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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 878 में से

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पृष्ठ 763

७३६ * अग्निपुराण *

इत्यादि$^१$। तेऽत्र, योऽत्र जलेऽकजम् $^२$। जहाँ संधि न होकर प्रकृत रूप ही रह जाता है, उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। उसके उदाहरण—नो अहो, ऐहि, अ अवेहि, इ इन्द्रकम्, उ उत्तिष्ठ, कवी एतौ, वायु एतौ, वने इमे, अमी एते, यज्ञभूते एहि देव इमं नय $^३$ ॥ १-५ ॥

अब 'व्यञ्जनसंधि'$^४$का वर्णन करूँगा—वाग्यतः। अजेकमात्रुकः। षडेते। तदिमे। अबादि। वाङ्नीतिः। षण्मुखः। वाङ्मनसम्। इत्यादि। वाग्भावादिः। वाक्श्लक्ष्णम्। तच्छरीरकम्। तल्लुनाति। तच्चरेत्। कुङ्ङनस्ते। सुगणिणह। भवांश्चरन्। भवांश्छात्रः। भवांष्टीका। भवांष्ठकः। भवांस्तीर्थम्। भवांस्थेत्याह।


१. यह 'लोपादेश-संधि' ('लोपः शाकल्यस्य।'-पा० सू० ८।३।१९) है। ते+इह-इस अवस्थामें 'ए'की जगह हुआ- त्+अय+इह बना। फिर 'लोपादेश'के नियमानुसार 'य्' का लोप हो गया-'त इह' बना। लोप न होनेपर 'तयिह' बना।
२. यहाँ 'पूर्वरूप-संधि' ('एङः पदान्तादति।'-पा० सू० ६।१।१०९) है। ते+अत्र, यो+अत्र, जले+अकजम्-इन तीनों ही पदोंमें 'अ' अपने पहलेके अक्षरमें मिल गया है।
३. अब 'प्रकृतिभाव'के उदाहरण देते हैं। 'नो अहो'-इस अवस्थामें ('एङः पदान्तादति'के अनुसार) 'पूर्वरूप एकादेश' प्राप्त था; किन्तु यहाँ प्रकृतिभावका विधान है; यह पद ज्यों-का-त्यों रहेगा; इसमें संधिजनित विकृति नहीं होगी। प्रकृतिभावके लिये पाणिनिने कई नियम बनाये हैं। ('नो अहो'-जैसे स्थलोंके नियम इस प्रकार हैं—'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्।' (पा० सू० ६।१।१२५) 'प्लुत' तथा 'प्रगृह्य' संज्ञावाले पदोंका 'प्रकृतिभाव' होता है, उनमें संधि नहीं होती। 'दूराद्धूते च।' (पा० सू० ८।२।८४) दूरसे किसीको बुलाते समय जिस वाक्यका प्रयोग होता है, उसके अन्तिम स्वरकी 'प्लुत' संज्ञा होती है; क्योंकि उसका उच्चारण दीर्घतर स्वरमें होता है। 'प्रगृह्य' संज्ञाके अनेक भेद हैं-(१) ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन। (२) 'अदस्' शब्द-सम्बन्धी मकारके बाद होनेवाले ई और ऊ। (३) एक स्वरवाला आङ्‌वर्जित निपात। (४) ओकारान्त निपात। (द्रव्यार्थभिन्न 'च' आदि अव्यय तथा 'प्र' आदि उपसर्ग भी 'निपात' कहलाते हैं।) (५) सम्बोधन-निमित्तक ओकार 'वैकल्पिक प्रगृह्य' होता है; किंतु उसके बाद अवैदिक 'इति' शब्दका रहना आवश्यक है। (६) 'मयू' प्रत्याहारसे परे जो 'उकार' हो, वह भी 'वैकल्पिक प्रगृह्य' है; किंतु उसके बाद कोई भी स्वर रहना चाहिये। (इनके सिवा और भी कई नियम हैं, जो विस्तारभयसे नहीं दिये जाते।) 