अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 744, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३४३ * ७१७
जाती है। यथासम्भव वाक्यकी भी आवृत्ति इस प्रकार होती है। अनुप्रास, यमक आदि अलंकार लघु होनेपर भी इस प्रकार सुधीजनोंद्वारा सम्मानित होते हैं। आवृत्ति पदकी हो या वाक्य आदिकी, जिस किसी आवृत्तिसे भी जो वर्णसमूह 'समान' अनुभवमें आता है, उस आवृत्तरूपको आदिमें रखकर जो सानुप्रास पदरचना की जाती है, वह सहृदयजनोंको रसास्वाद करानेवाली होती है। सहृदयजनोंकी गोष्ठीमें जिस वाग्बन्ध (पदरचना)-को कौतूहलपूर्वक पढ़ा और सुना जाता है, उसे 'चित्र'१ कहते हैं॥ १८—२१॥
इनके मुख्य सात भेद होते हैं—प्रश्न, प्रहेलिका, गुप्त, च्युताक्षर, दत्ताक्षर, च्युतदत्ताक्षर और समस्या। जिसमें समानान्तरविन्यासपूर्वक उत्तर दिया जाय, वह 'प्रश्न' कहा जाता है और वह 'एकपृष्टोत्तर' और 'द्विपृष्टोत्तर'के भेदसे दो प्रकारका होता है। 'एकपृष्ट'के भी दो भेद हैं—'समस्त' और 'व्यस्त'। जिसमें दोनों अर्थोंके वाचक शब्द गूढ रहते हैं, उसे 'प्रहेलिका' कहते हैं। वह प्रहेलिका 'आर्थी' और 'शाब्दी'के भेदसे दो प्रकारकी होती है। अर्थबोधके सम्बन्धसे 'आर्थी' कही जाती है। शब्दबोधके सम्बन्धसे उसको 'शाब्दी' कहते हैं। इस प्रकार प्रहेलिकाके छः भेद बताये गये २ हैं। वाक्याङ्गके गुप्त होनेपर भी सम्भाव्य अपारमार्थिक अर्थ जिसके अङ्गमें आकाङ्क्षासे युक्त स्थित रहता है, वह 'गुप्त' कही जाती है। इसीको 'गूढ़' भी कहते हैं। जिसमें वाक्याङ्गकी विकलतासे अर्थान्तरकी प्रतीति विकलित अङ्गमें साकाङ्क्ष रहती है, वह 'च्युताक्षरा' कही जाती है। वह चार प्रकारकी होती है—स्वर, व्यञ्जन, बिन्दु और विसर्गकी च्युतिके भेदसे। जिसमें वाक्याङ्गके विकल अंशको पूर्ण कर देनेपर भी द्वितीय अर्थ प्रतीत होता है, उसको 'दत्ताक्षरा' कहते हैं। उसके भी स्वर आदिके कारण पूर्ववत् भेद होते हैं। जिसमें लुप्तवर्णके स्थानपर अक्षरान्तरके रखनेपर भी अर्थान्तरका आभास होता है, वह 'च्युतदत्ताक्षरा' कही जाती है। जो किसी पद्यांशसे निर्मित और किसी पद्यसे सम्बद्ध हो, वह 'समस्या' कही जाती है। 'समस्या' दूसरेकी रचना होती है, उसकी पूर्ति अपनी कृति है। इस प्रकार अपनी तथा दूसरेकी कृतियोंके सांकर्यसे 'समस्या' पूर्ण होती है। पूर्वोक्त 'चित्रकाव्य' अत्यन्त क्लेशसाध्य होता है एवं दुष्कर होनेके कारण वह कविकी कवित्व-शक्तिका सूचक होता है। यह नीरस होनेपर भी सहृदयोंके लिये महोत्सवके समान होता है। यह नियम, विदर्भ और बन्धके भेदसे तीन प्रकारका होता है। रमणीय कविताके रचयिता कविकी प्रतिज्ञाको 'नियम' कहते हैं। नियम भी स्थान, स्वर और व्यञ्जनके अनुबन्धसे तीन प्रकारका होता है।
१. चित्रके छः भेद हैं—वर्ण, स्थान, स्वर, आकार, गति और बन्ध। वर्णचित्रके चतुर्व्यञ्जन, त्रिव्यञ्जन, द्विव्यञ्जन, एकव्यञ्जन, क्रमस्थसर्वव्यञ्जन, छन्दोऽक्षरव्यञ्जन, षड्जादिस्वरव्यञ्जन, मुरजाक्षर व्यञ्जन। चतुःस्थान चित्रोंमें निष्कण्ठ्य, निस्तालव्य, निर्दन्त्य, निरोष्ठ्य, निर्मूर्धन्य। चतुःस्वरोंमें दीर्घस्वर, प्रतिव्यञ्जनविन्यस्त स्वर, अपास्तसमस्तस्वर। आकार-चित्रोंमें अष्टदल कमल, चतुर्दल कमल, षोडशदल कमल, चक्र, चतुरङ्ग। गतिचित्रोंमें गतप्रत्यागत, तुरङ्गपद, अर्द्धभ्रम, श्लोकार्द्धभ्रम, सर्वतोभद्र। बन्धचित्रोंमें द्विचतुष्कचक्रबन्ध, द्विश्शृङ्गारवन्धक, विविडितबन्ध, षड्यन्त्रबन्ध, व्योमबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध, मुरजबन्ध, एकाक्षर मुरजबन्ध, मुरजप्रस्तार, पादगोमूत्रिका, अयुग्मपादगोमूत्रिका, युग्मपादगोमूत्रिका, श्लोकगोमूत्रिका, विपरीतगोमूत्रिका, भिन्नछन्दोगोमूत्रिका, संस्कृतप्राकृतगोमूत्रिका, अर्धमूत्रिकाप्रस्तार, गोमूत्रिकाधेनु, शतधेनु, सहस्रधेनु, अयुतधेनु, लक्षधेनु, कोटिधेनु, कामधेनु इत्यादि परिगणित चित्रोंके अतिरिक्त भी अनेक बन्ध होते हैं, जैसे—शरबन्ध, धनुर्बन्ध, मुसलबन्ध, खड्गबन्ध, क्षुरिकाबन्ध आदि। इनके अतिरिक्त भी अनेकानेक बन्ध विद्वानोंद्वारा ऊहनीय हैं। चित्रकाव्योंकी चर्चा दण्डीके 'काव्यादर्श'में भी मिलती है और भोजराजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण'में उनका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। २. भोजराजके मतमें 'प्रहेलिका'के छः भेद यों होते हैं—च्युताक्षरा, दत्ताक्षरा, च्युतदत्ताक्षरा, अक्षरमुष्टिका, बिन्दुमोती तथा अर्थवती। (सरस्वतीकण्ठाभरण, परिच्छेद २।१३३)