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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

७१८ * अग्निपुराण *


काव्यमें प्रातिलोम्य और आनुलोम्यसे विकल्पना होती है। ‘प्रातिलोम्य’ और ‘आनुलोम्य’ शब्द और अर्थके द्वारा भी होता है। विविध वृत्तोंके वर्णविन्यासके द्वारा उन-उन प्रसिद्ध वस्तुओंके चित्रकर्मादिकी कल्पनाको ‘बन्ध’ कहते हैं। बन्धके निम्नाङ्कित आठ भेद माने जाते हैं—गोमूत्रिका, अर्द्धभ्रमक, सर्वतोभद्र, कमल, चक्र, चक्राब्जक, दण्ड और मुरज। जिसमें श्लोकके दोनों-दोनों अर्द्धभागों तथा प्रत्येक पादमें एक-एक अक्षरके व्यवधानसे अक्षरसाम्य प्रयुक्त हो, उसको ‘गोमूत्रिका-बन्ध’ कहते हैं। ‘गोमूत्रिका-बन्ध’के दो भेद कहे जाते हैं—‘पूर्वा गोमूत्रिका’ जिसको कुछ काव्यवेत्ता ‘अश्वपदा’ भी कहते हैं, वह प्रति अर्द्धभागमें एक-एक अक्षरके बाद अक्षरसाम्यसे युक्त होती है। ‘अन्त्या गोमूत्रिका’ जिसको ‘धेनुजालबन्ध’ भी कहते हैं, वह प्रत्येक पदमें एक-एक अक्षरके अन्तरसे अक्षरसाम्यसमन्वित होती है॥ २२—३८॥

पूर्वा (अश्वपदा) गोमूत्रिकाबन्ध प्र दू रो दि क स दु ग्धा नं सा ध ने प्य वि षा दि भिः वं नु रो दि क स हा नं दु ध मा प्य वि षा णि भिः

अन्त्या (धेनुजाल) गोमूत्रिकाबन्ध कां स्यू लो म त न या स्त न ता हि सां म्नि धं स्यू लो र्थ्यि त र या स्त न पी डि ता म्नि

पा य म प य म य त ने न मु चि प्र हा री मा य म म स्य भ य तो गु मु थं प्र सा दी

गोमूत्रिका-बन्धके पूर्वोक्त दोनों भेदोंका क्रमशः अर्द्धभागों और अर्द्धपादोंसे विन्यास करना चाहिये॥ ३८$\frac{\text{१}}{\text{२}}$॥

यहाँ क्रमशः नीचे-नीचे विन्यस्त वर्णोंका, नीचे-नीचे स्थित वर्णोंका जबतक चतुर्थ पाद पूर्ण न हो जाय, तबतक नयन करे। चतुर्थ पाद पूर्ण हो जानेपर प्रतिलोमक्रमसे अक्षरोंको पादार्ध-पर्यन्त ऊपर ले जाय। इस तरह तीन प्रकारका ‘सर्वतोभद्र-मण्डल’ बनता है। कमलबन्धके तीन प्रकार हैं—चतुर्दल, अष्टदल और षोडशदल। चतुर्दल कमलको इस प्रकारसे आबद्ध किया जाता है—प्रथम पादके ऊपरी तीन पदोंवाले अक्षर सभी पादोंके अन्तमें रखे जाते हैं। पूर्वपादके अन्तिम वर्णको पिछले पादके आदिमें प्रातिलोम्यक्रमसे रखा जाय। अन्तिम पादके अन्तिम दो अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें निविष्ट किया जाय। यह स्थिति चतुर्दल कमलमें होती है। अष्टदल कमलमें अन्त्य पादके अन्तिम तीन अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें विन्यस्त किया जाता है। षोडशदल कमलमें दो अक्षरोंके बीचमें कर्णिका—मध्यवर्ती एक अक्षरका उच्चारण होता है। कर्णिकाके अन्तमें ऊपर पत्राकार अक्षरोंकी पङ्क्ति लिखे और उसे कर्णिकामें प्रविष्ट कराये। यह बात चतुर्दल कमलके विषयमें कही गयी है। कर्णिकामें एक अक्षर लिखे और दिशाओं तथा विदिशाओंमें दो-दो अक्षर लिखे; प्रवेश और निर्गमका मार्ग प्रत्येक दिशामें रखे। यह बात ‘अष्टदल कमल’के विषयमें कही गयी है। चारों ओर विषम-वर्णोंका उतनी ही पत्रावली बनाकर न्यास करे और मध्यकर्णिकामें सम अक्षरोंका एक अक्षरके रूपमें न्यास करे। यह बात ‘षोडशदल कमल’के विषयमें बतायी गयी है। ‘चक्रबन्ध’ दो प्रकारका होता है—एक चार अरोंका और दूसरा छः अरोंका। उनमें जो आदिम, अर्थात् चार अरोंवाला चक्र है, उसके पूर्वार्द्धमें समवर्णोंकी स्थापना करे और प्रत्येक पादके जो प्रथम, पञ्चम आदि विषमवर्ण हैं, उनको एवं चौथे और आठवें, दोनों समवर्णोंको क्रमशः उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिमके अरोंमें रखे॥ ३९—४९॥

  • अध्याय ३४३ * ७१९

उत्तर पादार्धके चार अक्षरोंको नाभिमें रखे और उसके आदि अक्षरको पिछले दो अरोंमें ले जाय। शेष दो पदोंको नेमिमें स्थापित करे। तृतीय अक्षरको चतुर्थ पादके अन्तमें तथा प्रथम दो समवर्णोंको तीनों पादोंके अन्तमें रखे। यदि दसवाँ अक्षर सम हो तो उसे प्रथम अरेपर रखे और छः अक्षरोंको पश्चिम अरेपर स्थापित करे। वे दो-दोके अन्तरसे स्थापित होंगे। इस प्रकार ‘बृहच्चक्र’का निर्माण होगा। यह ‘बृहच्चक्र’ बताया गया। सामनेके दो अरोंमें क्रमशः एक-एक पाद लिखे। नाभिमें दशम अक्षर अङ्कित करे और नेमिमें चतुर्थ चरणको ले जाय। श्लोकके आदि, अन्त और दशम अक्षर समान हों तथा दूसरे और चौथे चरणोंके आदि और अन्तिम अक्षर भी समान हों। प्रथम और चौथे चरणके प्रथम, चतुर्थ और पञ्चम वर्ण भी समान हों। द्वितीय चरणको विलोमक्रमसे पढ़नेपर यदि तृतीय चरण बन जाता हो तो उसे पत्रके स्थानमें स्थापित करे तो उस रचनाका नाम ‘दण्डचक्राब्जबन्ध’ समझना चाहिये। पूर्वदल (पूर्वार्द्ध)-में दोनों चरणोंके द्वितीय अक्षर एक समान हों और उत्तरार्द्धमें दोनों चरणोंके सातवें अक्षर समान हों। साथ ही द्वितीय अक्षरोंकी दृष्टिसे भी पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध परस्पर समता रखते हों। दूसरे, छठे तथा चौथे, पाँचवें भी एक-दूसरेके तुल्य हों। उत्तरार्द्ध भागके सातवें अक्षर प्रथम और चतुर्थ चरणोंके उन्हीं अक्षरोंके समान हों तो उन तुल्य रूपवाले चतुर्थ और पञ्चम अक्षरकी क्रमशः योजना करनी चाहिये। क्रमपादगत जो चतुर्थ अक्षर हैं, उनको तथा दलान्त वर्णोंको पूर्ववत् स्थापित करना चाहिये। ‘मुरजबन्ध’में पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनोंके अन्तिम और आदि अक्षर समान होते हैं। पादार्द्ध भागमें स्थित जो वर्ण है, उसे प्रातिलोम्यानुलोम्य-क्रमसे स्थापित करे। अन्तिम अक्षरको इस प्रकार निबद्ध करे कि वह चौथे चरणका आदि अक्षर बन जाय। चौथे चरणमें जो आदि अक्षर हो, उससे नवें तथा सोलहवें अक्षरसे पुटकके बीच-बीचमें चार-चार अक्षरोंका निवेश करे। ऐसा करनेसे उस श्लोकबन्धद्वारा मुरज (ढोल)-की आकृति स्पष्ट हो जाती है। द्वितीय चक्र ‘शार्दूलविक्रीडित’ छन्दसे सम्पादित होता है। ‘गोमूत्रिकाबन्ध’ सभी छन्दोंसे निर्मित हो सकता है। अन्य सब बन्ध अनुष्टुप् छन्दसे निर्मित होते हैं। यदि इन बन्धोंमें कवि और काव्यका नाम न हो तो मित्रभाव रखनेवाले लोग संतुष्ट होते हैं तथा शत्रु भी खिन्न नहीं होता। बाण, धनुष, व्योम, खड्ग, मुद्गर, शक्ति, द्विशृङ्गाट, त्रिशृङ्गाट, चतुःशृङ्गाट, वज्र, मुसल, अङ्कुश, रथपद, नागपद, पुष्करिणी, असिपुत्रिका (कटारी या छुरी)—इन सबकी आकृतियोंमें चित्रबन्ध लिखे जाते हैं। ये तथा और भी बहुत-से ‘चित्रबन्ध’ हो सकते हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुषोंको स्वयं जानना चाहिये ॥५०-६५॥*

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘शब्दालंकारका कथन’ नामक तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४३॥


* इस अध्यायके अन्तिम बीस-पचीस श्लोकोंका मूल अधिक स्पष्ट नहीं है। इनका आधार अन्वेषणीय है।

७२० * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय

अर्थालंकारोंका निरूपण

अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! अर्थोंका अलंकरण* 'अर्थालंकार' कहा जाता है। उसके बिना शब्द-सौन्दर्य भी मनको आकर्षित नहीं करता है। अर्थालंकारसे हीन सरस्वती विधवाके समान शोभाहीन है। अर्थालंकारके आठ भेद माने गये हैं— स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम। पदार्थोंके स्वभावको 'स्वरूप' कहते हैं। उसके दो भेद बतलाये गये हैं— 'निज' एवं 'आगन्तुक'। सांसिद्धिकको 'निज' तथा नैमित्तिकको 'आगन्तुक' कहा जाता है। धर्मकी समानताको 'सादृश्य' कहते हैं। वह भी उपमा, रूपक, सहोक्ति तथा अर्थान्तरन्यासके भेदसे चार प्रकारका होता है। जिसमें भेद और सामान्यधर्मके साथ उपमान एवं


* 'अलंकार' शब्दकी व्युत्पत्ति तीन प्रकारसे उपलब्ध होती है— (१) 'अलंकरणमलंकारः।' (२) 'अलंक्रियते अनेन इति वा अलंकारः।' (३) 'अलंकरोति इति अलंकारः।' प्रथम व्युत्पत्तिके अनुसार 'अलंकार' शब्द भावघञन्त है। दूसरीके अनुसार करणघञन्त तथा तीसरीके अनुसार कर्त्रर्थप्रधान 'अण्'—प्रत्ययान्त है। 'अलंकरणमर्थानामर्थालंकार इष्यते।'—यों कहकर अग्निपुराणमें भावघञन्त 'अलंकार' शब्दकी ही व्युत्पत्ति प्रदर्शित की गयी है। दण्डीने काव्य-शोभाकारी धर्मोंको 'अलंकार' कहा है (काव्यादर्श २।१)। वामनके मतमें सौन्दर्य और अलंकार पर्यायवाची शब्द हैं [सौन्दर्यमलंकारः १।२]। इन दोनोंने क्रमशः करणघञन्त और भावघञन्त व्युत्पत्ति स्वीकार की है। किसी भी व्युत्पत्तिके अनुसार अर्थोंका अलंकरण ही 'अर्थालंकार' है, इस मान्यतामें कोई बाधा नहीं आती। अतः दण्डी और वामनपर भी अग्निपुराणका ही प्रभाव मानना चाहिये। भामहने 'अलंकार' शब्दकी कोई सुस्पष्ट व्युत्पत्ति नहीं दी है। अतः उपर्युक्त व्युत्पत्तियोंपर अग्निपुराणोक्त व्युत्पत्तिका ही प्रभाव परिलक्षित होता है। मम्मटने 'उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित्।'—ऐसा लिखकर 'अलंकार' शब्दकी तीसरी व्युत्पत्ति स्वीकार की है। जैसे हार आदि शरीरके अलंकरणद्वारा शरीरीको अलंकृत करते हैं, उसी प्रकार उपमा आदि अलंकार काव्यके अलंकरणद्वारा काव्यात्मा रसका अलंकरण बनते हैं। अतः वे रसके उपकारी हैं। विश्वनाथका भी ऐसा ही मत है। भोजराजने—'अलमर्थमलंकर्तुं यद्व्युत्पत्त्यादिवर्त्मना' इत्यादि लिखकर अग्निपुराणोक्त मतका ही अनुकरण किया है।

अलंकारोंकी संख्याके विषयमें अनेक मत उपलब्ध होते हैं। भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र' में उपमा, दीपक, रूपक तथा यमक—केवल इन चार अलंकारोंका ही उल्लेख है— 'उपमा दीपकं चैव रूपकं यमकं तथा। काव्यस्यैते ह्यलंकाराश्चत्वारः परिकीर्तिताः॥' (ना० शा० १६।४३) यद्यपि भूषण, अक्षरसंघात, शोभा और उदाहरण आदि छत्तीस अलंकार 'नाट्यशास्त्र' में लक्षणसहित लिखे गये हैं तथापि वे विशेषतः नाट्योपयोगी हैं। उनका काव्यबन्धोंमें भी यथासम्भव प्रयोग करनेकी प्रेरणा दी गयी है, तथापि काव्य-सम्बन्धी अलंकार चार ही भरतमुनिको पूर्वपरम्परासे प्राप्त रहे हैं, जिनका उन्होंने 'परिकीर्तिताः'—कहकर स्पष्टीकरण किया है। वामनने अलंकारोंके तैंतीस भेद दिखलाये हैं। दण्डीने पैंतीस, भामहने उनतालीस और उद्भटने चालीस प्रकारके अलंकारोंका वर्णन किया है। रुद्रटने अपने 'काव्यालंकार'में बावन तथा मम्मटने सड़सठ अलंकारभेद दिखलाये हैं। जयदेवके 'चन्द्रालोक' में अलंकारोंकी संख्या सौ हो गयी है और अप्पय्य दीक्षितके 'कुवलयानन्द' में वह संख्या बढ़कर एक सौ चौबीसतक पहुँच गयी है। सरस्वतीकण्ठाभरणकारने शब्दालंकार, अर्थालंकार और शब्दार्थोभयालंकार—इन तीन भेदोंमें अलंकारोंका विभाजन करके तीनोंकी ही पृथक्-पृथक् चौबीस-चौबीस संख्याएँ स्वीकार की हैं। इस प्रकार उन्होंने बहत्तर अलंकारोंके लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। साहित्यदर्पणकारने सतहत्तर अर्थालंकारोंका उल्लेख करके उन सबके सोदाहरण लक्षण दिये हैं। इन सभी अलंकारोंके अवान्तरभेद और सांकर्यभेदसे इन सबकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। अग्निपुराणमें अर्थालंकारके मूलतः आठ भेद माने हैं—स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम। फिर स्वरूपके दो भेद, सादृश्यके चार भेद, अतिशयके दो भेद और विभावनाके साथ विशेषोक्तिको जोड़कर दो भेद किये हैं। सादृश्यके चार भेद—उपमा, रूपक, सहोक्ति और अर्थान्तरन्यास बताकर उपमाके लगभग उनतीस भेदोंका उल्लेख किया है। इन भेदोंमें ही अन्य बहुत-से अलंकार समाविष्ट हो गये हैं, जो दूसरे-दूसरे नामोंसे व्यवहृत होते हैं। उन्होंने उपमाके जो अन्तिम पाँच भेद लिखे हैं, उनके नाम हैं—प्रशंसा, निन्दा, कल्पिता, सदृशी और किंचित्सदृशी। ये भेद भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र' में भी वर्णित हैं और वहाँ उनके लक्षण तथा उदाहरण भी दिये गये हैं। अग्निपुराणमें उनके नाममात्रका संकलन वहींसे किया गया है, ऐसा जान पड़ता है।

