपण' नामक तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३८ ॥
१. नाटकोंमें सबसे प्रथम 'नान्दीपाठ'का विधान भरतमुनिने किया है। जैसा कि नाट्यशास्त्रके प्रथम अध्यायमें उल्लेख है— नान्दी कृता मया पूर्वमाशीर्वचनसंयुता। अष्टाङ्गपदसंयुक्ता विचित्रा देवसम्मता॥ २. विश्वनाथने अग्निपुराणके 'संहिताः सूत्रधारेण' इत्यादिसे लेकर 'प्रस्तावनापि सा' तककी पङ्क्तियोंको अपने ग्रन्थमें अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अग्निपुराणमें प्रस्तावनाके 'प्रवृत्तक', 'कथोद्घात' और 'प्रयोगातिशय'—ये तीन भेद माने गये हैं। परंतु विश्वनाथने 'उद्घात्यक' और 'अवलगित'—ये दो भेद और जोड़कर पाँच भेद स्वीकार किये हैं। ३. इन पाँचों अर्थप्रकृतियोंको विश्वनाथने अपने ग्रन्थमें ज्यों-का-त्यों ग्रहण किया है। ४. विश्वनाथने 'निर्वहण' के स्थानमें 'उपसंहृति'का उल्लेख किया है। ५. इस प्रसङ्गके अनुशीलनसे यह स्पष्ट जान पड़ता है कि व्यासदेवपर भरतमुनिका प्रभाव पड़ा है और परवर्ती आलोचकोंके ग्रन्थ भरतमुनि एवं व्यासदेवसे भी प्रभावित हैं।