'अहो+एहि' में 'अयाद्यादेश'के नियमानुसार 'ओ' की जगह 'अव्' प्राप्त था, किंतु 'अहो' पद 'ओकारान्त निपात' होनेसे 'प्रगृह्य' है; अतएव वह प्रकृतरूपमें रह गया। 'अ+अवेहि', इ+इन्द्रकम्, उ+उत्तिष्ठ-इनमें दीर्घ एकादेश प्राप्त था; किंतु नंबर ३ नियमके अनुसार 'प्रगृह्य' होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव होता है। 'कवी+एतौ', वायु+एतौ इनमें 'यणादेश' प्राप्त था और 'वने इमे' में 'अय्' आदेशकी प्राप्ति थी; किंतु नं० १ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे यहाँ भी प्रकृतरूप ही रह जाता है। 'कवी', 'वायु' और 'वने'-ये तीनों पद द्विवचनान्त हैं। 'अमी एते' में 'यण्' प्राप्त था; नं० २ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे प्रकृतिभाव हो गया। 'यज्ञभूते! एहि' इसमें अयादेश और 'देव! इमं नय' में गुण एकादेश प्राप्त था; किंतु प्लुत होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव हुआ। दूरसे सम्बोधनका वाक्य है 'यज्ञभूते! एहि' 'देव! इमं नय।'
४. व्यञ्जनसंधिके बहुत-से प्रकार या भेद पाणिनिसूत्रोंमें वर्णित हैं। परंतु अग्निपुराणमें उल्लिखित इस कौमार-व्याकरणमें व्यञ्जनसंधिके सिद्ध रूपोंका जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार व्यञ्जनसंधिके ग्यारह प्रकार निर्दिष्ट हुए हैं (१)-जश्त्वविधान [जो 'झलां जशोऽन्ते'-इस पाणिनिसूत्र (८।२।३९)-में निर्दिष्ट है]। (२)-अनुनासिकविधान [जो 'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा'-इस पाणिनिसूत्र (८।४।४५) तथा 'प्रत्यये भाषायां च नित्यम्।' इस कात्यायन-वार्तिकद्वारा प्रतिपादित है]। (३)-छत्वविधान [जो 'शश्छोऽटि'-(८।४।६३) 'छत्वममीति वाच्यम्।'-इन सूत्र-वार्तिकोंद्वारा निर्दिष्ट है]। (४)-श्चुत्वविधान [जो 'स्तोः श्चुना श्चुः'-इस पा० सू० (८।४।४०) में कहा गया है]। (५)-ष्टुत्वविधान [जो 'ष्टुना ष्टुः'-इस पा० सू० (८।४।४१) में वर्णित है]। (६)-लकारात्मक परसवर्णविधान [जो 'तोर्लि'-इस पा० सू० (८।४।६०) के नियमसे आबद्ध है]। (७)-ङमुडागमविधान [जो 'ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम्'-इस पा० सू० (८।३।३२) द्वारा कथित है]। (८)-नकारसत्त्वविधान [जो 'नश्छव्यप्रशान्।'-इस पा० सू० (८।३।७) के नियमानुसार सम्पादित होता है]। (९)-परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।'-पा० सू० (८।४।५८) तथा 'वा पदान्तस्य।' (८।४।५९)-इन पा० सूत्रोंद्वारा कथित है]। (१०)-तुगागमविधान [जो 'शि तुक्।', (८।३।३१) 'छे च।', (६।१।७३) 'दीर्घात् (६।१।७५) तथा 'पदान्ताद्वा' (६।१।७६)-इन सूत्रोंके नियमोंसे सम्बद्ध है]। ११-परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।' (८।४।५८)] 'वा पदान्तस्य' (८।४।५९)-इन पा० सूत्रोंद्वारा प्रतिपादित है।