  • अध्याय ३४४ * ७२१

उपमेयकी सत्ता हो, उसको 'उपमा'$^१$' कहते हैं; क्योंकि यत्किंचिद्विवक्षित सारूप्यका आश्रय लेकर ही लोकयात्रा प्रवर्तित होती है। प्रतियोगी (उपमान)-के समस्त और असमस्त होनेसे उपमा दो प्रकारकी मानी गयी है—'ससमासा' एवं 'असमासा'। 'घन इव श्याम:' इत्यादि पदोंमें समासके कारण वाचक शब्दके लुप्त होनेसे 'ससमासा उपमा' कही गयी है, इससे भिन्न प्रकारकी उपमा 'असमासा' है। कहीं उपमाद्योतक 'इवादि' पद, कहीं उपमेय और कहीं दोनोंके विरहसे 'ससमासा' उपमाके तीन भेद होते हैं। इसी प्रकार 'असमासा' उपमाके भी तीन भेद हैं। विशेषणसे युक्त होनेपर उपमाके अठारह भेद होते हैं। जिसमें साधारण धर्मका कथन या ज्ञान होता है—उपमाके उस भेदविशेषको धर्म या वस्तुकी प्रधानताके कारण 'धर्मोपमा'$^२$ एवं 'वस्तूपमा'$^३$ कहा जाता है। जिसमें उपमान और उपमेयकी प्रसिद्धिके अनुसार परस्पर तुल्य उपमा दी जाती है, वह 'परस्परोपमा'$^४$ होती है। प्रसिद्धिके विपरीत उपमान और उपमेयकी विषमतामें जब उपमा दी जाती है, तब वह 'विपरीतोपमा'$^५$ कहलाती है। उपमा—जहाँ एक वस्तुसे ही उपमा देकर अन्य उपमानोंका व्यावर्तन-निराकरण किया जाता है, वहाँ 'नियमोपमा'$^६$ होती है। यदि उपमेयके गुणादि धर्मकी अन्य उपमानोंमें भी अनुवृत्ति हो तो उसे 'अनियमोपमा'$^७$ कहते हैं॥१–१२॥

एकसे भिन्न धर्मोंके बाहुल्यका कीर्तन होनेसे 'समुच्चयोपमा'$^८$ होती है। जहाँ अनेक धर्मोंकी समानता होनेपर भी उपमानसे उपमेयकी विलक्षणता


१. उपमाका अग्निपुराणोक्त लक्षण बहुत ही सीधा-सादा और स्पष्ट है। भरतमुनिने सादृश्यमूलक सभी अलंकारोंका 'उपमा' नाम दिया है—'यत्किंचित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते। उपमा नाम सा ज्ञेया।' (१६।४१) व्यासजीने अपने लक्षणमें उपमान, उपमेय, सामान्य धर्म और भेदका उल्लेख किया है। भामहने भी इसीको आधार बनाकर 'यथैवशब्दौ सादृश्यमाहतुर्व्यतिरेकिणो:'—ऐसा लक्षण किया है। इसमें वाचक शब्द, सामान्य धर्म तथा भेद—तीनका उल्लेख किया है। उपमानोपमेयका होना तो स्वतःसिद्ध है। वामनने 'उपमानोपमेयस्य गुणलेशतः साम्यमुपमा।'—इस सूत्रके द्वारा उक्त अभिप्रायका ही पोषण किया है। दण्डीने जहाँ किसी तरह भी सादृश्यकी स्पष्ट प्रतीति होती हो, उसे 'उपमा' कहा है। मम्मटने 'साधर्म्यमुपमा भेदे', विश्वनाथने 'साम्यं वाच्यमवैधर्म्यं वाक्यैक्यं उपमा द्वयोः।' तथा भोजराजने 'प्रसिद्धेरनुरोधेन यः परस्परमर्थयोः। भूयोऽवयवसामान्ययोगः सेहोपमा मता॥'—ऐसा लक्षण किया है। इन सबने पूर्ववर्ती आचार्योंके ही मतोंका उपपादन किया है। २. दण्डीने अपने 'काव्यादर्श'में अग्निपुराण-कथित उपमाके इन भेदोंको ग्रहण किया है और इनके सोदाहरण लक्षण भी दिये हैं। जहाँ मुख्यतया तुल्यधर्मका प्रदर्शन किया गया, वहाँ 'धर्मोपमा' होती है। जैसे 'तुम्हारी हथेली कमलके समान लाल है'—इसमें लालिमारूपी धर्मका स्पष्ट कथन होनेसे यहाँ 'धर्मोपमा' है। ३. जिसमें शब्दसे अनुपात्त-प्रतीयमान साधारण धर्म हो, केवल उपमान वस्तुका प्रतिपादन होनेसे वहाँ 'वस्तूपमा' होती है। जैसे—'तुम्हारा मुख कमलके समान है।' ४. 'परस्परोपमा'का दूसरा नाम 'अन्योन्योपमा' है। दण्डीने इसी नामसे इसका उल्लेख किया है। जहाँ उपमान और उपमेय—दोनों एक-दूसरेके उपमेय तथा उपमान बनते हैं, वहाँ 'परस्परोपमा' होती है। जैसे—'तुम्हारे मुखके समान कमल है और कमलके समान तुम्हारा मुख है।' ५. दण्डीने अपने 'काव्यादर्श'में विपरीतोपमाका 'विपर्यासोपमा'के नामसे उल्लेख किया है। जहाँ प्रसिद्धिके विपरीत उपमानोपमेयभाव गृहीत होता है, वहाँ 'विपरीतोपमा' होती है। जैसे—'खिला हुआ कमल तुम्हारे मुखके समान प्रतीत होता था'—इत्यादि। ६. दण्डीने इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है—'तुम्हारा मुख कमलके ही समान है, दूसरी किसी वस्तुके समान नहीं।' ७. इसका उदाहरण दण्डीके 'काव्यादर्श'में इस प्रकार दिया गया है—'कमल तो तुम्हारे मुखका अनुकरण करता ही है, यदि दूसरी वस्तुएं (चन्द्र आदि) भी तुम्हारे मुखके समान हों तो रहें।' ८. 'समुच्चयोपमा'का उदाहरण दण्डीने इस प्रकार किया है—'सुन्दरि! तुम्हारा मुख केवल कान्तिसे ही नहीं, आह्लादनकर्मसे भी इन्दुका अनुसरण करता है।' यहाँ कान्तिगुण और आह्लादनकर्म—दोनोंका समुच्चय होनेके कारण 'समुच्चयोपमा' कही गयी है।

७२२ * अग्निपुराण *

विवक्षित हो और इसके कारण जो अतिरिक्तत्वका कथन होता है, उसे 'व्यतिरेकोपमा'१ कहते हैं। जहाँ बहुसंख्यक सदृश उपमानोंद्वारा उपमा दी जाय, उसे 'बहूपमा'२ माना गया है। यदि उनमेंसे प्रत्येक उपमान भिन्न-भिन्न साधारण धर्मोंसे युक्त हो तो उसे 'मालोपमा'३ कहा जाता है। उपमेयको उपमानका विकार बताकर तुलना की जाय तो 'विक्रियोपमा'४ होती है। यदि कवि उपमानमें किसी ऐसे वैशिष्ट्यका, जो तीनों लोकोंमें असम्भव हो, आरोप करके उसके द्वारा उपमा देता है, तो वह 'अद्भुतोपमा'५ कही जाती है। उपमानको आरोपित करके उससे अभिन्नरूपमें जो उपमेयका कीर्तन होता है और उससे जो भ्रम होनेका वर्णन किया जाता है, उसे 'मोहोपमा'६ कहा जाता है। दो धर्मियोंमेंसे किसी एकका यथार्थ निश्चय न होनेसे 'संशयोपमा'७ तथा पहले संशय होकर फिर निश्चय होनेसे 'निश्चयोपमा'८ होती है। जहाँ वाक्यार्थको उपमान बनाकर उससे ही वाक्यार्थकी उपमा दी जाय, उसको 'वाक्यार्थोपमा'९ कहते हैं। यह उपमा अपने उपमानकी दृष्टिसे दो प्रकारकी होती है—'साधारणी' और 'अतिशायिनी'। जो एकका उपमेय है, वही दूसरेका उपमान हो,

१. 'व्यतिरेकोपमा'को ही अर्वाचीन आलंकारिकोंने 'व्यतिरेक' नामक अलंकार माना है। दण्डीने इसका उल्लेख नहीं किया है। परंतु रुय्यक और मम्मटने इसका उदाहरण यों दिया है—'चन्द्रमा बारंबार क्षीण हो-होकर भी पुनः बढ़ जाता है; परंतु यौवन यदि चला गया तो फिर लौटता नहीं।' इसमें उपमानभूत चन्द्रमाकी अपेक्षा उपमेय यौवनकी अस्थिरता अधिक बतायी गयी है। अतः यहाँ 'व्यतिरेक' है।

२. 'तुम्हारा स्पर्श चन्दन, जल, चन्द्रकिरण तथा चन्द्रकान्तमणि आदिके समान शीतल है'। यहाँ शीतलतामें सादृश्य रखनेवाले बहुत-से उपमानोंद्वारा उपमा दी गयी है, अतः 'बहूपमा' अलंकार है। दण्डीने अपने 'काव्यादर्श'में यही उदाहरण प्रस्तुत किया है। अर्वाचीन आचार्यलोग इसे 'मालोपमा' ही मानते हैं। उनकी 'मालोपमा' का लक्षण इस प्रकार है—'मालोपमा यदेकस्योपमानं बहु दृश्यते।'

३. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणके ही पथका अनुसरण करते हुए 'बहूपमा' और 'मालोपमा' को अलग-अलग माना है। 'बहूपमा'के उदाहरणमें बहुत-से उपमानोंकी गणनामात्र करा दी गयी है, परंतु 'मालोपमा' में प्रत्येक उपमानके साथ साधर्म्यका अन्वय होता है। यही इन दोनोंमें भेद है। 'मालोपमा'का उदाहरण दण्डीने इस प्रकार प्रस्तुत किया है—'राजन् ! जैसे प्रकाश सूर्यमें शोभाका आधान करता है, जैसे सूर्य दिनमें लक्ष्मीका आधान करते हैं तथा जैसे दिन आकाशमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार तुम्हारा बल, पराक्रम तुममें लक्ष्मीको प्रतिष्ठित करता है।' यहाँ प्रत्येक उपमानके साथ पृथक्-पृथक् साधर्म्यका अन्वय होनेसे 'मालोपमा' मानी गयी है।

४. 'काव्यादर्श' में 'विक्रियोपमा' का उदाहरण इस प्रकार उपलब्ध होता है—' सुन्दरि ! तुम्हारा मुख चन्द्रमण्डलसे उत्कीर्ण (खोदकर निकाला हुआ)-सा तथा कमलके गर्भसे उद्धृत किया हुआ-सा जान पड़ता है।' यहाँ चन्द्रमण्डल तथा कमलगर्भ—ये प्रकृति हैं और मुख इनका विकार है। अतः यहाँ 'विक्रियोपमा' हुई।

५. इसका उदाहरण दण्डीने इस प्रकार प्रस्तुत किया है—' सुन्दरि ! यदि कोई कमल चञ्चल लोचनोंसे युक्त हो जाय तो वह तुम्हारे मुखकी शोभाको धारण कर सकता है।'

६. ''सुन्दरि ! मैं तुम्हारे मुखको 'यह चन्द्रमा है'—यों समझ लेता हूँ और तुम्हारे मुखके दर्शनकी आशासे बारंबार चन्द्रमाकी ओर दौड़ पड़ता हूँ।' यह वर्णन अग्निपुराणोक्त लक्षणको सामने रखकर किया गया है। अर्वाचीन आलंकारिक 'मोहोपमा' को 'भ्रान्तिमान्' अलंकारकी संज्ञा देते हैं।

७. दण्डीने 'संशयोपमा'का जो उदाहरण दिया है, उसका भावार्थ इस प्रकार है—जिसके भीतर भ्रमर मँडरा रहा हो, वह कमल है या कि चञ्चल लोचनोंसे युक्त तुम्हारा मुख है, इस संशयसे मेरा चित्त दोलायमान हो रहा है।' आधुनिक आलंकारिक इसीको 'संदेहालंकार' कहते हैं।

८. दण्डीने इसे 'निर्णयोपमा' नाम दिया है। उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण इस प्रकार है—'जिस कमलको चन्द्रमाने अभिभूत कर दिया था, उसकी कान्ति स्वयं चन्द्रमाको ही लज्जित कर दे, ऐसा नहीं हो सकता। अतः यह तुम्हारा मुख ही है (कमल नहीं है)।' अर्वाचीन आचार्यगण इसे 'निश्चयान्त संदेहालंकार' ही मानते हैं।

९. दण्डीने भी 'वाक्यार्थोपमा' का ऐसा ही लक्षण किया है। वे भी इसके दो ही भेद मानते हैं। परंतु उनके दोनों भेदोंके नाम अग्निपुराणमें दिये गये नामोंसे भिन्न हैं। अग्निपुराणमें 'साधारणी' और 'अतिशायिनी'—ये दो भेद माने हैं, परंतु दण्डीने 'एकेव शब्दा' और 'अनेकेव शब्दा'—इस प्रकार दो भेदोंका उल्लेख किया है। इनके उदाहरण 'काव्यादर्श' (२।४४-४५) में द्रष्टव्य हैं।

