अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 782, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ३५३ * ७५५
द्वि०), समिधि (स०—ए०)। 'सीमन्' शब्दके रूप इस प्रकार हैं—सीमा (प्र०—ए०), सीम्नि-सीमनि (स०—ए०)। तृ०, च० एवं पं० के द्विवचनमें 'दामनी' शब्दका दामनीभ्याम्, 'ककुभ्' शब्दका ककुब्भ्याम् रूप होता है। 'का'—'किम्' शब्द प्र०—ए० इयम्— (इदम् शब्द प्र०—ए०), आभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०), 'इदम्' शब्दके सप्तमीके बहुवचनमें 'आसु' रूप होता है।, 'गिर्' शब्दके रूप ये हैं—गीर्भ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०) गिरा (तृ०—ए०), गीर्षु (स०—ब०)। प्रथमाके एकवचनमें 'सुभूः' और 'सुपूः' रूप सिद्ध होते हैं। 'पुर्' शब्दका तृतीयाके एकवचनमें 'पुरा' और सप्तमीके एकवचनमें 'पुरि' रूप होता है। 'दिव्' शब्दके रूप ये हैं—द्यौः (प्र०—ए०), द्युभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि०), दिवि (स०—ए०), द्युषु (स०—ब०)। तादृश्या (तृ०—ए०), तादृशी (प्र०—ए०)—ये 'तादृशी' शब्दके रूप हैं। 'दिश्' शब्दके रूप दिक्-दिग् दिशौ दिशः इत्यादि हैं। यादृश्याम् (स०—ए०), यादृशी (प्र०—ए०)—ये 'यादृशी' शब्दके रूप हैं। सुवचोभ्याम् (तृ०, च० एवं पं०—द्वि) सुवचस्सु (स०—ब०)—ये 'सुवचस्' शब्दके रूप हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'अदस्' शब्दके कतिपय रूप ये हैं—असौ (प्र०—ए०), अमू (प्र० द्वि०—द्वि०), अमूम् (द्वि०—ए०), अमूः (प्र०, द्वि०—ब०), अमूभिः (तृ०—ब०), अमुया (तृ०—ए०), अमुयोः (ष०, स०—द्वि०) ॥८—१३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूपोंका कथन' नामक तीन सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५२॥
तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय
नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूप
भगवान् स्कन्द कहते हैं—नपुंसकलिङ्गमें 'किम्' शब्दके ये रूप होते हैं—(प्रथमा) किम्, के, कानि। (द्वितीया) किम्, के, कानि। शेष रूप पुँल्लिङ्गवत् हैं। जलम् (प्र० ए०), सर्वम् (प्र० ए०)। पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, स्व और अन्तर—इन सब शब्दोंके रूप इसी प्रकार होते हैं। सोमपम् (प्र० द्वि० ए०), सोमपानि (प्र० द्वि० ब०)—ये 'सोमप' शब्दके रूप हैं। 'ग्रामणी' शब्दके नपुंसकलिङ्गमें इस प्रकार रूप होते हैं—ग्रामणि (प्र० द्वि०-ए०), ग्रामणिनी (प्र० द्वि०-द्वि०), ग्रामणीनि (प्र०, द्वि०-ब०)। इसी प्रकार 'वारि' शब्दके रूप होते हैं—वारि (प्र० द्वि०-ए०), वारिणी (प्र०, द्वि०-द्वि०), वारीणि (प्र० द्वि०-ब०), वारीणाम् (ष०- ब०), वारिणि (स० ए०)। शुचये-शुचिने (च०-ए०) और मृदुने-मृदवे (च०-ए०) ये क्रमसे 'शुचि' और 'मृदु' शब्दके रूप हैं। त्रपु (प्र०, द्वि०-ए०), त्रपुणी (प्र०, द्वि०-द्वि०), त्रपूणाम् (ष०-ब०)—ये 'त्रपु' शब्दके कतिपय रूप हैं। 'खलपुनि' तथा 'खलप्वि'—ये दोनों नपुंसक 'खलपू' शब्दके सप्तमी, एकवचनके रूप हैं। कर्त्रा—कर्तृणा (तृ०-ए०), कर्तृणे—कर्त्रे (च० ए०)—ये 'कर्तृ' शब्दके रूप हैं। अतिरि (प्र० द्वि०-ए०), अतिरिणी (प्र०, द्वि०-द्वि०)—ये 'अतिरि' शब्दके रूप हैं। अभिनि (प्र०, द्वि०-ए०), अभिनिनी (प्र०, द्वि०-द्वि०)—ये 'अभिनि' शब्दके रूप हैं। सुवचांसि (प्र०, द्वि०-ब०), यह 'सुवचस्' शब्दका रूप है। सुवाक्षु (स०-ब०)