अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अध्याय ३२५ * ६६७
करता हूँ, जिससे मन्त्र उत्तम सिद्धिको देनेवाला होता है। पृथ्वीपर कूटयन्त्ररहित मातृका (अक्षर) लिखे। मन्त्राक्षरोंको विलग-विलग करके अनुस्वारको पृथक् ले जाय। साधकका भी जो नाम हो, उसके अक्षरोंको अलग-अलग करे। मन्त्रके आदि और अन्तमें साधकके नामाक्षर जोड़े। फिर सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध तथा अरि—इस संज्ञाके अनुसार अक्षरोंको क्रमशः गिने। मन्त्रके आदि तथा अन्तमें 'सिद्ध' हो तो वह शत-प्रतिशत सिद्धिदायक होता है। यदि आदि और अन्त दोनोंमें 'सिद्ध' (अक्षर) हों तो उस मन्त्रकी तत्काल सिद्धि होती है। यदि आदि और अन्तमें भी 'सुसिद्ध' हो तो उस मन्त्रको सिद्धवत् मान ले—वह मन्त्र अनायास ही सिद्ध हो गया—ऐसा समझ ले। यदि आदि और अन्त—दोनोंमें 'अरि' हो तो उस मन्त्रको दूरसे ही त्याग दे। 'सिद्ध' और 'सुसिद्ध'—एकार्थक हैं। 'अरि' और 'साध्य' भी एकसे ही हैं। यदि मन्त्रके आदि और अन्त अक्षरमें भी मन्त्र 'सिद्ध' हो और बीचमें सहस्रों 'रिपु'-अक्षर हों तो भी वे दोषकारक नहीं होते हैं। मायाबीज, प्रसादबीज और प्रणवके योगसे विख्यात मन्त्रमें अंशक होते हैं। वे क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रके अंश हैं। ब्रह्माका अंश 'ब्रह्मविद्या' कहलाता है। विष्णुका अंश 'वैष्णव' कहा गया है। रुद्रांशक मन्त्र 'वीर' कहलाता है। इन्द्रांशक मन्त्र 'ईश्वरप्रिय' होता है। नागांश-मन्त्र नागोंकी भाँति स्तब्ध नेत्रवाला माना गया है। यक्षके अंशका मन्त्र 'भूषणप्रिय' होता है। गन्धर्वोंके अंशका मन्त्र अत्यन्त गीत आदि चाहता है। भीमांश, राक्षसांश तथा दैत्यांश-मन्त्र युद्ध करानेवाला होता है। विद्याधरोंके अंशका मन्त्र अभिमानी होता है। पिशाचांश मन्त्र मलाक्रान्त होता है। मन्त्रका पूर्णतः निरीक्षण करके उपदेश देना चाहिये। एकाक्षरसे लेकर अनेक अक्षरोंतकके मन्त्रके अन्तमें यदि 'फट्'—यह पल्लव जुड़ा हो तो उसे 'मन्त्र' कहना चाहिये। पचास अक्षरोंतकके (फट्काररहित) मन्त्रकी 'विद्या' संज्ञा है। बीस अक्षरोंतककी विद्याको 'बाला विद्या' कहते हैं। बीस अक्षरोंतकके 'अस्त्रान्त' मन्त्रको 'रुद्रा' कहा गया है। इससे ऊपर तीन सौ अक्षरोंतकके मन्त्र 'वृद्ध' कहे जाते हैं। अकारसे लेकर हकारतकके अक्षर मन्त्रमें होते हैं। मन्त्रमें क्रमशः शुक्ल और कृष्ण—दो पक्ष होते हैं। अनुस्वार और विसर्गको छोड़कर दस स्वर होते हैं। ह्रस्वस्वर शुक्लपक्ष तथा दीर्घस्वर कृष्णपक्ष हैं। ये ही प्रतिपदा आदि तिथियाँ हैं। उदयकालमें शान्तिक आदि कर्म करावे तथा भ्रमितकालमें वशीकरण आदि। भ्रमितकाल एवं दोनों संध्याओंमें द्वेषण तथा उच्चाटन-सम्बन्धी कर्म करे। स्तम्भनकर्मके लिये सूर्यास्तकाल प्रशस्त है। इडा नाड़ी चलती हो तो शान्तिक आदि कर्म करे। पिङ्गला नाड़ी चलती हो तो आकर्षण-सम्बन्धी कार्य करे। विषुवकालमें जब दोनों नाड़ियाँ समान भावसे स्थित हों, तब मारण, उच्चाटन आदि पाँच कर्म पृथक्-पृथक् सिद्ध करे। तीन तल्ले गृहमें नीचेके तल्लेको 'पृथ्वी', बीचवालेको 'जल' तथा ऊपरवालेको 'तेज' कहते हैं। जहाँ-जहाँ रन्ध्र (छिद्र या गवाक्ष) है, वहाँ बाह्यपार्श्वमें वायु और भीतरी पार्श्वमें आकाश है। पार्थिव अंशमें स्तम्भन, जलीय अंशमें शान्तिकर्म तथा तैजस अंशमें वशीकरण आदि कर्म करे। वायुमें भ्रमण तथा शून्य (आकाश)-में पुण्यकर्म या पुण्यकालका अभ्यास करे॥७–२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अंशक आदिका कथन' नामक तीन सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२५॥
६६८ * अग्निपुराण *
तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय
गौरी आदि देवियों तथा मृत्युंजयकी पूजाका विधान
महादेवजी कहते हैं—स्कन्द ! अब मैं सौभाग्य आदिके निमित्त उमाकी पूजाका विधान बताऊँगा। उनके मन्त्र, ध्यान, आवरणमण्डल, मुद्रा तथा होमविधिका भी प्रतिपादन करूँगा॥ १॥
‘गौं गौरीमूर्तये नमः*।’—यह गौरीदेवीका वाचक मूल मन्त्र है। ‘ॐ ह्रीं सः शौं गौर्यै नमः।’ तीन अक्षरसे ही ‘नमः’ आदिके योगपूर्वक षडङ्गन्यास करना चाहिये। प्रणवसे आसन और हृदय-मन्त्रसे मूर्तिकी उपकल्पना करे। ‘ऊ’ कालबीज तथा शिवबीजका उद्धार करे। दीर्घस्वरसे आक्रान्त प्राण—‘यां यीं’ इत्यादिसे जातियुक्त षडङ्गन्यास करे। प्रणवसे आसन तथा हृदय-मन्त्रसे मूर्तिन्यास करे। यह मैंने ‘यामल-मन्त्र’ कहा है। अब ‘एकवीर’का वर्णन करता हूँ। सृष्टिन्याससे युक्त व्यापकन्यास अग्नि, माया तथा कृशानुद्वारा करे। शिव-शक्तिमय बीज हृदयादिसे वर्जित है। गौरीकी सोने, चाँदी, लकड़ी अथवा पत्थर आदिकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। अथवा पाँच पिण्डीवाली मृण्मयी प्रतिमा बनाये। चारों कोणोंमें अव्यक्त प्रतिमा रहे और मध्यभागमें पाँचवीं व्यक्त प्रतिमा स्थापित करे। आवरण-देवताओंके रूपमें क्रमशः ललिता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। पहले वृत्ताकार अष्टदल कमल बनाकर आग्नेय आदि कोणवर्ती दलोंमें क्रमशः ललिता, सुभगा, गौरी और क्षोभणीकी पूजा करे। फिर पूर्वादि दलोंमें वामा, ज्येष्ठा, क्रिया और ज्ञानाका यजन करे। पीठयुक्त वामभागमें शिवके अव्यक्त रूपकी पूजा करनी चाहिये। देवीका व्यक्त रूप दो या तीन नेत्रोंवाला है। वह शुद्ध रूप भगवान् शंकरके साथ पूजित होता है। वे देवी दो पीठ या दो कमलोंपर स्थित होती हैं। वहाँ देवी दो, चार, आठ अथवा अठारह भुजाओंसे युक्त हैं, ऐसा चिन्तन करे। वे सिंह अथवा भेड़ियेको भी अपना वाहन बनाती हैं। अष्टादशभुजाके दायें नौ हाथोंमें नौ आयुध हैं, जिनके नाम यों हैं—स्रक् (हन्), अक्ष, सूत्र (पाश), कलिका, मुण्ड, उत्पल, पिण्डिका, बाण और धनुष। इनमेंसे एक-एक महान् वस्तु उनके एक-एक हाथकी शोभा बढ़ाते हैं। वामभागके नौ हाथोंमें भी प्रत्येकमें एक-एक करके क्रमशः नौ वस्तुएँ हैं। यथा—पुस्तक, ताम्बूल, दण्ड, अभय, कमण्डलु, गणेशजी, दर्पण, बाण और धनुष॥ २—१४॥
उनको ‘व्यक्त’ अथवा ‘अव्यक्त’ मुद्रा दिखानी चाहिये। आसन-समर्पणके लिये ‘पद्म-मुद्रा’ कही गयी है। भगवान् शिवकी पूजामें ‘लिङ्ग-मुद्रा’ का विधान है। यही ‘शिवमुद्रा’ है। ‘आवाहनीमुद्रा’ दोनोंके लिये है। शक्ति-मुद्रा ‘योनि’ नामसे कही गयी है। इनका मण्डल या मन्त्र चौकोर है। यह चार हाथ लंबा-चौड़ा हुआ करता है। मध्यवर्ती चार कोष्ठोंमें त्रिदल कमल अङ्कित करना चाहिये। तीनों कोणोंके ऊर्ध्वभागमें अर्धचन्द्र रहे। उसे दो पदों (कोष्ठों)-को लेकर बनाया जाय। एकसे दूसरा दुगुना होना चाहिये। द्वारोंका कण्ठभाग दो-दो पदोंका हो; किंतु उपकण्ठ उससे दुगुना रहना चाहिये। एक-एक दिशामें तीन-तीन द्वार रखने चाहिये अथवा ‘सर्वतोभद्र’ मण्डल बनाकर उसमें पूजन करना चाहिये। अथवा किसी चबूतरे या वेदीपर देवताकी स्थापना करके पञ्चगव्य तथा पञ्चामृत आदिसे पूजन करे॥ १५–१८॥
पूजन करके उत्तराभिमुख हो उन्हें लाल रंगके फूल अर्पण करने चाहिये। घृत आदिकी
* ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’में इसी मन्त्रको ‘गौरीमन्त्र’ कहा है। यहाँ मूलमें जो बीज दिये गये हैं, उनका उल्लेख वहाँ नहीं मिलता।
- अध्याय ३२७ * ६६९
सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति प्रदान करनेवाला साधक सम्पूर्ण सिद्धियोंका भागी होता है। फिर बलि अर्पित करके तीन या आठ कुमारियोंको भोजन करावे। पूजाका नैवेद्य शिवभक्तोंको दे, स्वयं अपने उपयोगमें न ले। इस प्रकार अनुष्ठान करके कन्या चाहनेवालेको कन्या और पुत्रहीनको पुत्रकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवाली स्त्री सौभाग्यशालिनी होती है। राजाको युद्धमें विजय तथा राज्यकी प्राप्ति होती है। आठ लाख जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है तथा देवगण वशमें हो जाते हैं। इष्टदेवको निवेदन किये बिना भोजन न करे। बायें हाथसे भी अर्चना कर सकते हैं। विशेषतः अष्टमी, चतुर्दशी तथा तृतीयाको ऐसा करनेकी विधि है॥ १९—२२$\frac{१}{२}$॥
अब मैं मृत्युंजयकी पूजाका वर्णन करूँगा। कलशमें उनकी पूजा करे। हवनमें प्रणव मृत्युंजयकी मूर्ति है और 'ओं जूं सः।'—इस प्रकार मूलमन्त्र है। 'ओं जूं सः वौषट्।'—ऐसा कहकर अर्चनीय देवता मृत्युंजयको कुम्भमुद्रा दिखावे। इस मन्त्रका दस हजार बार जप करे तथा खीर, दूर्वा, घृत, अमृता (गुडुची), पुनर्नवा (गदहपूर्ना), पायस (पयःपक्व वस्तु) और पुरोडाशका हवन करे। भगवान् मृत्युंजयके चार मुख और चार भुजाएँ हैं। वे अपने दो हाथोंमें कलश और दो हाथोंमें वरद एवं अभयमुद्रा धारण करते हैं। कुम्भमुद्रासे उन्हें स्नान कराना चाहिये। इससे आरोग्य, ऐश्वर्य तथा दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित औषध शुभकारक होता है। भगवान् मृत्युंजय ध्यान किये जानेपर दुर्मृत्युको दूर करनेवाले हैं, इसलिये उनकी सदा पूजा होती है॥ २३—२७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गौरी आदिकी पूजाका वर्णन' नामक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२६॥
तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय
विभिन्न कर्मोंमें उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालयकी महत्ताका विचार