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* अध्याय ३४४ * ७२३


अर्थात् दोनों एक-दूसरेके उपमान-उपमेय कहे गये हों तो उसे 'अन्योन्योपमा'¹ कहते हैं। इस प्रकार यदि उत्तरोत्तर क्रम चलता जाय तो उसको 'गमनोपमा'² कहा जाता है। इसके सिवा उपमाके और भी पाँच भेद होते हैं—'प्रशस्त'³ 'निन्दा'⁴ 'कल्पिता'⁵ 'सदृशी'⁶ एवं 'किंचित्सदृशी'⁷। गुणोंकी समानता देखकर उपमेयका जो तत्त्व उपमानसे रूपित अभेदेन प्रतिपादित होता है, उसे 'रूपक'⁸ मानते हैं। अथवा भेदके तिरोहित होनेपर उपमा ही 'रूपक' हो जाती है। तुल्यधर्मसे युक्त दो पदार्थोंका एक साथ रहनेका वर्णन 'सहोक्ति'९ कहा जाता है॥ १३-२३॥

पूर्ववर्णित वस्तुके समर्थनके लिये साधर्म्य अथवा वैधर्म्यसे जो अर्थान्तरका उपन्यास किया जाता है, उसे 'अर्थान्तरन्यास'१० कहते हैं। जिसमें चेतन या अचेतन पदार्थकी अन्यथास्थित परिस्थितिको दूसरी तरहसे माना जाता है, उसको 'उत्प्रेक्षा'११ कहते हैं। लोकसीमातीत


१. काव्यादर्शमें इसका उदाहरण इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—'तुम्हारे मुखके समान कमल है और कमलके समान तुम्हारा मुख है।' इसे ही 'उपमेयोपमा' भी कहते हैं।
२. काव्यादर्शकारने 'गमनोपमा'का उल्लेख नहीं किया है। अग्निपुराणमें दिये गये लक्षणके अनुसार हम 'गमनोपमा'को 'अन्योन्योपमा'की माला कह सकते हैं। उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित श्लोक द्रष्टव्य है—

कौमुदीव भवती विभाति मे कातराक्षि भवतीव कौमुदी। अम्बुजेन तुलितं विलोचनं लोचनेन च तवाम्बुजं समम्॥

३—७. इससे पहले उपमाके अठारह भेद कहे गये हैं। इन्हीं भेदोंका विस्तार करके दण्डीने बत्तीस प्रकारकी उपमाएँ प्रदर्शित की हैं। उक्त भेदोंके अतिरिक्त जो उपमाके 'प्रशंसा' आदि पाँच भेद और कहे गये हैं, उनका आधार है—भरतका 'नाट्यशास्त्र' (द्रष्टव्य १६।४६)। भरतमुनिने प्रशंसा आदि पाँचों भेदोंके जो उदाहरण दिये हैं, वे भी सोलहवें अध्यायके श्लोक सैंतालीससे इक्यावनतक द्रष्टव्य हैं।
८. अग्निपुराणोक्त 'रूपक'का लक्षण नाट्यशास्त्रोक्त लक्षणका संक्षिप्त रूप है। अग्निपुराणके ही भावको लेकर दण्डीने 'उपमैव तिरोभूतभेदा रूपकमुच्यते'—ऐसा लक्षण किया है। अर्वाचीन आलंकारिकोंने 'रूपक'के बहुत-से भेदों और उपभेदोंकी चर्चा की है। 'रूपक'का उदाहरण 'नाट्यशास्त्र' १६।५८ में द्रष्टव्य है।
९. दण्डीने गुण और क्रियाका सहभावसे कथन 'सहोक्ति' माना है और 'सह दीर्घा मम श्वासैरिमाः सम्प्रति रात्रयः।' (इस समय मेरी लम्बी साँसोंके साथ ये रातें भी बहुत बड़ी हो गयी हैं) ऐसा उदाहरण दिया है।
१०. अर्थान्तरन्यासका जो लक्षण अग्निपुराणमें दिया गया है, लगभग इसीकी छायाको लेकर भामहने इस प्रकार अपने ग्रन्थमें उक्त अलंकारका लक्षण लिखा है—

उपन्यसनमन्यस्य यदर्थस्योदितादृते। ज्ञेयः सोऽर्थान्तरन्यासः पूर्वार्थानुगतो यथा॥ (का०२।७१)

वामनने इसमें सादृश्य, असादृश्य (साधर्म्य, वैधर्म्य)-की चर्चा नहीं की है, परंतु 'पूर्वार्थानुगतः'—यह विशेषण देकर उसी अर्थको व्यक्त किया है। अर्थात् जिस अर्थान्तरका उपन्यास किया जाय, वह पूर्वोदित अर्थका अनुगामी होना चाहिये। यह अनुगमन सादृश्य अथवा वैसा दृश्यसे ही सम्भव है। वामनने अग्निपुराण तथा भामहके भावोंको अपने सूत्रमें और भी अधिक स्पष्ट किया है।
यथा—

उक्तसिद्ध्यै वस्तुनोऽर्थन्तरस्यैव न्यसनमर्थान्तरन्यासः॥ (का०सू० ४।३।२१)

काव्यादर्शकार दण्डीने इसके लक्षणको और भी स्वच्छरूपसे प्रस्तुत किया है। यथा—

ज्ञेयः सोऽर्थान्तरन्यासो वस्तु प्रस्तुत्य किंचन। तत्साधनसमर्थस्य न्यासो योऽन्यस्य वस्तुनः॥ (२।१६९)

आचार्य मम्मटतक पहुँचते-पहुँचते इसका लक्षण पूर्णतः निखर उठा है। वे लिखते हैं—

सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते। यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा॥ (का०प्र० १०।१०९)

अर्थात्—सामान्य अथवा विशेषका उससे भिन्न विशेष और सामान्यसे जो समर्थन किया जाता है, वह 'अर्थान्तरन्यास' है। यह समर्थन साधर्म्य अथवा वैधर्म्यको लेकर किया जाता है। इस प्रकार अर्थान्तरन्यासके चार भेद होते हैं। इनके उदाहरण काव्यप्रकाशमें द्रष्टव्य हैं।
११. इसी लक्षणको कुछ और विशद करते हुए भामहने इस प्रकार कहा है—

अविवक्षितसामान्या किंचिचोपमया सह। अतद्गुणक्रियायोगादुत्प्रेक्षातिशयान्विता॥ (का० २।९१)

वामनने अग्निदेव तथा भामह—दोनोंके भावोंको अपने सूत्रमें इस प्रकार संकलित किया है—

७२४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

वस्तु-धर्मका कीर्तन **‘अतिशयालंकार’**¹ कहलाता है। यह ‘सम्भव’ और **‘असम्भव’**के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। जिसमें विशेषदर्शनके लिये गुण, जाति एवं क्रियादिकी विकलताका प्रदर्शन—अनपेक्षताका प्रकाशन हो, उसको **‘विशेषोक्ति’**² कहा जाता है। जिसमें प्रसिद्ध हेतुकी व्यावृत्तिपूर्वक (अर्थात् उसका अभाव दिखाते हुए) अन्य किसी कारणकी उद्भावना की जाय अथवा स्वाभाविकता स्वीकार की जाय अर्थात् बिना किसी कारणके ही स्वाभाविक रूपसे कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय, उसे विभावना³ कहते हैं। परस्पर असंगत पदार्थोंका जहाँ युक्तिके द्वारा विरोधपूर्वक संगतिकरण किया जाय, वह **‘विरोधालंकार’**⁴ होता है। जिसकी


अतद्रूपस्यान्यथाध्यवसानमतिशयार्थमुत्प्रेक्षा ॥ (का० सू० ४।३।९)

दण्डीका लक्षण इस प्रकार है— अन्यथैव स्थिता वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य वा। अन्यथोत्प्रेक्ष्यते यत्र तामुत्प्रेक्षां विदुर्यथा॥ (२।२२१) यही लक्षण अग्निपुराणमें भी है। दण्डीने उसे ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर केवल इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'मन्यते' क्रियाका प्रयोग है और काव्यादर्शमें 'उत्प्रेक्ष्यते' क्रियाका। आचार्य मम्मटने थोड़े-से शब्दोंमें ही उत्प्रेक्षाका सर्वसम्मत रूप रख दिया है। यथा— 'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।' (का० प्र० १०।९२) अर्थात्—"प्रकृत (वर्ण्य उपमेय)-की सम (उपमान)-के साथ सम्भावना 'उत्प्रेक्षा' कहलाती है।"

१. यह अतिशय ही आगे चलकर 'अतिशयोक्ति' के नामसे प्रसिद्ध हुआ है। अग्निपुराणके इस सूक्ष्म लक्षणको आचार्य भामहने विशद करते हुए कहा है कि—किसी "कारणवश लोकोत्तर अर्थका बोधक जो वचन है, उसे 'अतिशयोक्ति' अलंकार मानते हैं। वामनने इसके असम्भव-पक्षको नहीं लिया है। वे सम्भाव्य धर्म तथा उसके उत्कर्षकी कल्पनाको ही 'अतिशयोक्ति' मानते हैं (४।३।१०)। लोकसीमातीत होनेपर ही वस्तुधर्ममें उत्कर्ष सिद्ध होता है। आचार्य दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणके केवल भावकी ही नहीं, शब्दकी भी छाया ली है। यथा— विवक्षा या विशेषस्य लोकसीमातिवर्त्तिनी। असावतिशयोक्तिः स्यादालंकारोत्तमा यथा॥ (काव्यादर्श २।२१४) आचार्य मम्मटके द्वारा 'अतिशयोक्ति' का विकसित स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है। उपमानके द्वारा उपमेयका निगरण करके जो कल्पित अभेद-कथनरूप अध्यवसान करना है, वह एक प्रकारकी 'अतिशयोक्ति' है। प्रस्तुत अर्थका अन्यरूपसे वर्णन द्वितीय प्रकारकी, 'यदि' के समानार्थक शब्दको लगाकर की गयी कल्पना तृतीय प्रकारकी और कार्य-कारणके पौर्वापर्यका विपर्यय चतुर्थ प्रकारकी 'अतिशयोक्ति' है। (का० प्र० १०।१००-१०१)

२. दण्डीके 'काव्यादर्श'में अग्निपुराणकी ही शब्दावलीमें 'विशेषोक्ति' लक्षित करायी गयी है। भामहने भी अग्निपुराणके ही भाव तथा शब्दकी छाया ली है। यथा— एकदेशस्य विगमे या गुणान्तरसंस्थितिः। विशेषप्रथनायासौ विशेषोक्तिर्मता यथा॥ (३।२३) वामनने भी 'एकगुणहानिकल्पनायां साम्यदार्थं विशेषोक्तिः।'-इस सूत्रमें ऐसा ही भाव व्यक्त किया है। अर्वाचीन आलंकारिकोंने "कारण प्राप्त होनेपर भी जो कार्यका न होना बताया जाय, उसे 'विशेषोक्ति' कहा है।" जैसा कि आचार्य मम्मटका कथन है— 'विशेषोक्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावचः॥' (१०।१०८)

३. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणमें दिये गये लक्षणकी आनुपूर्वीको ही अपने ग्रन्थमें उद्धृत किया है। भामहने कारणभूत क्रियाका निषेध होनेपर भी उसके फलकी 'उद्भावना' को 'विभावना' माना है। इसी भावको वामनने भी अपने सूत्रमें अभिव्यक्त किया है। यथा— 'क्रियाप्रतिपेधे प्रसिद्धतत्फलव्यक्तिर्विभावना॥' (काव्यालंकार, सू० ४।३।१३) आचार्य मम्मटने अपनी कारिकामें उक्त सूत्रका ही भाव ग्रहण किया है— 'क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना।' 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता राजा भोजने 'विभावना' के अपने लक्षणमें अग्निपुराणकी शब्दावलीको ही अविकलरूपसे ले लिया है।

४. भामहने 'विरोध' का लक्षण इस प्रकार बताया है—"विशेषता बतानेके लिये किसी गुण या क्रियाके विरुद्ध अन्य क्रियाका वर्णन हो, तो उसे विद्वान् 'विरोध' कहते हैं"— गुणस्य वा क्रियाया वा विरुद्धान्यक्रियाभिधा। या विशेषाभिधानाय विरोधं तं विदुर्बुधाः॥ (३।२५)

  • अध्याय ३४५ * ७२५

सिद्ध अभिलषित हो, ऐसे अर्थका साधक 'हेतु'१ अलंकार कहलाता है। उस 'हेतु' अलंकारके भी 'कारक' एवं 'ज्ञापक'—ये दो भेद हो जाते हैं। इनमें कारक-हेतु कार्य-जन्मके पूर्वमें और पश्चात् भी रहनेवाला है, जो 'पूर्वशेष' कहा जाता है और उन्हीं भेदोंमें कार्य-कारणभावसे अथवा किसी नियामक स्वभावसे या अविनाभावके दर्शनसे जो अविनाभावका नियम होता है, वह ज्ञापक हेतुका भेद है। 'नदीपूर' आदिका दर्शन ज्ञापकका उदाहरण है२ ॥ २४-३२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्थालंकारका वर्णन' नामक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥

तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय शब्दार्थोभयालंकार

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! 'शब्दार्थालंकार' शब्द और अर्थ दोनोंको समानरूपसे अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्गमें धारण किया हुआ हार कामिनीके कण्ठ एवं कुचमण्डलकी कान्तिको बढ़ा देता है। 'शब्दार्थालंकार'के छः भेद काव्यमें उपलब्ध होते हैं—प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता तथा अभिव्यक्ति। दूसरोंके मर्मस्थलको द्रवीभूत करनेवाले वाक्-कौशलको 'प्रशस्ति' कहते हैं। वह प्रशस्ति 'प्रेमोक्ति' एवं 'स्तुति'के भेदसे दो प्रकारकी मानी गयी है। प्रेमोक्ति और स्तुतिके पर्यायवाचक शब्द क्रमशः 'प्रियोक्ति' एवं 'गुण-कीर्तन' हैं। वाच्य-वाचककी सर्वसम्मत एवं रुचिकर संगतिको 'कान्ति' कहते हैं। यदि ओज एवं माधुर्ययुक्त संदर्भमें—वस्तुके अनुसार रीति एवं वृत्तिके अनुसार रसका प्रयोग हो तो औचित्यका प्रादुर्भाव होता है। अल्पसंख्यक शब्दोंसे अर्थ-बाहुल्यका संग्रह 'संक्षेप' तथा शब्द एवं वस्तुका अन्यूनाधिक्य 'यावदर्थता' कहा जाता है। अर्थ-प्राकट्यको 'अभिव्यक्ति' कहते हैं। उसके दो भेद हैं—'श्रुति' और 'आक्षेप'। शब्दके द्वारा अपने अर्थका उद्घाटन 'श्रुति' कहा जाता है। श्रुतिके दो भेद हैं—'नैमित्तिकी' और 'पारिभाषिकी'। 'संकेत' को परिभाषा कहते हैं। परिभाषाके सम्बन्धसे ही वह पारिभाषिकी है।


