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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 878 में से

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पृष्ठ 742
  • अध्याय ३४३ * ७१५

ललितामें वकार और लकारका अधिक प्रयोग होता है। (वकारसे दन्त्योष्ठ्य वर्ण और लकारसे दन्त्यवर्ण समझने चाहिये^१।) जिसमें ऊर्ध्वगत रेफसे संयुक्त पकार, णकार एवं वर्ग्य वर्ण प्रयुक्त होते हैं, किंतु टवर्ग और पञ्चम वर्ण नहीं रहते, वह ‘प्रौढा’^२ वृत्ति कही जाती है। जिसमें अवशिष्ट, असंयुक्त, रेफ, णकार आदि कोमल वर्ण प्रयुक्त होते हैं, वह ‘भद्रा’ अथवा ‘कोमला वृत्ति’^३ मानी जाती है। जिसमें ऊष्मा वर्ण (श ष स ह) विभिन्न अक्षरोंसे संयुक्त होकर प्रयुक्त होते हैं, उसको ‘परुषा’^४ कहते हैं। परुषावृत्तिमें अकारके सिवा अन्य स्वरोंकी अत्यधिक आवृत्ति होती है। अनुस्वार, विसर्ग निरन्तर प्रयुक्त होनेपर परुषता प्रकट करते हैं। रेफसंयुक्त श, ष, स का प्रयोग, अधिक अकारका प्रयोग, अन्तःस्थ वर्णोंका अधिक निवेश तथा रेफ और अन्तःस्थसे भेदित एवं संयुक्त ‘हकार’ भी परुषताका कारण होता है। और प्रकारसे भी जो गुरु वर्ण है, वह यदि माधुर्यविरोधी वर्णसे संयुक्त हो, तो परुषता लानेवाला होता है। उस परुष-रचनामें वर्गका आदि अक्षर ही संयुक्त एवं गुरु हो तो श्रेष्ठ माना गया है। पञ्चम वर्ण यदि संयुक्त हो तो परुष-रचनामें उसे प्रशस्त नहीं माना गया है। किसीपर आक्षेप करना हो या किसी कठोर शब्दका अनुकरण करना हो, तो वहाँ ‘परुषा वृत्ति’ भी प्रयोगमें लायी जाती है। क च ट त प — इन पाँच वर्गों, अन्तःस्थ वर्णों और ऊष्मा अक्षरोंके क्रमशः आवर्तनसे जो वृत्ति होती है, उसके बारह भेद हैं—कर्णाटी, कौन्तली, कौंकी, कौंकणी, वाणवासिका, द्राविडी, माथुरी, मात्सी, मागधी, ताम्रलिप्तिका, औण्ड्री तथा पौण्ड्री^५॥ ५-१०½॥

अनेक वर्णोंकी जो आवृत्ति होती है, वह यदि भिन्न-भिन्न अर्थोंकी प्रतिपादिका हो, तो उसे ‘यमक’ कहते हैं^६। यमक दो प्रकारका होता है—‘अव्यपेत’ और ‘व्यपेत’। निरन्तर आवृत्त होनेवाला ‘अव्यपेत’ और व्यवधानसे आवृत्त होनेवाला ‘व्यपेत’ कहा जाता है। स्थान और पादके भेदसे इन दोनोंके दो-दो भेद होनेपर कुल चार भेद हुए। आदि पादके आदि, मध्य और अन्तमें


१. भोजराजने इसमें तालव्य वर्णोंका भी समावेश माना है। ‘ललिता’का उदाहरण इस प्रकार है—
द्राविडीनां ध्रुवं लीलारचितभूलते मुखे। आसज्य राज्यभारं स्वं सुखं स्वपिति मन्मथः॥ (सर० कं० २।२००)
२. भोजराजके मतसे इसमें प्रायः मूर्धन्य, अन्तःस्थ तथा संयोगपूर्व गुरुवर्णोंका प्रयोग होता है। यथा—
कृत्वा पुंवत्पातमुच्चैर्भृगुभ्यां मूर्ध्नि ग्राव्णां जर्जरा निर्झरौघाः। कुर्वन्ति द्याम्युत्पतन्तं स्मरातं स्वर्लोकस्त्रीगात्रनिर्वाणमन्त्र ॥ (सर० कं० २।१९२)
३. कोमला या भद्राका उदाहरण—
दारुणरणे रणन्तं करिदारणकारणं कृपाणं ते। रमणकृते रणरणकी पश्यति तरुणीजनो दिव्यः॥ (सर० कं० २।१९७)
४. परुषा। यथा—
जहे निर्हादिहादोऽसौ कहराहादितहदः। प्रसह्म मह्या गर्ह्यत्वमर्हणार्हः शरन्मरुत्॥ (सर० कं० २।१९९)
५. अग्निपुराणवर्णित इन वृत्तियोंके देश-भेदसे जो बारह भेद हैं, उन्हें भोजराजने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’में ज्यों-का-त्यों ले लिया है और अपनी ओरसे उनके लक्षण तथा उदाहरण प्रस्तुत किये हैं (द्रष्टव्यः २।७८-८१ कारिकातक)।
६. ‘नाट्यशास्त्र’में भरतमुनिने ‘शब्दाभ्यासस्तु यमकं पादादिषु विकल्पितम्।’ (१।५९)—इस प्रकार ‘यमक’का लक्षण किया है। इसीका आशय लेकर व्यासजीने ‘अनेकवर्णावृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका। यमकं साव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद् द्विधा॥’—ऐसा लक्षण किया है। इसीका आश्रय लेकर दण्डीने—‘अव्यपेतव्यपेतात्मा याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः। यमकं तत्......॥’—ऐसा लक्षण प्रस्तुत किया है। (काव्यादर्श ३।१) इन्हीं लक्षणोंको आधार बनाकर भोजराजने ‘यमक’का लक्षण इस प्रकार किया है—
विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः। अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते॥ (२।५८)