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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 780, कुल 878 में से

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पृष्ठ 780
* अध्याय ३५२ *७५३

(वह विद्वानोंमें प्रकट हुआ।)। 'बभूविवस्' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—बभूविवान्$^१$ बभूविवांसौ, बभूविवांसः—इत्यादि। इसी प्रकार 'पेचिवान्$^२$, पेचिवांसौ, पेचिवांसः। श्रेयान्$^३$ श्रेयांसौ, श्रेयांसः—इत्यादि रूप जानने चाहिये। 'श्रेयस्' शब्दके द्वितीयाके बहुवचनमें 'श्रेयसः' रूप होता है। अब 'अदस्' शब्दके पुँल्लिङ्गमें रूप बताते हैं—१-असौ$^४$, अमू, अमी। २-अमुम्, अमू, अमून्। ३-अमुना, अमूभ्याम्, अमीभिः। ४-अमुष्मै, अमूभ्याम्, अमीभ्यः। ५-अमुष्मात्, अमूभ्याम्, अमीभ्यः। ६-अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम्। ७-अमुष्मिन्, अमुयोः, अमीषु। 'गोधुग्भिरागतः' (वह गाय दुहनेवालोंके साथ आया)। 'गोदुह्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—गोधुक्$^५$-ग्, गोदुहौ, गोदुहः। गोधुक्षु इत्यादि। इसी प्रकार, 'दुह्' आदि अन्य शब्दोंसे रूप जानने चाहिये। 'मित्रद्रुह्$^६$' शब्दके रूप इस प्रकार जानने चाहिये—मित्रध्रुक्-ग्, मित्रध्रुद्-ड्, मित्रद्रुहौ, मित्रद्रुहः। मित्रद्रुहा, मित्रध्रुग्भ्याम्, मित्रध्रुड्भ्याम्, मित्रध्रुग्भिः, मित्रध्रुड्भिः इत्यादि। इसी प्रकार 'चित्रद्रुह्' आदि शब्दोंके भी रूप जानने चाहिये। 'स्वलिह्$^७$' शब्दके रूप यों होते हैं—स्वलिट्-स्वलिड्, स्वलिहौ, स्वलिहः। स्वलिहा, स्वलिड्भ्याम् इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें 'स्वलिहि' रूप होता है। 'अनडुह्' शब्दके रूप यों हैं—१-अनड्वान्$^८$, अनड्वाहौ, अनड्वाहः। २-अनड्वाहम्, अनड्वाहौ, अनडुहः, ३-अनडुहा, अनडुद्भ्याम्, अनडुद्भिः। सप्तमीके बहुवचनमें 'अनडुत्सु' (सम्बोधनमें 'हे अनड्वन्')। अजन्त और हलन्त शब्द पुँल्लिङ्गमें बताये गये। अब स्त्रीलिङ्गमें बताये जाते हैं॥ ६२–७३ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सामान्यतः सुब्-विभक्तियोंके सिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५१ ॥


तीन सौ बावनवाँ अध्याय

स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप

भगवान् स्कन्द कहते हैं—आकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'रमा' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं,—रमा (प्र०—ए०), रमे (प्र०—द्वि०), रमाः (प्र०—ब०), 'रमाः शुभाः' (रमाएँ शुभस्वरूपा हैं)। रमाम् (द्वि०—ए०), रमे (द्वि०—द्वि०), रमाः (द्वि०—ब०)। रमया (तृ०—ए०), रमाभ्याम् (तृ०—द्वि०), रमाभिः (तृ०—ब०), 'रमाभिः कृतमव्ययम्।'—(रमाओंने अव्यय (अक्षय) पुण्य किया है)। रमायै (च०—ए०), रमाभ्याम् (च०, पं०—द्वि०), रमायाः (प०, ष०—ए०), रमयोः (ष०, स०—द्वि०), 'रमयोः शुभम्' (दो रमाओंका शुभ)। रमाणाम् (ष०—ब०)। रमायाम् (स०—ए०), रमासु (स०—ब०)। इसी प्रकार 'कला' आदि शब्दोंके रूप होते हैं। आकारान्त 'जरा' शब्दके कुछ रूप भिन्न होते हैं—जरा (प्रथमा विभक्ति एक०)-में जरसौ—जरे (प्र०, द्वि०—द्वि०), जरसः—जराः (प्र०, द्वि०—बहु०), जरसम्—जराम् (द्वि०—ए०), जरासु (स०—ब०)। अब 'सर्वा' शब्दके रूप कहते हैं—१-सर्वा, सर्वे, सर्वाः। २-सर्वाम् सर्वे सर्वाः। सर्वया


१. हुआ। २. जो भूतकालमें पाचक रहा हो, वह। ३. श्रेष्ठ। ४. यह, वह। ५. गाय दुहनेवाला। ६. मित्रद्रोही। ७. अपनेको चाटनेवाला। ८. गाड़ी खींचनेवाला बैल।

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