दण्डीने "जहाँ प्रस्तुत वस्तुकी विशेषता (उत्कर्ष) दिखानेके लिये परस्परविरुद्ध संसर्ग (एकत्र अवस्थान) प्रदर्शित किया जाय, वह 'विरोध' नामक अलंकार है"—ऐसा लक्षण किया है। वामनने 'विरुद्धाभासत्वं विरोधः।' (४।३।१२)—ऐसा कहा है। 'काव्यप्रकाश'में 'विरुद्धः सोऽविरुद्धेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः।'—ऐसा विरोधका लक्षण देखा जाता है। इन सबकी शब्दावलीमें किंचित् भेद होते हुए भी, अभिप्राय सबका एक ही जान पड़ता है। विरोधपूर्वक संगतिकरणको कुछ लोग 'असंगति' अलंकार भी मानते हैं।

१. अग्निपुराणमें वर्णित 'हेतु' अलंकारको भामहने चमत्कार-शून्य बताकर अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने 'सूक्ष्म' और 'लेश'को भी अलंकार नहीं माना है। परंतु दण्डीने 'वाचामुत्तमभूषणम्'—यों कहकर इन तीनोंको उत्तम अलंकारकी कोटिमें रखा है। उन्होंने 'हेतु' का कोई स्वतन्त्र लक्षण नहीं दिया है, परंतु अग्निपुराणोक्त कारक और ज्ञापक दोनों हेतुओंका उल्लेख किया है। अतः अग्निपुराणोक्त लक्षण ही उन्हें अभिमत है। अग्नि धूमका कारक हेतु है और धूम अग्निका ज्ञापक हेतु। इस प्रकार हेतुके दोनों भेद देखे जाते हैं। आचार्य दण्डी 'हेतु'में ही 'काव्यलिङ्ग', 'अनुमान' तथा कार्यकारणमूलक 'अर्थान्तरन्यास'का अन्तर्भाव मानते हैं। अतएव उन्होंने इन सबके पृथक् लक्षण आदि नहीं लिखे हैं। भोजराजने 'हेतु'का 'क्रियायाः कारणे हेतुः'—ऐसा लक्षण किया है।

२. जैसे नदीके जलप्रवाहके दर्शनसे उसके उद्गम-स्थानकी सत्ता सिद्ध होती है तथा धूमके दर्शनसे अग्निकी सत्ता सूचित होती है। इस तरहके वर्णनोंमें ज्ञापक हेतु समझना चाहिये।

७२६ * अग्निपुराण *

पारिभाषिकीको 'मुख्या' और नैमित्तिकीको 'औपचारिकी' कहते हैं। [ये ही क्रमशः 'अभिधा' और 'लक्षणा' हैं।] उस औपचारिकीके भी दो भेद हैं। जिसके द्वारा अभिधेय अर्थसे स्खलित हुआ शब्द किसी निमित्तवश अमुख्य अर्थका बोधक होता है, वह वृत्ति 'औपचारिकी' है। ये ही दोनों भेद नैमित्तिकीके भी होते हैं। वह लक्षणायोगसे 'लाक्षणिकी' और गुणयोगसे 'गौणी' कहलाती है। अभिधेय अर्थके साथ सम्बद्ध रहकर जो अन्यार्थकी प्रतीति होती है, उसको 'लक्षणा' कहते हैं। अभिधेयके साथ सम्बन्ध, सामीप्य, समवाय, वैपरीत्य एवं क्रियायोगसे लक्षणा पाँच प्रकारकी मानी जाती है। गुणोंकी अनन्तता होनेसे उनकी विवक्षाके कारण गौणीके अनन्त भेद हो जाते हैं। लोकसीमाके पालनमें तत्पर कविद्वारा जब अप्रस्तुत वस्तुके धर्म प्रस्तुत वस्तुपर सम्यग्रूपसे आहित—आरोपित किये जाते हैं, तब उसे 'समाधि'१ कहते हैं। जिसके द्वारा श्रुतिसे अनुपलब्ध अर्थ चैतन्ययुक्त होकर भासित होता है, वह 'आक्षेप'२ कहा जाता है। इसको 'ध्वनि' भी माना गया है; क्योंकि वह ध्वनिसे ही व्यक्त होता है। इसमें ध्वनिके आश्रयसे शब्द और अर्थके द्वारा स्वतः संकलित अर्थ ही व्यञ्जित होता है। अभीष्ट कथनका विशेष विवक्षासे अर्थात् उसमें और भी उत्कर्षकी प्रतीति करानेके लिये जो प्रतिषेध-सा होता है, उसको 'आक्षेप'३ कहते हैं। अधिकार (प्रकरण)-से पृथक्, अर्थात् अप्रकृत या अप्रस्तुत अन्य वस्तुकी जो स्तुति की जाती है, उसे 'अस्तुतस्तोत्र'४ (अप्रस्तुतप्रशंसा) कहते हैं। जहाँ किसी एक वस्तुके कहनेपर उसके समान विशेषणवाले दूसरे अर्थकी प्रतीति हो, उसे विद्वान् पुरुष अर्थकी संक्षिप्तताके कारण 'समासोक्ति'५ कहते हैं। वास्तविक पदार्थका अपलाप या निषेध करके किसी अन्य


१. अग्निपुराणमें 'समाधि' का जो लक्षण किया गया है, वह भरतमुनिके निम्नाङ्कित श्लोकपर आधारित है—
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलभ्यते। तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्त्यते॥
(नाट्य० १६। १०२)
दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणको अविकलरूपसे अपने ग्रन्थमें ले लिया है। वामनने आरोहावरोहक्रमरूप 'समाधि' को शब्दगुण स्वीकार किया है, किंतु भोजराजने अग्निपुराण और दण्डीके ही भावको लेकर—'समाधिः सोऽन्यधर्माणां यदन्यत्राधिरोपणम्।'—यह लक्षण लिखा है। वाग्भटने भी यही बात कही है—'अन्यस्य धर्मो यत्रान्यत्रारोप्यते स समाधिः'।

२. यहाँ आक्षेपको ध्वनिरूप बताया गया है; क्योंकि उससे अर्थविशेषका ध्वनन होता है।

३. यह 'आक्षेपालंकार' का लक्षण है। आचार्य मम्मटने भी इसी भावका आश्रय लेकर कहा है कि—
निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया। वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः॥
इस लक्षणमें उक्त विषय और वक्ष्यमाण विषयके भेदसे आक्षेपके दो प्रकार बताये गये हैं।

४. इस 'अस्तुत-स्तोत्रको ही परवर्ती आलंकारिकोंने 'अप्रस्तुतप्रशंसा' नाम दिया है; इसी को 'अन्योक्ति' भी कहते हैं। अग्निपुराणमें जो लक्षण दिया गया है, उसीको भामहने अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अन्तर इतना ही है कि वे 'अस्तुतस्तोत्र' के स्थानमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' लिखते हैं। उनका लक्षण इस प्रकार है—
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः। अप्रस्तुतप्रशंसोति सा चैवं कथ्यते यथा॥
(३।२९)
दण्डीने इसी भावको संक्षिप्त शब्दोंमें व्यक्त किया है—'अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुतिः।' (२। ३४०) वामनने उपमेयकी अनुक्तिमें 'समासोक्ति' और किंचिद् उक्तिमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' मानी है।

५. आचार्य भामहने अपने ग्रन्थमें अग्निपुराणोक्त लक्षणको ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'उदिता' है और भामहके ग्रन्थमें 'उद्दिष्टा'। वहाँ अन्तमें 'बुधैः' पदका प्रयोग है और यहाँ 'यथा' का। दण्डीने इसी भावको कुछ अधिक स्पष्टताके साथ इस प्रकार लिखा है—

* अध्याय ३४६ *७२७

पदार्थको सूचित करना 'अपह्नुति'$^१$ है। जो अभिधेय दूसरे प्रकारसे कहा जाता है अर्थात् सीधे न कहकर प्रकारान्तरसे घुमा-फिराकर प्रस्तुत किया जाता है, उसको 'पर्यायोक्ति'$^२$ कहते हैं। इनमेंसे किसी भी एकका नाम 'ध्वनि'$^३$ है॥ १—१८॥'

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शब्दार्थोभयालंकारोंका कथन' नामक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४५ ॥


तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय

काव्यगुण-विवेक

अग्निदेव कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होनेपर भी सहृदयके लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारीके यौवनजनित लालित्यसे$^४$ रहित शरीरपर हार भी भारस्वरूप हो जाता है। यदि कोई कहे कि 'गुणनिरूपणकी क्या आवश्यकता है? दोषोंका अभाव ही गुण हो जायगा' तो उसका ऐसा कथन उचित नहीं है; क्योंकि 'श्लेष' आदि गुण और 'गूढार्थत्व' आदि दोष पृथक्-पृथक् कहे गये हैं। जो काव्यमें महती शोभाका आनयन करता है, उसको 'गुण' कहा जाता है। यह सामान्य और वैशेषिकके भेदसे दो प्रकारका हो जाता है। जो गुण सर्वसाधारण हो, उसे 'सामान्य' कहा जाता है। सामान्य गुण शब्द, अर्थ और शब्दार्थको प्राप्त होकर तीन प्रकारका हो जाता है। जो गुण काव्य-शरीरमें शब्दके आश्रित होता है, वह


वस्तु किंचिदभिप्रेत्य तत्तुल्यस्यान्यवस्तुनः। उक्तिः संक्षेपरूपत्वात् सा समासोक्तिरुच्यते ॥
(२।२०५)

'समासोक्ति'की गणना व्यङ्ग्य अलंकारोंमें होती है, इस दृष्टिसे अग्निपुराणोक्त लक्षणमें 'गम्यते'—इस क्रियापदका प्रयोग अधिक महत्त्वका है। अर्वाचीन आलंकारिक 'समासोक्ति'के लक्षणोंमें अप्रकृत व्यवहारके समारोपका भी उल्लेख करते हैं।

१. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणकी आनुपूर्वीको ही उद्धृत कर लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'किंचिदन्यार्थसूचनम्' पाठ है और काव्यादर्शमें 'सूचनम्'के स्थानमें 'दर्शनम्' कर दिया गया है। भामहने शब्दान्तरसे इसी भावको प्रकट किया है—

अपह्नुतिरभीष्टा च किंचिदन्तर्गतोपमा। भूतार्थापह्नवादस्याः क्रियते चाभिधा यथा ॥
(२।२१)

इस लक्षणमें 'किंचिदन्तर्गतोपमा' यह अंश विशेष है। वामनने तुल्य वस्तुके द्वारा वाक्यार्थके अपलापको 'अपह्नुति' कहा है—'समानवस्तुनान्यापलापोऽपह्नुतिः।' (३।५) परवर्ती आलंकारिकोंने प्रकृत वस्तुका निषेध करके अन्य वस्तुकी स्थापनाको 'अपह्नुति' कहा है।
२. भामहने भी 'पर्यायोक्ति'का यही लक्षण लिखा है।
३. प्राचीनोंने आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति तथा पर्यायोक्तिको 'ध्वनि' कहकर जो उसे अलंकारोंमें अन्तर्भूत करनेकी चेष्टा की है, उसका ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनने बड़ी प्रौढ़िके साथ खण्डन किया है।
४. इसी भावको लेकर वामनने कहा है—

यदि भवति वचश्च्युतं गुणेभ्यो वपुरिव यौवनवन्ध्यमङ्गनायाः।
अपि जनदयितानि दुर्भगत्त्वं नियतमलङ्करणानि संश्रयन्ते ॥

अर्थात्—'गुणरहित वचन नारीके यौवनरहित रूपकी भाँति मनोरम नहीं होता। यदि उसे अलंकृत भी किया जाय तो वे अलंकार अपना दुर्भाग्य सूचित करते हैं।'

७२८ * अग्निपुराण *


'शब्दगुण' कहलाता है। शब्दगुणके सात$^१$ भेद होते हैं—श्लेष, लालित्य, गाम्भीर्य, सौकुमार्य, उदारता, ओज और यौगिकी (समाधि)। शब्दोंका सुश्लिष्ट संनिवेश 'श्लेष'$^२$ कहा जाता है। जहाँ गुणादेश आदिके द्वारा पूर्वपदसम्बद्ध अक्षर संधिको प्राप्त नहीं होता, वहाँ 'लालित्य'$^३$ गुण माना गया है। विशिष्ट लक्षणके अनुसार उल्लेखनीय उच्चभावव्यञ्जक शब्दसमूहको श्रेष्ठ पुरुष 'गाम्भीर्य'$^४$ कहते हैं। वही अन्यत्र 'उत्तान शब्दक' या 'शब्दत्व' नामसे प्रसिद्ध है। जिसमें निष्ठुरतारहित कोमल अक्षरोंका बाहुल्य हो, उस शब्दसमूहको 'सौकुमार्य'$^५$ गुणविशिष्ट माना गया है। जहाँ श्लाघ्य विशेषणोंसे युक्त उत्कृष्ट पदका प्रयोग हो, वहाँ 'औदार्य'$^६$ गुण माना जाता है। समासोंका बाहुल्य 'ओज'$^७$ कहलाता है। यह गद्य-पद्यरूप काव्यका प्राण है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कोई भी प्राणी हैं, उनके 'पौरुष'का वर्णन एकमात्र 'ओज' गुणविशिष्ट पदावलीसे ही होता है। जिस-किसी भी शब्दके द्वारा वर्ण्यमान वस्तुका उत्कर्ष वहन करनेवाला गुण 'अर्थगुण' कहा जाता है। अर्थगुणके छः भेद प्रकाशित होते हैं—माधुर्य, संविधान, कोमलता, उदारता, प्रौढि एवं सामयिकता। क्रोध और ईर्ष्यामें भी आकारकी गम्भीरता तथा धैर्यधारणको 'माधुर्य'$^८$ कहते हैं। अपेक्षित कार्यकी सिद्धिके लिये उद्योग 'संविधान' माना गया है। जो कठिनता