भगवान् महेश्वर कहते हैं—कार्तिकेय! व्रतेश्वर और सत्य आदि देवताओंका पूजन करके उनको व्रतका समर्पण करना चाहिये। अरिष्ट-शान्तिके लिये अरिष्टमूलकी माला उत्तम है। कल्याणप्राप्तिके लिये सुवर्ण एवं रत्नमयी, मारणकर्ममें महाशङ्खमयी, शान्तिकर्ममें शङ्खमयी और पुत्रप्राप्तिके लिये मौक्तिकमयी मालासे जप करे। स्फटिकमणिकी माला कोष-सम्पत्ति देनेवाली और रुद्राक्षकी माला मुक्तिदायिनी है। उसमें आँवलेके बराबर रुद्राक्ष उत्तम माना गया है। मेरुसहित या मेरुहीन माला भी जपमें ग्राह्य हैं। मानसिक जप करते समय मालाके मणियोंको अनामिका और अङ्गुष्ठसे सरकाना चाहिये। उपांशु जपमें तर्जनी और अङ्गुष्ठके संयोगसे मणियोंकी गणना करे; किंतु जपमें मेरुका कभी उल्लङ्घन न करे। यदि प्रमादवश माला गिर जाय, तो दो सौ बार मन्त्रजप करे। घण्टा सर्ववाद्यमय है। उसका वादन अर्थ-सिद्धि करनेवाला है। गृह और मन्दिरमें शिवलिङ्गकी, गोमय, गोमूत्र, वल्मीक-मृत्तिका, भस्म और जलसे शुद्धि करनी चाहिये॥ १—६॥
कार्तिकेय! 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। वेदमें 'पञ्चाक्षर' और लोकमें 'षडक्षर' माना गया है। परम अक्षर ओंकारमें शिव सूक्ष्म वटबीजमें वटवृक्षके समान स्थित हैं। शिवके क्रमशः 'ॐ नमः शिवाय'—'ईशानः सर्वविद्यानाम्' आदि
६७० * अग्निपुराण *
मन्त्र समस्त विद्याओंके समुदाय इस षडक्षर मन्त्रके भाष्य हैं। 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र ही परमपद है। इसी मन्त्रसे शिवलिङ्गका पूजन करना चाहिये; क्योंकि धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् शिव सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये लिङ्गमें प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य शिवलिङ्गका पूजन नहीं करता है, वह धर्मकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाता है। लिङ्गपूजनसे भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये जीवनपर्यन्त शिवलिङ्गका पूजन करे। भले ही प्राण चले जायें, किंतु उसका पूजन किये बिना भोजन न करे। मनुष्य रुद्रके पूजनसे रुद्र, श्रीविष्णुके यजनसे विष्णु, सूर्यकी पूजा करनेसे सूर्य और शक्तिकी अर्चनासे शक्तिका सारूप्य प्राप्त करता है। उसे सम्पूर्ण यज्ञ, तप, दानकी प्राप्ति होती है। मनुष्य लिङ्गकी स्थापना करके उससे करोड़गुना फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य प्रतिदिन तीनों समय पार्थिव-लिङ्गका निर्माण करके बिल्वपत्रोंसे उसका पूजन करता है, वह अपनी एक सौ ग्यारह पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। अपने धनसंचयके अनुसार भक्तिपूर्वक देवमन्दिर निर्माण कराना चाहिये। दरिद्र और धनिकको मन्दिर-निर्माणमें यथाशक्ति अल्प या अधिक व्यय करनेके समान फल मिलता है। संचित धनके दो भाग धर्मकार्यमें व्यय करके जीवन-निर्वाहके लिये समभाग रखें; क्योंकि जीवन अनित्य है। देवमन्दिर बनवानेवाला अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति करता है। मिट्टी, लकड़ी, ईंट और पत्थरसे मन्दिर-निर्माणका क्रमशः करोड़गुना फल है। आठ ईंटोंसे भी मन्दिरका निर्माण करनेवाला स्वर्गलोकको प्राप्त हो जाता है। क्रीडामें धूलिका मन्दिर बनानेवाला भी अभीष्ट मनोरथको प्राप्त करता है॥ ७—११॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवालय-माहात्म्य-वर्णन' नामक तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२७॥
तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
छन्दोंके गण और गुरु-लघुकी व्यवस्था
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं वेदके मूलमन्त्रोंके अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दोंका क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण—ये आठ गण होते हैं। सभी गण तीन-तीन अक्षरोंके हैं। इनमें मगणके सभी अक्षर गुरु (ऽऽऽ) और नगणके सब अक्षर लघु (।।।) होते हैं। आदि गुरु (ऽ।।) होनेसे 'भगण' तथा आदि लघु (।ऽऽ) होनेसे 'यगण' होता है। इसी प्रकार अन्त्य गुरु (।।ऽ) होनेसे 'सगण' तथा अन्त्य लघु होनेसे 'तगण' (ऽऽ।) होता है। पादके अन्तमें वर्तमान ह्रस्व अक्षर विकल्पसे गुरु माना जाता है। विसर्ग, अनुस्वार, संयुक्त अक्षर (व्यञ्जन), जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीयसे अव्यवहित पूर्वमें स्थित होनेपर 'ह्रस्व' भी 'गुरु' माना जाता है, दीर्घ तो गुरु है ही। गुरुका संकेत 'ग' और लघुका संकेत 'ल' है। ये 'ग' और 'ल' गण नहीं हैं। 'वसु' शब्द आठकी और 'वेद' चारकी संज्ञा हैं, इत्यादि बातें लोकके अनुसार जाननी चाहिये॥ १—३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२८॥
* अध्याय ३३० * ६७१
तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय
गायत्री आदि छन्दोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! (गायत्री छन्दके आठ भेद हैं—आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची तथा ब्राह्मी) 'छन्द' शब्द अधिकारमें प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इस पूरे प्रकरणमें छन्द-शब्दकी अनुवृत्ति होती है। 'दैवी' गायत्री एक अक्षरकी, 'आसुरी' पंद्रह अक्षरोंकी, 'प्राजापत्या' आठ अक्षरोंकी, 'याजुषी' छः अक्षरोंकी, 'साम्नी' गायत्री बारह अक्षरोंकी तथा 'आर्ची' अठारह अक्षरोंकी है। यदि साम्नी गायत्रीमें क्रमशः दो-दो अक्षर बढ़ाते हुए उन्हें छः कोष्ठोंमें लिखा जाय, इसी प्रकार आर्ची गायत्रीमें तीन-तीन, प्राजापत्या-गायत्रीमें चार-चार तथा अन्य गायत्रियोंमें अर्थात् दैवी और याजुषीमें क्रमशः एक-एक अक्षर बढ़ जाय एवं आसुरी गायत्रीका एक-एक अक्षर क्रमशः छः कोष्ठोंमें घटता जाय तो उन्हें 'साम्नी' आदि भेदसहित क्रमशः उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती छन्द जानना चाहिये। याजुषी, साम्नी तथा आर्ची—इन तीन भेदोंवाले गायत्री आदि प्रत्येक छन्दके अक्षरोंको पृथक्-पृथक् जोड़नेपर उन सबको 'ब्राह्मी-गायत्री', 'ब्राह्मी-उष्णिक्' आदि छन्द समझना चाहिये। इसी प्रकार याजुषीके पहले जो दैवी, आसुरी और प्राजापत्या नामक तीन भेद हैं, उनके अक्षरोंको पृथक्-पृथक् छः कोष्ठोंमें जोड़नेपर जितने अक्षर होते हैं, वे 'आर्षी गायत्री', 'आर्षी उष्णिक्' आदि कहलाते हैं। इन भेदोंको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये चौंसठ कोष्ठोंमें लिखना चाहिये ॥ १–५॥
(कोष्ठक इस प्रकार है—)
| छन्द | गायत्री के अक्षर | उष्णिक् के अक्षर | अनुष्टुप् के अक्षर | बृहती के अक्षर | पङ्क्ति के अक्षर | त्रिष्टुप् के अक्षर | जगती के अक्षर |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ आर्षी | २४ | २८ | ३२ | ३६ | ४० | ४४ | ४८ |
| २ दैवी | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| ३ आसुरी | १५ | १४ | १३ | १२ | ११ | १० | ९ |
| ४ प्राजापत्या | ८ | १२ | १६ | २० | २४ | २८ | ३२ |
| ५ याजुषी | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
| ६ साम्नी | १२ | १४ | १६ | १८ | २० | २२ | २४ |
| ७ आर्ची | १८ | २१ | २४ | २७ | ३० | ३३ | ३६ |
| ८ ब्राह्मी | ३६ | ४२ | ४८ | ५४ | ६० | ६६ | ७२ |
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२९॥
तीन सौ तीसवाँ अध्याय
'गायत्री' से लेकर 'जगती' तक छन्दोंके भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्रका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—इस प्रकरणकी पूर्ति होनेतक 'पादः' पदका अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री आदि छन्दोंमें किसी पादकी अक्षर-संख्या पूरी न हो, वहाँ 'इय्', 'उव्' आदिके द्वारा उसकी पूर्ति की जाती है। (जैसे 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' में आठ अक्षरकी पूर्तिके लिये 'वरेण्यम्' के स्थानमें 'वरेणियम्' समझ लिया जाता है। 'स्वःपते' के स्थानमें 'सुवःपते' माना जाता है।) गायत्री छन्दका एक पाद आठ अक्षरोंका होता है। अर्थात् जहाँ 'गायत्रीके
६७२ * अग्निपुराण *
पाद'का कथन हो, वहाँ आठ अक्षर ग्रहण करने चाहिये। [यही बात अन्य छन्दोंके पादोंके सम्बन्धमें भी है।] 'जगती' छन्दका पाद बारह अक्षरोंका होता है। विराट्के पाद दस अक्षरोंके बताये गये हैं। 'त्रिष्टुप्' छन्दका चरण ग्यारह अक्षरोंका है। जिस छन्दका जैसा पाद बताया गया है, उसीके अनुसार कोई छन्द एक पादका, कोई दो पादका, कोई तीनका और कोई चार पादका माना गया है। [जैसे आठ अक्षरके तीन पादोंका 'गायत्री' छन्द और चार पादोंका 'अनुष्टुप्' होता है।] 'आदि छन्द' अर्थात् 'गायत्री' कहीं छः अक्षरके पादोंसे चार पादोंकी होती है। [जैसे ऋग्वेदमें—'इन्द्रः शचीपतिर्बलेन वीलितः। दुश्च्यवनो वृषा लमत्सु सामहिः॥'] कहीं-कहीं गायत्री सात अक्षरके पादोंसे तीन पादकी होती है। [जैसे ऋग्वेदमें—'युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम्। भूयाम वाजदाम्नाम्॥' (१।१७।४)] वह सात अक्षरोंवाली गायत्री 'पाद-निचृत्' संज्ञा धारण करती है। यदि गायत्रीका प्रथम पाद आठ अक्षरोंका, द्वितीय पाद सात अक्षरोंका तथा तृतीय पाद छः अक्षरोंका हो तो वह 'प्रतिष्ठा गायत्री' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक् च सूर्यं दृशे॥' (१।२२।२१)] इसके विपरीत यदि गायत्रीका प्रथम पाद छः, द्वितीय पाद सात और तृतीय पाद आठ अक्षरोंका हो तो उसे 'वर्धमाना'¹ गायत्री कहते हैं। यदि तीन पादोंवाली गायत्रीका प्रथम पाद छः, द्वितीय पाद आठ और तीसरा पाद सात अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'अतिपाद² निचृत्' होता है। यदि दो चरण नौ-नौ अक्षरोंके हों और तीसरा चरण छः अक्षरोंका हो तो वह 'नागी' नामकी गायत्री होती है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अग्रे तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम्। ऋध्यामां ओहैः॥' (४।१०।१)] यदि प्रथम चरण छः अक्षरोंका और द्वितीय-तृतीय नौ-नौ अक्षरोंके हों तो 'वाराही गायत्री' नामक छन्द होता है। [जैसे सामवेदमें—'अग्रे मृड मँहाँ अस्यय आदेवयुं जनम्। इयेथ बर्हिरासदम्॥' (२३)] अब तीसरे अर्थात् 'विराट्' नामक भेदको बतलाते हैं। जहाँ दो ही चरणोंका छन्द हो, वहाँ यदि प्रथम चरण बारह और द्वितीय चरण आठ अक्षरका हो तो वह 'द्विपाद् विराट्' नामक गायत्री छन्द है। [जैसे ऋग्वेदमें—'नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो। राजा देवः समुद्रियः॥' (९।१०७।१६)] ग्यारह अक्षरोंके तीन चरण होनेपर 'त्रिपाद् विराट्' नामक गायत्री होती है। [उदाहरण ऋग्वेदमें—'दुहीयन् मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै। इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै॥' (१।१२०।९)]॥१-४॥
