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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 779, कुल 878 में से

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पृष्ठ 779

७५२ * अग्निपुराण *


है। इसी प्रकार ‘मथिन्’ शब्दका भी रूप जानना चाहिये। यथा—मन्थाः$^१$, मन्थानौ, मन्थानः, इत्यादि। ऋभुक्षाः$^२$, ऋभुक्षाणौ, ऋभुक्षाणः—इत्यादि। पन्थादिमें पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षन्—ये तीन शब्द आते हैं। पाँच संख्याका वाचक ‘पञ्चन्’ शब्द नित्य बहुवचनान्त है। उसके रूप इस प्रकार होते हैं—१-२-पञ्च$^३$, ३-पञ्चभिः, ४-५-पञ्चभ्यः, ६-पञ्चानाम्, ७-पञ्चसु। ‘प्रतान्’$^४$ शब्दके रूप—प्रतान्, प्रतानौ, प्रतानः, इत्यादि हैं। तृतीया आदिके द्विवचनमें ‘प्रतान्भ्यां’ रूप होता है। सम्बोधनमें ‘हे प्रतान्!’। ‘सुशर्मन्’ शब्दके रूप—सुशर्मा$^५$ सुशर्माणौ, सुशर्माणः।—इत्यादि हैं। शस्, ङसि, ङस्—इन विभक्तियोंमें ‘सुशर्मणः’ रूप होता है। अप् शब्द नित्यबहुवचनान्त और स्त्रीलिङ्ग है। इसके रूप यों जानने चाहिये—१-आपः$^६$। २-अपः। ३-अद्भिः। ४-५अद्भ्यः। ६-अपाम्। ७-अप्सु। ‘प्रशाम्’ शब्दके रूप प्रशान्$^७$, प्रशामौ, प्रशामः इत्यादि हैं। सप्तमीके एकवचनमें ‘प्रशामि’ रूप होता है। ‘किम्’ शब्दके रूप—१-कः$^८$, कौ, के। २-कम्, कौ, कान् ३-केन, काभ्याम्, कैः—इत्यादि। सप्तमी बहुवचनमें—केषु। शेष रूप सर्ववत् होते हैं। ‘इदम्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-अयम्$^९$, इमौ, इमे। २-इमम्, इमौ, इमान्। ‘इमान्नय’ (अर्थात् इन्हें ले जाओ) ३-अनेन, आभ्याम्, एभिः। ४-अस्मै, आभ्याम्, एभ्यः। ५-अस्मात्, आभ्याम्, एभ्यः। ६-अस्य, अनयोः, एषाम्। ७-अस्मिन्, अनयोः, एषु। ‘चतुर्’ शब्द नित्य बहुवचनान्त है। पुँल्लिङ्गमें इसके रूप यों होते हैं—१-चत्वारः$^{१०}$, २-चतुरः। ३-चतुर्भिः। ४-५-चतुर्भ्यः। ६-चतुर्णाम्। ७-चतुर्षु। जिसकी वाणी अच्छी हो, वह पुरुष श्रेष्ठ माना जाता है। उसे ‘सुगीः’ कहते हैं। यह प्रथमाका एकवचन है। ‘सुगिर्’ शब्दका सप्तमीके एकवचनमें ‘सुगिरि’ रूप होता है। ‘सुदिव्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-सुद्यौः$^{११}$, सुदिवौ, सुदिवः इत्यादि। तृतीया आदिके द्विवचनमें ‘सुद्युभ्याम्’ रूप होता है। ‘विश्’ शब्दके रूप—विट्।विड्$^{१२}$, विशौ, विशः। विड्भ्याम् इत्यादि होते हैं। सप्तमीके बहुवचनमें ‘विक्षु’ रूप होता है। ‘यादृश्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—यादृक्-ग्$^{१३}$, यादृशौ, यादृशः। यादृशा, यादृग्भ्याम् इत्यादि। ‘षष्’ शब्द नित्य बहुवचनान्त है। इसके रूप यों हैं—१-२-षट्$^{१४}$-षड्। ३-षड्भिः। ४-५-षड्भ्यः। ६-षण्णाम्। ७-षट्सु। ‘सुवचस्’ शब्दके रूप इस प्रकार हैं—१-सुवचाः$^{१५}$, सुवचसौ, सुवचसः। २-सुवचसम्, सुवचसौ, सुवचसः। ३-सुवचसा, सुवचोभ्याम्, सुवचोभिः—इत्यादि। सम्बोधनमें—हे सुवचः! ‘उशनस्’ शब्दके रूप यों हैं—१-उशना$^{१६}$, उशनसौ, उशनसः। हे उशनः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें ‘उशनसि’ रूप होता है। ‘पुरुदंशस्’ और ‘अनेहस्’ शब्दोंके रूप भी इसी प्रकार होते हैं। यथा—१-पुरुदंशा$^{१७}$, पुरुदंशसौ, पुरुदंशसः। अनेहा$^{१८}$, अनेहसौ, अनेहसः इत्यादि। ‘विद्वस्’ शब्दके रूप यों जानने चाहिये—विद्वान्$^{१९}$, विद्वांसौ, विद्वांसः, हे विद्वन् इत्यादि। ‘विद्वांस उत्तमाः’ (विद्वान् पुरुष उत्तम होते हैं)। चतुर्थी विभक्तिके एकवचनमें ‘विदुषे’ रूप होता है। ‘विदुषे नमः’ (विद्वान्‌को नमस्कार है)। द्विवचनमें ‘विद्वद्भ्याम्’ और सप्तमीके बहुवचनमें ‘विद्वत्सु’ रूप होते हैं। ‘स विद्वत्सु बभूविवान्’


१. मथानी। २. इन्द्र। ३. पाँच। ४. अधिक विस्तार करनेवाला। ५. उत्तम कल्याणसे युक्त। ६. जल। ७. अत्यन्त शान्त। ८. कौन। ९. यह। १०. चार। ११. जब आकाश स्वच्छ हो, वह समय। १२. वैश्य। १३. जैसा। १४. छः। १५. उत्तम वचन बोलनेवाला। १६. शुक्राचार्य। १७. अधिक डँसनेवाला। १८. काल या समय। १९. पण्डित।