१. भरतमुनिने काव्यार्थ-गुण दस माने हैं—
श्लेषः प्रसादः समता समाधिर्माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम्।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च काव्यार्थगुणा दशैते॥
अग्निदेवने शब्दगुण सात, अर्थगुण छः और शब्दार्थ-गुण छः माने हैं। काव्यादर्शकार दण्डीने भी भरतोक्त दस गुणोंका ही उल्लेख किया है। वामनने बीस और भोजने अड़तालीस गुण प्रदर्शित किये हैं।
२. भामहने माधुर्य, प्रसाद और ओज—इन तीन गुणोंको ही स्वीकार किया है। वामनने शब्दगुण दस और अर्थगुण भी दस माने हैं। नाम दोनों विभागोंके एक ही हैं, केवल लक्षणमें अन्तर है। उन्होंने 'शब्दश्लेष'का लक्षण इस प्रकार किया है—'मसृणत्वं श्लेषः'। इसकी व्याख्या करते हुए वे स्वयं लिखते हैं—' 'मसृणत्वं नाम यस्मिन् सति बहून्यपि पदानि एकवद् भासन्ते।—अर्थात् जिसके होनेपर बहुत-से पद एकपदके तुल्य प्रतीत होते हैं, उसका नाम 'मसृणत्व' है।' 'उदाहरणके लिये 'अस्त्युत्तरस्याम्'—यह पद्यांश है। इसमें दो पद संधियुक्त होकर एकपदवत् प्रतीत होते हैं। दण्डीने 'श्लिष्टमस्पृष्टशैथिल्यम्'—यह श्लेषका लक्षण लिखा है। इसके अनुसार जिस वाक्यमें शिथिलता छू भी न गयी हो, वह 'श्लेष' है। इसका और वामनोक्त लक्षणका आधार अग्निपुराणका 'सुश्लिष्टसंनिवेशत्वं शब्दानां श्लेषः।'—यह लक्षण ही है। भोजराजने इसीका भाव लेकर 'सुश्लिष्टपदता श्लेषः।'—यह लक्षण लिखा है।
३-४.'लालित्य' नामक गुणका उल्लेख अन्यत्र नहीं मिलता। गाम्भीर्यका लक्षण भोजराजने इस प्रकार किया है—'ध्वनिमत्ता तु गाम्भीर्यम्'। इसमें भी अग्निपुराणोक्त लक्षणकी भावच्छाया दीख पड़ती है।
५. भोजराजके 'अनिष्ठुराक्षरप्रायं सुकुमारमिति स्मृतम्।'—इस लक्षणमें अग्निपुराणकी शब्दावलीका ही समावेश किया गया है। दण्डीने भी इसी आनुपूर्वीमें 'सुकुमारता'को लक्षित कराया है। वामनने बन्धकी अकठोरताको ही 'सौकुमार्य' कहा है। उसका आधार भी अग्निपुराणोक्त लक्षण ही है।
६. काव्यादर्शकार दण्डीने 'औदार्यका' यही लक्षण थोड़े-से पदोंके हेर-फेरके साथ अपने ग्रन्थमें ले लिया है। भोजराजने वैभवके उत्कर्षका प्रतिपादन 'औदार्य' माना है, किंतु यह उनका अर्थगुण है—'भूत्युत्कर्ष उदारता।'—शब्दगुणान्तर्गत उदारताका लक्षण उनके मतमें 'विकटाक्षरबन्धत्व' है, जो वामनोक्त लक्षणसे मेल खाता है। वामनने ग्राम्यत्वदोषसे रहित रचनाको 'औदार्यगुणशालिनी' स्वीकार किया है। यथा—'अग्राम्यत्वमुदारता।' (३।२।१२) किंतु यह उनके 'अर्थगुण'का लक्षण है। शब्दगुणके लक्षणमें वे बन्धकी विकटताको ही 'उदारता' मानते हैं। जिसके होनेपर पद नृत्य करते-से प्रतीत होते हैं।
७. 'काव्यादर्श'में भी 'ओज'का यही लक्षण उद्धृत किया गया है। वामनने निबन्धके गाढ़त्वको 'ओज' कहा है। यह गाढ़त्व समास-बाहुल्यसे ही आता है। अतः वामनने कोई नयी बात नहीं कही है। 'सरस्वतीकण्ठाभरण'के निर्माता भोजराजने भी अग्निपुराणकी आनुपूर्वीमें ही 'ओजः' समासभूयष्ठम्।'—इस प्रकार 'ओज'का लक्षण लिखा है।
८. वामनने 'पृथक्-पदत्वं माधुर्यम्।'—यह लिखकर बताया है, जहाँ पद्यमें सभी पद पृथक्-पृथक् हों, समासमें आबद्ध होनेके कारण विकट या जटिल न हो जायें, वहाँ 'माधुर्य' है। यह शब्दगत माधुर्यका लक्षण है। अर्थगत माधुर्य वे वहाँ मानते हैं, जहाँ उक्ति-वैचित्र्य

  • अध्याय ३४६ * ७२९

आदि दोषोंसे रहित है तथा संनिवेश विशेषका तिरस्कार करके मृदुरूपमें ही भासित होता है, वह गुण 'कोमलता'के नामसे प्रसिद्ध है॥ १-१४॥

जिसमें स्थूललक्ष्यत्वकी प्रवृत्तिका लक्षण लक्षित होता है, आशय अत्यन्त सुन्दररूपमें प्रकट होता है, वह 'उदारता'¹ नामक गुण है। इच्छित अर्थके प्रति निर्वाहका उपपादन करनेवाली हेतुगभिणी युक्तियोंको 'प्रौढ़ि'² कहते हैं। स्वतन्त्र या परतन्त्र कार्यके बाह्य एवं आन्तरिक संयोगसे अर्थकी जो व्युत्पत्ति होती है, उसको 'सामयिकता' कहते हैं। जो शब्द एवं अर्थ—दोनोंको उपकृत करता है, वह 'उभयगुण' (शब्दार्थगुण) कहलाता है। साहित्यशास्त्रियोंने इसका विस्तार छः भेदोंमें किया है—प्रसाद, सौभाग्य, यथासंख्य, प्रशस्तता, पाक और राग। सुप्रसिद्ध अर्थसे समन्वित पदोंका संनिवेश 'प्रसाद'³ कहा जाता है। जिसके उक्त होनेपर कोई गुण उत्कर्षको प्राप्त हुआ प्रतीत होता है, विद्वान् उसको 'सौभाग्य' या 'औदार्य' बतलाते हैं। तुल्य वस्तुओंका क्रमशः कथन 'यथासंख्य'⁴ माना जाता है। समयानुसार वर्णनीय दारुण वस्तुका भी अदारुण शब्दसे वर्णन 'प्राशस्त्य' कहलाता है। किसी पदार्थकी उच्च परिणतिको 'पाक' कहते हैं। 'मृद्वीकापाक' एवं 'नारिकेलाम्बुपाक'के भेदसे 'पाक' दो प्रकारका होता है। आदि और अन्तमें भी जहाँ सौरस्य हो, वह 'मृद्वीकापाक' है। काव्यमें जो छायाविशेष (शोभाधिक्य) प्रस्तुत किया जाय, उसे 'राग' कहते हैं। यह राग अभ्यासमें लाया जानेपर सहज कान्तिको भी लाँघ जाता है, अर्थात् उसमें और भी उत्कर्ष ला देता है। जो अपने विशेष लक्षणसे अनुभवमें आता हो, उसे 'वैशेषिक गुण' जानना चाहिये। यह राग तीन प्रकारका होता है—हारिद्रराग, कौसुम्भराग और नीलीराग। (यहाँतक सामान्य गुणका विवेचन हुआ)। अब 'वैशेषिक'का परिचय देते हैं। वैशेषिक उसको जानना चाहिये, जो स्वलक्षणगोचर हो—अनन्यसाधारण हो ॥ १५-२६ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्यगुणविवेककथन' नामक तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४६॥


हो। दण्डीने सरस वाक्यको 'मधुर' बताया है, परंतु राजा भोजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में अग्निपुराणोक्त लक्षणका ही भाव लेकर लिखा है—'माधुर्यमुक्तमाचार्यैः क्रोधादावप्यतीव्रता'। यह अर्थगत माधुर्य है। शब्दगत माधुर्यका लक्षण वे भी वामनकी भाँति 'पृथक्पदत्व' ही मानते हैं। १. दण्डीने शब्दान्तरसे अपने लक्षणमें कुछ ऐसा ही भाव प्रकट किया है। उनका कहना है कि—"जिस वाक्यका उच्चारण करनेपर उसमें किसी उत्कृष्ट गुणकी प्रतीति हो, वहाँ 'उदारता' नामक गुण है। उसके द्वारा काव्यपद्धति 'कृतार्थ' (चमत्कारकारिणी) होती है।" २. भोजराजने इसी अभिप्रायको और भी सरल रीतिसे व्यक्त किया है—'विवक्षितार्थनिर्वाहः काव्ये प्रौढिरिति स्मृता'। ३. दण्डीने इसी लक्षणका भाव लेकर 'प्रसादवत् प्रसिद्धार्थम्।'—ऐसा लक्षण किया है। वामनने भी 'अर्थवैमल्यं प्रसादः।'—यों कहकर इसी अभिप्रायकी पुष्टि की है। भोजराजने भी 'यत्तु प्राकट्यमर्थस्य प्रसादः सोऽभिधीयते'—यों लिखकर पूर्वोक्त अभिप्रायका ही पोषण किया है। ४. 'यथासंख्य'को अर्वाचीन आलंकारिकोंने गुण नहीं माना है, उसे अलंकारकी कोटिमें रखा है।

७३० * अग्निपुराण *

तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय

काव्यदोष-विवेक

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! ‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ काव्यमें यदि ‘दोष’$^१$ हो तो वह सहृदय सभ्यों (दर्शकों और पाठकों)-के लिये उद्वेगजनक होता है। वक्ता, वाचक एवं वाच्य—इनमेंसे एक-एकके नियोगसे, दो-दोके नियोगसे और तीनोंके नियोगसे सात प्रकारके दोष$^२$ होते हैं। इनमें ‘वक्ता’ कविको माना गया है, जो संदिहान, अविनीत, अज्ञ और ज्ञाताके भेदसे चार प्रकारका है। निमित्त और परिभाषा (संकेत)-के अनुसार अर्थका स्पर्श करनेवाले शब्दको ‘वाचक’ कहते हैं। उसके दो भेद हैं—‘पद’ और ‘वाक्य’। इन दोनोंके लक्षणोंका वर्णन पहले हो चुका है। पददोष दो प्रकारके होते हैं—असाधुत्व और अप्रयुक्तत्व। व्याकरणशास्त्रसे विरुद्ध पदमें विद्वानोंने ‘असाधुत्व’ दोष माना है। काव्यकी व्युत्पत्तिसे सम्पन्न विद्वानोंद्वारा जिसका कहीं उल्लेख न किया गया हो, उसमें ‘अप्रयुक्तत्व’ दोष कहा जाता है। अप्रयुक्तत्वके भी पाँच भेद होते हैं—छान्दसत्व, अविस्पष्टत्व, कष्टत्व, असामयिकत्व एवं ग्राम्यत्व। जिसका लोकभाषामें प्रयोग न हो, वह ‘छान्दसत्व’ दोष एवं जो बोधगम्य न हो, वह ‘अविस्पष्टत्व’ दोष कहलाता है। अविस्पष्टत्वके भेद निम्नलिखित हैं—गूढार्थता, विपर्यस्तार्थता तथा संशयितार्थता। जहाँ अर्थका क्लेशपूर्वक ग्रहण हो, वहाँ ‘गूढार्थता’ दोष होता है। जो विवक्षितार्थसे भिन्न शब्दार्थके ज्ञानसे दूषित हो उसे ‘विपर्यस्तार्थता’ कहते हैं। अन्यार्थत्व एवं असमर्थत्व—ये दोनों दोष भी ‘विपर्यस्तार्थता’ का ही अनुगमन करते हैं। जिसमें अर्थ संदिग्ध होता है, उसको ‘संशयितार्थता’ कहते हैं। यह सहृदयके लिये उद्वेगकारक न होनेपर दोष नहीं माना जाता। सुखपूर्वक उच्चारण न होना ‘कष्टत्वदोष’ माना जाता है। जो रचना समय—कविजन-निर्धारित मर्यादासे च्युत हो, उसमें ‘असामयिकता’ मानी जाती है। उस असामयिकताको मुनिजन ‘नेया’ कहते हैं। जिसमें निकृष्ट एवं दूषित अर्थकी प्रतीति होती है, उसमें ‘ग्राम्यतादोष’ होता है। निन्दनीय ग्राम्यार्थके कथनसे, उसके स्मरणसे तथा उसके वाचक पदके साथ समानता होनेसे ‘ग्राम्यदोष’ तीन प्रकारका है। ‘अर्थदोष’ साधारण और प्रातिस्वितकके भेदसे दो प्रकारका होता है। जो दोष अनेकवर्ती होता है, उसको ‘साधारण’ माना


१. काव्यमें ‘दोष’का परिहार अत्यन्त आवश्यक माना गया है। दण्डीने कहा है कि—‘जिस प्रकार सुन्दर-से-सुन्दर शरीर श्वेतकुष्ठके एक दागसे भी अपनी कमनीयता खो बैठता है, उसी प्रकार कितना भी रमणीय काव्य क्यों न हो, थोड़े-से दोषसे भी दूषित होकर सहृदयोंके लिये अग्राह्य हो जाता है। अतः दोषकी कदापि उपेक्षा नहीं करनी चाहिये।’ (काव्या० १।७) भामहने दोषयुक्त काव्यको कुपुत्रके समान निन्दाजनक माना है। वाग्भट (प्रथम)-का कहना है कि दोषरहित काव्य ही कीर्तिका विस्तार करनेवाला है। अग्निपुराणमें नाटक और काव्यके दोषको सहृदयोंके लिये उद्वेगजनक कहा गया है। भरतमुनिने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में काव्यके दस दोष गिनाये हैं। यथा—निगूढ़, अर्थान्तर, अर्थहीन, भिन्नार्थ, एकार्थ, अभिप्लुतार्थ, न्यायापेत, विषम, विसंधि तथा शब्दच्युति। अग्निपुराणमें इन सबका वर्णन तो है ही, अन्यान्य दोषोंकी भी विस्तारपूर्वक उद्भावना की गयी है। भामहके प्रथम निर्दिष्ट दस दोष भरतोक्त दोषोंपर ही आधारित हैं। दण्डीने भी किञ्चित् शब्दान्तरके साथ उन्हीं दस दोषोंको वर्जनीय बताया है। भामहने सबसे अधिक दोषोंकी उद्भावना की है, किंतु उनका कोई क्रमबद्ध वर्णन देखनेमें नहीं आता, यद्यपि उन्होंने अपना आधा ग्रन्थ दोषनिरूपणमें ही लगा दिया है।
२. अग्निपुराणमें पहले वक्तृ, वाचक और वाच्य—इन तीनोंमें एक-एक, दो-दो और तीनोंके नियोग (सम्बन्ध)-से सात प्रकारके दोष माने हैं। यथा—वक्तृनियुक्तदोष, वाचकनियुक्तदोष, वाच्यनियुक्तदोष, वक्तृवाचकनियुक्तदोष, वाचकवाच्यनियुक्तदोष, वक्तृवाच्यनियुक्तदोष और वक्तृवाचकवाच्यनियुक्तदोष।

