अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ * अग्निपुराण *
कमलचक्रमें प्रकृतिका चिन्तन करके उसका पूजन करे। उस कमलके पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दलोंमें हृदय आदि चार अङ्गोंका न्यास करे। अग्निकोण आदिके दलोंमें अस्त्र एवं वैनतेय (गरुड) आदिको पूर्ववत् स्थापित करे। इसी तरह पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि दिक्पालोंका चिन्तन करे। इन सबके ध्यान-पूजनकी विधि एक-सी है। (सूर्य, सोम और अग्निरूप) त्रिव्यूहमें अग्निका स्थान मध्यमें है। पूर्वादि दिशाओंके दलोंमें जिनका आवास है, उन देवताओंके साथ कमलकी कर्णिकामें नाभस (आकाशकी भाँति व्यापक आत्मा) तथा मानस (अन्तरात्मा) विराजमान हैं॥ ४०-४८॥
साधकको चाहिये कि वह सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धिके लिये तथा राज्यपर विजय पानेके लिये विश्वरूप (परमात्मा)-का यजन करे। सम्पूर्ण व्यूहों, हृदय आदि पाँचों अङ्गों, गरुड आदि तथा इन्द्र आदि दिक्पालोंके साथ ही उन श्रीहरिकी पूजाका विधान है। ऐसा करनेवाला उपासक सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर सकता है। अन्तमें विष्वक्सेनकी नाम-मन्त्रसे पूजा करे। नामके साथ 'रौं' बीज लगा ले, अर्थात् 'रौं विष्वक्सेनाय नमः।' बोलकर उनके लिये पूजनोपचार अर्पित करे॥ ४९-५०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वासुदेवादि मन्त्रोंके लक्षण [तथा न्यास]-का वर्णन' नामक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५॥
छब्बीसवाँ अध्याय
मुद्राओंके लक्षण
**नारदजी कहते हैं—**मुनिगण! अब मैं मुद्राओंका लक्षण बताऊँगा। सांनिध्य$^१$ (संनिधापिनी) आदि$^२$ मुद्राके प्रकार-भेद हैं। पहली मुद्रा अञ्जलि$^३$ है, दूसरी वन्दनी$^४$ है और तीसरी हृदयानुगा है। बायें हाथकी मुट्ठीसे दाहिने हाथके अँगूठेको बाँध ले और बायें अङ्गुष्ठको ऊपर उठाये रखे। सारांश यह है कि बायें और दाहिने—दोनों हाथोंके अँगूठे ऊपरकी ओर ही उठे रहें। यही 'हृदयानूँगा' मुद्रा है। (इसीको कोई 'संरोधिनी'$^५$ और कोई 'निष्ठुरा'$^६$ कहते हैं)। व्यूहार्चनमें ये तीन मुद्राएँ साधारण हैं।
१. दोनों हाथोंके अँगूठोंको ऊपर करके मुट्ठी बाँधकर दोनों मुट्ठियोंको परस्पर सटानेसे 'संनिधापिनी मुद्रा' होती है।
२. 'आदि' पदसे 'आवाहनी' आदि मुद्राओंको ग्रहण करना चाहिये। उनके लक्षण ग्रन्थान्तरसे जानने चाहिये।
३. यहाँ अञ्जलिको प्रथम मुद्रा कहा गया है। 'अञ्जलि' और 'वन्दनी'—दोनों मुद्राएँ प्रसिद्ध हैं; अतः उनका विशेष लक्षण यहाँ नहीं दिया गया है। तथापि मन्त्रमहार्णवमें अञ्जलिको ही 'अञ्जलिमुद्रा' कहते हैं, यह परिभाषा दी गयी है—'अञ्जल्यञ्जलिमुद्रा स्यात्।'
४. हाथ जोड़कर नमस्कार करना ही 'वन्दनी' मुद्रा है। ईशान शिवगुरुदेव-पद्धतिमें इसका लक्षण इस प्रकार दिया गया है—
'बद्ध्वाञ्जलिं पङ्कजकोशकल्पं यद्दक्षिणज्येष्ठिकया तु वामाम्। ज्येष्ठां समाक्रम्य तु वन्दनीयं मुद्रा नमस्कारविधौ प्रयोज्या॥'
अर्थात् कमल-मुकुलके समान अञ्जलि बाँधकर, जब दाहिने अँगूठेसे बायें अँगूठेको दबा दिया जाय तो 'वन्दिनी मुद्रा' होती है। इसका प्रयोग नमस्कारके लिये होना चाहिये (उत्तरार्ध क्रियापाद, सप्तम पटल ९)।
५. यहाँ मूलमें 'हृदयानूँगा' मुद्राका जो लक्षण दिया गया है, वही अन्यत्र 'संरोधिनी मुद्रा'का लक्षण है। मन्त्रमहार्णवमें 'संनिधापिनी मुद्रा'का लक्षण देकर कहा है—'अन्तःप्रवेशिताङ्गुष्ठा सैव संरोधिनी मता।' अर्थात् संनिधापिनीको ही यदि उसकी मुट्ठियोंके भीतर अङ्गुष्ठका प्रवेश हो तो 'संरोधिनी' कहते हैं। हृदयानुगामें बायीं मुट्ठीके भीतर दाहिनी मुट्ठीका अंगूठा रहता है और बायाँ अंगूठा खुला रहता है, परंतु संरोधिनीमें दोनों ही अंगूठे मुट्ठीके भीतर रहते हैं, यही अन्तर है।
६. ईशानशिवगुरुदेव मिश्रने शब्दान्तरसे यही बात कही है। उन्होंने संनिरोधिनीको निष्ठुराकी संज्ञा दी है—
'संलग्नमुष्ट्योः करयोः स्थितोर्ध्वज्येष्ठायुगं यत्र समुन्नताग्रम्। सा संनिधापिन्यथ सैव गर्भाङ्गुष्ठा भवेच्चेदिह निष्ठुराख्या॥'