अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 778, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३५१ * \hfill ७५१
प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः। स्त्रीलिङ्गमें प्रतीची$^१$। इन सभी शब्दोंके 'शस्' आदि विभक्तियोंमें इस तरह रूप जानने चाहिये—उदीचः उदीचा। समीचः, समीचा। प्रतीचः, प्रतीचा इत्यादि। तिर्यङ्$^२$ तिर्यश्वः। सध्यङ्$^३$, सधीचः। विश्वद्र्यङ्, विश्वद्रीचः इत्यादि रूप भी पूर्ववत् बनते हैं। 'अमुम् अञ्चति'—इस विग्रहमें अमुमुयङ्$^४$, अदमुयङ्, अदद्र्यङ्—ये तीन रूप प्रथमा विभक्तिके एकवचनमें होते हैं। प्रथमाके बहुवचनमें 'अद्र्यञ्चः' रूप होता हैं और द्वितीयाके बहुवचनमें अमुमुईचः तथा अमुद्रीचः—ये रूप होते हैं। 'भ्याम्' विभक्तिमें पूर्ववत् 'अदद्र्यग्भ्याम्' रूपकी सिद्धि होती है। 'तत्त्वतृष्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—१-तत्त्वतृट्$^५$-तत्त्वतृड्, तत्त्वतृषौ, तत्त्वतृषः इत्यादि। तृतीया आदिके द्विवचनमें तत्त्वतृड्भ्याम्। 'तत्त्वतृड्भ्यां समागतः'—'वह तत्त्वज्ञानकी पिपासावाले दो व्यक्तियोंके साथ आया।' सप्तमीके एकवचनमें तत्त्वतृषि और बहुवचनमें तत्त्वतृट्सु—ये रूप होते हैं। इसी तरह 'काष्ठतक्ष्$^६$' आदि रूप होते हैं। यथा—काष्ठतट्, काष्ठतड्, काष्ठतक्षौ, काष्ठतक्षः इत्यादि। 'भिषज्' शब्दके रूप 'भिषक्$^७$, भिषग्-भिषजौ, भिषजः इत्यादि होते हैं। तृतीयाके द्विवचनमें 'भिषग्भ्याम्' और सप्तमीके एकवचनमें 'भिषजि' रूप होते हैं। इसी प्रकार 'जन्मभाक्' आदि भी जानने चाहिये। यथा—जन्मभाक्, जन्मभाग्, जन्मभाजौ, जन्मभाजः इत्यादि। 'मरुत्' शब्दके रूप इस प्रकार जाने—मरुत्, मरुद् मरुतौ मरुतः। मरुद्भ्याम् मरुति इत्यादि। इसी प्रकार 'शत्रुजित्$^{१०}$' आदि शब्दोंके भी रूप होते हैं। पूजनीय व्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाले 'भवत्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—भवान्$^{११}$, भवन्तौ, भवन्तः इत्यादि। षष्ठीके बहुवचनमें 'भवताम्'—यह रूप होता है। 'भू' धातुसे बननेवाले 'शतृ' प्रत्ययान्त 'भवत्' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—भवन्$^{१२}$, भवन्तौ भवन्तः इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें 'भवन्ती$^{१३}$' रूप होता है।
'महत्' शब्दके रूप—महान्$^{१४}$, महान्तौ, महान्तः। महती, इत्यादि। 'भगवत्' आदि शब्दोंके रूप 'भवत्' शब्दकी तरह—भगवान्$^{१५}$ भगवन्तौ भगवन्तः इत्यादि होते हैं। इसी प्रकार 'मघवत्' शब्दके रूप जानने चाहिये। यथा—मघवान्$^{१६}$, मघवन्तौ मघवन्तः इत्यादि। 'अग्निचित्' शब्दके रूप—अग्निचित्-द्$^{१७}$, अग्निचितौ, अग्निचितः इत्यादि होते हैं। सप्तमीके एकवचनमें 'अग्निचिति' और बहुवचनमें 'अग्निचित्सु'—ये रूप होते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य 'तत्त्ववित्$^{१८}$' 'वेदवित्$^{१९}$' तथा 'सर्ववित्$^{२०}$' शब्दोंके रूप होते हैं॥ ५४—६१ ॥
'राजन्' शब्दके सिद्ध रूप इस प्रकार जानने चाहिये। यथा—१-राजा, राजानौ, राजानः। २-राजानम् राजानौ राज्ञः। ३-राज्ञा राजभ्याम् राजभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'राज्ञि' और 'राजनि'—ये दो रूप होते हैं। सम्बोधनमें—हे राजन्! इत्यादि। 'यज्वन्' शब्दके—यज्वा$^{२१}$ यज्वानौ यज्वानः इत्यादि रूप होते हैं। 'करिन्' और 'दण्डिन्' इत्यादि इन्तन्त शब्दोंके रूप इस प्रकार होते हैं—करी$^{२२}$ करिणौ करिणः। दण्डी$^{२३}$ दण्डिनौ दण्डिनः इत्यादि। 'पथिन्' शब्दके सिद्ध रूप यों हैं—१-पन्थाः$^{२४}$ पन्थानौ पन्थानः। २-पन्थानम् पन्थानौ पथः। ३-पथा पथिभ्याम् पथिभिः—इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'पथि' रूप होता
१. पश्चिम दिशा। २. तिर्यग्दिशाकी ओर जानेवाले पशु-पक्षी आदि। ३. सन्मार्गगामी। ४. उसकी ओर जानेवाला। ५. तत्त्वज्ञानके लिये प्यासा रहनेवाला। ६. काठ काटनेवाला। ७. वैद्य या चिकित्सक। ८. जन्मधारी। ९. वायु। १०. शत्रुविजयी। ११. आप। १२. होता हुआ। १३. होती हुई। १४. बड़ा, श्रेष्ठ। १५. छः प्रकारके सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न परमात्मा। १६. इन्द्र। १७. अग्निका चयन करनेवाला। १८. तत्त्वज्ञ। १९. वेदवेत्ता। २०. सर्वज्ञ। २१. यजमान। २२. हाथी। २३. दण्डधारी संन्यासी। २४. मार्ग।