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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 878 में से

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पृष्ठ 745

७१८ * अग्निपुराण *


काव्यमें प्रातिलोम्य और आनुलोम्यसे विकल्पना होती है। ‘प्रातिलोम्य’ और ‘आनुलोम्य’ शब्द और अर्थके द्वारा भी होता है। विविध वृत्तोंके वर्णविन्यासके द्वारा उन-उन प्रसिद्ध वस्तुओंके चित्रकर्मादिकी कल्पनाको ‘बन्ध’ कहते हैं। बन्धके निम्नाङ्कित आठ भेद माने जाते हैं—गोमूत्रिका, अर्द्धभ्रमक, सर्वतोभद्र, कमल, चक्र, चक्राब्जक, दण्ड और मुरज। जिसमें श्लोकके दोनों-दोनों अर्द्धभागों तथा प्रत्येक पादमें एक-एक अक्षरके व्यवधानसे अक्षरसाम्य प्रयुक्त हो, उसको ‘गोमूत्रिका-बन्ध’ कहते हैं। ‘गोमूत्रिका-बन्ध’के दो भेद कहे जाते हैं—‘पूर्वा गोमूत्रिका’ जिसको कुछ काव्यवेत्ता ‘अश्वपदा’ भी कहते हैं, वह प्रति अर्द्धभागमें एक-एक अक्षरके बाद अक्षरसाम्यसे युक्त होती है। ‘अन्त्या गोमूत्रिका’ जिसको ‘धेनुजालबन्ध’ भी कहते हैं, वह प्रत्येक पदमें एक-एक अक्षरके अन्तरसे अक्षरसाम्यसमन्वित होती है॥ २२—३८॥

पूर्वा (अश्वपदा) गोमूत्रिकाबन्ध प्र दू रो दि क स दु ग्धा नं सा ध ने प्य वि षा दि भिः वं नु रो दि क स हा नं दु ध मा प्य वि षा णि भिः

अन्त्या (धेनुजाल) गोमूत्रिकाबन्ध कां स्यू लो म त न या स्त न ता हि सां म्नि धं स्यू लो र्थ्यि त र या स्त न पी डि ता म्नि

पा य म प य म य त ने न मु चि प्र हा री मा य म म स्य भ य तो गु मु थं प्र सा दी

गोमूत्रिका-बन्धके पूर्वोक्त दोनों भेदोंका क्रमशः अर्द्धभागों और अर्द्धपादोंसे विन्यास करना चाहिये॥ ३८$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥

यहाँ क्रमशः नीचे-नीचे विन्यस्त वर्णोंका, नीचे-नीचे स्थित वर्णोंका जबतक चतुर्थ पाद पूर्ण न हो जाय, तबतक नयन करे। चतुर्थ पाद पूर्ण हो जानेपर प्रतिलोमक्रमसे अक्षरोंको पादार्ध-पर्यन्त ऊपर ले जाय। इस तरह तीन प्रकारका ‘सर्वतोभद्र-मण्डल’ बनता है। कमलबन्धके तीन प्रकार हैं—चतुर्दल, अष्टदल और षोडशदल। चतुर्दल कमलको इस प्रकारसे आबद्ध किया जाता है—प्रथम पादके ऊपरी तीन पदोंवाले अक्षर सभी पादोंके अन्तमें रखे जाते हैं। पूर्वपादके अन्तिम वर्णको पिछले पादके आदिमें प्रातिलोम्यक्रमसे रखा जाय। अन्तिम पादके अन्तिम दो अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें निविष्ट किया जाय। यह स्थिति चतुर्दल कमलमें होती है। अष्टदल कमलमें अन्त्य पादके अन्तिम तीन अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें विन्यस्त किया जाता है। षोडशदल कमलमें दो अक्षरोंके बीचमें कर्णिका—मध्यवर्ती एक अक्षरका उच्चारण होता है। कर्णिकाके अन्तमें ऊपर पत्राकार अक्षरोंकी पङ्क्ति लिखे और उसे कर्णिकामें प्रविष्ट कराये। यह बात चतुर्दल कमलके विषयमें कही गयी है। कर्णिकामें एक अक्षर लिखे और दिशाओं तथा विदिशाओंमें दो-दो अक्षर लिखे; प्रवेश और निर्गमका मार्ग प्रत्येक दिशामें रखे। यह बात ‘अष्टदल कमल’के विषयमें कही गयी है। चारों ओर विषम-वर्णोंका उतनी ही पत्रावली बनाकर न्यास करे और मध्यकर्णिकामें सम अक्षरोंका एक अक्षरके रूपमें न्यास करे। यह बात ‘षोडशदल कमल’के विषयमें बतायी गयी है। ‘चक्रबन्ध’ दो प्रकारका होता है—एक चार अरोंका और दूसरा छः अरोंका। उनमें जो आदिम, अर्थात् चार अरोंवाला चक्र है, उसके पूर्वार्द्धमें समवर्णोंकी स्थापना करे और प्रत्येक पादके जो प्रथम, पञ्चम आदि विषमवर्ण हैं, उनको एवं चौथे और आठवें, दोनों समवर्णोंको क्रमशः उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिमके अरोंमें रखे॥ ३९—४९॥