अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 739, कुल 878 में से
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आलम्बन-विशेषसे तथा आलम्बन-विशेषके वैशेषिकसे शृङ्गाररस निरन्तर उपचय (वृद्धि)-को प्राप्त होता है। 'अभिनेय' शृङ्गारके दो भेद और जानने चाहिये—'वचनक्रियात्मक' तथा 'नेपथ्यक्रियात्मक' ॥ ६—८ $\frac{१}{२}$ ॥
हास्यरस स्थायीभाव— हासके छः भेद माने गये हैं—स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित और अतिहसित। जिसमें मुस्कराहटमात्र हो, दाँत न दिखायी दें—ऐसी हँसीको 'स्मित' कहते हैं। जिसमें दन्ताग्र कुछ दीख पड़ें और नेत्र प्रफुल्लित हो उठें, वह 'हसित' कहा जाता है। यह उत्तम पुरुषोंकी हँसी है। ध्वनियुक्त हासको 'विहसित' तथा कुटिलतापूर्ण दृष्टिसे देखकर किये गये अट्टहासको 'उपहसित' कहते हैं। यह मध्यम पुरुषोंकी हँसी है। बेमौके जोर-जोरसे हँसना (और नेत्रोंसे आँसूतक निकल आना)—यह 'अपहसित' है और बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसना 'अतिहसित' कहा गया है$^१$। (यह अधम जनोंकी हँसी है) ॥ ९-१० $\frac{१}{२}$ ॥
जो 'करुण' नामसे प्रसिद्ध रस है, वह तीन प्रकारका होता है। 'करुण' नामसे प्रसिद्ध जो रस है, उसका स्थायी भाव 'शोक' है। वह तीन हेतुओंसे प्रकट होनेके कारण 'त्रिविध' माना गया है—१-धर्मोपघातजनित, २-चित्तविलासजनित और ३-शोकदायकघटनाजनित। (प्रश्न) शोकजनित शोकमें कौन स्थायी भाव है? (उत्तर) जो पूर्ववर्ती शोकसे उद्भूत हुआ है, वह$^२$ ॥ ११-१२ ॥
अङ्गकर्म, नेपथ्यकर्म और वाक्कर्म—इनके द्वारा रौद्ररसके भी तीन भेद होते हैं। उसका स्थायी भाव 'क्रोध' है। इसमें स्वेद, रोमाञ्च और वेपथु आदि सात्त्विक भावोंका उदय होता है$^३$ ॥ १३ ॥
दानवीर, धर्मवीर एवं युद्धवीर—ये तीन 'वीररसके' भेद हैं। वीररसका निष्पादक हेतु 'उत्साह' माना गया है। जहाँ प्रारम्भमें वीरका ही अनुसरण किया जाता है, परंतु जो आगे चलकर भयका उत्पादक होता है, वहा 'भयानक रस' है। उसका निष्पादक 'भय' नामक स्थायी भाव$^४$ है। बीभत्सरसके 'उद्वेजन' और 'क्षोभण'—दो
१. 'नाट्यशास्त्र' अध्याय छः, श्लोक ४९-६१ में 'हास्यरस' का विशद विवेचन उपलब्ध होता है। स्मित, हसित आदि छः भेदोंके भी विस्तृत लक्षण वहाँ दिये गये हैं।
२. अग्निपुराणमें 'करुणरस' का वर्णन अत्यन्त संक्षिप्त है। अतः उसके विभाव और अनुभावोंका परिचय देनेवाले दो श्लोक यहाँ उद्धृत किये जाते हैं—
$$\begin{array}{l}
\text{इष्टवधदर्शनाद्वा विप्रियवचनस्य संश्रवाद्वापि। एभिर्भावविशेषैः करुणरसो नाम सम्भवति॥} \
\text{सस्वनरुदितैर्मोहागमैश्च परिदेवितैर्विलपितैश्च। अभिनेयः करुणरसो देहायासाभिघातैश्च॥}
\end{array}$$
\hfill (नाट्यशास्त्र ६। ६२-६३)
३. 'रौद्ररस' के परिचायक श्लोक 'नाट्यशास्त्र' में इस प्रकार दिये गये हैं—
$$\begin{array}{lcl}
\text{युद्धप्रहारघातनविकृतच्छेदनविदारणैश्चैव} & \text{। संग्रामसम्भ्रमाद्यैरभिः संजायते} & \text{रौद्रः॥} \
\text{नानाप्रहरणमोक्षैः शिरःकबन्धभुजकर्तनैश्चैव} & \text{। एभिश्चार्थविशेषैरस्याभिनयः} & \text{प्रयोक्तव्यः॥} \
\text{इति रौद्ररसो दृष्टो रौद्रवागङ्गचेष्टितः} & \text{। शस्त्रप्रहारभूयिष्ठ} & \text{उग्रकर्मक्रियात्मकः॥}
\end{array}$$
\hfill (नाट्यशास्त्र ६। ६४-६६)
४. 'वीररस' का अभिनय कैसे करना चाहिये, इसे भरतमुनिने दो आर्याओंमें बताया है—
$$\begin{array}{lcl}
\text{उत्साहाध्यवसायादविषादित्वादविस्मयान्मोहात्} & \text{। विविधादर्थविशेषाद्वीररसो नाम} & \text{सम्भवति॥} \
\text{स्थितिधैर्यवीर्यगर्वैरुत्साहपराक्रमप्रभावैश्च} & \text{। वाक्यैश्चाक्षेपकृतैर्वीररसः} & \text{सम्यगभिनेयः॥}
\end{array}$$
\hfill (नाट्यशास्त्र ६। ६७-६८)
५. 'भयानकरस' का विशद वर्णन 'नाट्यशास्त्र'में इस प्रकार किया गया है—
$$\begin{array}{lcl}
\text{विकृतरवसत्त्वदर्शनसंग्रामारण्यशून्यगृहगमनात्} & \text{। गुरुनृपयोरपराधात् कृतकश्च भयानको} & \text{ज्ञेयः॥} \
\text{गात्रमुखदृष्टिभेदैरूरुस्तम्भाभिवीक्षणोद्वेगैः} & \text{। सन्नमुखशोषहृदयस्पन्दनरोमोद्गमैश्च} & \text{भयम्॥}
\end{array}$$