अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 768, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५१ * ७४१
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एकवचनमें—सख्या, चतुर्थीके एकवचनमें सख्ये, पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें सख्युः तथा सप्तमीके एकवचनमें सख्यौ रूप होते हैं। शेष सभी रूप 'वह्नि' शब्दके समान हैं। 'पति' शब्दके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें वह्निवत् रूप होते हैं, शेष विभक्तियोंमें वह 'सखि' शब्दके समान रूप रखता है। 'अहर्पतिः' का अर्थ है सूर्य। यहाँ 'पति' शब्द समासमें आबद्ध है। समासमें उसका रूप वह्नितुल्य ही होता है।
(अब उकारान्त शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं।) पहले पुँल्लिङ्ग 'पटु' शब्दके रूप दिये जाते हैं। पटुका अर्थ है—कुशल—निपुण। १—पटुः, पटू, पटवः। २—पटुम्, पटू, पटून्। ३—पटुना, पटुभ्याम्, पटुभिः। ४—पटवे, पटुभ्याम्, पटुभ्यः। ५—पटोः, पटुभ्याम्, पटुभ्यः। ६—पटोः, पट्वोः, पटूनाम्। ७—पटौ, पट्वोः, पटुषु। सम्बो०—हे पटो, हे पटू, हे पटवः। इसी तरह भानु, शम्भु विष्णु आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ईकारान्त 'ग्रामणी' शब्द है। इसका अर्थ है—गाँवका मुखिया। इसका रूप इस प्रकार है—१—ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। २—ग्रामणीम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। ३—ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभिः। ४—ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम् २, ग्रामणीभ्यः २। ५—ग्रामण्यः २। ६—ग्रामण्योः २। बहुवचन—ग्रामण्याम्। ७—ग्रामण्याम्, ग्रामणीषु। इसी तरह 'प्रधी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। दीर्घ ऊकारान्त 'दृन्भू' शब्द है। इसका अर्थ है—राजा, वज्र, सूर्य, सर्प और चक्र। इसका रूप—दृन्भूः, दृन्भौ, दृन्भ्वः इत्यादि। 'खलपूः'—खलिहान या भूमिको शुद्ध—स्वच्छ करनेवाला। इसके रूप खलपूः, खलप्वौ, खलप्वः इत्यादि। 'मित्रभूः'—मित्रसे उत्पन्न। इसका रूप है—मित्रभूः, मित्रभुवौ, मित्रभुवः इत्यादि। 'स्वभू' का अर्थ है—स्वयम्भूः—स्वतः प्रकट होनेवाला। इसके रूप—स्वभूः, स्वभुवौ, स्वभुवः इत्यादि हैं॥ ४—६॥
'सुश्रीः' का अर्थ है—सुन्दर शोभासे सम्पन्न। इसके रूप हैं—सुश्रीः, सुश्रियौ, सुश्रियः इत्यादि। 'सुधीः' का अर्थ है—उत्तम बुद्धिसे युक्त विद्वान्। इसके रूप हैं—सुधीः, सुधियौ, सुधियः इत्यादि। (अब ऋकारान्त पुँल्लिङ्ग 'पितृ' तथा 'भ्रातृ' शब्दोंके रूप दिये जाते हैं—'पिता' का अर्थ है—बाप और 'भ्राता' का अर्थ है—भाई। 'पितृ' शब्दके सब रूप इस प्रकार हैं—१—पिता, पितरौ, पितरः। २—पितरम्, पितरौ, पितॄन्। ३—पित्रा, पितृभ्याम्, पितृभिः। ४—पित्रे, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५—पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ६—पितुः, पित्रोः, पितॄणाम्। ७—पितरि, पित्रोः, पितृषु। सम्बो०—हे पितः, हे पितरौ, हे पितरः। इसी तरह 'भ्रातृ' और 'जामातृ' शब्दोंके भी रूप होते हैं। 'नृ' शब्द नरका वाचक है। इसके रूप ना, नरौ, नरः इत्यादि 'पितृ' शब्दवत् होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें दो रूप होते हैं—नृणाम् नॄणाम्। 'कर्तृ' शब्दका अर्थ है करनेवाला। यह 'तृजन्त' शब्द है। इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार हैं—कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः। कर्तारम्, कर्तारौ, कर्तॄन्। शेष 'पितृ' शब्दकी भाँति। 'क्रोष्टु' शब्द सियारका वाचक है। क्रोष्टु विकल्पसे 'क्रोष्ट्र' शब्दके रूपमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसका रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होता है। 'क्रोष्टु'के रूपमें ही यदि इसके रूप लिये जायें तो 'पटु' शब्दकी तरह लेने चाहिये। 'नप्तृ' शब्द नातीका वाचक है। इसके रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होते हैं। 'सुरै' शब्दका अर्थ उत्तम धनवान् है। 'रै' शब्दका अर्थ है—धन। ये ऐकारान्त पुँल्लिङ्ग हैं। इन दोनोंके रूप एक-से होते हैं—१—सुराः, सुरायौ, सुरायः। २—सुरायम्, सुरायौ, सुरायः। ३—सुराया,