सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 766
* अध्याय ३५१ *७३९
भो इह$^{१७}$। स्वदेवा यान्ति$^{१८}$। भगो व्रज$^{१९}$। सु पूः$^{२०}$।स यातीह$^{२५}$। सैष$^{२६}$ याति। क ईश्वरः। ज्योतीरूपम्$^{२७}$।
सुदूरात्रित्र$^{२१}$। वायुर्याति$^{२२}$। पुनर्नहि$^{२३}$। पुनर्$^{२४}$ राति।तवच्छत्रम्$^{२८}$। म्लेच्छ$^{२९}$ धीः। छिद्रमांच्छिदत्॥ १०—१३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संधिसिद्धरूपकथन' नामक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५०॥


तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय

सुबन्त-सिद्ध रूप

स्कन्द कहते हैं— कात्यायन! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपोंका वर्णन करता हूँ। विभक्तियाँ दो हैं—'सुप्' और 'तिङ्'। 'सुप्' विभक्तियाँ सात हैं। 'सु औ जस्'—यह प्रथमा विभक्ति है। 'अम् औट् शस्'—यह द्वितीया, 'टा भ्याम् भिस्'—यह तृतीया, 'ङे भ्याम् भ्यस्'—यह चतुर्थी, 'ङसि भ्याम् भ्यस्'—यह पञ्चमी, 'ङस् ओस् आम्'—यह षष्ठी तथा 'ङि ओस् सुप्'—यह सप्तमी विभक्ति है। ये सातों विभक्तियाँ प्रातिपदिक संज्ञावाले शब्दोंसे परे प्रयुक्त होती हैं॥ १—३॥

'प्रातिपदिक' दो प्रकारका होता है—'अजन्त' और 'हलन्त'। इनमेंसे प्रत्येक पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्गके भेदसे तीन-तीन प्रकारका है। उन पुँल्लिङ्ग आदि शब्दोंके नायकोंका* यहाँ दिग्दर्शन कराया जाता है। जो शब्द नहीं कहे गये हैं (किंतु जिनके रूप इन्हींके समान होते हैं) उन्हींके ये 'वृक्ष' आदि शब्द सामर्थ्यतः नायक हैं। 'वृक्ष' शब्द पेड़का वाचक है। यह अकारान्त पुँल्लिङ्ग है। इसके सात विभक्तियोंमें तथा सम्बोधनमें एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके भेदसे कुल मिलाकर चौबीस रूप होते हैं। उन सबको यहाँ उद्धृत किया जाता है। १—वृक्षः, वृक्षौ, वृक्षाः। २—वृक्षम्, वृक्षौ, वृक्षान्। ३—वृक्षेण, वृक्षाभ्याम्, वृक्षैः। ४—वृक्षाय, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः। ५—वृक्षात्, वृक्षाभ्याम्, वृक्षेभ्यः। ६—वृक्षस्य, वृक्षयोः, वृक्षाणाम्। ७—वृक्षे, वृक्षयोः, वृक्षेषु। सम्बोधने—हे वृक्ष, हे वृक्षौ, हे वृक्षाः। इसी


इस पदच्छेदमें 'स्' की जगह 'रु' और 'रु' की जगह 'य्' हो गया। फिर पूर्ववत् 'य' लोप होनेसे 'देवा एते'—ऐसा प्रयोग सिद्ध हुआ। १७-१८-१९. 'भोस् इह', 'भगोस् व्रज' तथा 'अघोस् याहि', 'स्वदेवास् यान्ति'—इन वाक्योंमें 'स्' की जगह रुत्व-यत्व हुआ। फिर पहलेमें तो 'लोपः शाकल्यस्य।'—इस सूत्रसे और अन्य उदाहरणोंमें 'हलि सर्वेषाम्।' (पा० सू० ८। ३। २२)—इस सूत्रसे 'य' लोप होनेपर निर्दिष्ट रूप बनते हैं। २०. 'सुपूः' यहाँ 'सुपूर्'—इस अवस्थामें 'रकार'के स्थानमें 'विसर्ग' हुआ है। २१. 'सुदुर्+रात्रित्र=सुदूरात्रित्र।' यहाँ 'रोरि' से 'र्' लोप होकर पूर्वस्वरको दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २२. इस उदाहरणमें 'वायुस्+याति'—ऐसा पदच्छेद है। यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु', उकारकी इत्संज्ञा और रेफका यकारसे मिलन हुआ है। २३. इस उदाहरणमें यह दिखाया गया है कि यहाँ 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः।' (पा० सू० ८। ३। १५) से रकारका विसर्ग नहीं हो सकता; क्योंकि न रेफ अवसानमें है और न उससे परे 'खर्' प्रत्याहारका ही कोई अक्षर है। २४. 'पुनर्+राति'—इस अवस्थामें 'रो रि।' (पा० सू० ८। ३। १४) से रकारका लोप हुआ और पूर्व 'अण्' को दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २५. 'सस् याति इह'—इस अवस्थामें 'एतत्तदोः सुलोपो।'—इस (पा० सूत्र ६। १। १३२) के अनुसार 'तत्'-शब्दसम्बन्धी 'सु' विभक्तिसे सकारका लोप हो गया है। २६. 'सस् एषस् याति', 'क ईश्वरः'—इस अवस्थामें 'सस्'के सकारका लोप श्लोककी पादपूर्तिके लिये हुआ है, 'एषस्'—के सकारका लोप पूर्ववत् हुआ है। २७. 'ज्योतिर्+रूपम्'—यहाँ रलोप और दीर्घ हुआ है। २८. 'तव + छत्रम्।' यहाँ 'छे च।'—इस (पा० सू० ६। १। ७३) सूत्रसे तुगागम हुआ है, फिर 'त' का श्चुत्वेन 'च' हो गया है। (यह व्यञ्जनसंधिका उदाहरण है।) २९. यहाँ भी 'दीर्घात्', 'पदान्ताद्वा' (पा०सू० ६। १। ७५-७६) से तुगागम हुआ है। शेष पूर्ववत् (यहाँ भी व्यञ्जनसंधि ही है)।

* अकारान्तसे लेकर औकारान्तक जितने शब्द हैं, सब 'अजन्त' हैं। ऐसे शब्द असंख्य हैं, उन सबका उल्लेख असम्भव है। अतः कुछ शब्द यहाँ नमूनेके तौरपर दिये गये हैं, उन्हींके समान अन्य शब्दोंके रूप भी होंगे। इन नमूनेके तौरपर दिये गये शब्दोंको ही यहाँ 'नायक' कहा गया है।