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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 738, कुल 878 में से

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पृष्ठ 738
  • अध्याय ३४२ * ७११

प्रकारका होता है। पताक, त्रिपताक, कर्तरीमुख, अर्द्धचन्द्र, उत्कराल, शुकतुण्ड, मुष्टि, शिखर, कपित्थ, कटकामुख, सूच्यास्य, पद्मकोष, अतिशिरा, मृगशीर्षक, कामूल, कालपद्म, चतुर, भ्रमर, हंसास्य, हंसपक्ष, संदंश, मुकुल, ऊर्णनाभ एवं ताम्रचूड—'असंयुक्त हस्त'के ये चौबीस भेद कहे गये हैं॥ १-१६ ॥

'संयुक्त हस्त'के तेरह भेद माने जाते हैं—अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटक, वर्धमान, असङ्ग, निषध, दोल, पुष्पपुट, मकर, गजदन्त एवं बहिःस्तम्भ। संयुक्त करके परिवर्द्धनसे इसके अन्य भेद भी होते हैं॥ १७-१८॥

वक्षःस्थलका अभिनय आभुग्ननर्तन आदि भेदोंसे पाँच^२ प्रकारका होता है। उदरकर्म^३ अनतिक्षाम, खल्व तथा पूर्ण—तीन प्रकारके होते हैं। पार्श्वभागोंके पाँच^४ कर्म तथा जङ्घाके^५ भी पाँच ही कर्म होते हैं। नाट्य-नृत्य आदिमें पादकर्मके अनेक भेद होते हैं॥ १९-२१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नृत्य आदिमें उपयोगी विभिन्न अङ्गोंकी क्रियाओंका निरूपण' नामक तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४१ ॥


तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय

अभिनय और अलंकारोंका निरूपण

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! 'काव्य' अथवा 'नाटक' आदिमें वर्णित विषयोंको जो अभिमुख कर देता—सामने ला देता, अर्थात् मूर्तरूपसे प्रत्यक्ष दिखा देता है, पात्रोंके उस कार्यकलापको विद्वान् पुरुष 'अभिनय' मानते या कहते हैं। वह चार प्रकारसे सम्भव होता है। उन चारों अभिनयोंके नाम इस प्रकार हैं—सात्त्विक, वाचिक, आङ्गिक और आहार्य। स्तम्भ, स्वेद आदि 'सात्त्विक अभिनय' हैं; वाणीसे जिसका आरम्भ होता है, वह 'वाचिक अभिनय' है; शरीरसे आरम्भ किये जानेवाले अभिनयको 'आङ्गिक' कहते हैं तथा जिसका आरम्भ बुद्धिसे किया जाता है, वह 'आहार्य अभिनय' कहा गया है॥ १-२॥

रसादिका आधान अभिमानकी सत्तासे होता है। उसके बिना सबकी स्वतन्त्रता व्यर्थ ही है। 'सम्भोग' और 'विप्रलम्भ'के भेदसे शृङ्गार दो प्रकारका माना जाता है। उनके भी 'प्रच्छन्न' एवं 'प्रकाश'—दो भेद होते हैं। विप्रलम्भ शृङ्गारके चार भेद माने जाते हैं—पूर्वानुराग, मान, प्रवास एवं करुणात्मक ॥ ३-५ ॥

इन पूर्वानुरागादिसे 'सम्भोग' शृङ्गारकी उत्पत्ति होती है। वह भी चार भागोंमें विभाजित होता है एवं पूर्वका अतिक्रमण नहीं करता। यह स्त्री और पुरुषका आश्रय लेकर स्थित होता है। उस शृङ्गारकी साधिका अथवा अभिव्यञ्जिका 'रति' मानी गयी है। उसमें वैवर्ण्य और प्रलयके सिवा अन्य सभी सात्त्विक^६ भावोंका उदय होता है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंसे,


१. हस्तकर्मके विशद विवेचनके लिये द्रष्टव्य—नाट्यशास्त्र, नवम अध्याय।
२. आभुग्न, निर्भुग्न, प्रकम्पित, उद्वाहित तथा सम—ये 'वक्षःस्थल'के पाँच भेद हैं। (द्रष्टव्य—अध्याय ९, श्लोक २२३-२३२)
३. कुछ लोग क्षाम, खल्व, सम तथा पूर्ण—ये 'उदर'के चार भेद मानते हैं।
४. नत, समुन्नत, प्रसारित, विवर्तित तथा अपसृत—ये 'पार्श्वभाग'के पाँच कर्म हैं। (द्रष्टव्य—अध्याय ९, श्लोक २३३-२४०)
५. नाट्यशास्त्रमें 'ऊरुकर्म' और 'जङ्घाकर्म' दोनों ही पाँच-पाँच बताये हैं। कम्पन, वलन, स्तम्भन, उद्वर्तन और विवर्तन—ये पाँच 'ऊरुकर्म' हैं तथा आवर्तित, नत, क्षिप्त, उद्वाहित तथा परिवृत्त—ये पाँच 'जङ्घाकर्म' हैं। (द्रष्टव्य—अध्याय ९, श्लोक २५०-२६५)
६. स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभङ्ग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु तथा प्रलय—ये आठ सात्त्विक भाव हैं। इनमेंसे वैवर्ण्य और प्रलयका उद्गम सम्भोग-शृङ्गारमें नहीं होता।