  • अध्याय ३४७ * \hfill ७३१

गया है। क्रियाभ्रंश, कारकभ्रंश, विसंधि, पुनरुक्तता एवं व्यस्त-सम्बन्धताके भेदसे 'साधारण दोष' पाँच प्रकारके होते हैं। क्रियाहीनताको 'क्रियाभ्रंश', कर्त्ता आदि कारकके अभावको 'कारकभ्रंश' एवं संधिदोषको 'विसंधि' कहते हैं॥ १—१५॥

विसंधि दोष दो प्रकारका होता है—'संधिका अभाव' एवं 'विरुद्ध संधि'। विरुद्ध पदार्थान्तरकी प्रतीति होनेसे विरुद्ध संधिको कष्टकर माना गया है। बार-बार कथनको 'पुनरुक्तत्व' दोष कहते हैं। वह भी दो प्रकारका होता है—'अर्थावृत्ति' एवं 'पदावृत्ति'। 'अर्थावृत्ति' भी दो प्रकारकी होती है—काव्यमें प्रयुक्त अभीष्ट या विवक्षित शब्दके द्वारा एवं शब्दान्तरके द्वारा 'पदावृत्ति'में अर्थकी आवृत्ति नहीं होती, पदमात्रकी ही आवृत्ति होती है। जहाँ व्यवधानसे भली-भाँति सम्बन्ध हो, वहाँ 'व्यस्त-सम्बन्धता' दोष होता है। सम्बन्धान्तरकी प्रतीतिसे, सम्बन्धान्तरजन्य होनेसे तथा इन दोनोंके अभावमें भी अन्तर्व्यवधानसे व्यस्त-सम्बन्धताके तीन भेद हो जाते हैं। बीचमें पद अथवा वाक्यसे व्यवधान होनेके कारण उक्त भेदोंमेंसे प्रत्येकके दो-दो भेद और होते हैं। पद और वाक्यमें अर्थ और अर्थ्यमानके भेदसे वाच्यार्थके दो भेद होते हैं। पदगत वाच्य 'व्युत्पादित' और 'व्युत्पाद्य'के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। यदि हेतु अभीष्टसिद्धिमें व्याघातकारी हो तो यह उसका दोष माना गया है। यह 'हेतुदोष' ग्यारह प्रकारका होता है—असमर्थत्व, असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनेकान्तिकता, सत्प्रतिपक्षत्व, कालातीतत्व, संकर, पक्षमें अभाव, सपक्षमें अभाव, विपक्षमें अस्तित्व और ग्यारहवाँ निरर्थत्त्व। वह इष्टव्याघातकारित्व दोष काव्य और नाटकोंमें तथा सहृदय सभासदोंमें (श्रोताओं, दर्शकों और पाठकोंमें) मार्मिक पीड़ा उत्पन्न करनेवाला है। निरर्थत्वदोष दुष्कर चित्रबन्धादि काव्यमें दूषित नहीं माना जाता। पूर्वोक्त गूढार्थत्वदोष दुष्कर चित्रबन्धमें विद्वानोंके लिये दुःखप्रद नहीं प्रतीत होता। 'ग्राम्यत्व' भी यदि लोक और शास्त्र दोनोंमें प्रसिद्ध हो तो उद्वेगकारक नहीं जान पड़ता। क्रियाभ्रंशमें यदि क्रियाका अध्याहार करके उसका सम्बन्ध जोड़ा जा सके तो वह दोष नहीं रह जाता। इसी तरह भ्रष्टकारकता दोष नहीं रह जाता, जब कि आक्षेपबलसे कारकका अध्याहार सम्भव हो जाय। जहाँ 'प्रगृह्य' संज्ञा होनेके कारण प्रकृतिभाव प्राप्त हो, वहाँ विसंधित्व दोष नहीं माना गया है। जहाँ संधि कर देनेपर उच्चारणमें कठिनाई आ जाय, वैसे दुर्वाच्य स्थलोंमें विसंधित्व दोषकारक नहीं है॥ १६—२७॥

'अनुप्रास' अलंकारकी योजनामें पदोंकी आवृत्ति तथा व्यस्त-सम्बन्धता शुभ है। अर्थात् दोष न होकर गुण है। अर्थसंग्रहमें अर्थावृत्ति दोषकारक नहीं होती। वह व्युत्क्रम (क्रमोल्लङ्घन) आदि दोषोंसे भी लिप्त नहीं होती। उपमान और उपमेयमें विभक्ति, संज्ञा, लिङ्ग और वचनका भेद होनेपर भी वह तबतक दोषकारक नहीं माना जाता, जबतक कि बुद्धिमान् पुरुषोंको उससे उद्वेगका अनुभव नहीं होता। (उद्वेगजनकता ही दूषकताका बीज है।) वह न हो तो माने गये दोष भी दोषकारक नहीं समझे जाते। अनेककी एकसे और बहुतोंकी बहुतोंसे दी गयी उपमा शुभ मानी गयी है। (अर्थात् यदि सहृदयोंको उद्वेग न हो तो लिङ्ग-वचनादिके भेद होनेपर भी दोष नहीं मानना चाहिये।) कविजनोंका परम्परानुमोदित सदाचार 'समय' कहा जाता है। जिसके द्वारा समस्त सिद्धान्तवादी निर्बाध संचरण करते हैं तथा जिसके ऊपर कुछ ही सिद्धान्तवादी चल पाते हैं—इस पक्षद्वयके कारण सामान्य

७३२

* अग्निपुराण *

समय दो भेदोंमें विभक्त हो जाता है। यह मतभेद किसीको तो सिद्धान्तका आश्रय लेनेसे और किसीको भ्रान्तिसे होता है। किसी मुनिके सिद्धान्तका आधार तर्क होता है और किसीके मतका आलम्बन क्षणिक विज्ञानवाद। किसीका यह मत है कि पञ्चभूतोंके संघातसे शरीरमें चेतनता आ जाती है, कोई स्वतःप्रकाश ज्ञानको ही चैतन्यरूप मानते हैं। कोई प्रज्ञात स्थूलतावादी है और कोई शब्दानेकान्तवादी। शैव, वैष्णव, शाक्त तथा सौर सिद्धान्तोंको माननेवालोंका विचार है कि इस जगत्का कारण 'ब्रह्म' है। परंतु सांख्यवादी प्रधानतत्त्व (प्रकृति)-को ही दृश्य जगत्का कारण मानते हैं। इसी वाणीलोकमें विचरते हुए विचारक जो एक-दूसरेके प्रति विपर्यस्त दृष्टि रखते हुए परस्पर युक्तियोंद्वारा एक-दूसरेको बाँधते हैं, उनका वह भिन्न-भिन्न मत या मार्ग ही 'विशिष्ट समय' कहा गया है। यह विशिष्ट समय 'असत्के परिग्रह' तथा 'सत्के परित्याग'के कारण दो भेदोंमें विभक्त होता है। जो 'प्रत्यक्ष' आदि प्रमाणोंसे बाधित हो, उस मतको 'असत्' मानते हैं। कवियोंको वह मत ग्रहण करना चाहिये, जहाँ ज्ञानका प्रकाश हो। जो अर्थक्रियाकारी हो, वही 'परमार्थ सत्' है। अज्ञान और ज्ञानसे परे जो एकमात्र ब्रह्म है, वही परमार्थ सत् जाननेयोग्य है। वही सृष्टि, पालन और संहारका हेतुभूत विष्णु है, वही शब्द और अलंकाररूप है। वही अपरा और परा विद्या है। उसीको जानकर मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त होता है ॥ २८—४०॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्यदोषविवेकका कथन' नामक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४७॥


तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय

एकाक्षरकोष

अग्निदेव कहते हैं—अब मैं तुम्हें 'एकाक्षराभिधान' तथा मातृकाओंके नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ। सुनो—'अ' नाम है भगवान् विष्णुका। 'अ' निषेध अर्थमें भी आता है। 'आ' ब्रह्माजीका बोध कराता है। वाक्य-प्रयोगमें भी उसका उपयोग होता है। 'सीमा' अर्थमें 'आ' अव्ययपद है। क्रोध और पीड़ा अर्थमें भी उसका प्रयोग किया जाता है। 'इ' काम-अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'ई' रति और लक्ष्मीके अर्थमें आता है। 'उ' शिवका वाचक है। 'ऊ' रक्षक आदि अर्थोंमें प्रयुक्त होता है। 'ऋ' शब्दका बोधक है। 'ॠ' अदितिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'ऌ', 'ॡ'—ये दोनों अक्षर दिति एवं कुमार कार्तिकेयके बोधक हैं। 'ए' का अर्थ है—देवी। 'ऐ' योगिनीका वाचक है। 'ओ' ब्रह्माजीका और 'औ' महादेवजीका बोध करानेवाला है। 'अं' का प्रयोग काम अर्थमें होता है। 'अः' प्रशस्त (श्रेष्ठ)-का वाचक है। 'क' ब्रह्मा आदिके अर्थमें आता है। 'कु' कुत्सित (निन्दित) अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'खं'—यह पद शून्य, इन्द्रिय और मुखका वाचक है। 'ग' अक्षर यदि पुल्लिंगमें हो तो गन्धर्व, गणेश तथा गायकका वाचक होता है। नपुंसकलिङ्ग 'ग' गीत अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'घ' घण्टा तथा करधनीके अग्रभागके अर्थमें आता है। 'ताडन' अर्थमें भी 'घ' आता है। 'ङ' अक्षर विषय, स्पृहा तथा भैरवका वाचक है। 'च' दुर्जन तथा निर्मल-अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'छ'का अर्थ छेदन है। 'जि' विजेयके अर्थमें

  • अध्याय ३४८ * । ७३३

आता है। 'ज' पद गीतका वाचक है। 'झ' का अर्थ प्रशस्त, 'ञ' का बल तथा 'ट' का गायन है। 'ठ' का अर्थ चन्द्रमण्डल, शून्य, शिव तथा उद्बन्धन है। 'ड' अक्षर रुद्र, ध्वनि एवं त्रासके अर्थमें आता है। ढक्का और उसकी आवाजके अर्थमें 'ढ' का प्रयोग होता है। 'ण' निष्कर्ष एवं निश्चयके अर्थमें आता है। 'त' का अर्थ है—तस्कर (चोर) और सूअरकी पूँछ। 'थ' भक्षणके और 'द' छेदन, धारण तथा शोभनके अर्थमें आता है। 'ध' धाता (धारण करनेवाले या ब्रह्माजी) तथा धूस्तूर (धतूरे)-के अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'न' का अर्थ समूह और सुगत (बुद्ध) है। 'प' उपवनका और 'पूः' झंझावातका बोधक है। 'फु' फूँकने तथा निष्फल होनेके अर्थमें आता है। 'बि' पक्षी तथा 'भ' ताराओंका बोधक है। 'मा' का अर्थ है—लक्ष्मी, मान और माता। 'य' योग, याता (यात्री अथवा दयादिन) तथा 'ईरिण' नामक वृक्षके अर्थमें आता है॥ १-१०॥

'र' का अर्थ है—अग्नि, बल और इन्द्र। 'ल' का विधाता, 'व' का विश्लेषण (वियोग या बिलगाव) और वरुण तथा 'श' का अर्थ शयन एवं सुख है। 'ष' का अर्थ श्रेष्ठ, 'स' का परोक्ष, 'सा' का लक्ष्मी, 'स' का बाल, 'ह' का धारण तथा रुद्र और 'क्ष' का क्षेत्र, अक्षर, नृसिंह, हरि, क्षेत्र तथा पालक है। एकाक्षरमन्त्र देवतारूप होता है। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। 'क्षौं हयशिरसे नमः' यह सब विद्याओंको देनेवाला मन्त्र है। अकार आदि नौ अक्षर भी मन्त्र हैं;' उन्हें उत्तम 'मातृका-मन्त्र' कहते हैं। इन मन्त्रोंको एक कमलके दलमें स्थापित करके इनकी पूजा करे। इनमें नौ दुर्गाओंकी भी पूजा की जाती है। भगवती, कात्यायनी, कौशिकी, चण्डिका, प्रचण्डा, सुरनायिका, उग्रा, पार्वती तथा दुर्गाका पूजन करना चाहिये। 'ॐ चण्डिकायै विद्महे भगवत्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्'—यह दुर्गा-मन्त्र है। षडङ्ग आदिके क्रमसे पूजन करना उचित है। अजिता, अपराजिता, जया, विजया, कात्यायनी, भद्रकाली, मङ्गला, सिद्धि, रेवती, सिद्ध आदि वटुक तथा एकपाद, भीमरूप, हेतुक, कापालिकका पूजन करे। मध्यभागमें नौ दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये। मन्त्रार्थकी सिद्धिके लिये 'ह्रीं दुर्गे रक्षिणि स्वाहा'—इस मन्त्रका जप करे। गौरीकी पूजा करे; धर्म आदिका, स्कन्द आदिका तथा शक्तियोंका यजन करे। प्रज्ञा, ज्ञानक्रिया, वाचा, वागीशी, ज्वालिनी, वामा, ज्येष्ठा, रौद्रा, गौरी, ह्री तथा पुरस्सरा देवीका 'ह्रींः सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा'—इस मन्त्रसे महागौरीका तथा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, सुभगा, ललिता, कामिनी, काममाला और इन्द्रादि शक्तियोंका पूजन भी एकाक्षर मन्त्रोंसे होता है। गणेश-पूजनके लिये 'ॐ गं स्वाहा' 'यह मूलमन्त्र है। अथवा—'गं गणपतये नमः।' से भी उनकी पूजा होती है। रक्त, शुक्ल, दन्त, नेत्र, परशु और मोदक—यह 'षडङ्ग' कहा गया है। 'गन्धोल्काय नमः।' से क्रमशः गन्ध आदि निवेदन करे। गज, महागणपति तथा महोल्क भी पूजनके योग्य हैं। 'कूष्माण्डाय, एकदन्ताय, त्रिपुरान्तकाय, श्यामदन्तविकटहरहासाय, लम्बनासाननाय, पद्मदंष्ट्राय, मेघोल्काय, धूमोल्काय, वक्रतुण्डाय, विघ्नेश्वराय, विकटोत्कटाय, गजेन्द्रगमनाय, भुजगेन्द्रहाराय, शशाङ्कधराय, गणाधिपतये स्वाहा।'—इन मन्त्रोंके आदिमें 'क' आदि एकाक्षर बीज-मन्त्र लगाये और अन्तमें 'नमः' एवं 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करे। फिर इन्हीं मन्त्रोंद्वारा तिलोंसे होम आदि करके मन्त्रार्थभूत देवताका पूजन करे। अथवा द्विरेफ, द्विमुख एवं

