अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 762, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३५० * ७३५
तीन सौ पचासवाँ अध्याय
संधिके १ सिद्ध रूप
कुमार कार्तिकेय कहते हैं—कात्यायन! अब सिद्ध संधिका वर्णन करूँगा। पहले 'स्वरसंधि'२ बतलायी जाती है—दण्डाग्रम्, साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितॄषभः, लृकारः ३, तवेदम्, सकलोदकम्, अर्धर्चोऽयम्, तवल्कारः४, सैषा, सैन्द्री, तवौदनम्, खट्वौघोऽभवत्,५ इत्येवम्, व्युसुधीः, वस्वलंकृतम्, पित्रर्थोपवनम्, दात्री,६ नायकः, लावकः, नयः,७ त इह, तयिह
१. अक्षरोंके मेलनको 'संधि' कहते हैं, संधि के साधारणतया पाँच भेद माने जाते हैं—(१) स्वरसंधि, (२) व्यञ्जनसंधि, (३) अनुस्वारसंधि, (४) विसर्गसंधि और (५) स्वादिसंधि। अनुस्वारसंधिमें व्यञ्जनका 'अनुस्वार' और अनुस्वारका 'व्यञ्जन' बनता है; अतः उसका व्यञ्जनसंधिमें ही अन्तर्भाव हो सकता है। ऐसे ही स्वादिसंधि भी उसीके अन्तर्गत है; क्योंकि 'शिवोऽर्च्यः' इत्यादिमें विभक्ति-सकार आदि हलरूप ही हैं। इस प्रकार मुख्यतः तीन ही संधियाँ हैं—स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग। कौमार-व्याकरणमें इन्हीं तीनोंका नामतः उल्लेख हुआ है। पाणिनि-व्याकरण तथा कौमार-व्याकरण—दोनों ही माहेश्वर सूत्रोंको आधार मानकर प्रवृत्त हुए हैं, अतः दोनोंकी प्रक्रियामें बहुत कुछ साम्य है।
२. जहाँ स्वर अक्षर विकृत हो वर्णान्तरसे मिले, वह 'स्वर-संधि' है; इसके मुख्यतः पाँच भेद हैं—यणादेश, अयाद्यादेश, य्-व्-लोपादेश, अवङ्ङादेश तथा एकादेश। 'यणादेश'के भी चार भेद हैं—य् व् र् ल्। ये क्रमशः इ उ ऋ लृ के स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। अयाद्यादेशके छः भेद हैं—अय्, अव्, आय्, आव्, यान्तादेश और वान्तादेश। पहलेवाले चार आदेश क्रमशः ए, ओ, ऐ, औके स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। 'यान्तादेश' ऐ, औके स्थानमें 'यादि' प्रत्यय परे रहनेपर होते हैं और 'वान्तादेश' ओ, औके स्थानमें यकारादि प्रत्यय परे होनेपर होते हैं। 'य्-व् लोपादेश', में अवर्णपूर्वक पदान्त 'य् व्'का लोप होता है। 'अश्' प्रत्याहार परे होनेपर एङन्त 'गो' शब्दको 'अवङ्' आदेश होता है; 'अच्' परे रहनेपर तथा 'इन्द्र' शब्द परे रहनेपर भी यह आदेश होता है। जहाँ दो अक्षरोंके स्थानमें एक आदेश हो, वह 'एकादेश' है। एकादेश-संधिके भी पाँच भेद हैं—गुण, वृद्धि, पूर्वरूप, पररूप और दीर्घ। 