अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 776, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३५१ * ७४९
(रवि+तृ० द्वि०), रविभिः (रवि०+तृ० बहु०), 'देहि वह्नये यः समागतः — जो आया है उसे वह्नि (अग्नि)-को समर्पित कर दो।' वह्नये (वह्नि+च० एक०), अग्नेः (अग्नि+षष्ठी एक०), अग्न्योः (अग्नि+षष्ठी द्वि०), अग्नीनाम् (अग्नि+षष्ठी बहु०), कवौ (कवि+सप्त० एक०), कव्योः (कवि+सप्त० द्वि०), कविषु (कवि+सप्त० बहु०) ॥ ३७-४० ॥
इसी प्रकार सुसृति, अभ्रान्ति, सुकीर्ति और सुधृति आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। यहाँ इन सबका प्रथमाका एकवचनान्त रूप दिया गया है। यथा—सुसृतिः, अभ्रान्तिः, सुकीर्तिः, सुधृतिः। अब 'सखि' शब्दके रूप दिये जाते हैं—१-सखा, सखायौ, सखायः। हे सखे! सत्पतिं व्रज। (हे मित्र! तुम अच्छे स्वामीके पास जाओ।) 'हे सखे' यह सखि शब्दका सम्बोधनमें एकवचनान्त रूप है। २-सखायम्, सखायौ, सखीन्। ३-सख्या आगतः (मित्रके साथ आया)। ४-सख्ये दद (मित्रको दो)। ५-सख्युः। ६-सख्युः, सख्योः, सखीनाम्। ७- सख्यौ, सख्योः, सखिषु। शेष रूप 'कवि' शब्दके समान जानने चाहिये। पत्या (पति+तृ० एक०), पत्ये (पति+च० एक०), पत्युः (पति+पञ्च० एक०), पत्युः (पति+षष्ठी एक०), पत्योः (पति+षष्ठी द्वि०), पत्यौ (पति+सप्त० एक०)। 'पति' शब्दके शेष रूप 'अग्नि' शब्दके समान जानने चाहिये। (यदि 'पति' शब्द समासमें आबद्ध हो तो उसके सम्पूर्ण रूप 'कवि' शब्दके समान ही होंगे।) अब 'द्वि' शब्दके पुँल्लिङ्ग रूप दिये जाते हैं, यह नित्य द्विवचनान्त है। १, २—द्वौ। ३, ४, ५—द्वाभ्याम्। ६, ७—द्वयोः। यह दो संख्याका वाचक है ॥ ४१-४३ ॥
अब संख्या तीनके वाचक नित्य बहुवचनान्त पुँल्लिङ्ग 'त्रि' शब्दके रूप दिये जाते हैं—१-त्रयः। २-त्रीन्। ३-त्रिभिः। ४, ५-त्रिभ्यः। ६-त्रयाणाम्। ७-त्रिषु।—ये क्रमशः सात विभक्तियोंके रूप हैं। अब 'कति' शब्दके रूप दिये जाते हैं—१-कति। २-कति। शेष रूप 'कवि' शब्दके समान होते हैं। यह नित्य बहुवचनान्त शब्द है। अब 'नेता'के अर्थमें प्रयुक्त होनेवाले 'नी' शब्दके रूप उद्धृत किये जाते हैं—१-नीः, नियौ, नियः। सम्बोधन—हे नीः, हे नियौ, हे नियः। २-नियम्, नियौ, नियः। ३-निया, नीभ्याम्, नीभिः। ४-निये, नीभ्याम्, नीभ्यः। ५-नियः, नीभ्याम्, नीभ्यः। ६-नियः, नियोः, नियाम्। ७-नियि*, नियोः नीषु। सुश्रीः (सुश्री+प्र० एक०)। इसी तरह 'सुधीः' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'ग्रामणीः पूजयेद्धरिम्' गाँवका मुखिया श्रीहरिका पूजन करे। 'ग्रामणी' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। २-ग्रामण्यम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। ३-ग्रामण्या, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभिः। ४-ग्रामण्ये, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभ्यः। ५-ग्रामण्यः, ग्रामणीभ्याम्, ग्रामणीभ्यः। ६-ग्रामण्यः, ग्रामण्योः, ग्रामण्याम्। ७-ग्रामण्याम्, ग्रामण्योः, ग्रामणीषु। इसी तरह 'सेनानी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'सुभू' शब्दके रूप—सुभूः, सुभुवौ इत्यादि हैं। 'स्वयम्भू' शब्दके रूप—१-स्वयम्भूः, स्वयम्भुवौ, स्वयम्भुवः। २-स्वयम्भुवम्, स्वयम्भुवौ, स्वयम्भुवः। ३-स्वयम्भुवा। सप्तमीके एकवचनमें 'स्वयम्भुवि'। शेष 'सुभू' शब्दके समान। इसी तरह 'प्रतिभू' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'खलपू' शब्दके रूप—खलपूः, खलप्वौ, खलप्वः। खलप्वम् इत्यादि हैं। सप्तमीके एकवचनमें 'खलप्वि'—यह रूप होता है। इसी प्रकार 'शरपू' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये। 'क्रोष्टु' शब्दके क्रमशः पाँच रूप इस प्रकार होते हैं—क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः। क्रोष्टारम्, क्रोष्टारौ।
* पाणिनीय व्याकरणके अनुसार 'नी' शब्दका सप्तमी विभक्तिके एकवचनमें 'नियाम्'—यह रूप होता है। कौमार-व्याकरणमें 'नियि'—यह रूप उपलब्ध होता है। अतः इस अंशमें इन दोनों व्याकरणोंका अन्तर सुस्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।