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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 765, कुल 878 में से

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पृष्ठ 765
७३८* अग्निपुराण *

संधि* जाननी चाहिये—कश्चिञ्छ्यात्१, कश्चरेत्। | कश्श्वशुरः१०, कः श्वशुरः। कस्स्वरः११, कः कष्टः२। कष्ठः३। कः स्थः४। कश्चलेत्५। | स्वरः। कः फलेत्१२। कः शयिता१३। क ᳵखनेत्६। क ᳵकरोति७। क ᳶपठेत्८। क ᳶफलेत्९। | कोऽत्रयोधः१४। क उत्तमः१५। देवाएते१६।

'भवाञ्छेते' रह जाता है। 'लोप' और 'छत्त्व' वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभावमें 'भवाञ्शेते' बना। तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होनेपर 'भवाञ् शेते' बना। भवान्+डीनः=भवाण्डीनः। यहाँ ष्टुत्वविधानके अनुसार 'न्' की जगह 'ण्' हो गया है। 'त्वं+भर्ता=त्वम्भर्ता', 'त्वं करिष्यसि=त्वङ्करिष्यसि'—ये दोनों वैकल्पिक परसवर्णके उदाहरण हैं। यहाँ अनुस्वारकी जगह 'वा पदान्तस्य।' (पा० सू० ८।४।५९) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः 'भ्' और 'ङ्' हो गये हैं।

'व्यञ्जनसंधि'के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरणमें निर्दिष्ट नहीं हैं—जैसे 'पूर्वसवर्ण-संधि'। इसके दो प्रकारके स्थल हैं। 'झयो होऽन्यतरस्याम्' (८।४।६२)—इस सूत्रके अनुसार 'झय्' से परे हकारके स्थानमें पूर्वसवर्ण होता है। इसके 'वाग्घरिः' इत्यादि उदाहरण हैं। यहाँ 'वाक्+हरिः' इस अवस्थामें 'ह' की जगह पूर्वसवर्ण—'घ' हो गया है। 'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य।'—इस पा० सूत्र (८।४।६१) के अनुसार 'उद्' उपसर्गसे परे 'स्थ' और 'स्तम्भ'के आदि वर्णकी जगह पूर्व-सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं—उत्थानम्, उत्तम्भनम्। 'सम्' के मकारका भी रुत्वविधान होता है, 'सुट्' परे रहनेपर। इसके 'संस्कर्ता' आदि उदाहरण हैं।

* विसर्गसंधिके भी अनेक प्रकार-भेद हैं—यहाँ लगभग दस प्रकारकी कार्य-विधि वर्णित हुई है—(१) विसर्गस्थाने सत्वविधान (इसका विधायक है—'विसर्जनीयस्य सः।' पा० सू० ८।३।३४)। (२) वैकल्पिकविसर्गत्वविधान (इसका निर्देशक है—'वा शरि'—यह पा० सूत्र ८।३।३६)। (३) क ᳵ प-विधान (यह 'कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च'—इस पाणिनिसूत्र ८।३।३७ पर आधारित है)। (४) रुत्वविधान (इसका आधार है—'ससजुषो रुः।' यह पा० सूत्र ८।२।६६)। (५) रोरुत्वविधान (यह 'अतो रोरप्लुतादप्लुते।' ६।१।११३, 'हशि च।' ६।१।११४ इत्यादि सूत्रोंपर अवलम्बित है)। (६) रोर्यत्वविधान (जो 'भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि।' इस पा० सूत्र ८।३।१७ तथा अतो रोरप्लुतादप्लुते ६।१।११३ पर आधारित है)। (७) यलोपविधान (इसका आधार 'हलि सर्वेषाम्' यह पा० सूत्र ८।३।२२ है)। (८) रकार-विसर्गविधान (इसका विधायक 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः।'—यह पा० सूत्र ८।३।१५ है)। (९) सुलोपविधान (इसके आधार हैं—'एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ् समासे हलि।', 'सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम्।' इत्यादि ६।१।१३२, ३४ सूत्र)। (१०) ढ्रलोपदीर्घविधान (इसके आधारभूत पा० सूत्र हैं—'रोरि।', 'ढो ढे लोपः।', 'ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः।' ८।३।१४, १३; ६।३।१११)।

