सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 754
* अध्याय ३४६ *७२७

पदार्थको सूचित करना 'अपह्नुति'$^१$ है। जो अभिधेय दूसरे प्रकारसे कहा जाता है अर्थात् सीधे न कहकर प्रकारान्तरसे घुमा-फिराकर प्रस्तुत किया जाता है, उसको 'पर्यायोक्ति'$^२$ कहते हैं। इनमेंसे किसी भी एकका नाम 'ध्वनि'$^३$ है॥ १—१८॥'

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शब्दार्थोभयालंकारोंका कथन' नामक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४५ ॥


तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय

काव्यगुण-विवेक

अग्निदेव कहते हैं—द्विजश्रेष्ठ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होनेपर भी सहृदयके लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारीके यौवनजनित लालित्यसे$^४$ रहित शरीरपर हार भी भारस्वरूप हो जाता है। यदि कोई कहे कि 'गुणनिरूपणकी क्या आवश्यकता है? दोषोंका अभाव ही गुण हो जायगा' तो उसका ऐसा कथन उचित नहीं है; क्योंकि 'श्लेष' आदि गुण और 'गूढार्थत्व' आदि दोष पृथक्-पृथक् कहे गये हैं। जो काव्यमें महती शोभाका आनयन करता है, उसको 'गुण' कहा जाता है। यह सामान्य और वैशेषिकके भेदसे दो प्रकारका हो जाता है। जो गुण सर्वसाधारण हो, उसे 'सामान्य' कहा जाता है। सामान्य गुण शब्द, अर्थ और शब्दार्थको प्राप्त होकर तीन प्रकारका हो जाता है। जो गुण काव्य-शरीरमें शब्दके आश्रित होता है, वह


वस्तु किंचिदभिप्रेत्य तत्तुल्यस्यान्यवस्तुनः। उक्तिः संक्षेपरूपत्वात् सा समासोक्तिरुच्यते ॥
(२।२०५)

'समासोक्ति'की गणना व्यङ्ग्य अलंकारोंमें होती है, इस दृष्टिसे अग्निपुराणोक्त लक्षणमें 'गम्यते'—इस क्रियापदका प्रयोग अधिक महत्त्वका है। अर्वाचीन आलंकारिक 'समासोक्ति'के लक्षणोंमें अप्रकृत व्यवहारके समारोपका भी उल्लेख करते हैं।

१. काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणकी आनुपूर्वीको ही उद्धृत कर लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'किंचिदन्यार्थसूचनम्' पाठ है और काव्यादर्शमें 'सूचनम्'के स्थानमें 'दर्शनम्' कर दिया गया है। भामहने शब्दान्तरसे इसी भावको प्रकट किया है—

अपह्नुतिरभीष्टा च किंचिदन्तर्गतोपमा। भूतार्थापह्नवादस्याः क्रियते चाभिधा यथा ॥
(२।२१)

इस लक्षणमें 'किंचिदन्तर्गतोपमा' यह अंश विशेष है। वामनने तुल्य वस्तुके द्वारा वाक्यार्थके अपलापको 'अपह्नुति' कहा है—'समानवस्तुनान्यापलापोऽपह्नुतिः।' (३।५) परवर्ती आलंकारिकोंने प्रकृत वस्तुका निषेध करके अन्य वस्तुकी स्थापनाको 'अपह्नुति' कहा है।
२. भामहने भी 'पर्यायोक्ति'का यही लक्षण लिखा है।
३. प्राचीनोंने आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति तथा पर्यायोक्तिको 'ध्वनि' कहकर जो उसे अलंकारोंमें अन्तर्भूत करनेकी चेष्टा की है, उसका ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनने बड़ी प्रौढ़िके साथ खण्डन किया है।
४. इसी भावको लेकर वामनने कहा है—

यदि भवति वचश्च्युतं गुणेभ्यो वपुरिव यौवनवन्ध्यमङ्गनायाः।
अपि जनदयितानि दुर्भगत्त्वं नियतमलङ्करणानि संश्रयन्ते ॥

अर्थात्—'गुणरहित वचन नारीके यौवनरहित रूपकी भाँति मनोरम नहीं होता। यदि उसे अलंकृत भी किया जाय तो वे अलंकार अपना दुर्भाग्य सूचित करते हैं।'