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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 777, कुल 878 में से

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पृष्ठ 777

७५० * अग्निपुराण *

द्वितीयाके बहुवचनमें ‘क्रोष्टून्’—यह रूप बनता है। तृतीया आदिके स्वरादि प्रत्ययोंमें दो-दो रूप चलते हैं। एक ‘क्रोष्टु’ शब्दके, दूसरे ‘क्रोष्टृ’ शब्दके। यथा—क्रोष्टुना क्रोष्ट्रा, क्रोष्टवे क्रोष्ट्रे, क्रोष्टोः क्रोष्टुः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें ‘क्रोष्टूनाम्’—यह एक ही रूप होता है। सप्तमीके एकवचनमें क्रोष्टौ, क्रोष्टरि—ये रूप होते हैं। हलादि विभक्तियोंमें इसके रूप ‘शम्भु’ आदि शब्दोंके समान होते हैं। ‘पितृ’ शब्दके रूप— १-पिता, पितरौ, पितरः। सम्बोधनमें—हे पितः! हे पितरौ! हे पितरः! । २-पितरम्, पितरौ, पितॄन्। ३-पित्रा, पितृभ्याम्, पितृभिः। ४-पित्रे, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५-पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ५-पितुः, पितृभ्याम्, पितृभ्यः। ६-पितुः, पित्रोः, पितॄणाम्। ७-पितरि, पित्रोः, पितृषु॥ ४४—५०॥

इसी प्रकार ‘भ्रातृ’ और ‘जामातृ’ आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिये—१-भ्राता, भ्रातरौ, भ्रातरः। जामाता, जामातरौ, जामातरः इत्यादि। ‘नृ’ शब्दके रूप ‘पितृ’ शब्दके समान होते हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें उसके नॄणाम्, नृणाम्—ये दो रूप होते हैं। ‘कर्तृ’ शब्दके प्रारम्भिक पाँच रूप इस प्रकार होते हैं—कर्त्ता, कर्त्तारौ, कर्त्तारः। कर्त्तारम्, कर्त्तारौ। द्वितीयाके बहुवचनमें कर्तॄन्, षष्ठीके बहुवचनमें कर्तॄणाम् और सप्तमीके एकवचनमें कर्त्तरि रूप होते हैं। शेष रूप ‘पितृ’ शब्दके समान जानने चाहिये। इसी तरह उद्गातृ, स्वसृ और नप्तृ आदि शब्दोंके रूप होते हैं। उद्गाता$^१$ उद्गातारौ उद्गातारः। स्वसा$^२$, स्वसारौ, स्वसारः। नप्ता$^३$, नप्तारौ, नप्तारः इत्यादि। शेष रूप ‘कर्तृ’ शब्दके समान होते हैं। ‘स्वसृ’ शब्दका द्वितीयाके बहुवचनमें ‘स्वसॄः’ रूप होता है। ‘सुरै’$^४$ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—सुराः, सुरायौ, सुरायः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें सुरायाम् और सप्तमीके एकवचनमें सुरायि रूप होते हैं। ‘गो’ शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं। १-गौः$^५$, गावौ, गावः। २-गाम्, गावौ, गाः। ३-गवा गोभ्याम्, गोभिः इत्यादि। षष्ठी—गोः, गवोः, गवाम्। सप्तमी—गवि, गवोः, गोषु। इसी प्रकार ‘द्यौ’ तथा ‘ग्लौ’ शब्दोंके रूप जानने चाहिये। ये स्वरान्त शब्द पुँल्लिङ्गमें नायक (प्रधान) हैं॥ ५१—५३॥

अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप बताये जाते हैं। ‘सुवाच्’ शब्दके रूप यों जानने चाहिये—१-सुवाक्$^६$, सुवाग्, सुवाचौ, सुवाचः। २-सुवाचम्, सुवाचौ, सुवाचः। ३-सुवाचा, सुवाग्भ्याम्, सुवाग्भिः। इत्यादि। (सप्त० बहुवचनमें—) सुवाक्षु। इसी तरह ‘दिक्’ आदि शब्दोंके रूप होते हैं। प्राञ्च् शब्दके रूप—१-प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः। २-भोः प्राञ्चं व्रज (हे भाई! तुम प्राचीन महापुरुषोंके पथपर चलो)। यहाँ ‘प्राञ्चम्’ यह द्वितीया विभक्तिका एकवचनान्त रूप है। ३-प्राचा, प्राग्भ्याम्, प्राग्भिः। षष्ठीके बहुवचनमें ‘प्राचाम्’ रूप होता है। सप्तमीके एकवचनमें ‘प्राचि’ द्विवचनमें ‘प्राचोः’ और बहुवचनमें ‘प्राक्षु’। पूजार्थक ‘प्राञ्च’ शब्दके सप्तमीके बहुवचनमें ‘प्राङ्क्षु’ ‘प्राङ्क्षु’। इसी प्रकार उदञ्च्, सम्यञ्च् और प्रत्यञ्च् शब्दोंके भी रूप होते हैं। यथा—‘उदङ्’$^८$, उदञ्चौ उदञ्चः इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें उदीची$^९$। सम्यङ्$^{१०}$ सम्यञ्चौ, सम्यञ्चः। स्त्रीलिङ्गमें समीची$^{११}$। प्रत्यङ्$^{१२}$


१. यज्ञमें ‘उद्गाता’ नामक ऋत्विज्, जो साम-मन्त्रोंका उच्चस्वरसे गान करता है। २. बहिन। ३. नाती। ४. उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न। ५. गाय-बैल। ६. उत्तम वक्ता। ७. पूर्ववर्ती विद्वान् या महात्मा। ८. ऊपर उठनेवाला। ९. उत्तर दिशा। १०. उत्तम आचरणवाला। ११. साध्वी। १२. अन्तर्मुख।