अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 741, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें७१४ * अग्निपुराण *
वाचक—दोनोंकी योजनाके लिये जो समर्थ हो, मनीषीजन उसे 'उक्ति' कहते हैं। युक्तिके विषय छः हैं—पद, पदार्थ, वाक्य, वाक्यार्थ, प्रकरण और प्रपञ्च। 'गुम्फना' कहते हैं—रचनाचर्याको। वह 'शब्दार्थक्रमगोचरा', 'शब्दानुकारा' तथा 'अर्थानुपूर्व्यार्था'—इन तीन भेदोंसे युक्त है॥२६-३१॥ जिस वाक्यमें 'उक्ति' और 'प्रत्युक्ति' (प्रश्न और उत्तर) दोनों हों, उसे 'वाकोवाक्य' कहते हैं। उसके भी दो भेद हैं—'ऋजूक्ति' और 'वक्रोक्ति'। इनमें पहली जो 'ऋजूक्ति' है, वह स्वाभाविक कथनरूपा है। ऋजूक्तिके भी दो भेद हैं—'अप्रश्नपूर्विका' और 'प्रश्नपूर्विका'। वक्रोक्तिके भी दो भेद हैं—'भङ्ग-वक्रोक्ति' और 'काकु-वक्रोक्ति' ॥ ३२-३३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अभिनय और अलंकारोंका निरूपण' नामक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४२ ॥
तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय
शब्दालंकारोंका विवरण
अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ ! पद एवं वाक्यमें वर्णोंकी आवृत्तिको 'अनुप्रास'<sup>१</sup> कहते हैं। वृत्यनुप्रासके वर्णसमुदाय दो प्रकारके होते हैं—एकवर्ण और अनेकवर्ण<sup>२</sup> ॥ १॥ एकवर्णगत आवृत्तिसे पाँच वृत्तियाँ निर्मित होती हैं—मधुरा, ललिता, प्रौढ़ा, भद्रा तथा परुषा<sup>३</sup> ॥ २ ॥ मधुरावृत्तिकी रचनामें वर्गान्त पञ्चम वर्णके नीचे उसी वर्गके अक्षर तथा 'र ण म न'—ये वर्ण ह्रस्व स्वरसे अन्तरित होकर प्रयुक्त होते हैं तथा दो नकारोंका संयोग भी रहा करता है ॥ ३ ॥ वर्ग्य वर्णोंकी आवृत्ति पाँचसे अधिक बार नहीं करनी चाहिये। महाप्राण (वर्गके दूसरे और चौथे अक्षर) और ऊष्मा (श ष स ह) इनके संयोगसे युक्त उत्तरोत्तर लघु अक्षरवाली रचना मधुरा<sup>४</sup> कही गयी है ॥ ४ ॥
१. अनुप्रासका लक्षण अग्निदेवने 'स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः।'—इस प्रकार कहा है। इसीका आधार लेकर आचार्य मम्मटने लिखा है कि 'सरूपवर्णविन्यासमनुप्रासं प्रचक्षते।' (पूर्वे विद्वांस इति शेषः।) 'वर्णसाम्यमनुप्रासः।' (का०प्र० ९।७९), 'अनुप्रासः शब्दसाम्यम्।' (सा० द० १०।३)—ये मम्मट और विश्वनाथकथित लक्षण भी उक्त अभिप्रायके ही पोषक हैं। २. 'नाट्यशास्त्र' १६।४० में भरतने उपमा, दीपक, रूपक और यमक—ये चार ही अलंकार माने हैं। व्यासजीने अनुप्रासका उल्लेख किया है। भामहने अपनेसे पूर्व अनुप्रासकी मान्यता स्वीकार की है। 'वृत्यनुप्रास'के अग्निपुराणोक्त लक्षणका भाव लेकर भोजराजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में इस प्रकार लिखा है— मुहुरावर्त्यमानेषु यः स्ववर्गेषु वर्तते। काव्यव्यापी स संदर्भों वृत्तिरित्यभिधीयते ॥ (२।७८) आचार्य मम्मटने 'एकस्याप्यसकृत्परः'—इस सूत्रभूत वाक्यके द्वारा अग्निपुराणोक्त लक्षणकी ओर ही संकेत किया है। इसी भावको कविराज विश्वनाथने निम्नाङ्कित शब्दोंमें विशद किया है— अनेकस्यैकधा साम्यमसकृद्वाप्यनेकधा। एकस्य सकृदप्येष वृत्यनुप्रास उच्यते ॥ (१०।४) ३. अग्निपुराणमें जहाँ पाँच वृत्तियोंका उल्लेख है, वहीं परवर्ती आलोचकोंने अन्यान्य वृत्तियोंका भी उत्प्रेक्षण किया है। भोजराजने 'वृत्ति'के तीन गुण बताये हैं—सौकुमार्य, प्रौढ़ि और मध्यमत्व। साथ ही वृत्तिके बारह भेदोंका उल्लेख किया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं—गम्भीरा, ओजस्विनी, प्रौढ़ा, मधुरा, निष्ठुरा, श्लथा, कठोरा, कोमला, मिश्रा, परुषा, ललिता और अमिता। अग्निपुराणकथित पाँचों वृत्तियाँ भी इनके अन्तर्गत हैं। भद्राके स्थानमें कोमला वृत्ति समझनी चाहिये। ४. भोजराजने 'मधुरा वृत्ति'के उदाहरणके रूपमें निम्नाङ्कित श्लोक प्रस्तुत किया है— किञ्जल्कसङ्घिशिञ्जानभृङ्गलाञ्छितचम्पकः। अयं मधुरुपैति त्वां चण्डि पङ्कजदन्तुरः ॥ (२।१९३)
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth