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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 743, कुल 878 में से

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पृष्ठ 743

७१६ * अग्निपुराण *


एक, दो और तीन वर्णोंकी पर्यायसे आवृत्ति होनेपर कुल सात भेद होते हैं। यदि सात पादोंमें उत्तरोत्तर पाद एक, दो और तीन पदोंसे आरम्भ हो तो अन्तिम पाद छः प्रकारका हो जाता है। तीसरा पाद पादके आदि, मध्य और अन्तमें आवृत्ति होनेसे तीन प्रकारका होता है। श्रेष्ठ यमकके निम्नलिखित दस भेद होते हैं—पादान्त यमक, काञ्ची यमक, समुद्ग यमक, विक्रान्त यमक, चक्रवाल यमक, संदष्ट यमक, पादादि यमक, आम्रेडित यमक, चतुर्व्यवसित यमक तथा माला$^१$ यमक। इनके भी अन्य अनेक भेद$^२$ होते हैं॥ ११—१७॥

सहृदयजन भिन्नार्थवाची पदकी आवृत्तिको 'स्वतन्त्र' एवं 'अस्वतन्त्र' पदके आवर्त्तनसे दो प्रकारकी मानते हैं। दो आवृत्त पदोंका समास होनेपर 'समस्ता' और उनके समासरहित रहनेपर 'व्यस्ता' आवृत्ति कही जाती है। एक पादमें विग्रह होनेसे असमासत्वप्रयुक्त 'व्यस्ता' जानी


$^१.$ यमकके जो 'पादान्त यमक' आदि दस भेद निरूपित हुए हैं, वे 'नाट्यशास्त्र' अध्याय १६, श्लोक ६०—६२ तक ज्यों-के-त्यों उपलब्ध होते हैं तथा श्लोक ६३ से ८६ तक इन सबके लक्षण और उदाहरण भी दिये गये हैं। उन सबको वहीं देखना चाहिये। केवल एक 'पादान्त-यमक' का लक्षण और उदाहरण यहाँ दिग्दर्शनमात्रके लिये दिया जाता है। जहाँ चारों पादोंके अन्तमें एक समान अक्षर प्रयुक्त होते हैं, उसे 'पादान्त-यमक' जानना चाहिये। जैसे—निम्नाङ्कित श्लोकके चारों पादोंके अन्तमें 'मण्डल'—इन तीन अक्षरोंकी समानरूपसे आवृत्ति हुई है—

दिनक्षयात्संहतरश्मिमण्डलं दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम्। विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डलं यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम्॥
(१६।६४)

आचार्य भामहने यमकके पाँच ही भेद दिये हैं—आदि यमक, मध्यान्त यमक, पादाभ्यास, आवली और समस्तपाद यमक (द्रष्टव्य भामह 'काव्यालं०' द्वितीय परिच्छेद)। आचार्य वामनने 'पाद-यमक', एक पादके आदिमध्यान्त्य यमक, दो पादोंके आदिमध्यान्त्य यमक, एकान्तर पादान्त यमक, एकान्तर पादादि मध्य यमक, द्विविध अक्षर यमक, त्रिविध शृङ्गमार्ग-शृङ्खला, परिवर्तक और चूर्ण आदि भेद माने हैं।

$^२.$ 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता भोजराजने अग्निपुराणके इसी प्रसङ्गमें अपनी सुस्पष्ट वाणीद्वारा इस प्रकार कहा है—

विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः। अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते॥
तदव्यपेतयमकं व्यपेतयमकं तथा। स्थानास्थानविभागाभ्यां पादभेदाच्च भिद्यते॥
यत्र पादादिमध्यान्ताः स्थानं तेषुपकल्प्यते। यदव्यपेतमन्यद्वा तत्स्थानयमकं विदुः॥
चतुस्त्रिद्व्येकपादेषु यमकानां विकल्पनाः। आदिमध्यान्तमध्यान्तमध्याद्यन्ताश्च सर्वतः॥
अत्यन्तबहवस्तेषां भेदाः सम्भेदयोनयः। सुकरा दुष्कराश्चैव दृश्यन्ते तत्र केचन॥
(२।५८—६२)

उपर्युक्त श्लोकोंके अनुसार यमकोंके भेद इस प्रकार बनते हैं—'स्थानयमक' और 'अस्थानयमक'। स्थानयमकोंमें चतुष्पाद यमक, त्रिपाद यमक, द्विपाद यमक और एकपाद यमक होते हैं। चतुष्पाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक, आद्यन्त यमक, मध्यान्त यमक तथा आदिमध्यान्त यमक। त्रिपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, मध्य यमक, अन्त्य यमक। द्विपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत मध्य यमक, अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक इत्यादि। एकपाद यमकोंमें अव्यपेत आदि यमक, अव्यपेत अन्त्य यमक, मध्य यमक। इसी प्रकार सकृत् आवृत्ति और असकृत् आवृत्तिमें भी अव्यपेत यमक होता है। 'अव्यपेत' का अर्थ है—अव्यवहित और 'व्यपेत' का अर्थ है—व्यवधानयुक्त। आवृत्तिकी एकरूपता और अधिकतामें भी अव्यपेत आदि, मध्यादि यमक होने सम्भव हैं। व्यपेत आदि यमक, मध्य यमक, अन्त्य यमक, आदिमध्य यमक, मध्यान्त्य यमक और आदिमध्यान्त्य यमक—ये चतुष्पाद यमकोंमें होते हैं। त्रिपाद और द्विपाद यमकोंमें भी व्यपेत आदि यमक, मध्य यमक और अन्त्य यमक होते हैं। आवृत्तिकी अधिकतामें भी आदि, मध्य यमकके व्यपेतरूप देखे जाते हैं। इसी तरह आवृत्तिकी एकरूपतामें भी आदि, मध्य तथा मध्यान्त्य यमक कविजनोंकी रचनाओंमें उपलब्ध हैं। इन सबमें आवृत्ति व्यवहित होती है, इसलिये इनको 'व्यपेत यमक' कहा जाता है। जहाँ आदि, मध्य और अन्तका नियम न हो, ऐसे यमकोंको 'अस्थानयमक' कहते हैं। इनके भी व्यपेत और अव्यपेत आदि बहुत-से स्थूल-सूक्ष्म भेद हैं। इन सबका विस्तार 'सरस्वतीकण्ठाभरण', द्वितीय परिच्छेदमें देखना चाहिये।