अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 753, कुल 878 में से
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पारिभाषिकीको 'मुख्या' और नैमित्तिकीको 'औपचारिकी' कहते हैं। [ये ही क्रमशः 'अभिधा' और 'लक्षणा' हैं।] उस औपचारिकीके भी दो भेद हैं। जिसके द्वारा अभिधेय अर्थसे स्खलित हुआ शब्द किसी निमित्तवश अमुख्य अर्थका बोधक होता है, वह वृत्ति 'औपचारिकी' है। ये ही दोनों भेद नैमित्तिकीके भी होते हैं। वह लक्षणायोगसे 'लाक्षणिकी' और गुणयोगसे 'गौणी' कहलाती है। अभिधेय अर्थके साथ सम्बद्ध रहकर जो अन्यार्थकी प्रतीति होती है, उसको 'लक्षणा' कहते हैं। अभिधेयके साथ सम्बन्ध, सामीप्य, समवाय, वैपरीत्य एवं क्रियायोगसे लक्षणा पाँच प्रकारकी मानी जाती है। गुणोंकी अनन्तता होनेसे उनकी विवक्षाके कारण गौणीके अनन्त भेद हो जाते हैं। लोकसीमाके पालनमें तत्पर कविद्वारा जब अप्रस्तुत वस्तुके धर्म प्रस्तुत वस्तुपर सम्यग्रूपसे आहित—आरोपित किये जाते हैं, तब उसे 'समाधि'१ कहते हैं। जिसके द्वारा श्रुतिसे अनुपलब्ध अर्थ चैतन्ययुक्त होकर भासित होता है, वह 'आक्षेप'२ कहा जाता है। इसको 'ध्वनि' भी माना गया है; क्योंकि वह ध्वनिसे ही व्यक्त होता है। इसमें ध्वनिके आश्रयसे शब्द और अर्थके द्वारा स्वतः संकलित अर्थ ही व्यञ्जित होता है। अभीष्ट कथनका विशेष विवक्षासे अर्थात् उसमें और भी उत्कर्षकी प्रतीति करानेके लिये जो प्रतिषेध-सा होता है, उसको 'आक्षेप'३ कहते हैं। अधिकार (प्रकरण)-से पृथक्, अर्थात् अप्रकृत या अप्रस्तुत अन्य वस्तुकी जो स्तुति की जाती है, उसे 'अस्तुतस्तोत्र'४ (अप्रस्तुतप्रशंसा) कहते हैं। जहाँ किसी एक वस्तुके कहनेपर उसके समान विशेषणवाले दूसरे अर्थकी प्रतीति हो, उसे विद्वान् पुरुष अर्थकी संक्षिप्तताके कारण 'समासोक्ति'५ कहते हैं। वास्तविक पदार्थका अपलाप या निषेध करके किसी अन्य
१. अग्निपुराणमें 'समाधि' का जो लक्षण किया गया है, वह भरतमुनिके निम्नाङ्कित श्लोकपर आधारित है—
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलभ्यते। तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्त्यते॥
(नाट्य० १६। १०२)
दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणको अविकलरूपसे अपने ग्रन्थमें ले लिया है। वामनने आरोहावरोहक्रमरूप 'समाधि' को शब्दगुण स्वीकार किया है, किंतु भोजराजने अग्निपुराण और दण्डीके ही भावको लेकर—'समाधिः सोऽन्यधर्माणां यदन्यत्राधिरोपणम्।'—यह लक्षण लिखा है। वाग्भटने भी यही बात कही है—'अन्यस्य धर्मो यत्रान्यत्रारोप्यते स समाधिः'।
२. यहाँ आक्षेपको ध्वनिरूप बताया गया है; क्योंकि उससे अर्थविशेषका ध्वनन होता है।
३. यह 'आक्षेपालंकार' का लक्षण है। आचार्य मम्मटने भी इसी भावका आश्रय लेकर कहा है कि—
निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया। वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः॥
इस लक्षणमें उक्त विषय और वक्ष्यमाण विषयके भेदसे आक्षेपके दो प्रकार बताये गये हैं।
४. इस 'अस्तुत-स्तोत्रको ही परवर्ती आलंकारिकोंने 'अप्रस्तुतप्रशंसा' नाम दिया है; इसी को 'अन्योक्ति' भी कहते हैं। अग्निपुराणमें जो लक्षण दिया गया है, उसीको भामहने अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अन्तर इतना ही है कि वे 'अस्तुतस्तोत्र' के स्थानमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' लिखते हैं। उनका लक्षण इस प्रकार है—
अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः। अप्रस्तुतप्रशंसोति सा चैवं कथ्यते यथा॥
(३।२९)
दण्डीने इसी भावको संक्षिप्त शब्दोंमें व्यक्त किया है—'अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुतिः।' (२। ३४०) वामनने उपमेयकी अनुक्तिमें 'समासोक्ति' और किंचिद् उक्तिमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' मानी है।
५. आचार्य भामहने अपने ग्रन्थमें अग्निपुराणोक्त लक्षणको ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'उदिता' है और भामहके ग्रन्थमें 'उद्दिष्टा'। वहाँ अन्तमें 'बुधैः' पदका प्रयोग है और यहाँ 'यथा' का। दण्डीने इसी भावको कुछ अधिक स्पष्टताके साथ इस प्रकार लिखा है—