७३४* अग्निपुराण *

द्व्यक्ष आदि पृथक्-पृथक् मन्त्र हो सकते हैं। अब कुमार कार्तिकेयजीने कात्यायनको जिसका उपदेश किया था, वह व्याकरण बतलाऊँगा ॥ १९-२८ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'एकाक्षराभिधान' नामक तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४८ ॥


तीन सौ उनचासवाँ अध्याय

व्याकरण-सार

स्कन्द बोले—कात्यायन! अब मैं बोधके लिये तथा बालकोंको व्याकरणका ज्ञान करानेके लिये सिद्ध शब्दरूप सारभूत व्याकरणका वर्णन करता हूँ; सुनो। पहले प्रत्याहार आदि संज्ञाएँ बतलायी जाती हैं, जिनका व्याकरणशास्त्रीय प्रक्रियामें व्यवहार होता है।

अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच्, हयवरट्, लण्, ञमङणनम्, झभञ्, घढधष्, जबगडदश्, खफछठथचटतव्, कपय्, शषसर्, हल्।

ये 'माहेश्वर सूत्र' एवं 'अक्षर-समाम्नाय' कहलाते हैं। इनसे 'अण्' आदि 'प्रत्याहार' बनते हैं। उपदेशावस्था में अन्तिम 'हल्'<sup></sup> तथा अनुनासिक 'अच्'<sup></sup> की 'इत्'<sup></sup> संज्ञा होती है। अन्तिम इत्संज्ञक वर्णके साथ गृहीत होनेवाला आदि वर्ण उन दोनोंके मध्यवर्ती अक्षरोंका तथा अपना भी ग्रहण करानेवाला होता है। इसीको 'प्रत्याहार'<sup></sup> कहते हैं, जैसा कि निम्नाङ्कित उदाहरणसे स्पष्ट होता है—अण्, एङ्, अट्, यय्, (अथवा यञ्), छव्, झष्, भष्, अक्, इक्, उक्। अण्, इण्, यण्—ये तीनों पर णकार अर्थात् लण् सूत्रके णकारसे बनते हैं। अम्, यम्, ङम्, अच्, इच्, एच्, ऐच्, अय्, मय्, झय्, खय्, जश्, झर्, खर्, चर्, यर्, शर्, अश्, हश्, वश्, झश्, अल्, हल्, वल्, रल्, झल्, शल्—ये सभी प्रत्याहार हैं ॥ १-७ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'व्याकरण-सार-वर्णन' नामक तीन सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४९ ॥


१. 'उपदेश' कहते हैं—आदि उच्चारणको। यहाँ जो चौदह 'माहेश्वरसूत्र' हैं, वे ही 'उपदेश' पदसे गृहीत होते हैं।
२. 'हल्' का अर्थ है—व्यञ्जन वर्ण।
३. 'अच्' स्वर अक्षरोंका नाम है।
४. जिसकी 'इत्' संज्ञा होती है, उसका लोप हो जाता है। 'अइउण्' आदिमें जो अन्तिम णकार आदि हैं, उनकी भी 'इत्संज्ञा' होती है, अतः वे भी लुप्त ही समझने चाहिये। उनका ग्रहण केवल 'अण्' आदि प्रत्याहार-सिद्धिके लिये है। वे उन प्रत्याहारोंके अक्षरोंमें गिने नहीं जाते।
५. जिसमें अक्षरोंका प्रत्याहरण—संक्षेप किया गया हो, वह 'प्रत्याहार' कहलाता है। जैसे 'अक्' प्रत्याहारमें 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ'—इतने वर्णोंका संक्षेप किया गया है। अर्थात् 'अक्' इस छोटेसे पदके उच्चारणसे उक्त पाँच अक्षरोंका ग्रहण होता है। 'प्रत्याहार' बनानेकी विधि इस प्रकार है—'अइउण्' आदि सूत्र उपदेश हैं; उनके अन्तिम हल् 'ण्' आदि हैं, उनकी 'इत्संज्ञा' होती है, यह बात बतायी जा चुकी है। अब अन्तिम इत्संज्ञक वर्ण 'ण्'के साथ गृहीत होनेवाला आदिवर्ण 'अ' हो तो दोनों मिलकर 'अण्' हुआ। यह 'अण्' बीचके 'इ उ'का भी ग्रहण कराता है और अपना अर्थात् अकारका भी बोधक होता है। इसी प्रकार अन्तिम इत्संज्ञक 'ऐऔच्'का जो 'च्' है, उसके साथ आदि वर्ण 'अ'को ग्रहण करनेपर 'अच्' बनता है, जो 'अ इ उ ऋ ऌ ए ओ ऐ औ'—इन नौ स्वरोंका बोध कराता है। ऐसे ही 'हल्' सूत्रका अन्तिम अक्षर 'ल्' इत्संज्ञक है। इसके साथ आदिमें 'ह य व र ट्' का 'ह' गृहीत हुआ तो 'हल्' प्रत्याहार बना; यह 'हल्' 'ह य व र ल ञ म ङ ण न झ भ घ ढ ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ थ च ट त क प श ष स ह'—इन सभी व्यञ्जनवर्णोंका बोधक हुआ। इसी तरह अन्य प्रत्याहारोंको भी समझना चाहिये।

* अध्याय ३५० * ७३५

तीन सौ पचासवाँ अध्याय

संधिके १ सिद्ध रूप

कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन! अब सिद्ध संधिका वर्णन करूँगा। पहले 'स्वरसंधि'२ बतलायी जाती है—दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितॄषभः, लृकारः ३, तवेदम्, सकलोदकम्, अर्धर्चोऽयम्, तवल्कारः४, सैषा, सैन्द्री, तवौदनम्, खट्वौघोऽभवत्,५ इत्येवम्, व्युसुधीः, वस्वलंकृतम्, पित्रर्थोपवनम्, दात्री,६ नायकः, लावकः, नयः,७ त इह, तयिह


१. अक्षरोंके मेलनको 'संधि' कहते हैं, संधि के साधारणतया पाँच भेद माने जाते हैं—(१) स्वरसंधि, (२) व्यञ्जनसंधि, (३) अनुस्वारसंधि, (४) विसर्गसंधि और (५) स्वादिसंधि। अनुस्वारसंधिमें व्यञ्जनका 'अनुस्वार' और अनुस्वारका 'व्यञ्जन' बनता है; अतः उसका व्यञ्जनसंधिमें ही अन्तर्भाव हो सकता है। ऐसे ही स्वादिसंधि भी उसीके अन्तर्गत है; क्योंकि 'शिवोऽर्च्यः' इत्यादिमें विभक्ति-सकार आदि हलरूप ही हैं। इस प्रकार मुख्यतः तीन ही संधियाँ हैं—स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग। कौमार-व्याकरणमें इन्हीं तीनोंका नामतः उल्लेख हुआ है। पाणिनि-व्याकरण तथा कौमार-व्याकरण—दोनों ही माहेश्वर सूत्रोंको आधार मानकर प्रवृत्त हुए हैं, अतः दोनोंकी प्रक्रियामें बहुत कुछ साम्य है।

२. जहाँ स्वर अक्षर विकृत हो वर्णान्तरसे मिले, वह 'स्वर-संधि' है; इसके मुख्यतः पाँच भेद हैं—यणादेश, अयाद्यादेश, य्-व्-लोपादेश, अवङ्ङादेश तथा एकादेश। 'यणादेश'के भी चार भेद हैं—य् व् र् ल्। ये क्रमशः इ उ ऋ लृ के स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। अयाद्यादेशके छः भेद हैं—अय्, अव्, आय्, आव्, यान्तादेश और वान्तादेश। पहलेवाले चार आदेश क्रमशः ए, ओ, ऐ, औके स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। 'यान्तादेश' ऐ, औके स्थानमें 'यादि' प्रत्यय परे रहनेपर होते हैं और 'वान्तादेश' ओ, औके स्थानमें यकारादि प्रत्यय परे होनेपर होते हैं। 'य्-व् लोपादेश', में अवर्णपूर्वक पदान्त 'य् व्'का लोप होता है। 'अश्' प्रत्याहार परे होनेपर एङन्त 'गो' शब्दको 'अवङ्' आदेश होता है; 'अच्' परे रहनेपर तथा 'इन्द्र' शब्द परे रहनेपर भी यह आदेश होता है। जहाँ दो अक्षरोंके स्थानमें एक आदेश हो, वह 'एकादेश' है। एकादेश-संधिके भी पाँच भेद हैं—गुण, वृद्धि, पूर्वरूप, पररूप और दीर्घ। 'गुण-एकादेश' चार हैं—ए, ओ, अर्, अल्। ये क्रमशः अ+इ, अ+उ, अ+ऋ तथा अ+लृके स्थानमें होते हैं। वृद्धि-संधिके भेद तीन ही हैं—ऐ, औ, आर्। इनमें, पहला अ, आ, ए, ऐके स्थानमें; दूसरा अ, आ, ओ, औके स्थानमें, तथा तीसरा अ, आ, ऋ, ॠके स्थानमें होता है। पदान्त ए, ओ से परे 'अ' हो तो 'पूर्वरूप' होता है; यह 'अयादेश'का अपवाद है। अ से परे ए, ओ और 'अ'के स्थानमें 'पररूप' होता है, यह वृद्धि तथा दीर्घका अपवाद है; अतः इसकी प्रवृत्तिके स्थल परिगणित होते हैं। अ-आ+अ-आ, इ-ई+इ-ई, उ-ऊ+उ-ऊ, ऋ-ॠ + ऋ-ॠ तथा लृ-लॄ + लृ-लॄ के स्थानमें 'दीर्घ एकादेश' होता है। जैसे अ+अ=आ इत्यादि।

३. 'दण्डाग्रम्' से लेकर 'लृकारः' तक ऊपर बताये अनुसार 'दीर्घ एकादेश' हुआ है। यहाँ 'अकः सवर्णे दीर्घः।' (६।१।१०१)—इस पाणिनि-सूत्रकी प्रवृत्ति होती है। इस स्थलमें सबका पदच्छेदमात्र दिया जाता है। दण्ड + अग्रम्=दण्डाग्रम्। इसमें 'दण्ड'के 'ड' में जो 'अ' है, वह और 'अग्रम्' का 'अ' मिलकर 'आ' हुआ; इसलिये 'दण्डाग्रम्' बना। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये। सा+आगता=साऽऽगता। दधि+इदम्=दधीदम्, नदी+ईहते=नदीहते। मधु+उदकम्=मधूदकम्। पितृ+ऋषभः=पितॄषभः। लृ+लृकार=लॄकारः।

४. अब गुण-एकादेश ('आद्गुणः।'-पा०सू० ६।१।८७) के उदाहरण दिये जाते हैं—तव+इदम्=तवेदम्। यहाँ 'तव'के अन्तिम 'अ' और 'इदम्'के 'इ'के स्थानमें 'ए' हो गया है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये। सकल + उदकम् = सकलोदकम्। अर्ध+ऋचोऽयम् = अर्धर्चोऽयम्। तव+लृकारः=तवल्कारः।

५. वृद्धिसंधि ('वृद्धिरेचि।'-पा० सू० ६।१।८८), के उदाहरण-सा+एषा=सैषा। यहाँ आ+एके स्थानमें 'ऐ' हुआ है। एवमन्यत्र। सा+ऐन्द्री=सैन्द्री। तव+ओदनम्=तवौदनम्। खट्वा+ओघः=खट्वौघः।

६. अब 'यणादेश' ('इको यणचि।'-पा० सू० ६।१।७७) के उदाहरण दिये जाते हैं। इति+एवम्=इत्येवम्। यहाँ 'इति'के अन्तिम 'इकार'के स्थानमें 'य्' हुआ है। वि+असुधीः=व्युसुधीः। वसु + अलंकृतम्=वस्वलंकृतम्। यहाँ 'उ'के स्थानमें 'व्' हुआ है। पितृ + अर्थोपवनम्=पित्रर्थोपवनम्। दातृ+ई = दात्री। यहाँ 'ऋ'के स्थानमें 'र्' हुआ है। अन्यत्र चौथे 'यण्'के उदाहरणमें 'लाकृतिः' पद आता है, उसका पदच्छेद है—ल+आकृतिः = लाकृतिः।

७. यह 'अयादेश-संधि' ('एचोऽयवायावः।'-पा० सू० ६।१।७८) है। नै+अकः=नायकः। यहाँ 'नै'के 'ऐ'के स्थानमें 'आय्' हुआ है। लौ+अकः = लावकः ('औ'की जगह 'आव्')। ने+अः=नयः ('ए'के स्थानमें 'अय्'); अन्यत्र 'लवः', 'विष्णवे' आदि उदाहरण भी मिलते हैं। लो+अः=ल् अव् अः=लवः। विष्णो+ए=विष्णवे।

७३६ * अग्निपुराण *

इत्यादि$^१$। तेऽत्र, योऽत्र जलेऽकजम् $^२$। जहाँ संधि न होकर प्रकृत रूप ही रह जाता है, उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। उसके उदाहरण—नो अहो, ऐहि, अ अवेहि, इ इन्द्रकम्, उ उत्तिष्ठ, कवी एतौ, वायु एतौ, वने इमे, अमी एते, यज्ञभूते एहि देव इमं नय $^३$ ॥ १-५ ॥

अब 'व्यञ्जनसंधि'$^४$का वर्णन करूँगा—वाग्यतः। अजेकमात्रुकः। षडेते। तदिमे। अबादि। वाङ्नीतिः। षण्मुखः। वाङ्मनसम्। इत्यादि। वाग्भावादिः। वाक्श्लक्ष्णम्। तच्छरीरकम्। तल्लुनाति। तच्चरेत्। कुङ्ङनस्ते। सुगणिणह। भवांश्चरन्। भवांश्छात्रः। भवांष्टीका। भवांष्ठकः। भवांस्तीर्थम्। भवांस्थेत्याह।