'गुण-एकादेश' चार हैं—ए, ओ, अर्, अल्। ये क्रमशः अ+इ, अ+उ, अ+ऋ तथा अ+लृके स्थानमें होते हैं। वृद्धि-संधिके भेद तीन ही हैं—ऐ, औ, आर्। इनमें, पहला अ, आ, ए, ऐके स्थानमें; दूसरा अ, आ, ओ, औके स्थानमें, तथा तीसरा अ, आ, ऋ, ॠके स्थानमें होता है। पदान्त ए, ओ से परे 'अ' हो तो 'पूर्वरूप' होता है; यह 'अयादेश'का अपवाद है। अ से परे ए, ओ और 'अ'के स्थानमें 'पररूप' होता है, यह वृद्धि तथा दीर्घका अपवाद है; अतः इसकी प्रवृत्तिके स्थल परिगणित होते हैं। अ-आ+अ-आ, इ-ई+इ-ई, उ-ऊ+उ-ऊ, ऋ-ॠ + ऋ-ॠ तथा लृ-लॄ + लृ-लॄ के स्थानमें 'दीर्घ एकादेश' होता है। जैसे अ+अ=आ इत्यादि।
३. 'दण्डाग्रम्' से लेकर 'लृकारः' तक ऊपर बताये अनुसार 'दीर्घ एकादेश' हुआ है। यहाँ 'अकः सवर्णे दीर्घः।' (६।१।१०१)—इस पाणिनि-सूत्रकी प्रवृत्ति होती है। इस स्थलमें सबका पदच्छेदमात्र दिया जाता है। दण्ड + अग्रम्=दण्डाग्रम्। इसमें 'दण्ड'के 'ड' में जो 'अ' है, वह और 'अग्रम्' का 'अ' मिलकर 'आ' हुआ; इसलिये 'दण्डाग्रम्' बना। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये। सा+आगता=साऽऽगता। दधि+इदम्=दधीदम्, नदी+ईहते=नदीहते। मधु+उदकम्=मधूदकम्। पितृ+ऋषभः=पितॄषभः। लृ+लृकार=लॄकारः।
४. अब गुण-एकादेश ('आद्गुणः।'-पा०सू० ६।१।८७) के उदाहरण दिये जाते हैं—तव+इदम्=तवेदम्। यहाँ 'तव'के अन्तिम 'अ' और 'इदम्'के 'इ'के स्थानमें 'ए' हो गया है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये। सकल + उदकम् = सकलोदकम्। अर्ध+ऋचोऽयम् = अर्धर्चोऽयम्। तव+लृकारः=तवल्कारः।
५. वृद्धिसंधि ('वृद्धिरेचि।'-पा० सू० ६।१।८८), के उदाहरण-सा+एषा=सैषा। यहाँ आ+एके स्थानमें 'ऐ' हुआ है। एवमन्यत्र। सा+ऐन्द्री=सैन्द्री। तव+ओदनम्=तवौदनम्। खट्वा+ओघः=खट्वौघः।
६. अब 'यणादेश' ('इको यणचि।'-पा० सू० ६।१।७७) के उदाहरण दिये जाते हैं। इति+एवम्=इत्येवम्। यहाँ 'इति'के अन्तिम 'इकार'के स्थानमें 'य्' हुआ है। वि+असुधीः=व्युसुधीः। वसु + अलंकृतम्=वस्वलंकृतम्। यहाँ 'उ'के स्थानमें 'व्' हुआ है। पितृ + अर्थोपवनम्=पित्रर्थोपवनम्। दातृ+ई = दात्री। यहाँ 'ऋ'के स्थानमें 'र्' हुआ है। अन्यत्र चौथे 'यण्'के उदाहरणमें 'लाकृतिः' पद आता है, उसका पदच्छेद है—ल+आकृतिः = लाकृतिः।
७. यह 'अयादेश-संधि' ('एचोऽयवायावः।'-पा० सू० ६।१।७८) है। नै+अकः=नायकः। यहाँ 'नै'के 'ऐ'के स्थानमें 'आय्' हुआ है। लौ+अकः = लावकः ('औ'की जगह 'आव्')। ने+अः=नयः ('ए'के स्थानमें 'अय्'); अन्यत्र 'लवः', 'विष्णवे' आदि उदाहरण भी मिलते हैं। लो+अः=ल् अव् अः=लवः। विष्णो+ए=विष्णवे।