जब दो चरण आठ-आठ अक्षरोंके और एक चरण बारह अक्षरोंका हो तो वेदमें उसे 'उष्णिक्' नाम दिया गया है। प्रथम और तृतीय चरण आठ अक्षरोंके हों और बीचका द्वितीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो वह तीन पादोंका 'ककुप् उष्णिक्' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः। यं त्रायध्वेऽस्यासते³॥' (५।५३।१५)] जब प्रथम चरण बारह अक्षरोंका और द्वितीय-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो 'पुर उष्णिक्'
१. उदाहरण ऋग्वेदमें—त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने॥ (६।१६।१) २. ऋग्वेदे यथा—प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्निं रथं न वेद्यम्॥ (८।८४।१) ३. इस मन्त्रमें 'मर्त्य'के स्थानमें व्यूहकी रीतिसे 'मर्तिय' मानने तथा 'अस्यासते'के स्थानमें 'अस्य आसते' इस प्रकार दीर्घ-व्यूह करनेसे पादकी पूर्ति होती है।
* अध्याय ३३० *
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नामक तीन पादोंवाला छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये। देवा भवत वाजिनः॥' (१।२३।१९)] जब प्रथम और द्वितीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों और तृतीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो 'परोष्णिक्' छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अग्रे वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः^१॥' (१।७९।४)] सात-सात अक्षरोंके चार चरण होनेपर भी 'उष्णिक्' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'नदं व ओदतीनां नदं यो युवतीनाम्। पतिं वो अध्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि॥' (८।६९।२)]
आठ-आठ अक्षरके चार चरणोंका 'अनुष्टुप्' नामक छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—'सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं सर्वतः स्पृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥' (३१।१)] अनुष्टुप् छन्द कहीं-कहीं तीन चरणोंका भी होता है। 'त्रिपाद अनुष्टुप्' दो तरहके होते हैं। एक तो वह है, जिसके प्रथम चरणमें आठ तथा द्वितीय और तृतीय चरणोंमें बारह-बारह अक्षर होते हैं। दूसरा वह है, जिसका मध्यम अथवा अन्तिम पाद आठ अक्षरका हो तथा शेष दो चरण बारह-बारह अक्षरके हों। आठ अक्षरके मध्यम पादवाले 'त्रिपाद अनुष्टुप्' का उदाहरण [जैसे ऋग्वेदमें—'पर्यूषु प्र धन्व वाजसातय, परि वृत्राणि सक्षणिः। द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे॥' (९।११०।१)] तथा आठ अक्षरके अन्तिम चरणवाले 'त्रिपाद अनुष्टुप्' का उदाहरण [ऋग्वेदमें—'मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो मा कुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः। स्तनाभुजो अशिश्वीः॥' (१।१२०।८)]
यदि एक चरण 'जगती' का (अर्थात् बारह अक्षरका) हो और शेष तीन चरण गायत्रीके (अर्थात् आठ-आठ अक्षरके) हों तो यह चार चरणोंका 'बृहती छन्द' होता है। इसमें भी जब पहलेका स्थान तीसरा चरण ले ले अर्थात् वही जगतीका पाद हो और शेष तीन चरण गायत्रीके हों तो उसे 'पथ्या बृहती' कहते हैं। [जैसे सामवेदमें—'मा चिदन्यद् विशंसत सखायो मा रिषण्यत। इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत॥' (२४२)] जब पहलेवाला 'जगती'का चरण द्वितीय पाद हो जाय और शेष तीन गायत्रीके चरण हों तो 'न्यङ्गुसारिणी बृहती' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—'मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः। वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वाद्वीसहस्रसातमः॥' (१।१७५।१)] आचार्य क्रोष्टुकिके मतमें यह (न्यङ्कुसारिणी) 'स्कन्ध' या 'ग्रीवा' नामक छन्द है^२। यास्काचार्यने इसे ही 'उरोबृहती' नाम दिया है। जब अन्तिम (चतुर्थ) चरण 'जगती'का हो और आरम्भके तीन चरण गायत्रीके हों तो 'उपरिष्टाद् बृहती^३' नामक छन्द होता है। वही 'जगती'का चरण जब पहले हो और शेष तीन चरण गायत्री छन्दके हों तो उसे 'पुरस्ताद् बृहती' छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—'महो यस्पतिः शस्वसो असाम्या महो नृम्णस्य ततुजिः। मर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम्^४॥' (१०।२२।३)] वेदमें कहीं-कहीं नौ-नौ अक्षरोंके चार चरण दिखायी देते
१. पाँचवें श्लोकमें 'उष्णिक्' छन्दका जो लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है। यहाँ 'परोष्णिक्' यह विशेष संज्ञा बतानेके लिये पुनः उल्लेख किया गया है।
२. पिङ्गलसूत्रमें 'स्कन्धोग्रीवी' नाम आया है।
३. इसका उदाहरण सामवेदमें इस प्रकार है—'अग्रे जरितर्विश्वस्तिस्पानो देव रक्षसः। अप्रोषिवाण् गृहपते महाँ असि दिवस्यायुर्दुरोण्युः॥' (३९)
४. आठवें श्लोकके उत्तरार्धमें जो 'बृहती छन्द'का लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है; फिर भी विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनरुक्ति की गयी है।
६७४ * अग्निपुराण *
हैं। वे भी ‘बृहती’ छन्दके ही अन्तर्गत हैं। [उदाहरणके लिये ऋग्वेदमें—‘तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम। देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् १॥’ (१।१८७।११)] जहाँ पहले दस अक्षरके दो चरण हों, फिर आठ अक्षरोंके दो चरण हों, उसे भी ‘बृहती’ छन्द कहते हैं। [जैसे सामवेदमें— ‘अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य। आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः २॥’ (४०)] केवल ‘जगती’ छन्दके तीन चरण हों तो उसे ‘महाबृहती’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ, ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः। सदासरो वाजमच्छसनिष्यदत्’ (९।११०।४)] ताण्डी नामक आचार्यके मतमें यही ‘सतो बृहती’ नामक छन्द है॥ ५-१०३/२॥
जहाँ दो पाद बारह-बारह अक्षरोंके और दो आठ-आठ अक्षरोंके हों, वहाँ ‘पङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। यदि विषम पाद अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो उसे ‘सतःपङ्क्ति’ नामक छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः॥’ (१।३६।१०)] यदि वे ही चरण विपरीत अवस्थामें हों, अर्थात् प्रथम-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके और द्वितीय-चतुर्थ बारह- बारह अक्षरोंके तो भी वह छन्द ‘सतःपङ्क्ति’ ही कहलाता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘य ऋष्ये श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः। तं विश्वे मानुषा युगे, इन्द्रं हवन्ते तविशं यतासुचः॥’ (८।४६।१२)] जब पहलेके दोनों चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके, तो उसे ‘प्रस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [ग्यारहवें श्लोकमें बताये हुए ‘पङ्क्ति’ छन्दके लक्षणसे ही यह गतार्थ हो जाता है, तथापि विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनः उपादान किया गया है। मन्त्र-ब्राह्मणमें इसका उदाहरण इस प्रकार है—‘काम वेदते मदो नामासि समानया अमुं सुरा ते अभवत्। परम्त्र जन्मा अग्ने तपसा निर्मितोऽसि ४॥’] जब अन्तिम दो चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और आरम्भके दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो ‘आस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—भद्रं नो अपि वातय, मनो दक्षमृत क्रतुम्। अधा ते सख्य अन्धसो वि वो मदे रणन् गावो न यवसे विवक्षसे॥’ (१०।२५।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बीचमें हों और प्रथम एवं चतुर्थ चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो उसे ‘विस्तारपङ्क्ति’ कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें—‘अग्ने तव श्रवो वयो, महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो। बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे॥’ (१०।१४०।१)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बारह हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरणके रूपमें हों और बीचके द्वितीय-तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो वह ‘संस्तारपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘पितुभूतो न तन्तुमित् सुदानवः प्रतिदध्मो यजामसि। उषा अप स्वसुस्तमः संवर्तयति वर्तनि सुजातता॥’ (१०।१७२।३)] पाँच-पाँच अक्षरोंके चार पाद होनेपर ‘अक्षरपङ्क्ति’ नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें—‘प्र शुक्रैतु ५ देवी मनीषा। अस्मत् सुतष्टो
