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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 774, कुल 878 में से

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पृष्ठ 774
  • अध्याय ३५१ * ७४७

प्रथमा१ विभक्तिका प्रयोग होता है। जो किया जाता है, उसकी ‘कर्म’ संज्ञा है। कर्ममें द्वितीया२ विभक्ति होती है। जिसकी सहायतासे कर्म किया जाता है, उसको ‘करण’ कहते हैं तथा जो कार्य करता है, उसे ‘कर्ता’ कहते हैं। तिङ्, कृत्, तद्धित प्रत्ययों और समाससे अनुक्त कर्तामें और करणमें भी तृतीया३ विभक्ति होती है। किसी भी कारकके रहते हुए कर्तामें भी तृतीया होती है। यथा—‘व्रजं नेतव्या गावः कृष्णेन।’ [यहाँ ‘कृत्यानां कर्तरि वा।’—इस सूत्र (२।३।७१) के अभिप्रायका उपजीव्यभाव लक्षित होता है।] सम्प्रदानमें चतुर्थी४ विभक्ति होती है। जिसको कुछ देनेकी इच्छा हो, उसे ‘सम्प्रदान’ कहा गया है। जिससे कोई पृथक् होता हो, जिससे कुछ लेता या ग्रहण करता हो तथा जिससे भयकी प्राप्ति होती हो, उसकी ‘अपादान’ संज्ञा होती है। अपादानमें पञ्चमी५ विभक्ति होती है। जहाँ स्व-स्वामिभाव या जन्य-जनकभाव आदि सम्बन्धका बोध होता हो, वहाँ षष्ठी६ विभक्तिका प्रयोग होता है। जो आधार हो, उसकी ‘अधिकरण’ संज्ञा होती है। ‘अधिकरण’में सप्तमी७ विभक्तिका प्रयोग होता है। जहाँ एकार्थ विवक्षित हो, वहाँ एकवचन और जहाँ द्वित्व विवक्षित हो, वहाँ द्विवचनका प्रयोग करना चाहिये। बहुत्वकी विवक्षा होनेपर बहुवचनका प्रयोग होता है। अब शब्दोंके सिद्ध रूप बताता हूँ—वृक्षः, सूर्यः, अम्बुवाहः, अर्कः, हे रवे ! हे द्विजातयः !८॥ २४–२९॥

विप्रौ (विप्र+प्र० द्वि०), गजान् (गज+द्वि० बहु०), महेन्द्रेण (महेन्द्र+तृ० एक०), यमाभ्याम् (यम+तृ० द्वि), अनिलैः (अनिल+तृ० बहु०), कृतम् (कृत नपुंसकलिङ्ग प्रथमा-एकवचन), रामाय (राम+च० एक०), मुनिवर्याभ्याम् (मुनिवर्य+च० द्वि०), केभ्यः (किम्+च० बहु०), धर्मात् (धर्म+पं० एक०), हरौ (हरि+सप्त० एक०), रतिः (रति+प्र० एक०), शराभ्याम् (शर+पञ्च० द्वि०), पुस्तकेभ्यः (पुस्तक+पञ्च० बहु०), अर्थस्य (अर्थ+षष्ठी एक०), ईश्वरयोः (ईश्वर+षष्ठी द्वि०), गतिः (गति+प्र० एक०), बालानाम् (बाल+षष्ठी बहु०), सज्जने (सज्जन+सप्त० एक०), प्रीतिः (प्रीति+प्र० एक०), हंसयोः (हंस+सप्त० द्वि०), कमलेषु (कमल+सप्त० बहु०), बालकोंकी सज्जनमें प्रीति होती है और हंसके जोड़ेकी कमलोंमें—यह इकतीसवें श्लोकके उत्तरार्धका वाक्यार्थ हैं९॥ ३०–३१॥

इसी प्रकार ‘काम’, ‘महेश’ आदि शब्द


१. सम्बोधनमें प्रथमाका उदाहरण—‘हे राम! हे रामौ!’ इत्यादि। २. द्वितीयाका उदाहरण—हरिं भजति। ३. उदा०—रामेण बाणेन हतो वाली। यहाँ ‘राम’ शब्द ‘तिङ्’ प्रत्ययद्वारा अनुक्त कर्ता है। अतः उसमें तृतीया हुई है। ‘बाण’ करण है, इससे उसमें तृतीया हुई है। ४. उदा०—ब्राह्मणाय गां ददाति। ५. उदा०—ग्रामाद् अपैति, आयाति वा। शिष्यो गुरोर्विद्यामादत्ते गृह्णाति वा। चोराद् बिभेति। जो भयका हेतु हो, उसीमें पञ्चमी होती है। अतः ‘अरण्ये बिभेति’ इसमें पञ्चमी नहीं हुई; क्योंकि भयका हेतु ‘अरण्य’ नहीं, व्याघ्र आदि हैं। ६. उदा०—राज्ञः पुरुषः, देवदत्तस्य पुत्रः इत्यादि। ७. उदा०—‘कटे आस्ते’ इत्यादि।

८. एकार्थमें एकवचन ‘रामः’ इत्यादि। द्वित्वविवक्षामें ‘रामौ’ इत्यादि। बहुत्वविवक्षामें बहुवचन ‘रामाः’ इत्यादि। ‘वृक्ष’ शब्दका प्रथमा विभक्तिके एकवचनमें ‘वृक्षः’—यह रूप सिद्ध होता है। इसके शेष रूप ‘राम’ शब्दकी तरह जानने चाहिये। इसी तरह सूर्यः, अम्बुवाहः और अर्कः—इनको क्रमशः सूर्य, अम्बुवाह और अर्क शब्दका प्रथमान्त एकवचन रूप समझना चाहिये। ‘वृक्ष’ और ‘सूर्य’ शब्दका अर्थ सर्वविदित है। ‘अम्बुवाह’ और ‘अर्क’ शब्द—ये क्रमशः मेघ और सूर्यके वाचक हैं। हे रवे !—यह ‘रवि’ शब्दका सम्बोधनमें प्रथमान्त एकवचन रूप है। हे द्विजातयः !—यह ‘द्विजाति’ शब्दका सम्बोधनमें प्रथमान्त बहुवचनरूप है। ‘रवि’ शब्द सूर्यका एवं ‘द्विजाति’ शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंका वाचक है।

९. इन दो श्लोकोंमें जो शब्द आये हैं, उनका पृथक्-पृथक् अर्थ इस प्रकार जानना चाहिये। विप्रौ=दो ब्राह्मण। गजान्=हाथियोंको। महेन्द्रेण=महेन्द्रसे। यमाभ्याम्=दो यमोंसे। अनिलैः=हवाओंसे। कृतम्=किया गया। रामाय=रामके लिये। मुनिवर्याभ्याम्=दो मुनिवरोंके लिये। केभ्यः=किनके लिये। धर्मात्=धर्मसे। हरौ=हरिमें। रतिः=अनुराग। शराभ्याम्=दो बाणोंसे। पुस्तकेभ्यः=पुस्तकोंसे। अर्थस्य=अर्थका। ईश्वरयोः=दो ईश्वरोंकी। गतिः=प्राप्ति। बालानाम्=बालकोंकी। सज्जने=सत्पुरुषमें। प्रीतिः=प्रेम। हंसयोः=दो हंसोंकी। कमलेषु=कमलोंमें।