अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५१ * | ७४५ ---|---
भी 'कुण्ड' कहते हैं। इसीको ध्यानमें रखकर कुण्डभर दूध देनेवाली गायको 'कुण्डोध्नी' कहते हैं। 'सर्वम्'—यह 'सर्व' शब्दका एकवचनान्त रूप है, इसका अर्थ है सम्पूर्ण या सब। इसके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें नपुंसकलिङ्ग-सम्बन्धी रूप इस प्रकार होते हैं—सर्वम् सर्वे सर्वाणि। शेष पुँल्लिङ्गवत्। 'सोमपम्'—सोम पान करनेवाला कुल (ब्राह्मणकुल या देवकुल)। इसके भी प्रथम दो विभक्तियोंमें सोमपम् सोमपे सोमपानि इत्यादि रूप होंगे। शेष पुँल्लिङ्ग रामवत्। 'दधि' और 'वारि' शब्द क्रमशः दही और जलके वाचक हैं। ये नित्य नपुंसकलिङ्ग हैं। अतः इनके सम्पूर्ण रूप यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। प्र०, द्वि० विभक्तियोंमें—दधि दधिनी दधीनि। तृ०—दध्ना, दधिभ्याम्, दधिभिः। च०—दध्ने दधिभ्याम् दधिभ्यः। पं०—दध्नः दधिभ्याम् दधिभ्यः। ष०—दध्नः, दध्नोः, दध्नाम्। स०—दध्नि-दधनि, दध्नोः, दधिषु। 'वारि' शब्दके सातों विभक्तियोंके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—१, २—वारि वारिणी वारीणि। ३—वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः। ४—वारिणे वारिभ्याम् वारिभ्यः। ५—वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः। ६—वारिणः वारिणोः वारीणाम्। ७—वारिणि, वारिणोः, वारिषु। 'खलपु' का अर्थ है—खलिहानको स्वच्छ करनेवाला साधन, 'खुरपा' आदि। इसके रूप विशेष्यके अनुसार स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्गमें भी होते हैं। यहाँ नपुंसकलिङ्गमें इसके रूप उद्धृत किये जाते हैं। १, २—खलपु खलपुनी खलपूनि। ३—खलप्वा, खलपुना खलपूभ्याम् खलपूभिः। ४—खलप्वे-खलपुने खलपूभ्याम् खलपूभ्यः इत्यादि। 'मधु' शब्द शहद और मदिराका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—१, २—मधु मधुनी मधूनि। ३—मधुना मधुभ्याम् मधुभिः। ४—मधुने मधुभ्याम् मधुभ्यः। ५—मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः। ६—मधुनः मधुनोः मधूनाम्। ७—मधुनि मधुनोः मधुषु। सं० हे मधो, हे मधु हे मधुनी हे मधूनि!। 'त्रपु' शब्द राँगाका वाचक है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंके रूप इस प्रकार हैं—त्रपु, त्रपुणी, त्रपूनि। शेष मधुवत्। 'कर्तृ' (करनेवाला), 'भर्तृ' (भरण-पोषण करनेवाला), 'अतिभर्तृ' (भर्ताको भी अतिक्रमण करनेवाला कुल)—इन तीनों शब्दोंके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें रूप क्रमशः इस प्रकार हैं—कर्तृ कर्तृणी कर्तॄणि। भर्तृ भर्तृणी भर्तॄणि। अतिभर्तृ अतिभर्तृणी अतिभर्तॄणि। तृतीया आदि विभक्तियोंमें जो अजादि प्रत्यय हैं, उनमें दो-दो रूप होंगे। यथा—कर्त्रा, कर्तृणा। भर्त्रा, भर्तृणा। अतिभर्त्रा, अतिभर्तृणा इत्यादि। 'पयस्' शब्द जलका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार हैं—१, २—पयः पयसी पयांसि। तृतीया आदिमें पयसा पयोभ्याम् पयोभिः इत्यादि। 'पुरस्' शब्द सकारान्त अव्यय है। इसका अर्थ है—पहले या आगे। अव्यय शब्दोंका कोई रूप नहीं चलता; क्योंकि 'अव्यय' का यह लक्षण है—॥ २०॥<br><br>सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु।<br>वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम्॥<br><br>प्राक् (पूर्व), प्रत्यक् (अंदर या पश्चिम), तिर्यक् (तिरछी दिशाकी ओर चलनेवाले पशु-पक्षी आदि), उदक् (उत्तर)—इन शब्दोंके प्रथम दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार जानने