१.-२-३. इन सबमें व्यूहकी रीतिसे या ‘निचृत्’ मानकर पादपूर्ति की जाती है।
४. यहाँ ‘नामा असि’, ‘निर्मितः असि’—इस प्रकार संधिव्यूहसे पादपूर्ति की जाती है। कात्यायनने इसे गायत्री छन्दमें गिना है। सायणाने इसे ‘द्विपदा’ कहा है।
५. यहाँ ‘निचृत्’ होनेसे एक अक्षरकी न्यूनता है।
- अध्याय ३३० * ६७५
रथो न वाजी ॥' (७।३४।१)] पाँच अक्षरोंके दो ही चरण होनेपर 'अल्पशः-पङ्क्ति' नामक छन्द कहलाता है। जहाँ पाँच-पाँच अक्षरोंके पाँच पाद हों, वहाँ 'पदपङ्क्ति' नामक छन्द जानना चाहिये। [जैसे ऋग्वेदमें—'घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यं तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः१॥' (४।१०।६)] जब पहला चरण चार अक्षरोंका, दूसरा छः अक्षरोंका तथा शेष तीन पाद पाँच-पाँच अक्षरोंके हों तो भी 'पद-पङ्क्ति' छन्द ही होता है। आठ-आठ अक्षरोंके पाँच पादोंका 'पथ्यापङ्क्ति' नामक छन्द कहा गया है। [जैसे ऋग्वेदमें—'अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया यती योजान्विन्द्र ते हरी॥' (१।८२।२)] आठ-आठ अक्षरोंके छः चरण होनेपर 'जगतीपङ्क्ति' नामक छन्द होता है। [जैसे मन्त्रब्राह्मणमें—'येन स्त्रियमकृणुतं येनापामृशतं सुराम्; येनाक्षामभ्यषिञ्चतम्। येनेमां पृथ्वीं महीं यद्वां तदश्विना यशस्तेन मामभिषिञ्चतम्॥'] ॥ ११–१४॥
'त्रिष्टुप्' अर्थात् ग्यारह अक्षरोंका एक पाद हो और आठ-आठ अक्षरोंके चार पाद हों तो पाँच पादोंका 'त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती' नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब एक चरण 'जगती'का अर्थात् बारह अक्षरोंका हो और चार चरण 'गायत्री'के (आठ-आठ अक्षरोंके) हों तो उस छन्दका नाम 'जगतीज्योतिष्मती' होता है। यदि पहला ही चरण ग्यारह अक्षरोंका हो और शेष चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो 'पुरस्ताज्ज्योति'२ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है और यदि पहला ही चरण बारह अक्षरोंका तथा शेष चार चरण आठ-आठके हों तो 'पुरस्ताज्ज्योति' नामक जगती छन्द३ होता है। जब मध्यम चरण ग्यारह अक्षरों और आगे-पीछेके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये-ज्योति'४ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है; इसी प्रकार जब मध्यम चरण बारहका तथा आदि-अन्तके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये-ज्योति'५ नामक जगती छन्द होता है। जब आरम्भके चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तथा अन्तिम चरण ग्यारह अक्षरोंका हो तो उसे 'उपरिष्टाज्ज्योसि'६ नामक त्रिष्टुप् छन्द कहते हैं। इसी प्रकार जब आदिके चार चरण पूर्ववत् आठ-आठके हों और अन्तिम पाद बारह अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'उपरिष्टाज्ज्योति'७ जगती छन्द होता है ॥ १५३/२ ॥
गायत्री आदि सभी छन्दोंके एक पादमें यदि पाँच अक्षर हों तथा अन्य पादोंमें पहलेके अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उस छन्दका नाम 'शङ्कुमती' होता है। [जैसे प्रथम पाद पाँच अक्षरका और तीन चरण छः-छः अक्षरोंका होनेपर उसे 'शङ्कुमती गायत्री' कह सकते हैं।]
१. यहाँ 'भूरिक्' होनेसे एक अक्षरकी अधिकता है। अन्यत्र भी अक्षरोंकी न्यूनता या अधिकता दीखनेपर इसी प्रकार समझना चाहिये। २. उदाहरण ऋग्वेदमें—तमुष्टुहीन्द्रं यो ह स त्वा यः शूरो मघवा यो रथेष्ठाः। प्रतीचश्चिद् यो धीमान् वृषण्वान् ववव्रुपांश्चित्तमसो विहन्ता ॥ (१।१७३।५) ३. उदाहरण ऋग्वेदमें—अबोध्याग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यूषाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा। आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत् पृथक् ॥ (१।१५७।१) ४. उदाहरण मन्त्रब्राह्मणमें—इमं तमुपस्थं मधुना संसृजामि। प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयं तेन पुंसोऽभिभवासि, सर्वान् कामान् वशिन्यसि राज्ञी ॥ ५. उदाहरण ऋग्वेदमें—बृहद्भिborderअग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा। भरद्वाजे समिधानो यविष्ठय रेवन्तः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥ (६।४८।७) ६. उदाहरण मन्त्रब्राह्मणमें—अग्निं क्रव्यादमकृण्वन्, गुहाना स्त्रीणामुपस्थम्। ऋषयः पुराणाः, तेन आज्यमकृण्वं त्रैशुद्धं त्वयि त्वद्दधातु। ७. उदाहरण ऋग्वेदमें—नवानां नवतीनां विष्यस्य रोपुषीणाम्। सर्वसामग्रभंनामा अरे अस्य योजनं हरिष्ठा मधु त्वा मधुला चकार ॥ (१।१९१।१३)
६७६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
जब एक चरण छः अक्षरोंका हो और अन्य चरणोंमें पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम ‘ककुदमती’ होगा। जहाँ तीन पादवाले छन्दके पहले और दूसरे चरणमें अधिक अक्षर हों और बीचवालेमें बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्दका नाम ‘पिपीलिकमध्या’ होगा। [जैसे त्रिपदा गायत्रीके आदि और अन्त चरण आठ-आठ अक्षरके हों तथा बीचवाला चरण तीन, चार या पाँच अक्षरका हो तो उसे ‘पिपीलिकमध्या’ कहेंगे।] इसके विपरीत जब आदि और अन्तवाले पादोंके अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरोंका हो तो उस ‘त्रिपाद् गायत्री’ आदि छन्दको ‘यवमध्या’ कहते हैं। यदि ‘गायत्री’ या ‘उष्णिक्’ आदि छन्दोंमें केवल एक अक्षरकी कमी हो, उसकी ‘निचृत्’ यह विशेष संज्ञा होती है। एक अक्षरकी अधिकता होनेपर वह छन्द ‘भूरिक्’ नाम धारण करता है। इस प्रकार दो अक्षरोंकी कमी रहनेपर ‘विराट्’ और दो अक्षर अधिक होनेपर ‘स्वराट्’ संज्ञा होती है। संदिग्ध अवस्थामें आदि पादके अनुसार छन्दका निर्णय करना चाहिये। [जैसे कोई मन्त्र छब्बीस अक्षरका है, उसमें गायत्रीसे दो अक्षर अधिक हैं और उष्णिक्से दो अक्षर कम—ऐसी दशामें वह ‘स्वराट् गायत्री’ छन्द है या ‘विराड् उष्णिक्’?—ऐसे संदेहयुक्त स्थलोंमें यदि मन्त्रका पहला चरण ‘गायत्री’ से मिलता हो तो उसे ‘स्वराट् गायत्री’ कहेंगे और यदि प्रथम पाद ‘उष्णिक्’ से मिलता हो तो उसे ‘विराड् उष्णिक्’ कह सकते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये।] इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदिके द्वारा संदिग्धस्थलमें छन्दका निर्णय हो सकता है। गायत्री आदि छन्दोंके देवता क्रमशः इस प्रकार हैं—अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव। उक्त छन्दोंके स्वर हैं—‘षड्ज’ आदि। उनके नाम क्रमशः ये हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। श्वेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित (लाल) तथा गौर—ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दोंके वर्ण हैं। ‘कृति’ नामवाले छन्दोंका वर्ण गोरोचनके समान है और अतिच्छन्दोंका वर्ण श्यामल है। अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वसिष्ठ—ये क्रमशः उक्त सात छन्दोंके गोत्र बताये गये हैं॥ १६—२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘छन्दस्सारका कथन’ नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३०॥
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय
उत्कृति आदि छन्द, गण-छन्द और मात्रा-छन्दोंका निरूपण
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठजी! एक सौ चार अक्षरोंका ‘उत्कृति’ छन्द होता है। [जैसे यजुर्वेदमें—‘होता यक्षदश्विनौ छागस्य०’ इत्यादि (२१।४१)] ‘उत्कृति’ छन्दमेंसे चार-चार घटाते जायँ तो क्रमशः निम्नाङ्कित छन्द होते हैं—सौ अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^१$, छानबे अक्षरोंकी ‘संस्कृति’$^२$, बानबे अक्षरोंकी ‘विकृति’$^३$, अठासी अक्षरोंकी ‘आकृति’$^४$, चौरासी अक्षरोंकी ‘प्रकृति’$^५$,
$^१$. ‘अभिकृति’ आदि छन्दोंके उदाहरणका प्रतीकमात्र यहाँ दिया जाता है, विशेष जानकारीके लिये वेदोंमें अनुसंधान करना चाहिये। यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत् देवान्यक्षत्’ इत्यादि (२१।५८)।
$^२$. यजुर्वेदे—‘देवो अग्निः स्विष्टकृत्, सुद्रविणामन्दः कविः’ इत्यादि।
$^३$. ‘इमे सोमाः सुरामाणाम्’ इत्यादि।
$^४$. ‘भगा अनुपयुक्तामिन्द्रो यातु पुरोगवः’ इत्यादि।
$^५$. प्रकृतेरुदाहरणम्—‘सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च’ इत्यादि प्रातराचमनमन्त्रः।
- अध्याय ३३१ * ६७७