१. 'कः+छिन्द्यात्'=कश्चिञ्छ्यात्। यहाँ विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'श्' हुआ है। कः+चरेत्=कश्चरेत्। यहाँ भी पूर्ववत् विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वेन 'श्' हुआ है। २. कः+टः=कष्टः। ३. कः+ठः=कष्ठः—इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें सकार होकर ष्टुत्वविधानके अनुसार 'सकार'के स्थानमें 'षकार' हो गया है। ४. कः+स्थः=कः स्थः, कस्स्थः। यहाँ वैकल्पिक विसर्गताका विधान है। 'वा शरि' (पा० सूत्र ८।३।३६)-के नियमानुसार यदि विसर्गसे परे 'श्', 'ष्' और 'स्'—ये अक्षर हों तो एक पक्षके मतानुसार उस विसर्गके स्थानमें 'स्' न होकर विसर्ग ही रह जाता है। पक्षान्तरसे 'सकार' हो जाता है। उक्त उदाहरणोंमें पहले विसर्गरूप, फिर सकाररूपका साक्षात्कार कराया गया है। ५. 'कः+चलेत्=कश्चलेत्।' यहाँ भी सब बातें 'कश्चरेत्' के अनुसार समझनी चाहिये। ६-७. 'कः+खनेत्'=क ᳵ खनेत्। कः+करोति=क ᳵ करोति—इन दोनों उदाहरणोंमें 'क ᳵ प विधान'के अनुसार विसर्गके स्थानमें 'क ᳵ ख हो गये हैं। कवर्ग और पवर्गके प्रथम-द्वितीय अक्षर परे हों तो विसर्गके स्थानमें क्रमशः 'क ᳵ प होते हैं—ऐसा नियम है। ८-९. 'कः+पठेत्', 'कः+फलेत्'—इस अवस्थामें अभी बताये हुए नियमके अनुसार विसर्गकी जगह 'ᳶप ᳶफ'—हो गये हैं। १०-११. इन उदाहरणोंमें 'वा शरि' (पा० सू० ८।३।३६) के नियमानुसार एक पक्षमें विसर्गका विसर्ग ही रह गया है; पक्षान्तरमें 'विसर्ग' की जगह 'स्' होकर 'श्वशुरः' के शकारका योग मिलनेसे श्चुत्वेन 'स्' की जगह 'श्' हो गया है। 'स्वरः' के साथ विसर्गका सकार उसी रूपमें दृष्टिगोचर होता है। १२. 'कः+फलेत्'—इस जगह ᳶफ प्राप्त था; परंतु वह वैकल्पिक है, अतः पक्षान्तरके अनुसार विसर्गके स्थानमें विसर्ग ही रह गया है। १३. यहाँ भी वही बात है। विसर्गकी जगह 'स्' या 'श्' नहीं हुआ है। १४. 'कस् अत्र योधः।' यह पदच्छेद है। यहाँ 'कस्' के सकारकी जगह 'रु' तथा 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है; फिर गुण और पूर्वरूप होकर 'कोऽत्र योधः' बना है। रोरुत्वविधानका नियम यह है—अप्लुत 'अ' से परे 'रु' हो तो उसकी जगह 'उ' होता है, अप्लुत अकार परे विद्यमान हो तब। १५. कस् उत्तमः—इस अवस्थामें 'स्' के स्थानमें 'रु' हुआ। फिर 'रोर्यत्वविधान' के अनुसार 'रु'के स्थानमें 'य' हो गया। फिर य-लोपविधानसे 'य्' का लोप हो गया। 'लोपः शाकल्यस्य।' (८।३।१९)—इस पा० सूत्रके अनुसार यहाँ 'य्' लोप हुआ है, अतः 'क उत्तमः' प्रयोग सिद्ध हुआ है। १६. 'देवास+एते'—