१. यह 'लोपादेश-संधि' ('लोपः शाकल्यस्य।'-पा० सू० ८।३।१९) है। ते+इह-इस अवस्थामें 'ए'की जगह हुआ- त्+अय+इह बना। फिर 'लोपादेश'के नियमानुसार 'य्' का लोप हो गया-'त इह' बना। लोप न होनेपर 'तयिह' बना।
२. यहाँ 'पूर्वरूप-संधि' ('एङः पदान्तादति।'-पा० सू० ६।१।१०९) है। ते+अत्र, यो+अत्र, जले+अकजम्-इन तीनों ही पदोंमें 'अ' अपने पहलेके अक्षरमें मिल गया है।
३. अब 'प्रकृतिभाव'के उदाहरण देते हैं। 'नो अहो'-इस अवस्थामें ('एङः पदान्तादति'के अनुसार) 'पूर्वरूप एकादेश' प्राप्त था; किन्तु यहाँ प्रकृतिभावका विधान है; यह पद ज्यों-का-त्यों रहेगा; इसमें संधिजनित विकृति नहीं होगी। प्रकृतिभावके लिये पाणिनिने कई नियम बनाये हैं। ('नो अहो'-जैसे स्थलोंके नियम इस प्रकार हैं—'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्।' (पा० सू० ६।१।१२५) 'प्लुत' तथा 'प्रगृह्य' संज्ञावाले पदोंका 'प्रकृतिभाव' होता है, उनमें संधि नहीं होती। 'दूराद्धूते च।' (पा० सू० ८।२।८४) दूरसे किसीको बुलाते समय जिस वाक्यका प्रयोग होता है, उसके अन्तिम स्वरकी 'प्लुत' संज्ञा होती है; क्योंकि उसका उच्चारण दीर्घतर स्वरमें होता है। 'प्रगृह्य' संज्ञाके अनेक भेद हैं-(१) ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन। (२) 'अदस्' शब्द-सम्बन्धी मकारके बाद होनेवाले ई और ऊ। (३) एक स्वरवाला आङ्‌वर्जित निपात। (४) ओकारान्त निपात। (द्रव्यार्थभिन्न 'च' आदि अव्यय तथा 'प्र' आदि उपसर्ग भी 'निपात' कहलाते हैं।) (५) सम्बोधन-निमित्तक ओकार 'वैकल्पिक प्रगृह्य' होता है; किंतु उसके बाद अवैदिक 'इति' शब्दका रहना आवश्यक है। (६) 'मयू' प्रत्याहारसे परे जो 'उकार' हो, वह भी 'वैकल्पिक प्रगृह्य' है; किंतु उसके बाद कोई भी स्वर रहना चाहिये। (इनके सिवा और भी कई नियम हैं, जो विस्तारभयसे नहीं दिये जाते।) 'अहो+एहि' में 'अयाद्यादेश'के नियमानुसार 'ओ' की जगह 'अव्' प्राप्त था, किंतु 'अहो' पद 'ओकारान्त निपात' होनेसे 'प्रगृह्य' है; अतएव वह प्रकृतरूपमें रह गया। 'अ+अवेहि', इ+इन्द्रकम्, उ+उत्तिष्ठ-इनमें दीर्घ एकादेश प्राप्त था; किंतु नंबर ३ नियमके अनुसार 'प्रगृह्य' होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव होता है। 'कवी+एतौ', वायु+एतौ इनमें 'यणादेश' प्राप्त था और 'वने इमे' में 'अय्' आदेशकी प्राप्ति थी; किंतु नं० १ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे यहाँ भी प्रकृतरूप ही रह जाता है। 'कवी', 'वायु' और 'वने'-ये तीनों पद द्विवचनान्त हैं। 'अमी एते' में 'यण्' प्राप्त था; नं० २ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे प्रकृतिभाव हो गया। 'यज्ञभूते! एहि' इसमें अयादेश और 'देव! इमं नय' में गुण एकादेश प्राप्त था; किंतु प्लुत होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव हुआ। दूरसे सम्बोधनका वाक्य है 'यज्ञभूते! एहि' 'देव! इमं नय।'
४. व्यञ्जनसंधिके बहुत-से प्रकार या भेद पाणिनिसूत्रोंमें वर्णित हैं। परंतु अग्निपुराणमें उल्लिखित इस कौमार-व्याकरणमें व्यञ्जनसंधिके सिद्ध रूपोंका जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार व्यञ्जनसंधिके ग्यारह प्रकार निर्दिष्ट हुए हैं (१)-जश्त्वविधान [जो 'झलां जशोऽन्ते'-इस पाणिनिसूत्र (८।२।३९)-में निर्दिष्ट है]। (२)-अनुनासिकविधान [जो 'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा'-इस पाणिनिसूत्र (८।४।४५) तथा 'प्रत्यये भाषायां च नित्यम्।' इस कात्यायन-वार्तिकद्वारा प्रतिपादित है]। (३)-छत्वविधान [जो 'शश्छोऽटि'-(८।४।६३) 'छत्वममीति वाच्यम्।'-इन सूत्र-वार्तिकोंद्वारा निर्दिष्ट है]। (४)-श्चुत्वविधान [जो 'स्तोः श्चुना श्चुः'-इस पा० सू० (८।४।४०) में कहा गया है]। (५)-ष्टुत्वविधान [जो 'ष्टुना ष्टुः'-इस पा० सू० (८।४।४१) में वर्णित है]। (६)-लकारात्मक परसवर्णविधान [जो 'तोर्लि'-इस पा० सू० (८।४।६०) के नियमसे आबद्ध है]। (७)-ङमुडागमविधान [जो 'ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्'-इस पा० सू० (८।३।३२) द्वारा कथित है]। (८)-नकारसत्त्वविधान [जो 'नश्छव्यप्रशान्।'-इस पा० सू० (८।३।७) के नियमानुसार सम्पादित होता है]। (९)-परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।'-पा० सू० (८।४।५८) तथा 'वा पदान्तस्य।' (८।४।५९)-इन पा० सूत्रोंद्वारा कथित है]। (१०)-तुगागमविधान [जो 'शि तुक्।', (८।३।३१) 'छे च।', (६।१।७३) 'दीर्घात् (६।१।७५) तथा 'पदान्ताद्वा' (६।१।७६)-इन सूत्रोंके नियमोंसे सम्बद्ध है]। ११-परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।' (८।४।५८)] 'वा पदान्तस्य' (८।४।५९)-इन पा० सूत्रोंद्वारा प्रतिपादित है।

* अध्याय ३५० * ७३७

भवाँल्लेखा। भवाञ्जयः। भवाञ्छेते, भवाञ्शेते, भवाञ्शेते। भवाण्ड्डीनः। सम्भर्त्ता। त्वङ्करिष्यसि*

इत्यादि॥ ६-९॥ इसके बादकी पदावलियोंमें विसर्ग-


* वाक् यतः=वाग्यतः। ('झलां जशोऽन्ते।' पा० सू० ८।२।३९) 'पदान्तमें 'झल्' के स्थानमें 'जश्' होता है'—इस नियमके अनुसार 'वाक्'के 'क्' का 'ग्' हो गया है। यद्यपि जश्में ज् ब् ग् ड् द्—ये पाँच अक्षर हैं, तथापि 'क्'के स्थानमें 'ग्' होनेका कारण है स्थानकी समानता। 'क्' और 'ग्'का स्थान एक है। दोनों ही कण्ठस्थानसे निकलते हैं। आगेके चार उदाहरणोंमें भी यही नियम है—अच्+एकमातृकः=अजेकमातृकः। यहाँ 'च्' के स्थानमें 'ज्' हो गया है। स्वरहीन अक्षर अपने बादवाले अक्षरसे मिल जाते हैं, अतः 'ज्' 'ए' में मिलकर 'जे' बन गया। 'षट्+ एते'—इसमें 'ट्' के स्थानमें 'ड्' हुआ है। इसी तरह 'तत् + इमे' में 'त्'के स्थानमें 'द्' तथा 'अप्+आदि' में 'प्' के स्थानमें 'ब्' हुआ है। ये पूर्वनिर्दिष्ट जश्त्वविधानके उदाहरण हैं। अब अनुनासिकविधानके उदाहरण दिये जाते हैं—वाक्+नीतिः=वाङ्नीतिः। पदान्त 'यर्' प्रत्याहारके अक्षरोंका विकल्पसे अनुनासिक होता है, कोई अनुनासिक अक्षर परे हो तब। यदि प्रत्यय अनुनासिक परे हो तो 'यर्'के स्थानमें नित्य अनुनासिक होता है। इस नियमके अनुसार 'क्' के स्थानमें उसी वर्गका अनुनासिक अक्षर 'ङ्' हो गया। अनुनासिक न होनेकी स्थितिमें पूर्वनियमानुसार 'जश्त्व' होता है। उस दशामें 'वाग्नीतिः' रूप होता है। षट्+मुखः=षण्मुखः (षड्मुखः)। उक्त नियमसे 'ट्' की जगह उसीके स्थान (मूर्धा)-का अनुनासिक 'ण्' हुआ। जश्त्व होनेपर 'ड्' होता है। निम्नाङ्कित पदोंका पदच्छेद इस प्रकार है—वाक्+मनसम्=वाङ्मनसम्। वाक्+मात्रम्=वाङ्मात्रम्। अब छत्वविधानके उदाहरण देते हैं—वाक्+श्लक्ष्णम्= वाक्छ्लक्ष्णम्, वाक्श्लक्ष्णम्। यहाँ 'श्'के स्थानमें विकल्पेन 'छ्' हुआ है। नियम इस प्रकार है—'झय्' से परे 'श्' का 'छ्' हो जाता है, 'अम्' प्रत्याहार परे रहनेपर। श्चुत्वविधान— सकार-तवर्गके स्थानमें 'शकार' 'चवर्ग' होते हैं, शकार-चवर्गका योग होनेपर। 'तत्+शरीरम्'='तच्छरीरम्'। यहाँ 'शरीरम्'के शकारका योग होनेसे 'तत्' के 'त्' की जगह 'च्' हो गया। इसके बाद छत्व-विधानके नियमानुसार 'शकार'के स्थानमें 'छकार' हो गया। 'तल्लुनाति' यह लकारात्मक परसवर्णका उदाहरण है। नियम यह है कि 'तवर्गसे परे लकार हो तो उस तवर्गका 'परसवर्ण' होता है।' इसके अनुसार 'तत्+लुनाति' इस अवस्थामें 'त्' के स्थानमें 'ल्' हो गया। तत्+चरेत्=तच्चरेत्। यहाँ श्चुत्वविधानके नियमानुसार पूर्ववत् 'त्' की जगह 'च्' हो गया है। कृङ्+आस्ते=कृङ्ङास्ते। यह ङ्मुडागम-विधानका उदाहरण है। नियम है कि ह्रस्व अक्षरसे परे यदि 'ङ् ण् न्'—ये व्यञ्जन हों और इनके बाद स्वर अक्षर हों तो उक्त 'ङ्' आदिकी जगह एक और 'ङ्' आदि बढ़ जाते हैं। अर्थात् वे ङ् ङ्, ण् ण् और न् न् हो जाते हैं। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें एक 'ङ्' की जगह दो 'ङ् ङ्' हो गये हैं। इसी तरह 'सुगण्+इह' की जगह 'सुगण्णह' बनता है। भवान्+चरन्='भवांश्चरन्'—यह नकाररुत्वविधानका उदाहरण है। नियम यह है—'प्रशान्' से भिन्न जो नकारान्त पद हैं, उनके 'न्' की जगह 'र्' हो जाता है, यदि बादमें 'छ् ठ् थ् च् ट् त्'—इनमेंसे कोई अक्षर विद्यमान हो, तब। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें 'न्' के स्थानमें 'र्' हुआ। 'र्' का विसर्ग, विसर्गके स्थानमें 'स्' हुआ। 'स्' का श्चुत्व-विधानके अनुसार 'श्' हो गया। उसके पूर्व अनुस्वारका आगम होता है। कहीं-कहीं 'चिरम्' पाठ मिलता है। उस दशामें 'भवांश्चिरम्' रूप सिद्ध होगा। यदि 'चिरम्' के साथ परवर्ती 'भवान्' शब्द ले लिया जाय तो निम्नाङ्कितरूप सिद्ध होगा। चिरम्+भवान्=चिरंभवान्, चिरम्भवान्—यहाँ मकारके स्थानमें अनुस्वार हुआ है। अनुस्वारका वैकल्पिक परसवर्ण होनेपर 'चिरम्भवान्' रूप बनता है। 'मोऽनुस्वारः।'—इस पा० सूत्र (८।३।२३) के अनुसार मकारानुस्वारविधानका नियम इस प्रकार है—पदान्तमें 'म्'का अनुस्वार होता है, 'हल्' परे रहनेपर। ('नश्चापदान्तस्य झलि।' पा० सू० ८।३।२४) के अनुसार 'झल्' परे रहनेपर अपदान्त 'न् म्' के स्थानमें भी अनुस्वार होता है। 'न्'के अनुस्वारका उदाहरण है—'यशांसि'। 'म्' के अनुस्वारका उदाहरण है 'आक्रंस्यते'। भवान्+छात्रः=भवांश्छात्रः। यहाँ पूर्ववत् नकाररुत्व-विधानके अनुसार नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार तथा अनुस्वारागम होकर श्चुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'श्' हो गया है। भवान्+टीका=भवाँष्टीका। यहाँ भी 'न्' की जगह रुत्व, विसर्ग और सकार होकर अनुस्वारागम हुआ और ष्टुत्व-विधानके अनुसार 'स्'के स्थानमें 'ष्' हो गया। यही बात 'भवाँष्ठकः'के साधनमें भी समझनी चाहिये—भवान्+ठकः। भवान्+तीर्थम्—भवाँस्तीर्थम्। यहाँ भी नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार और अनुस्वारागम समझना चाहिये। 'भवान्+था+इत्याह—इसमें भी पूर्ववत् सब कार्य होंगे और था+इत्याहमें गुण एकादेश होनेपर 'भवांस्थेत्याह'—ऐसा रूप सिद्ध होगा। 'भवान्+लेखाः=भवाँल्लेखाः।'—यहाँ लकारातमक परसवर्ण सानुनासिक हुआ है। 'भवान्+जयः' इसमें श्चुत्वविधानके अनुसार चवर्ग-योगके कारण तवर्गीय 'न्' की जगह चवर्गीय 'ज्' हो गया है। 'भवान्+शेते' इस पदच्छेदमें 'भवाञ्छेते, भवाञ्छेते, भवाञ्शेते, भवाञ् शेते।'—ये रूप बनते हैं। पहलेमें 'शि तुक्।' पा० सू० (८।३।३१) के अनुसार 'शकार' परे रहते नान्त पदको 'तुक्'का आगम होता है। इसे 'नान्ततुगागम' कहा जा सकता है। इसी तरह ह्रस्व, दीर्घ और पदान्तसे परे भी तुगागम होते हैं। यहाँ 'नान्ततुगागम'के अनुसार 'तुक्' हुआ। 'उक्' की इत्संज्ञा हुई, लोप हुआ। 'भवान् त् शेते' रहा। श्चुत्वविधानके अनुसार 'त्' के स्थानमें 'च्' और 'न्' के स्थानमें 'ज्' हुआ और 'श्' की जगह 'छ्' हुआ तो 'भवाञ्छेते' बना। 'झरो झरि सवर्णे।' (पा० सू० ८।४।६५) के अनुसार 'झर्'का लोप होनेपर 'च्' अदृश्य हो जाता है, अतः