अस्सी अक्षरोंकी ‘कृति’$^१$, छिहत्तर अक्षरोंकी ‘अभिकृति’$^२$, बहत्तर अक्षरोंकी ‘धृति’$^३$, अड़सठ अक्षरोंकी ‘अत्यष्टि’$^४$, चौसठ अक्षरोंकी ‘अष्टि’$^५$, साठ अक्षरोंकी ‘अतिशक्वरी’$^६$, छप्पन अक्षरोंकी ‘शक्वरी’$^७$, बावन अक्षरोंकी ‘अतिजगती’$^८$ तथा अड़तालीस अक्षरोंकी ‘जगती’$^९$ होती है। यहाँतक केवल वैदिक छन्द हैं। यहाँसे आगे लौकिक छन्दका अधिकार है। ‘गायत्री’से लेकर ‘त्रिष्टुप्’ तक जो आर्षछन्द वैदिक छन्दोंमें गिनाये गये हैं, वे लौकिक छन्द भी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—त्रिष्टुप्, पङ्क्ति, बृहती, अनुष्टुप्, उष्णिक् और गायत्री। गायत्री छन्दमें क्रमशः एक-एक अक्षरकी कमी होनेपर ‘सुप्रतिष्ठा’, ‘प्रतिष्ठा’, ‘मध्या’, ‘अत्युक्तात्युक्त’ तथा ‘आदि’ नामक छन्द होते हैं॥१-४॥
छन्दके चौथाई भागको ‘पाद’ या ‘चरण’ कहते हैं। [छन्द तीन प्रकारके हैं—गणच्छन्द, मात्रा-छन्द और अक्षरच्छन्द]। पहले ‘गणच्छन्द’ दिखलाया जाता है। चार लघु अक्षरोंकी ‘गण’ संज्ञा होती है। [‘आर्या’के लक्षणोंकी सिद्धि ही इस संज्ञाका प्रयोजन है।] ये गण पाँच हैं। कहीं आदि गुरु (ऽ।।), कहीं मध्य गुरु (।ऽ।), कहीं अन्त्य गुरु (।।ऽ), कहीं सर्वगुरु (ऽऽ) और कहीं चारों अक्षर लघु (।।।।) होते हैं। [एक ‘गुरु’ दो ‘लघु’ अक्षरोंके बराबर होता है; अतः जहाँ सब लघु हैं, वहाँ चार अक्षर तथा जहाँ सब गुरु हैं, वहाँ दो अक्षर दिखाये गये हैं।] अब ‘आर्या’का लक्षण बताया जाता है। साढ़े सात गणोंकी, अर्थात् तीस मात्राओं या तीस लघु अक्षरोंकी आधी ‘आर्या’ होती है। [आर्यामें गुरुवर्णको दो मात्रा या दो लघु मानकर गिनना चाहिये।] ‘आर्या’ छन्दके विषम गणोंमें जगण (।ऽ।)-का प्रयोग नहीं होता$^{१०}$। किंतु छठा गण अवश्य जगण (।ऽ।) होना चाहिये।$^{११}$ अथवा वह नगण और लघु यानी सब-का-सब लघु भी हो सकता है। जब छठा गण सब-का-सब लघु हो तो उस गणके द्वितीय अक्षरसे सुबन्त या तिङन्तलक्षण पदसंज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१२}$ यदि छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) हो और सातवाँ गण भी सर्वलघु ही हो, तो सातवें गणके प्रथम अक्षरसे ‘पद’ संज्ञाकी प्रवृत्ति होती है।$^{१३}$ इसी प्रकार जब आर्याके उत्तरार्ध-भागमें पाँचवाँ गण सर्वलघु हो तो उसके प्रथम अक्षरसे ही पदका आरम्भ होता है।$^{१४}$ आर्याके उत्तरार्ध भागमें छठा गण एकमात्र लघु अक्षरका (।) होता है।$^{१५}$ जिस आर्याके पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें
१. यजुर्वेदे—‘सुपर्णोऽसि गरुत्मॉस्त्रिः सत्रिवृत्ते शिरो गायत्रम्’ इत्यादि (१७।७२)। २. ऋग्वेदे—‘स हि शर्धो न मारुतं तु विष्णोणि’ इत्यादि (१।१२७।६)। ३. ऋग्वेदे—‘अवमह इन्द्र दादृहि श्रुधि नः शुशोच हि द्यौः०’ इत्यादि (१।१३३।६)। ४. ऋग्वेदे—‘अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिः०’ इत्यादि (१।१३६।२)। ५. ऋग्वेदे—‘त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तु विषुष्म’ इत्यादि (२।२२।१)। ६. ऋग्वेदे—‘सार्कं जातः क्रतुना साकभोजसा ववक्षिथ’ इत्यादि (२।२२।३)। ७. ऋग्वेदे—‘प्रीस्वस्मै पुरोरथं, इन्द्राय शषमर्चत्०’ इत्यादि। ८. मन्त्रब्राह्मणे—‘मा ते गृहेषु निशि घोष उत्था०’ इत्यादि। ९. सामवेदे—‘इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया। भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसदि, अग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव॥’ (६६)
१०. उदाहरण— द्वीपादप्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥ ११. सा जयति जगत्यार्या देवी दिवमुत्पतिष्णुरतिरुपिरा। यादृश्यत गगनतले कंसवधोत्पातविद्युदिव॥ १२. रूपान्तरेण देवीं तामेव स्तौमि सपदि किल महिषः। पादस्पर्शसुखादिव मीलितनयनोऽभवद् यस्याः॥ यहाँ ‘मि सपदि’ यही छठा गण है, इसमें द्वितीय अक्षरसे पदका आरम्भ है। १३. ब्रह्मक्षत्रकुलीनः प्रलीनसामन्तचक्रनुतचरणः। सकलसुकृतैकपुञ्जः श्रीमान् मुञ्जश्चिरं जयति॥ जयति भुवनैकवीरः सीरायुधतुलितविपुलबलविभवः। अनवरतवित्तवितरणनिर्जितचम्पाधिपो मुञ्जः॥ १४-१५. स जयति वाक्पतिराजः सकलार्थमनोरथैककल्पतरुः। प्रत्यर्थिभूतपार्थिवलक्ष्मीहठहरणदुर्ललितः॥
६७८ * अग्निपुराण *
तीन-तीन गणोंके बाद पहले पादका विराम होता है, उसे 'पथ्या' माना गया है।१ ॥ ५-८ ॥
जिस आर्याके पूर्वार्धमें या उत्तरार्धमें अथवा दोनोंमें तीन गणोंपर पादविराम नहीं होता, उसका नाम 'विपुला' होता है। [इस प्रकार इसके तीन भेद होते हैं—१-आदिविपुला, २-अन्त्यविपुला तथा ३-उभयविपुला। इनमें पहलीका नाम 'मुख-विपुला' दूसरीका 'जघनविपुला' तथा तीसरीका 'महाविपुला' है।] इनके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं—
१- स्निग्धच्छायालावण्यलेपिनी किंचिदवनतवीणा। मुखविपुला सौभाग्यं लभते स्त्रीत्याह माण्डव्यः ॥
२- चित्तं हरन्ति हरिणीदीर्घदृशः कामिनां कलालापैः। नीवीविमोचनव्याजकथितजघना जघनविपुला ॥
३- या स्त्री कुचकलशनितम्बमण्डले जायते महाविपुला। गम्भीरनाभिरतिदीर्घलोचना भवति सा सुभगा ॥
—पहले पद्यमें पूर्वार्धमें, दूसरेमें उत्तरार्धमें तथा तीसरेमें दोनों जगह पाद-विराम तीन गणोंसे आगे होता है।२ जिस आर्या-छन्दमें द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरोंके बीचमें होनेके साथ ही जगण अर्थात् मध्यगुरु (। ऽ ।) हों, उसका नाम 'चपला' है। तात्पर्य यह है कि 'चपला' नामक आर्यामें प्रथम गण अन्त्यगुरु (।। ऽ), तृतीय गण दो गुरु (ऽ ऽ) तथा पञ्चम गण आदिगुरु (ऽ ।।) होता है। शेष गण पूर्ववत् रहते हैं। पूर्वार्धमें 'चपला'का लक्षण हो तो उस आर्याका नाम 'मुखचपला'३ होता है। परार्धमें चपलाका लक्षण होनेपर उसे 'जघनचपला'४ कहते हैं। पूर्वार्ध और परार्ध—दोनोंमें चपलाका लक्षण संघटित होता हो तो उसका नाम 'महाचपला'५ है। जहाँ
१. पथ्याशी व्यायामी स्त्रीषु जितात्मा नरो न रोगी स्यात्। यदि वचसा मनसा वा द्रुह्यति नित्यं न भूतेभ्यः ॥
२. 'पथ्या' और 'विपुला'में सहानवस्थारूप विरोध है; अतः ये दोनों छन्द एक साथ नहीं रह सकते। यदि एक अंशमें भी 'विपुला'का लक्षण संघटित हुआ तो उसका पथ्यात्व नष्ट हो जाता है; क्योंकि 'विपुला' छन्द उभयाश्रय है; वह पूर्वार्धमें, उत्तरार्धमें तथा दोनोंमें भी रह सकता है। अब 'विपुला'का जहाँ अंश भी हो, वहाँ 'पथ्या'का प्रवेश नहीं हो सकता। 'पथ्या' छन्द एक अंशसे भी विकल हो जाय तो वहीं 'विपुला'का विषय होता है; अतः वहाँ 'विपुला'की प्राप्ति अनिवार्य है। 'पथ्या' और 'चपला'में कोई विरोध नहीं है; अतः इनमें बाध्य-बाधकभाव नहीं होता। इस विषयका संक्षिप्त संग्रह नीचे लिखे श्लोकोंमें है—
एकैव भवति पथ्या विपुलास्तिस्रस्ततश्चतस्रस्ताः। चपलाभेदैस्त्रिभिरपि भिन्ना इति षोडशार्याः स्युः ॥
गीतिचतुष्टयमित्थं प्रत्येकं षोडशप्रकारं स्यात्। साकल्येनार्याणामशीतिरेवं विकल्पाः स्युः ॥
'एक 'पथ्या', तीन 'विपुला', कुल चार भेद हुए। इनमेंसे प्रत्येक छन्द 'चपला'के तीन भेदोंसे भिन्न होकर बारह प्रकारका होता है। बारह ये और चार पहलेके—यों सोलह हुए। इन सोलहोंके 'गीति' आदि चार भेदोंद्वारा भेद होनेसे चौंसठ भेद होते हैं। पहलेके सोलह और चौंसठ—कुल अस्सी हुए। इस प्रकार 'आर्या'के अस्सी भेद हैं।'
३. पथ्यापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण—
अतिदारुणा द्विजिह्वा परस्य रन्ध्रानुसारिणी कुटिला। दूरात्परिहरणीया नारी नागीव मुखचपला ॥
आदिविपुलापूर्वक मुखचपलाका उदाहरण—
यस्याश्च लोचने पिङ्गले भ्रुवौ संगते मुखं दीर्घम्। विपुलोन्नताश्च दन्ताः कान्तासौ भवति मुखचपला ॥
उभयविपुलापूर्वक मुख-चपलाका उदाहरण—
विपुलाभिजातवंशोद्गवापि रूपातिरेकरम्यापि। निस्सार्यते गृहाद् वल्लभापि यदि भवति मुखचपला ॥
४. पथ्यापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
यत्पादस्य कनिष्ठा न स्पृशति महीमनामिका वाप। सा सर्वधूर्तभोग्या भवेदवश्यं जघनचपला ॥
अन्त्यविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
यस्याः पादाङ्गुष्ठं व्यतीत्य याति प्रदेशिनी दीर्घा। विपुले कुले प्रसूतापि सा ध्रुवं जघनचपला स्यात् ॥
महाविपुलापूर्वक जघनचपलाका उदाहरण—
मकरध्वजसद्मनि दृश्यते स्फुटं तिलकलाञ्छनं यस्याः। विपुलान्वयाभिजातापि जायते जघनचपलासौ ॥
५. पथ्यापूर्वक महाचपलाका उदाहरण—
हृदयं हरन्ति नार्यो मुनेरपि भ्रूकटाक्षविक्षेपैः। दोर्मूलनाभिदेशं निदर्शयन्त्यो महाचपलाः ॥
विपुलापूर्वक महाचपलाका उदाहरण—
चिबुके कपोलदेशेऽपि कूपिका दृश्यते स्मिते यस्याः। विपुलान्वयप्रसूतापि जायते सा महाचपला ॥
- अध्याय ३३१ * ६७९
आर्याके पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, उसे 'गीति'^१ नाम दिया गया है। तात्पर्य यह कि उसके उत्तरार्धमें भी छठा गण मध्यगुरु (। ऽ ।) अथवा सर्वलघु (।।।।) करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ आर्याके उत्तरार्धके समान ही पूर्वार्ध भी हो, उसे 'उपगीति'^२ कहते हैं। आर्याके पूर्वोक्त क्रमको विपरीत कर देनेपर 'उद्गीति'^३ नाम पड़ता है। सारांश यह कि उसमें पूर्वार्धको उत्तरार्धमें और उत्तरार्धको पूर्वार्धमें रखा जाता है। यदि पूर्वार्धमें आठ गण हों तो 'आर्यागीति'^४ नामक छन्द होता है। कोई विशेषता न होनेसे इसका उत्तरार्ध भी ऐसा ही समझना चाहिये। यहाँ भी छठे गणमें मध्यगुरु और सर्वलघु-इन दोनों विकल्पोंकी प्राप्ति थी, उसके स्थानमें केवल एक 'लघु'का विधान है॥९-१०$\frac{३}{४}$॥
अब 'मात्रा-छन्द' बतलाया जाता है। जहाँ विषम, अर्थात् प्रथम और तृतीय चरणमें चौदह लघु (मात्राएँ) हों और सम-द्वितीय, चतुर्थ
