अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 767, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें७४० * अग्निपुराण *
प्रकार राम, देव, इन्द्र, वरुण, भव आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'देव' आदि शब्दोंके तृतीयाके एकवचनमें 'देवेन' तथा षष्ठीके बहुवचनमें 'देवानाम्' इत्यादि रूप होते हैं। वहाँ 'न' के स्थानमें 'ण' नहीं होता। रेफ और षकारके बाद जो 'न' हो, उसीके स्थानमें 'ण' होता है। अकारान्त शब्दोंमें जो सर्वनाम हैं, उनके रूपोंमें कुछ भिन्नता होती है। उस भिन्नताका परिचय देनेके लिये सर्वनामका 'प्रथम' या 'नायक' जो 'सर्व' शब्द है, उसके रूप यहाँ दिये जाते हैं; उसी तरह अन्य सर्वनामोंके भी रूप होंगे। यथा—१—सर्वः सर्वौ सर्वे। २—सर्वम् सर्वौ सर्वान्। ३—सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः। ४—<u>सर्वस्मै</u> सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। ५—<u>सर्वस्मात्</u> सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः। ६—सर्वस्य सर्वयोः <u>सर्वेषाम्</u>। ७—<u>सर्वस्मिन्</u> सर्वयोः सर्वेषु। सम्बोधनमें—<u>हे सर्व</u> हे सर्वौ हे सर्वे।* यहाँ रेखाङ्कित रूपोंपर दृष्टिपात कीजिये। साधारण अकारान्त शब्दोंकी अपेक्षा सर्वनाम शब्दोंके रूपोंमें भिन्नताके पाँच ही स्थल हैं। इसके बाद 'पूर्व' शब्द आता है। यह सर्वनाम होनेपर भी अन्य सर्वनामोंसे कुछ विलक्षण रूप रखता है। पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर—ये व्यवस्था और असंज्ञा में सर्वनाम हैं। 'स्व' तथा 'अन्तर' शब्द भी अर्थ-विशेषमें ही सर्वनाम हैं। अतः उससे भिन्न अर्थमें वे असर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी-सप्तमीके एकवचनमें पूर्वाद शब्दोंके रूप सर्वनामवत् होते हैं, किंतु विकल्पसे। अतः पक्षान्तरमें उनके असर्वनामवत् रूप भी होते ही हैं—जैसे पूर्वे पूर्वाः, परे पराः, इत्यादि। पूर्वस्मात् पूर्वात्। पूर्वस्मिन् पूर्वे इत्यादि। प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय—ये शब्द सर्वनाम नहीं हैं, तथापि 'प्रथम' शब्दके प्रथमा बहुवचनमें—प्रथमे प्रथमाः—यह रूप होता है। 'चरम' आदि शब्दोंके लिये भी यही बात है। 'द्वितीय' तथा 'तृतीय' शब्द चतुर्थी, पञ्चमी तथा सप्तमीके एकवचनमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। यथा—द्वितीयस्मै द्वितीयाय। तृतीयस्मै तृतीयाय—इत्यादि शेष रूप वृक्षवत् होते हैं।
अब आकारान्त शब्दका एक रूप उपस्थित करते हैं—खड्गपाः—खड्गं पातीति खड्गपाः अर्थात् 'खड्ग-रक्षक'। इसका रूप यों समझना चाहिये—१—खड्गपाः, खड्गपौ, खड्गपाः। २—खड्गपाम्, खड्गपौ, खड्गपः। ३—खड्गपा, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभिः। ४—खड्गपे, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभ्यः। ५—खड्गपः, खड्गपाभ्याम्, खड्गपाभ्यः। ६—खड्गपः, खड्गपोः, खड्गपाम्। ७—खड्गपि, खड्गपोः, खड्गपासु। सम्बो०—हे खड्गपाः, हे खड्गपौ, हे खड्गपाः। इसी तरह विश्वपा (विश्वपालक), गोपा (गोरक्षक), कीलालपा (जल पीनेवाला), शङ्खध्मा (शङ्ख बजानेवाला) आदि शब्दोंके रूप होंगे। (अब ह्रस्व इकारान्त 'वह्नि' शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं—) १—वह्निः, वह्नी, वह्नयः। २—वह्निम्, वह्नी, वह्नीन्। ३—वह्निना, वह्निभ्याम्, वह्निभिः। ४—वह्नये, वह्निभ्याम्, वह्निभ्यः। ५—वह्नेः, वह्निभ्याम्, वह्निभ्यः। ६—वह्नेः, वह्न्योः, वह्नीनाम्। ७—वह्नौ, वह्न्योः, वह्निषु। सम्बो०—हे वह्ने, हे वह्नी, हे वह्नयः। 'वह्नि'का अर्थ है अग्नि। इसी तरह अग्रि, रवि, कवि, गिरि, पवि इत्यादि शब्दोंके रूप होंगे। इकारान्त शब्दोंमें 'सखि' और 'पति' शब्दोंके रूप कुछ भिन्नता रखते हैं। जैसे—१—सखा, सखायौ, सखायः। २—सखायम्, सखायौ, सखीन्। तृतीयाके
* यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि किसीका नाम 'सर्व' रख दिया जाय तो उस 'सर्व' का रूप वृक्षकी तरह ही होगा। 'सब' इस अर्थमें प्रयुक्त 'सर्व' शब्दका ही रूप ऊपर बताये अनुसार होगा। यही बात अन्य सर्वनामोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। संज्ञा एवं उपसर्जनीभूत 'सर्व' आदि शब्दोंकी सर्वनामोंमें गणना नहीं होती। 'अतिसर्व' आदि शब्दोंमें जो 'सर्व' शब्द है; वह उपसर्जन है।