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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 737, कुल 878 में से

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पृष्ठ 737

७१० * अग्निपुराण *

आदिके मिश्रणको 'किलकिञ्चित' माना गया है। चित्तके किसी गर्वयुक्त विकारको 'बिब्बोक' कहते हैं। (इस भावके उदय होनेपर अभीष्ट वस्तुमें भी अनादर प्रकट किया जाता है।) सौकुमार्यजनित चेष्टा-विशेषको 'ललित' कहते हैं। सिर, हाथ, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग—ये क्रमशः अङ्ग हैं। भ्रूलता (भौंह) आदिको प्रत्यङ्ग या 'उपाङ्ग' जाना जाता है। अङ्ग-प्रत्यङ्गोंके प्रयत्नजनित कर्म (चेष्टाविशेष)-के बिना नृत्य आदिका प्रयोग सफल नहीं होता। वह कहीं मुख्यरूपसे और कहीं वक्ररूपसे साधित होता है। आकम्पित, कम्पित, धुत, विधुत, परिवाहित, आधूत, अवधूत, अञ्चित, निहञ्चित, परावृत्त, उत्क्षिप्त, अधोगत एवं लोलित—ये तेरह प्रकारके शिरः१कर्म जानने चाहिये। भ्रूकर्म सात२ प्रकारका होता है। भ्रूसंचालनके कर्मोंमें पातन आदि कर्म मुख्य हैं। रस, स्थायी भाव एवं संचारी भावके सम्बन्धसे दृष्टि३का 'अभिनय' तीन प्रकारका होता है। उसके भी छत्तीस भेद होते हैं—जिनमें दस भेद रससे प्रादुर्भूत होते हैं। कनीनिकाका कर्म भ्रमण एवं चलनादिके भेदसे नौ४ प्रकारका माना गया है। मुखके छः५ तथा नासिकाकर्मके छः६ एवं निःश्वासके नौ भेद माने जाते हैं। ओष्ठकर्मके छः७, पादकर्मके छः८ चिबुक-क्रियाके सात९ एवं ग्रीवाकर्मके नौ१० भेद बताये गये हैं। हस्तका अभिनय प्रायः 'असंयुक्त' तथा 'संयुक्त'—दो


१. 'नाट्यशास्त्र'के आठवें अध्यायमें श्लोक १७ से ४० तक शिरःसंचालनके विविध प्रकारोंकी विशद व्याख्या दृष्टिगोचर होती है। 'आकम्पित' आदि जो तेरह प्रकार हैं, उनके नाममात्र अग्निपुराणमें वहींसे ज्यों-के-त्यों ले लिये गये हैं। इन सबके लक्षणोंका विवेचन वहीं द्रष्टव्य है।
२. 'भ्रूसंचालन'के जिन सात कर्मोंकी यहाँ चर्चा की गयी है, उनके नाम 'नाट्यशास्त्र'में इस प्रकार उपलब्ध होते हैं—उत्क्षेप, पातन, भ्रुकुटी, चतुर, कुञ्चित, रेचित तथा सहज। दोनों ओरकी भौंहोंको एक साथ या बारी-बारीसे ऊपरको उठाना 'उत्क्षेप' है। इसी तरह उन्हें एक साथ या एक-एक करके नीचे लाना 'पातन' है। भौंहोंके मूलभागको ऊपर उठाना 'भ्रुकुटी' कही गयी है। दोनों ओरकी मनोहर और विस्तृत भौंहोंको तनिक-सा उठानेसे 'चतुर'कर्म सम्पादित होता है। एक या दोनों भौंहोंको मृदुलभावसे सिकोड़ना 'कुञ्चित' कहा गया है। एक ही भौंहके ललितउत्क्षेपसे 'रेचित'का सम्पादन होता है और भौंहोंका जो स्वाभाविक कर्म है, उसे 'सहज' कहा गया है। (नाट्य० ८। ११८-१२३)
३. कान्ता, भयानका, हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री, वीरा तथा बीभत्सा—ये आठ 'रसदृष्टियाँ' हैं। स्निग्धा, हृष्टा, दीना, क्रुद्धा, दृप्ता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता—ये आठ 'स्थायिभाव-सम्बन्धिनी' दृष्टियाँ हैं। शून्या, मलिना, श्रान्ता, ललिता, ग्लाना, शङ्किता, विषण्णा, मुकुला, कुञ्चिता, अभितप्ता, जिह्मा, ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विशोका, त्रस्ता तथा मदिरा—ये संचारीभावसे सम्बन्ध रखनेवाली बीस प्रकारकी दृष्टियाँ हैं। इन सबका विवेचन 'नाट्यशास्त्र'में बड़े विस्तारके साथ किया गया है। (द्रष्टव्य—अध्याय आठ, श्लोक ४१-११४ तक)
४. भ्रमण, वलन, पात, चलन, सम्प्रवेशन, विवर्तन, समुद्वृत्त, निष्कास तथा प्राकृत—ये कनीनिकाके नौ कर्म हैं। नेत्रपुटके भीतर दोनों पुतलियोंका मण्डलाकार आवर्तन 'भ्रमण' माना गया है। त्रिकोणगमन 'वलन' कहलाता है। नीचेकी ओर खिसकना 'पातन' है। उनके कम्पनको 'चलन' जानना चाहिये। उनको भीतर घुसा देना 'प्रवेशन' कहलाता है। कटाक्ष करनेकी क्रियाको 'विवर्तन' कहते हैं। पुतलियोंका ऊँचे उठना 'समुद्वृत्त' कहलाता है, निकलना 'निष्काम' है और स्वाभाविकरूपसे उनकी स्थिति 'प्राकृत' कहलाती है।
५. विधुत, विनिवृत्त, निर्भुग्न, भुग्न, निवृत्त तथा उद्वाहि—ये मुखके छः कर्म हैं। (द्रष्टव्य—अध्याय ८, श्लोक १५३ से ५७ तक)
६. नता, मन्दा, विकृष्टा, सोच्छ्वासा, विघूर्णिता तथा स्वाभाविकी—ये छः प्रकारकी 'नासिका' मानी गयी हैं।
(इसका लक्षण द्रष्टव्य—नाट्य० ८, श्लोक १२९-१३६ तक)
७. विवर्तन, कम्पन, विसर्ग, विनिगूहन, संदष्टक तथा समुद्ग—ये 'ओष्ठ'के छः कर्म हैं। (द्रष्टव्य—अध्याय ८, श्लोक १४१-१४७)
८. नाट्यशास्त्रमें 'पादकर्म'के छः भेदोंका उल्लेख है। उद्घट्टित, सम, अग्रतलसंचर, अञ्चित, कुञ्चित तथा सूचीपाद—ये उन छहोंके नाम हैं। (द्रष्टव्य—अध्याय ९, श्लोक २६५-२८०)
९. कुट्टन, खण्डन, छिन्न, चुक्कित, लेहन, सम तथा दन्तक्रियादिष्ट—ये सात प्रकारकी 'चिबुकक्रिया' हैं। (द्रष्टव्य-अध्याय ८, श्लोक १४७-१५३)
१०. समा, नता, उन्नता, त्र्यश्रा, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता, वलिता और निवृत्ता—ये 'ग्रीवा' के नौ भेद हैं। (द्रष्टव्य—श्लोक १७०-१७६)