१. पथ्या-गीतिका उदाहरण- मधुरं वीणारणितं पञ्चमसुभगश्च कोकिलालापः। गीतिः पौरवधूनामधुना कुसुमायुधं प्रबोधयति॥ आदिविपुला-गीति- इयमपरा विपुला गीतिरुच्यते सर्वलोकहितहेतोः। यदनिष्टमात्मनस्तत्परेषु भवतापि मा क्वचित् कारि॥ पथ्या महाचपला-गीतिका उदाहरण- कामं चकास्ति गीतिर्मृगीदृशां सीधुपानचपलानाम्। मुखं च मुक्तलज्जं निरर्गलोल्लापमणितरमणीयम्॥ महाविपुला-महाचपला-गीतिका उदाहरण- पङ्केषुवल्लभः पञ्चमध्वनिस्तत्र भवति यदि विपुलः। चपलं करोति कामाकुलं मनः कामिनामसौ गीतिः॥ २. पथ्योपगीतिका उदाहरण- गान्धर्वं मकरध्वजदेवस्यास्त्रं जगद्विजायि। इति समवेक्ष्य मुमुक्षुभिरुपगीतिस्त्यज्यते देशः॥ महाविपुलोपगीतिका उदाहरण- विपुलोपगीतिझंकारमुखरिते भ्रमरमालानाम। रैवतकोपवने वस्तुमस्तु सततं मम प्रीतिः॥ पथ्या-महाचपलोपगीतिका उदाहरण- विषयाभिलाभिलाषः करोति चित्तं सदा चपलम्। वैराग्यभावनानां तथोपगीत्या भवेत् स्वस्थम्॥ महाविपुला महाचपलोपगीतिका उदाहरण- विपुलोपगीति संत्यज्यतामिदं स्थानकं भिक्षो। विषयाभिलाषदोषेण बाध्यते चञ्चलं चेतः॥ ३. पथ्योद्गीतिका उदाहरण- व्याध इवोद्गीतिरवैः प्रथमं तावन्मनो हरसि। दुर्नयकर विश्राम्यसि पश्चात् प्राणेषु विप्रियैः शल्यैः॥ महाविपुलोद्गीतिका उदाहरण- एषा तवापरोद्गीतिरत्र विपुला परिभ्रमति। तद्वल्लभामि यत्कीर्तिरखिलदिक्पालपार्श्वमुपयाति॥ पथ्यामहाचपलोद्गीतिका उदाहरण- उद्गीतिरत्र नित्यं प्रवर्त्तते कामचपलानाम्। तस्मान्मुने विमुञ्च प्रदेशमेतं समेतमेताभिः॥ महाविपुला महाचपलोद्गीतिका उदाहरण- विपुला पयोधरश्रोणिमण्डले चक्षुषोश्चपला। उद्गीतिशालिनी कामिनी च सा वर्णिनां मनो हरति॥ ४. पथ्या आर्यागीतिका उदाहरण- अजमजरममरमेकं प्रत्यक्तैन्यमीश्वरं ब्रह्म परम्। आत्मानं भावयती भवमुक्तिः स्यादितीयमार्यागीतिः॥ महाविपुला आर्यागीतिका उदाहरण- विपुलाभिलाषमृगतृष्णिका ध्रुवं हन्ति हरिणमिव हतहृदयम्। विपुलात्ममोक्षसुखकाङ्क्षिभिस्ततस्त्यज्यते विषयरससङ्गः॥ पथ्या जघनचपलार्यागीतिका उदाहरण- वाताहतोर्मिमालाचपलं सम्प्रेक्ष्य विषयसुखमल्पतरम्। मुक्त्वा समस्तसङ्गं तपोवनान्य्याश्रयन्ति तेनात्मविदः॥ महाविपुला महाचपला आर्यागीतिका उदाहरण- चपलानि चक्षुरादीनि चित्तहारी च हन्त हतविषयगणः। एकान्तशीलिनां योगिनामतो भवति परमसुखसम्प्राप्तिः॥
६८० * अग्निपुराण *
चरणोंमें सोलह लघु हों तथा इनमेंसे प्रत्येक चरणके अन्तमें रगण (ऽ।ऽ), एक लघु और एक गुरु हो तो 'वैतालीय'¹ नामक छन्द होता है। [रगण, लघु और गुरु मिलाकर आठ मात्राएँ होती हैं, इनके सिवा प्रथम-तृतीय पादोंमें छः-छः मात्राएँ और द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें आठ-आठ मात्राएँ ही शेष रहती हैं। इन्हें जोड़कर ही चौदह-सोलह मात्राओंकी व्यवस्था की गयी है।] वैतालीय छन्दके अन्तमें एक गुरु और बढ़ जाय तो उसका नाम 'औपच्छन्दसक'² होता है॥ ११-१२॥
पूर्वोक्त वैतालीय छन्दके प्रत्येक चरणके अन्तमें जो रगण, लघु और गुरुकी व्यवस्था की गयी है, उसकी जगह यदि भगण और दो गुरु हो जायें तो उस छन्दका नाम 'आपातलिका'³ होता है। उपर्युक्त वैतालीय छन्दके अधिकारोंमें जो रगण आदिके द्वारा प्रत्येक चरणके अन्तमें आठ लकारों (मात्राओं)-का नियम किया गया है, उनको छोड़कर प्रत्येक चरणमें जो 'लकार' शेष रहते हैं, उनमेंसे सम लकार विषम लकारके साथ मिल नहीं सकता। अर्थात् दूसरा तीसरेके और चौथा पाँचवेंके साथ संयुक्त नहीं हो सकता; उसे पृथक् ही रखना चाहिये। इससे विषम लकारोंका सम लकारोंके साथ मेल अनुमोदित होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरणोंमें लगातार छः लकार पृथक्-पृथक् नहीं प्रयुक्त होने चाहिये। प्रथम और तृतीय चरणोंमें रुचिके अनुसार किया जा सकता है।⁴ अब 'प्राच्यवृत्ति' नामक वैतालीय छन्दका दिग्दर्शन कराया जाता है। जब दूसरे और चौथे चरणमें चतुर्थ लकार (मात्रा) पञ्चम लकारके साथ संयुक्त हो तो उसका नाम 'प्राच्यवृत्ति'⁵ होता है। [यद्यपि सम लकारका विषम लकारके साथ मिलना निषिद्ध किया गया है, तथापि वह सामान्य नियम है; प्राच्यवृत्ति आदि विशेष स्थलोंमें उस नियमका अपवाद होता है।] शेष लकार पूर्वोक्त प्रकारसे ही रहेंगे। जब प्रथम और तृतीय चरणमें दूसरा लकार तीसरेके साथ मिश्रित होता है, तब 'उदीच्यवृत्ति'⁶ नामक वैतालीय कहलाता है। शेष लकार पूर्वोक्त रूपमें ही रहते हैं। जब दोनों लक्षणोंकी एक साथ ही प्रवृत्ति
१. वैतालीय छन्दके विभिन्न उदाहरण—
(क) शुत्क्षीणशरीरसंचया व्यक्तीभूतशिरोऽस्थिपञ्जराः। केशैः परुषैस्तवारयो वैतालीयतनुं वितन्वते॥
(ख) तव तन्वि कटाक्षवीक्षितैः प्रसरद्भिः श्रवणान्तगोचरैः। विशिखैरिव तीक्ष्णकोटिभिः प्रहतः प्राणिति दुष्करं नरः॥
(ग) शवशोणितपङ्कचर्चितं पुरुषान्त्रग्रथितोर्ध्वमूर्धजम्। वपुरातपवह्निदीपितं वैतालीयमिदं विलोक्यताम्॥
२. औपच्छन्दसकका उदाहरण—
वाक्यैर्मधुरैः प्रतार्य पूर्वं यः पश्चादभि संदधाति मित्रम्। तं दुष्टमतिं विशिष्टगोष्ठ्यामौपच्छन्दसकं वदन्ति बाह्यम्॥
३. आपातलिकाका उदाहरण—
पिङ्गलकेशी कपिलाक्षी वाचाटा विकटोन्नतदन्ती। आपातलिका पुनरेषा नृपतिकुलेऽपि न भाग्यमुपैति॥
४. वैतालीय छन्दमें इसका उदाहरण—
समरशिरसि सह्यते द्विषां नवनिशितायुधवृष्टिरग्रतः। कुवलयदलदीर्घचक्षुषां प्रमदानां न कटाक्षवीक्षितम्॥
औपच्छन्दसकमें—
परयुवतिषु पुत्रभावमादौ कृत्वा प्रार्थयते पुनः पतित्वम्। इदमपरमिहोच्यते विशेषादौपच्छन्दसकं खलस्य वृत्तम्॥
आपातलिकामें—
अभिरमयति किंनरकण्ठी हंसगतिः श्रवणायतनेत्रा। विशदकमलकोमलाङ्गी युवतिरियं हृदयं तरुणानाम्॥
५. प्राच्यवृत्तिका उदाहरण—
विपुलार्थसुवाचकाक्षराः कस्य नाम न हरन्ति मानसम्। रसभावविशेषपेशलाः प्राच्यवृत्तिकविकाव्यसम्पदः॥
६. उदीच्यवृत्तिका उदाहरण—
अवाचकर्मनूर्जिताक्षरं श्रुतिदुष्टं यतिकष्टमक्रमम्। प्रसादरहितं च नेष्यते कविभिः काव्यमुदीच्यवृत्तिभिः॥
- अध्याय ३३१ * ६८१
हो, अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें पञ्चम लकारके साथ चौथा मिल जाय और प्रथम एवं तृतीय चरणोंमें तृतीयके साथ द्वितीय लकार संयुक्त हो जाय तो ‘प्रवृत्तिक’१ नामक छन्द होता है। जिस वैतालीय छन्दके चारों चरण विषम पादोंके ही अनुसार हों, अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारोंसे युक्त हो तथा द्वितीय लकार तृतीयसे मिला हो, उसे ‘चारुहासिनी’२ कहते हैं। जब चारों चरण सम पादोंके लक्षणसे युक्त हों अर्थात् सबमें सोलह लकार (मात्राएँ) हों और चतुर्थ लकार पञ्चमसे मिला हो तो उसका नाम ‘अपरान्तिका’३ है। जिसके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों, किंतु पादके अन्तिम अक्षर गुरु ही हों, उसे ‘मात्रासमक’४ नामक छन्द कहा गया है। साथ ही इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस ‘मात्रासमक’के चरणमें बारहवाँ लकार अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, किसीसे मिलता नहीं, उसका नाम ‘वानवासिका’५ है। जिसके चारों चरणोंमें पाँचवाँ और आठवाँ लकार लघुरूपमें ही स्थित रहता है, उसका नाम ‘विश्लोक’६ है। जहाँ नवाँ भी लघु हो, वह ‘चित्रा’७ नामक छन्द कहलाता है। जहाँ नवाँ लकार दसवेंके साथ मिलकर गुरु हो गया हो, वहाँ ‘उपचित्रा’८ नामक छन्द होता है। मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका, चित्रा और उपचित्रा—इन पाँचोंमें जिस-किसी भी छन्दके एक-एक पादको लेकर जब चार चरणोंका छन्द बनाया जाय, तब उसे ‘पादाकुलक’९ कहते हैं। जिसके प्रत्येक चरणमें सोलह लघु स्वरूपसे ही स्थित हों, किसीसे मिलकर गुरु न हो गये हों, उस छन्दका नाम ‘गीत्यार्या’१० है। इसी गीत्यार्यामें जब आधे भागकी सभी मात्राएँ गुरुरूपमें हों और आधे भागकी मात्राएँ लघुरूपमें तो उसका नाम ‘शिखा’ होता है। इसीके दो भेद हैं—पूर्वाधर्भागमें लघु-ही-लघु और उत्तरार्धमें गुरु-ही-गुरु हों तो उसका नाम ‘ज्योति’११ बताया गया है। इसके विपरीत पूर्वार्धभागमें सब गुरु और उत्तरार्धमें सब लघु हों तो ‘सौम्या’१२ नामक छन्द होता है। जब पूर्वार्धभागमें उन्तीस लकार और उत्तरार्धमें इकतीस लकार हों एवं अन्तिम दो लकारोंके स्थानमें एक-एक गुरु हो तो उसका नाम ‘चूलिका’१३
१. इदं भरतवंशभूभृतां श्रूयतां श्रुतिमनोरसायनम्। पवित्रमधिकं शुभोदयं व्यासवक्त्रकथितं प्रवृत्तकम्॥
२. मनाक्प्रसृतदन्तदीधितिः स्मरोल्लसितगण्डमण्डला। कटाक्षललिता तु कामिनी मनो हरति चारुहासिनी॥
३. स्थिरविलासनतमौक्तिकावली कमलकोमलाङ्गी मृगेक्षणा। हरति कस्य हृदयं न कामिनः सुरतकेलिकुशलापरान्तिका॥
४. अश्मश्रुमुखो विरलैर्दन्तैर्गम्भीराक्षो मितानासाग्रः। निर्मांसहनुः स्फुटितैः केशैर्मात्रासमकं लभते दुःखम्॥
५. मन्मथचापध्वनिरमणीयः सुरतमहोत्सवपटहनिनादः। वनवासस्त्रीस्वनितविशेषः कस्य न चित्तं रमयति पुंसः॥
६. भ्रातृगुणरहितं विश्लोकं दुर्नयचरणकदर्थितलोकम्। जातं महितकुलेऽप्यविनीतं मित्रं परिहर साधुविगीतम्॥
७. यदि वाञ्छसि परपदमारोढुं मैत्रीं परिहर सह वनिताभिः। मुह्यति मुनिरपि विषयात्सङ्गाच्चित्रा भवति हि मनसो वृत्तिः॥
८. यच्चित्तं गुरुसक्तमुदारं विद्याभ्यासमहाव्यसनं च। पृथ्वी तस्य गुणैरुपचित्रा चन्द्रमरीचिनिभैर्भवतीथम्॥
९. अलिवाचालितविकसितचूते काले मदनसमागमदूते। स्मृत्वा कान्तां विरहितसार्थः पादाकुलकं धावति पान्थः॥
(इसमें मात्रासमक, विश्लोक, वानवासिका और उपचित्राके चरण हैं।)
१०. मदकलखगकुलकलरवमुखरिणि विकसितसरसिजपरिमलसुरभिणि।
गिरिवरपरिसरसरसि महति खलु रतिरतिशयमिह मम हृदि विलसति॥
