सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 781, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 781

७५४ * अग्निपुराण *


(तृ०—ए०), सर्वस्यै (च०—ए०), 'सर्वस्यै देहि' (सबको दो)। सर्वस्याः (प०—ए०), सर्वस्याः (ष०—ए०), सर्वयोः (ष०, स०—द्वि०), शेष रूप 'रमा' शब्दके समान होते हैं। स्त्रीलिङ्ग नित्य द्विवचनान्त द्वि-शब्दके रूप ये हैं—द्वे (प्र०—द्वि०), द्वे (द्वि०—द्वि०), 'त्रि' शब्दके रूप ये हैं—१-२—तिस्त्रः। तिसृणाम् (ष०—ब०)। 'बुद्धि' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—बुद्धिः (प्र०—ए०), बुद्ध्या (तृ०—ए०), बुद्ध्यै-बुद्धयै (च०—ए०), बुद्धेः (प०, ष०—ए०)। 'मति' शब्दके सम्बोधनके एकवचनमें 'हे मते'—यह रूप होता है। 'मुनीनाम्' (यह 'मुनि' शब्दके षष्ठी—बहुवचनका रूप है) और शेष रूप 'कवि' शब्दके समान होते हैं। 'नदी' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं—नदी (प्र०—ए०), नद्यौ (प्र० द्वि०—द्वि०), नदीम् (द्वि०—ए०), नदीः (द्वि०—ब०), नद्या (तृ०—ए०), नदीभिः (तृ०—ब०), नद्यै (च०—ए०), नद्याम् (स०—ए०), नदीषु (स०—ब०), इसी प्रकार 'कुमारी' और 'जृम्भणी' शब्दके रूप होते हैं। 'श्री' शब्दके रूप भिन्न होते हैं—'श्रीः' (प्र०—ए०), श्रियौ (प्र०—द्वि०—द्वि०), श्रियः (प्र०, द्वि०—ब०), श्रिया (तृ०—ए०), श्रियै—श्रियै (च०—ए०)। 'स्त्री' शब्दके रूप अधोलिखित हैं—स्त्रीम्-स्त्रियम् (द्वि०—ए०), स्त्रीः—स्त्रियः (द्वि०—ब०), स्त्रिया (तृ०—ए०), स्त्रियै (च०—ए०), स्त्रियाः (प०, ष०—ए०), स्त्रीणाम् (ष० ब०), स्त्रियाम् (स०—ए०)। स्त्रीलिङ्ग 'ग्रामणी' शब्दका सप्तमीके एकवचनमें 'ग्रामण्याम्' और 'धेनु' शब्दका चतुर्थीके एकवचनमें 'धेन्वै, धेनवे' रूप होते हैं॥ १-७॥

'जम्बू' शब्दके रूप ये हैं—जम्बूः (प्र०—ए०) जम्ब्वौ (प्र०—द्वि०—द्वि०), जम्बूः (द्वि०—ब०), जम्बूनाम् (ष०—ब०)। 'जम्बूनां फलं पिब।' (जामुनके फलोंका रस पीयो)। 'वर्षाभू' आदि शब्दके कतिपय रूप ये हैं—वर्षाभ्वौ (प्र०, द्वि०—द्वि०)। पुनर्भवौ (प्र०, द्वि०—द्वि०)। मातृः (मातृशब्दका द्वि०—ब०)। गौः (गो+प्र०—ए०)। नौः (नौका) (प्र०—ए०)। 'वाच्' शब्दके रूप ये हैं—वाक्—वाग् (प्र०—ए०) (वाणी), वाचा (तृ०—ए०) वाग्भिः (तृ०—ब०)। वाक्षु (स०—ब०)। पुष्पहारवाचक 'स्रज्' शब्दके रूप ये हैं—स्रग्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०)। स्रजि (स०—ए०) स्रजोः (ष० स०—द्वि०)। लतावाचक 'वीरुध्' शब्दके रूप ये हैं—वीरुद्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि) वीरुत्सु (स०—ब०)। स्त्रीलिङ्गमें प्रथमाके एकवचनमें उकारानुबन्ध 'भवत्' शब्दका 'भवती' और ऋकारानुबन्ध 'भवत्' शब्दका 'भवन्ती' रूप होता है। स्त्रीलिङ्ग 'दीव्यत्' शब्दका प्रथमाके एकवचनमें 'दीव्यन्ती' रूप होता है। स्त्रीलिङ्गमें 'भात्' शब्दके भी प्रथमाके एकवचनमें भाती—भान्ती—ये दो रूप होते हैं। स्त्रीलिङ्ग 'तुदत्' शब्दके भी प्रथमाके एकवचनमें तुदती—तुदन्ती—ये दो रूप होते हैं*। स्त्रीलिङ्गमें प्रथमाके एकवचनमें 'रुदत्' शब्दका रुदती, 'रुन्धत्' शब्दका रुन्धती, 'गृह्णत्' शब्दका गृह्णती और 'चोरयत्' शब्दका चोरयन्ती रूप होता है। 'दृषद' शब्दके रूप ये हैं—दृषद (प्र०—ए०), दृषदभ्याम् (तृ०—च० एवं पं०—द्वि०), दृषदि (स०—ए०)। विशेषविदुषी (प्र०—ए०)। प्रथमाके एकवचनमें 'कृति' शब्दका 'कृतिः' रूप होता है। 'समिध्' शब्दके रूप ये हैं—समित्-समिद् (प्र०—ए०), समिद्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—


* 'भात्' और 'तुदत्' दोनोंके आगे स्त्रीत्वविवक्षामें 'ङीप्' प्रत्यय होनेपर उसकी 'नदी' संज्ञा होनेसे 'आच्छीनद्योर्नुम्' (पा० सू० ७।१।८०)-से वैकल्पिक 'नुम्' का आगम होता है; अतः 'भाती, भान्ती' तथा 'तुदती, तुदन्ती' दो रूप होते हैं। यह पाणिनि-व्याकरणका नियम है। कुमारने जो दो रूप माने हैं, उसकी पाणिनिके सूत्रद्वारा भी सिद्धि होती है।