अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 740, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३४२ * | ७१३
भेद माने गये हैं। पूति (दुर्गन्ध) आदिसे 'उद्वेजन' तथा रुधिरक्षरण आदिसे 'क्षोभण' होता है। 'जुगुप्सा' इसका स्थायी भाव है और सात्त्विक भावका इसमें अभाव होता है*॥ १४—१६ $\frac{१}{२}$॥
काव्य-सौन्दर्यकी अभिवृद्धि करनेवाले धर्मोंको 'अलंकार' कहते हैं। वे शब्द, अर्थ एवं शब्दार्थ—इन तीनोंको अलंकृत करनेसे तीन प्रकारके होते हैं। जो अलंकार काव्यमें व्युत्पत्ति आदिसे शब्दोंको अलंकृत करनेमें सक्षम होते हैं, काव्यशास्त्रकी मीमांसा करनेवाले विद्वान् उनको 'शब्दालंकार' कहते हैं। छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, गुम्फना, वाकोवाक्य, अनुप्रास, चित्त और दुष्कर—ये संकरको छोड़कर शब्दालंकारके नौ भेद हैं। दूसरोंकी उक्तिके अनुकरणको 'छाया' कहते हैं। इस छायाके भी चार भेद जानने चाहिये। लोकोक्ति, छेकोक्ति, अर्भकोक्ति एवं मत्तोक्तिका अनुकरण। आभाणक (कहावत)-को 'लोकोक्ति' कहते हैं। ये उक्तियाँ सर्वसाधारणमें प्रचलित होती हैं। जो रचना लोकोक्तिका अनुसरण करती है, विद्वज्जन उसको 'लोकोक्ति छाया' कहते हैं। विदग्ध (नागरिक)-को 'छेक' कहा जाता है। कलाकुशल बुद्धिको 'वैदग्ध्य' कहते हैं। उल्लेख करनेवाली रचनाको कविजन 'छेकोक्ति-छाया' मानते हैं। 'अर्भकोक्ति' सब विद्वानोंकी दृष्टिसे अव्युत्पन्न (मूढ़) पुरुषोंकी उक्तिका उपलक्षण मात्र है, अतः केवल उन मूढ़ोंकी उक्तिका अनुकरण करनेवाली रचना 'अर्भकोक्तिछाया' कही जाती है। मत्त (पागल)-की जो वर्णक्रमहीन अश्लीलतापूर्ण उक्ति होती है, उसको 'मत्तोक्ति' कहते हैं। उसका अनुकरण करनेवाली रचना 'मत्तोक्ति-छाया' मानी गयी है। यह यथावसर वर्णित होनेपर अत्यन्त सुशोभित होती है॥ १७—२५॥
जो विशेष अभिप्रायोंके द्वारा कवित्वशक्तिको प्रकाशित करती हुई सहृदयोंको प्रमोद प्रदान करती है, वह 'मुद्रा' कही जाती है। हमारे मतसे वही 'शय्या' भी कही जाती है। जिसमें युक्तियुक्त अर्थविशेषका कथन हो तथा जो लोकप्रचलनके प्रयोजनकी विधिसे सामाजिकके हृदयको संतर्पित करे, उसको 'उक्ति' कहते हैं। उक्तिके अवान्तर भेदोंमें विधि-निषेध, नियम-अनियम तथा विकल्प-परिसंख्यासे सम्बद्ध छह प्रकारकी उक्तियाँ होती हैं। परस्पर पृथग्भूतके समान स्थित वाच्य और
एतत्स्वभावजं स्यात्सत्त्वसमुत्थं तथैव कर्तव्यम्। पुनरेभिरेव भावैः कृतकं मृदुचेष्टितैः कार्यम्॥
करचरणवेपथुस्तम्भगात्रसंकोचहृदयकम्पेन। शुष्कोष्ठतालुकण्ठैर्भयानको नित्यमभिनेयः॥
(६।६९-७२)
* 'बीभत्सरस'के अभिनयका निर्देश करनेवाले दो श्लोक 'नाट्यशास्त्र'में इस प्रकार उपलब्ध होते हैं—
अनभिमतदर्शनेन च गन्धरसस्पर्शशब्ददोषैश्च। उद्वेजनैश्च बहुभिर्बीभत्सरसः समुद्भवति॥
मुखनेत्रविकूणनया नासाप्रच्छादनावनमितास्यैः। अव्यक्तपादपतनैर्बीभत्सः सम्यगभिनेयः॥
(६।७३-७४)
अग्निपुराणमें 'अद्भुतरसका' वर्णन छूट गया है या खण्डित हो गया है। अतः 'नाट्यशास्त्र'के अनुसार उसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
अथाद्भुतो नाम विस्मयस्थायिभावात्मकः। स च दिव्यजनदर्शनेप्सितमनोरम्भावाप्त्युपवनदेवकुलादिगमनसम्भाव्यमानमायेन्द्रजाल-सम्भावनादिभिर्विभावैरुत्पद्यते। तस्य नयनविस्तारानिमेषप्रेक्षणरोमाञ्चाश्रुस्वेदहर्षसाधुवाददानप्रबन्धहाहाकार बाहुवदनखेलाङ्गुलि-भ्रमणादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः।
भावाश्चास्या—स्तम्भाश्रुस्वेदगद्गदरोमाञ्चावेगसम्भ्रमप्रहर्षचपलतान्मोदधृतिजड़ताप्रलयादयः। अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः—
यत्त्वतिशयार्थयुक्तं वाक्यं शिल्पं च कर्मरूपं वा। तत्सर्वमद्भुतरसे विभावरूपं हि विज्ञेयम्॥
स्पर्शग्रहोतहसनैर्हाहाकारैश्च साधुवादैश्च। वेपथुगद्गदवचनैः स्वेदाद्यैरभिनयस्तस्य॥