११. यदि सुखमनुपममपरमभिलषसि परिहर युवतिषु रतिमतिशयमिह।
आत्मज्योतिर्योगाभ्यासाद् दृष्ट्वा दुः खच्छेदं कुर्याः॥
१२. सौम्यां दृष्टिं देहि स्नेहाद् देहेऽस्माकं मानं मुक्त्वा।
शशधरमुखि सुखमुपनय मम हृदि मनसिजरुजमपहर लघुतरमिह॥
१३. रतिकरमलयमरुति शुभशशभृति समभिहतहिममहसि मधुसमये।
प्रवससि पथिक विरहितं कथमिह तु परिहृतयुवतिरतिचपलतया॥
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६८२ * अग्निपुराण *
होता है। छन्दकी मात्राओंसे उसके अक्षरोंमें जितनी कमी हो, उतनी गुरुकी संख्या और अक्षरोंसे जितनी कमी गुरुकी संख्यामें हो, उतनी लघुकी संख्या मानी गयी है। तात्पर्य यह है$^१$ कि यदि कोई पूछे, इस आर्यामें कितने लघु और कितने गुरु हैं तो उस आर्याको लिखकर उसकी सभी मात्राओंकी गणना करके कहीं लिख ले, फिर अक्षरोंकी संख्या लिख ले। मात्राके अङ्कोंमेंसे अक्षरोंके अङ्क घटा दे; जितना बचे, वह गुरुकी संख्या हुई। इसी प्रकार अक्षरसंख्यामें गुरुकी संख्या घटा देनेपर जो बचे, वह लघु अक्षरोंकी संख्या होगी$^२$। इस प्रकार वर्ण आदिके अन्तरसे गुरु-लघु आदिका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये॥ १३-१८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दोजात्तिका निरूपण' नामक
तीन सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३१॥
तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय
विषमवृत्तका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—[छन्द या पद्य दो प्रकारके हैं—'जाति' और 'वृत्त'। यहाँतक 'जाति' छन्दोंका निरूपण किया गया, अब 'वृत्त'का वर्णन करते हैं—] वृत्तके तीन भेद हैं—सम, अर्धसम तथा विषम। इन तीनोंका प्रतिपादन करता हूँ। 'समवृत्त'की संख्यामें उतनी ही संख्यासे गुणा करे। इससे जो गुणनफल हो, उसे अर्धसमवृत्तकी संख्या समझनी चाहिये। इसी प्रकार 'अर्धसमवृत्त'की संख्यामें भी उसी संख्यासे गुणा करनेपर जो अङ्क उपलब्ध हो, वह 'विषमवृत्त'की संख्या है। विषमवृत्त और अर्धसमवृत्तकी संख्यामेंसे मूलराशि घटा देनी चाहिये। इससे शुद्ध विषम और शुद्ध अर्धसमवृत्तकी संख्याका ज्ञान होगा। [केवल गुणनसे जो संख्या ज्ञात होती है, वह मिश्रित होती है; उसमें अर्धसमके साथ सम और विषमके साथ अर्धसमकी संख्या भी सम्मिलित रहती है$^३$।] जो अनुष्टुप् छन्द प्रत्येक चरणमें गुरु और लघु अक्षरोंद्वारा समाप्त होता है, अर्थात् जिसके प्रत्येक
१. 'एकोनत्रिंशदन्ते' इत्यादिकी व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है—इकतीस मात्राएँ एवं अन्तमें गुरु होनेसे 'चूलिका' का आधा भाग सम्पन्न होता है। इस प्रकार इसके पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दोनोंमें ही इकतीस-इकतीस मात्राएँ होती हैं तथा अन्तिम दो मात्राएँ गुरुके रूपमें रहती हैं। इस छन्दमें पादकी व्यवस्था नहीं है। इसका उदाहरण इस प्रकार है—
घनपरिमलमिलदलिकुलमुखरितनिखिलकमलवनमलयजवने ।
जनयति मनसि मम तु शशिमुखि मुदमतिशयितमिह मधुरयमधुना ॥
२. उदाहरणार्थ यह 'आर्या' छन्द प्रस्तुत है—
स्तनयुगलमश्रुस्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाग्नेः। चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुस्त्रीणाम् ॥
इसमें मात्रासंख्या ५७ है, इसमेंसे अक्षरसंख्या चालीस घटी, शेष बचा १७। इतने गुरुवर्ण हैं। अक्षरसंख्या ४० में १७ गुरुसंख्या घटा दी गयी। शेष २३ लघुसंख्या है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये।
३. इन सब भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये। गायत्री छन्दमें कितने समवृत्त, कितने अर्धसमवृत्त और कितने विषमवृत्त होंगे, इसकी संख्या दी जाती है। गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंका है। इसके चार भाग करनेपर एक-एक पादमें छः-छः अक्षर हो सकते हैं। इसमें वर्णप्रस्तारके नियमानुसार प्रस्तार करनेपर सर्वगुरुसे लेकर सर्वलघूतक चौंसठ भेद हो सकते हैं। ये सभी समवृत्तके भेद हैं। उपर्युक्त नियमानुसार समवृत्तकी संख्या चौंसठमें चौंसठका गुणा करनेपर ४०९६ होती है। यह सममिश्रित अर्धसमवृत्तकी संख्या हुई। पुनः इसमें इतनी ही संख्यासे गुणा करनेपर १६७७७२१६ होता है। यह सम अर्धसम-मिश्रित विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसमें मूलराशि गुण्य अङ्क ४०९६ को घटा देनेपर १६७७३१२० होता है। यह शुद्ध विषमवृत्तकी संख्या हुई। इसी प्रकार ४०९६ में मूलराशि ६४ घटा देनेपर ४०३२ शेष रहा। यह 'शुद्ध अर्धसमवृत्त'की संख्या हुई।
| * अध्याय ३३२ * | ६८३ |
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पादमें अन्तिम दो वर्ण क्रमशः गुरु-लघु होते हैं, उसे 'समानी'$^१$ नाम दिया गया है। जिसके चारों चरणोंके अन्तिम वर्ण क्रमशः लघु और गुरु हों, उसकी 'प्रमाणी'$^२$ संज्ञा है। इन दोनोंसे भिन्न स्थितिवाला छन्द 'वितान'$^३$ कहलाता है। [इसके अन्तिम दो वर्ण केवल लघु अथवा केवल गुरु भी हो सकते हैं।] यहाँसे तीन अध्यायोंतक 'पादस्य' इस पदका अधिकार है तथा 'पदचतुरूर्ध्व' छन्दके पहलेतक 'अनुष्टुब्वक्त्रम्'का अधिकार है। तात्पर्य यह कि आगे बताये जानेवाले कुछ अनुष्टुप् छन्द 'वक्त्र' संज्ञा धारण करते हैं। 'वक्त्र' जातिके छन्दमें पादके प्रथम अक्षरके पश्चात् सगण (॥ऽ) और नगण (॥।) नहीं प्रयुक्त होने चाहिये।$^४$ इन दोनोंके अतिरिक्त मगण आदि छः गणोंमेंसे किसी एक गणका प्रयोग हो सकता है। पादके चौथे अक्षरके बाद भगण (ऽ॥)-का प्रयोग करना उचित है।$^५$ जिस 'वक्त्र' जातिके छन्दमें द्वितीय और चतुर्थ पादके चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग हो, उसे 'पथ्या वक्त्र'$^६$ कहते हैं। किसी-किसीके मतमें इसके विपरीत न्यास करनेसे, अर्थात् प्रथम एवं तृतीय पादके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग करनेसे 'पथ्या'$^७$ संज्ञा होती है। जब विषम पादोंके चतुर्थ अक्षरके बाद नगण (॥।) हों तथा सम पादोंमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगण (।ऽऽ)-की ही स्थिति हो तो उस 'अनुष्टुब्वक्त्र'का नाम 'चपला'$^८$ होता है। जब सम पादोंमें सातवाँ अक्षर लघु हो, अर्थात् चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसका नाम 'विपुला'$^९$ होता है। [यहाँ सम पादोंमें तो सप्तम लघु होगा ही, विषम पादोंमें भी यगणको बाधितकर अन्य गण हो सकते हैं—यही 'विपुला' और 'पथ्या'का भेद है।] सैतव आचार्यके मतमें विपुलाके सम और विषम सभी पादोंमें सातवाँ अक्षर लघु होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादोंमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगणको बाध कर विकल्पसे भगण (ऽ॥), रगण (ऽ।ऽ), नगण (॥।) और तगण (ऽऽ।) आदि हों तो 'विपुला'$^{१०}$ छन्द होता है।
इस प्रकार 'विपुला' अनेक प्रकारकी होती है। यहाँतक 'वक्त्र' जातिके छन्दोंका वर्णन किया गया। अनुष्टुप् छन्दके प्रथम पादके पश्चात्
१. समानीका उदाहरण—
वासवोऽपि विक्रमेण यत्समानतां न याति। तस्य वल्लभेश्वरस्य केन तुल्यता क्रियेत॥
ॐ नमो जनार्दनाय पापसंघमोचनाय। दुष्टदैत्यमर्दनाय पुण्डरीकलोचनाय॥
२. प्रमाणीका उदाहरण—
सरोजयोनिरम्बरे रसातले तथाच्युतः। तव प्रयाणमीक्षितुं क्षमौ न तौ बभूवतुः॥
३. वितानका उदाहरण—
तृष्णां त्यज धर्मं भज पापे हृदयं मा कुरु। इष्टा यदि लक्ष्मीस्तव शिष्टामनिशं संश्रय॥
हृदयं यस्य विशालं गणनायोगसमानम्। लभतेऽसौ मणिवित्रं नृपतिमूर्धिन वितानम्॥
४. नवधाराम्बुसंसिक्तं वसुधागन्धिनिःश्वासम्। किंचिदुन्नतघोणाग्रं मही कामयते वक्त्रम्॥
५. दुर्भाषितेऽपि सौभाग्यं प्रायः प्रकुरुते प्रीतिः। मातुर्मनो हरन्त्येव दौर्लालित्योक्तिभिर्बालाः॥
६. उदाहरण—नित्यं नीतिनिषण्णस्य राज्ञो राष्ट्रं न सीदति। न हि पथ्याशिनः काये जायन्ते व्याधिवेदनाः॥
७. उदाहरण—भर्तुराज्ञानुवर्तिनी या स्त्री स्यात् सा स्थिरा लक्ष्मीः। स्वप्रभुत्वाभिमानिनी विपरीता परित्याज्या॥
८. उदाहरण—क्षीयमाणाग्रदशना वक्त्रनिर्मांसनासाग्रा। कन्यका वाक्यचपला लभते धूर्तसौभाग्यम्॥
९. उदाहरण—सैतवेन यथार्णवं तीर्णो दशरथात्मजः। रक्षःक्षयकरौं पुनः प्रतिज्ञां स्वेन बाहुना॥
१०. यगणके द्वारा उदाहरण—
इयं सखे चन्द्रमुखी स्मितज्योत्स्ना च मानिनी। इन्दीवराक्षी हृदयं दंदहीति तथापि मे॥
इसी प्रकार अन्य भी बहुत-से उदाहरण हो सकते हैं। 'विपुला' छन्दके पादोंका चौथा अक्षर प्रायः गुरु ही होता है।
६८४ * अग्निपुराण *
