अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 773, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें७४६ * अग्निपुराण *
चाहिये। प्राक् प्राची प्राञ्चि। प्रत्यक् प्रतीची प्रत्यञ्चि। तिर्यक् तिरश्ची तिर्यञ्चि। उदक् उदीची उदञ्चि इत्यादि। ये गत्यर्थक 'अञ्च्'के रूप हैं, पूजा-अर्थमें प्रयुक्त 'अञ्च्'के—प्राङ् प्राञ्ची प्राञ्चि। प्रत्यङ् प्रत्यञ्ची प्रत्यञ्चि। उदङ् उदञ्ची उदञ्चि। तिर्यङ् तिर्यञ्ची तिर्यञ्चि। इत्यादि रूप होते हैं। 'जगत्' शब्द संसारका वाचक है। इसके रूप हैं—जगत् जगती जगन्ति इत्यादि। 'जाग्रत्' शब्दका अर्थ है—सजग रहनेवाला। इसके रूप हैं—जाग्रत् जाग्रती जाग्रन्ति, जाग्रति इत्यादि। 'शकृत्' शब्द मल या विष्ठाका वाचक है। इसके रूप शकृत्, शकृती, शकृन्ति, शकानि इत्यादि। तृतीया आदिमें शक्ना, शकृता इत्यादि। जिस कुलमें बहुत अच्छी सम्पत्ति है, उसको 'सुसम्पत्' कहते हैं। सुसम्पत्के प्रथम दो विभक्तियोंमें इस प्रकार रूप होते हैं—सुसम्पत्, सुसम्पद्, सुसम्पदी, सुसम्पन्ति, इत्यादि। सुन्दर दण्डियोंसे युक्त मन्दिर या आयतनको 'सुदण्डि' कहते हैं। 'सुदण्डिन्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—सुदण्डि सुदण्डिनी सुदण्डीनि। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् होते हैं। 'इह' शब्द अव्यय है। 'अहन्' शब्द दिनका वाचक है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार जानने चाहिये—अहः अहनी, अह्नी, अहानि। 'किम्' प्रश्नवाचक सर्वनाम है। इसके रूप तीनों लिङ्गोंमें होते हैं। नपुंसकलिङ्गमें प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें 'किम् के कानि—ये रूप होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्ग 'सर्व' शब्दके समान हैं। 'इदम्'का अर्थ है—यह। इसके नपुंसकलिङ्गमें—इदम् इमे इमानि—ये रूप होते हैं। तृतीया आदि विभक्तियोंमें पुँल्लिङ्गवत् रूप जानने चाहिये॥ २१॥
'ष्' शब्द संख्या छःका वाचक और बहुवचनान्त है। इसके तीनों लिङ्गोंमें समान रूप होते हैं। १, २—षट्। ३—षड्भिः। ४-५—षड्भ्यः। ६—षण्णाम्। ७—षट्सु। 'सर्पिष्' शब्द घीका वाचक है। इसके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—सर्पिः सर्पिषी सर्पींषि। सर्पिषा सर्पिर्भ्याम् सर्पिर्भिः इत्यादि। 'श्रेयस्' शब्द कल्याणका वाचक है। उसके रूप—श्रेयः श्रेयसी श्रेयांसि इत्यादि हैं। तृतीया आदिमें 'पयस्' शब्दके समान इसके रूप जानने चाहिये। संख्या चारका वाचक 'चतुर्' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। नपुंसकलिङ्गमें इसके रूप इस प्रकार हैं—१, २—चत्वारि। ३—चतुर्भिः। ४, ५—चतुर्भ्यः। ६—चतुर्णाम्। ७—चतुर्षु। 'अदस्' शब्द 'यह', 'वह'का वाचक सर्वनाम है। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियोंमें इसके रूप—'अदः अमू अमूनि' होते हैं। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् जानने चाहिये। इनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे शब्द हैं, उनके रूप भी इन पूर्वकथित शब्दोंके ही समान हैं। इन शब्दोंकी 'प्रातिपदिक' संज्ञा कही गयी है। प्रातिपदिकसे परे प्रथमा आदि विभक्तियाँ होती हैं। जो धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्तसे रहित अर्थवान् शब्द है। उसीको 'प्रातिपदिक' कहते हैं। प्रातिपदिकसे प्रातिपदिकार्थ, लिङ्गमात्राधिक्य और वचनमात्रका बोध करानेके लिये प्रथमा* विभक्ति होती है॥ २२-२३॥
सम्बोधनमें तथा उक्त कर्म और कर्तामें भी
* जो लिङ्गरहित (अव्यय) और नियत लिङ्गवाले शब्द हैं, वे 'प्रातिपदिकार्थमात्र'के उदाहरण हैं। यथा—उच्चैः, नीचः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम् इत्यादि। जो अनियत लिङ्गवाले शब्द हैं, वे 'लिङ्गमात्राधिक्य'के उदाहरण हैं। यथा—तटः, तटी, तटम् इत्यादि। 'वचन' कहते हैं—संख्याको। उसके उदाहरण—एकः, द्वौ, बहवः इत्यादि हैं।