अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 730, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३३८ * ७०३
वर्णन हो, उस रचनाको 'कलाप' कहते हैं। उसमें 'पूर्वानुराग' नामक शृङ्गाररसकी प्रधानता होती है। संस्कृत अथवा प्राकृतके द्वारा प्राप्ति आदिका वर्णन 'विशेषक' कहलाता है। जहाँ अनेक श्लोकोंका एक साथ अन्वय हो, उसे 'कुलक' कहते हैं। उसीका नाम 'संदानितक' भी है। एक-एक श्लोककी स्वतन्त्र रचनाको 'मुक्तक' कहते हैं। उसे सहृदयोंके हृदयमें चमत्कार उत्पन्न करनेमें समर्थ होना चाहिये। श्रेष्ठ कवियोंकी सुन्दर उक्तियोंसे सम्पन्न ग्रन्थको 'कोष' कहा गया है। वह ब्रह्मकी भाँति अपरिच्छिन्न रससे युक्त होता है तथा सहृदय पुरुषोंको रुचिकर प्रतीत होता है। सर्गमें जो भिन्न-भिन्न छन्दोंकी रचना होती है, वह आभासोपम शक्ति है। उसके दो भेद हैं—'मिश्र' तथा 'प्रकीर्ण'। जिसमें 'श्रव्य' और 'अभिनेय'—दोनोंके लक्षण हों, वह 'मिश्र' और सकल उक्तियोंसे युक्त काव्य 'प्रकीर्ण' कहलाता है॥ ३३-३९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्य आदिके लक्षण' नामक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३७॥
तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय
नाटक-निरूपण
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! 'रूपक'के सत्ताईस भेद माने गये हैं¹—नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, भाण, वीथी, अङ्क, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, कर्णा, दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीगदित, नाट्यरासक, रासक, उल्लाप्य तथा प्रेङ्खण। लक्षण दो प्रकारके होते हैं—सामान्य और विशेष। सामान्य लक्षण रूपकके सभी भेदोंमें व्याप्त होते हैं और विशेष लक्षण किसी-किसीमें दृष्टिगोचर होते हैं। रूपकके सभी भेदोंमें पूर्वरङ्गके² निवृत्त हो जानेपर देश-काल, रस, भाव, विभाव, अनुभाव, अभिनय, अङ्क और स्थिति—ये उनके सामान्य लक्षण हैं; क्योंकि इनका सर्वत्र उपसर्पण देखा जाता है। विशेष लक्षण यथावसर बताया जायगा। यहाँ पहले सामान्य लक्षण कहा जाता है; 'नाटक'को धर्म, अर्थ और कामका साधन माना गया है; क्योंकि वह करण है। उसकी इतिकर्तव्यता (कार्यारम्भकी विधि) यह है कि 'पूर्वरङ्ग'का विधिवत् सम्पादन किया जाय। 'पूर्वरङ्ग'के नान्दी आदि बाईस अङ्ग होते हैं³॥ १-८॥
देवताओंको नमस्कार, गुरुजनकी प्रशस्ति तथा गौ, ब्राह्मण और राजा आदिके आशीर्वाद 'नान्दी' कहलाते हैं। रूपकोंमें 'नान्दीपाठ'के पश्चात् यह
१. भरतमुनिके नाट्यशास्त्र (१८। २)-में 'रूपक' के दस भेद बताये गये हैं—नाटक, प्रकरण, अङ्क, व्यायोग, भाण, समवकार, वीथी, प्रहसन, डिम और ईहामृग। अग्निपुराणमें ये दस भेद तो मिलते ही हैं, सत्रह भेद और उपलब्ध होते हैं। इन्हींमें 'विलासिका' नामक एक भेद और जोड़कर विश्वनाथने सब भेदोंकी सम्मिलित संख्या अट्ठाईस कर दी है। उन्होंने प्रथम दस भेदोंको 'रूपक' और शेष अठारह भेदोंको 'उपरूपक' बताया है। अग्निपुराणोक्त 'कर्णा' नामक भेद 'साहित्यदर्पण'में 'प्रकरणी'के नामसे और 'भाणी' नामक भेद 'संलापक' नामसे लिखा गया है।
२. 'रङ्ग' कहते हैं— 'रङ्गशाला' या 'नृत्यस्थान'को। वहाँ जो सम्भावित विघ्न या उपद्रव हों, उनकी शान्तिके लिये सूत्रधार और नट आदि जो 'नान्दीपाठ' और 'स्तुति' आदि करते हैं, उसका नाम 'पूर्वरङ्ग' है।
३. नाट्यशास्त्रके पाँचवें अध्याय (९-१७ तकके श्लोकों)-में प्रत्याहार, अवतरण, आरम्भ, आश्रावणा, वक्त्रपाणि, परिघट्टना, संघोटना, मार्गासारित, ज्येष्ठासारित, मध्यासारित, कनिष्ठासारित—ये ग्यारह 'बहिर्गीत' कहे गये हैं, जो परदेके भीतर ही रहकर अभिनेता या प्रयोगकर्ता प्रयोगमें लाते हैं। तदनन्तर परदा उठाकर सब लोग एक साथ गीतकी योजना करते हैं। उसके गीतक, वर्द्धमान, ताण्डव, उत्थापन, परिवर्तन, नान्दी, शुष्कावकृष्टा, रङ्गद्वार, चारी, महाचारी और प्ररोचना—ये ग्यारह अङ्ग हैं। इन बाईस अङ्गोंका पूर्वरङ्गमें प्रयोग होता है।