जब प्रत्येक चरणमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जायें तो 'पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्द होता है। [तात्पर्य यह कि इसके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह, तृतीय पादमें सोलह और चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं।] उक्त छन्दके चारों चरणोंमें अन्तिम दो अक्षर गुरु हों तो उसकी 'आपीड²' संज्ञा होती है। [यहाँ अन्तिम अक्षरोंको गुरु बतलानेका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि शेष लघु ही होते हैं।] जब आदिके दो अक्षर गुरु और शेष सभी लघु हों तो उसका नाम 'प्रत्यापीड³' होता है। 'पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्दके प्रथम पादका द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर क्रमशः 'मञ्जरी⁴' 'लवली⁵' तथा 'अमृतधारा⁶' नामक छन्द होते हैं। (अर्थात् जब प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हों तो 'मञ्जरी' छन्द होता है। जब प्रथम पादके स्थानमें तृतीय पाद और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो 'लवली' छन्द होता है और जब प्रथम पादके स्थानमें चतुर्थ पाद और चतुर्थ पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो 'अमृतधारा' नामक छन्द होता है।) अब 'उद्गता' छन्दका प्रतिपादन किया जाता है। जहाँ प्रथम चरणमें सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (॥ऽ) और एक लघु—ये दस अक्षर हों, द्वितीय पादमें भी नगण (।।।), सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु—ये दस ही अक्षर हों, तृतीय पादमें भगण (ऽ।।), नगण (।।।), जगण (।ऽ।), एक लघु तथा एक गुरु—ये ग्यारह अक्षर हों तथा चतुर्थ चरणमें सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।), सगण (॥ऽ), जगण (।ऽ।) और एक गुरु—ये तेरह अक्षर हों, वह 'उद्गता⁷' नामवाला छन्द है। उद्गताके तृतीय चरणमें जब रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।), भगण (ऽ।।) और एक गुरु—ये दस अक्षर हों तथा शेष तीन पाद पूर्ववत् ही रहें तो उसका नाम 'सौरभ⁸' होता है। उद्गताके तृतीय पादमें जब दो नगण और दो सगण हों और शेष चरण ज्यों-के-त्यों रहें तो उसकी 'ललित⁹' संज्ञा होती है। जिसके प्रथम चरणमें यगण, सगण, जगण, भगण और दो गुरु (अठारह अक्षर) हों, द्वितीय चरणमें सगण, नगण, जगण,
१. तस्याः कटाक्षविक्षेपैः कम्पिततनुकुटिलैरतिदीर्घः।
तक्षकदष्ट इवेन्द्रियशून्यः क्षतचैतन्यः, पदचतुरूर्ध्वं न चलति पुरुषः पतति सहसैव॥
—इसमें गुरु-लघुका विभाग नहीं होता।
२. कुसुमितसहकारे हतहिममहिमशुचिशशाङ्के।
विकसितकमलसरसि मधुसमयेऽस्मिन्, प्रवससि पथिकहतक यदि भवति तव विपत्तिः॥
३. चित्तं मम रमयति, कान्तं वनमिदमुपगिरिनदि।
कूजन्मधुकरकलवरकृतजनधृति, पुंस्कोकिलमुखरितसुरभिकुसुमोपचिततरुवति॥
४. जनयति महतीं प्रीतिं हृदये, कामिनां चूतमञ्जरी।
मिलदलिचक्रचञ्चुपरिचुम्बितकेसरा, कोमलमलवयातपरिनर्तिततरुशिखरस्थिता॥
५. विरहविधुरहूणकाङ्क्षनाकपोलोपमं, परिणतिधरं पीतपाण्डुच्छवि।
लवलीफलं निदाघे, भवति जगति हिमकरशीतलमतिस्वादूष्णहरम्॥
६. परिवाञ्छसि कर्णरसायनं सततममृतधाराभिर्यदि हृदि वा परमानन्दरसम्।
चेतः शृणु धरणीधरवाणीममृतमयी तत्काव्यगुणभूषणम्॥
७. मृगलोचना शशिमुखी च, रुचिरदशना नितम्बिनी।
हंसललितगमना ललना, परिणीयते यदि भवेत् कुलोद्गता॥
८. विनिवारितोऽपि नयनेन, तदपि किमिहागतो भवान्।
एतदेव तव सौरभकं यदुदीरितार्थमपि नावबुद्ध्यसे॥
९. सततं प्रियंवदमनूनममलहृदयं गुणोत्तरम्।
सुललितमतिकमनीयतनुं पुरुषं त्यजन्ति न तु जातु योषितः॥
- अध्याय ३३३ * ६८५
रगण और एक गुरु (तेरह अक्षर) हों, तृतीय चरणमें दो नगण और एक सगण (नौ अक्षर) हों तथा चतुर्थ चरणमें तीन नगण, एक जगण और एक भगण (पंद्रह अक्षर) हों, वह उपस्थित 'प्रचुपित'¹ नामक छन्द होता है। उक्त छन्दके तृतीय चरणमें जब क्रमशः दो नगण, एक सगण, फिर दो नगण और एक सगण (अठारह अक्षर) हों तो वह 'वर्धमान'² छन्द नाम धारण करता है। उसी छन्दमें तृतीय चरणके स्थानमें जब तगण, जगण और रगण (ये नौ अक्षर) हों तो वह 'शुद्ध विराषभ'³ छन्द कहलाता है। अब अर्धसमवृत्तका वर्णन करूँगा॥ १-१०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विषमवृत्तका वर्णन' नामक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३२॥
तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय
अर्धसमवृत्तोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, वह 'उपचित्रक'⁴ नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें तीन भगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय पादमें एक नगण (।।।), दो जगण (।ऽ।) एवं एक जगण हो, वह 'द्रुतमध्या'५ नामक छन्द होता है। [यहाँ भी प्रथम पादके समान तृतीय पाद और द्वितीय पादके समान चतुर्थ पाद जानना चाहिये। यही बात आगेके छन्दोंमें भी स्मरण रखनेयोग्य है।] जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण और एक गुरु तथा द्वितीय चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों, उस छन्दका नाम 'वेगवती'⁶ है। जिसके पहले पादमें तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) और एक गुरु तथा दूसरे चरणमें मगण (ऽऽऽ), सगण (।।ऽ), जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु हों, वह 'भद्रविराट्'⁷ नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें सगण, जगण, सगण और एक गुरु तथा द्वितीय पादमें भगण, रगण, नगण और दो गुरु हों, उसका नाम 'केतुमती'⁸ है। जिसके पहले चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों तथा दूसरे चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो
१. रामा कामकरेणुका मृगायतनेत्रा, हृदयं हरति पयोधरावनम्रा।
इयमतिशयसुभगा, बहुविधनिधुवनकुशला ललिताङ्गी॥
२. बिम्बोष्ठि कठिनोन्नतस्तनाव्नताङ्गी, हरिणी शिशुनयना नितम्बगुर्वी।
जनयति मम मनसि मुदं मदिराक्षी, मदकलकरिगमना परिणतशशिवदना॥
३. कन्येयं कनकोज्ज्वला मनोहरदीप्तिः शशिनिर्मलवदना विशालनेत्रा।
पीनोरुनितम्बशालिनी सुखयति हृदयमतिशयं तरुणानाम्॥
४. उपचित्रकमत्र विराजते चूतवनं कुसुमैर्विकसद्भिः।
परपुष्टविघृष्टमनोहरं मन्मथकेलिनिकेतनमेतत्॥
५. यद्यपि शीघ्रगतिमद्रुगामी बहुधनवानपि दुःखमुपैति। नातिशयत्वरिता न च मृद्वी नृपतिगतिः कथिता द्रुतमध्या॥
६. तव मुञ्ज नराधिपसेनां वेगवतीं सहते समरेषु। प्रलयोर्मिमिवाभिमुखीं तां कः सकलक्षितिभृन्निवहेषु॥
७. यत्पादतले चकास्ति चक्रं हस्ते वा कुलिशं सरोरुहं वा।
राजा जगदेकचक्रवर्ती स्याच्छं भद्रविराट् समश्रुतेऽसौ॥
८. हतभूरिभूमिपतिचिह्नां युद्धसहस्रलब्धजयलक्ष्मीम्।
सहते न कोऽपि वसुधायां केतुमतीं नरेन्द्र तव सेनाम्॥
६८६ * अग्निपुराण *
गुरु हों, उसे 'आख्यानिकी'^[१] कहते हैं। इसके विपरीत यदि प्रथम चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय चरणमें दो तगण, एक जगण तथा दो गुरु हों तो उसकी 'विपरीताख्यानकी'^[२] संज्ञा होती है। जिसके पहले पादमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा दूसरेमें नगण, भगण, भगण एवं रगण मौजूद हों, उस छन्दका नाम 'हरिणप्लुता'^[३] है। जिसके प्रथम चरणमें दो नगण, एक रगण, एक लघु और एक गुरु हो तथा दूसरे चरणमें एक नगण, दो जगण और एक रगण हो, वह 'अपरवक्त्र'^[४] नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें दो नगण, एक रगण और एक यगण हो तथा दूसरेमें एक नगण, दो जगण, एक रगण और एक गुरु हो, उसका नाम 'पुष्पिताग्रा'^[५] है। जिसके पहले चरणमें रगण, जगण, रगण, जगण हो तथा दूसरेमें जगण, रगण, जगण, रगण और एक गुरु हो उसे 'यवमती'^[६] कहते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय चरणोंमें अट्ठाईस लघु और अन्तमें एक गुरु हो तथा दूसरे एवं चौथे चरणोंमें तीस लघु एवं एक गुरु हो तो उसका नाम 'शिखा'^[७] होता है। इसके विपरीत यदि प्रथम और तृतीय चरणोंमें तीस लघु और एक गुरु हो तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणोंमें अट्ठाईस लघुके साथ एक गुरु हो तो उसे 'खञ्जा'^[८] कहते हैं। अब 'समवृत्त' का दिग्दर्शन कराया जाता है॥१-६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्धसमवृत्तका वर्णन' नामक तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥३३३॥
तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय
समवृत्तका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं—'यति' नाम है विच्छेद या विरामका। [पादके अन्तमें श्लोकार्ध पूरा होनेपर तथा कहीं-कहीं पादके मध्यमें भी 'यति' होती है।] जिसके प्रत्येक चरणमें क्रमशः
^[१]. भृङ्गावलीमङ्गलगीतनादैर्जनस्य चित्ते मुदमादधाति।
आख्यानिकी च स्मरजन्मपाशमहोत्सवस्याश्रवणे कृणन्ती॥
^[२]. अलं तवालीकवचोभिरेभिः स्वार्थं प्रिये साधय कार्यमन्यत्।
कथं कथावर्णनकौतुकं स्यादाख्यानिकी चेद् विपरीतवृत्तिः॥
आख्यानिकीके दोनों भेद उपजातिके अन्तर्गत हैं। यहाँ विशेष संज्ञा-विधानके लिये पढ़े गये हैं।
^[३]. तव मुञ्ज नराधिप विद्विषां भयविवर्जितकेतुलघीयसाम्।
रणभूमिपराङ्मुखवर्त्मनां भवति शीघ्रगतिर्हरिणीप्लुता॥
^[४]. 'अपरवक्त्र' नामक छन्द 'वैतालीय' छन्दके अन्तर्गत है; फिर भी विशेष संज्ञा-विधानके लिये यहाँ पढ़ा गया है। उदाहरण—
सकृदपि कृपणेन चक्षुषा नरवर पश्यति यस्तवाननम्।
न पुनरपरवक्त्रमीक्षते स हि सुखितोऽर्थिजनस्तथाविधः॥
^[५]. यह छन्द 'औपच्छन्दसक' के अन्तर्गत है, तो भी विशेष संज्ञा देनेके लिये इस प्रकरणमें इसका पाठ किया गया है। उदाहरण—
समसितदशना मृगायताक्षी स्मितसुभगा प्रियवादिनी विदग्धा।
अपहरति नृणां मनांसि रामा भ्रमरकुलानि लतेव पुष्पिताग्रा॥
^[६]. पद्मकं तु कोमले करे विभाति प्रशस्तमत्स्यलाञ्छनं च पदे यस्याः।
सा यवान्विता भवेद्धनाधिका च समस्तबन्धुपूजिता प्रिया च पत्युः॥
^[७]. अभिमतबकुलकुसुमघनपरिमलमिलदलिमुखरितहरिति मधौ सहचरमलयपवनरयतरलितसरसिजरजसि शयतणि वितते।
विकसित विविधकुसुममुलभसुरभिशर मदननिहतसकलजने ज्वलयति मम हृदयमविरतमिह सुतनु तव विरहदहनविषमशिखा॥
^[८]. 'शिखा' छन्दके ही समान 'खञ्जा'का भी उदाहरण होगा। उसका सम इसका विषम होगा और उसका विषम इसका सम होगा।