अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २७ * ४९
अब आगे ये असाधारण (विशेष) मुद्राएँ बतायी जाती हैं। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे कनिष्ठातककी तीन अँगुग्रियोंको नवाकर कनिष्ठा आदिको क्रमशः मुक्त करनेसे आठ मुद्राएँ बनती हैं। ‘अ क च ट त प य श'—ये जो आठ वर्ग हैं, उनके जो पूर्व बीज (अं कं चं टं इत्यादि) हैं, उनको ही सूचित करनेवाली उक्त आठ मुद्राएँ हैं—ऐसा निश्चय करे। फिर पाँचों अँगुग्रियोंको ऊपर करके हाथको सम्मुख करनेसे जो नवीं मुद्रा बनती है, वह नवम बीज (क्षं)-के लिये है॥ १—४ $\frac{१}{२}$ ॥
दाहिने हाथके ऊपर बायें हाथको उत्तान रखकर उसे धीरे-धीरे नीचेको झुकाये। यह वराहकी मुद्रा मानी गयी है। ये क्रमशः अङ्गोंकी मुद्राएँ हैं। बायीं मुट्ठीमें बँधी हुई एक-एक अँगुलीको क्रमशः मुक्त करे और पहलेकी मुक्त हुई अँगुलीको फिर सिकोड़ ले। बायें हाथमें ऐसा करनेके बाद दाहिने हाथमें भी यही क्रिया करे। बायीं मुट्ठीके अँगूठेको ऊपर उठाये रखे। ऐसा करनेसे मुद्राएँ सिद्ध होती हैं॥ ५—७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मुद्रालक्षण-वर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
शिष्योंको दीक्षा देनेकी विधिका वर्णन
नारदजी कहते हैं— महर्षिगण! अब मैं सब कुछ देनेवाली दीक्षाका वर्णन करूँगा। कमलाकार मण्डलमें श्रीहरिका पूजन करे। दशमी तिथिको समस्त यज्ञ-सम्बन्धी द्रव्यका संग्रह एवं संस्कार (शुद्धि) करके रख ले। नरसिंह-बीज-मन्त्र (क्ष्रौं) — से सौ बार उसे अभिमन्त्रित करके, उस मन्त्रके अन्तमें ‘फट्' लगाकर बोले तथा राक्षसोंका विनाश करनेके उद्देश्यसे सब ओर सरसों छींटे। फिर वहाँ सर्वस्वरूपा प्रासादरूपिणी शक्तिका न्यास करे। सर्वौषधियोंका संग्रह करके बिखेरनेके उपयोगमें आनेवाली सरसों आदि वस्तुओंको शुभ पात्रमें रखकर साधक वासुदेव-मन्त्रसे उनका सौ बार अभिमन्त्रण करे। तदनन्तर वासुदेवसे लेकर नारायणपर्यन्त पूर्वोक्त पाँच मूर्तियों (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण)—के मूल-मन्त्रोंद्वारा पञ्चगव्य तैयार करे और कुशाग्रसे पञ्चगव्य छिड़ककर उस भूमिका प्रोक्षण करे। फिर वासुदेव-मन्त्रसे उत्तान हाथके द्वारा समस्त विकिर वस्तुओंको सब ओर बिखेरे। उस समय पूर्वाभिमुख खड़ा हो, मन-ही-मन भगवान् विष्णुका चिन्तन करते हुए तीन बार उन विकिर वस्तुओंको सब ओर छींटे। तत्पश्चात् वर्धनीसहित कलशपर स्थापित भगवान् विष्णुका अङ्गसहित पूजन करे। अस्त्र-मन्त्रसे वर्धनीको सौ बार अभिमन्त्रित करके अविच्छिन्न जलधारासे सींचते हुए उसे ईशानकोणकी ओर ले जाय। कलशको पीछे ले जाकर विकिरपर स्थापित करे। विकिर-द्रव्योंको कुशद्वारा एकत्र करके कुम्भेश और कर्करीका यजन करे॥ १—८॥
पञ्चरत्नयुक्त सवस्त्र वेदीपर श्रीहरिकी पूजा करे। अग्निमें भी उनकी अर्चना करके पूर्ववत् मन्त्रोंद्वारा उनका संतर्पण करे। तत्पश्चात् पुण्डरीक*-मन्त्रसे उखा (पात्रविशेष)—का प्रक्षालन करके उसके भीतर सुगन्धयुक्त घी पोत दे। इसके बाद
* पुण्डरीक-मन्त्र— ‘ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥'